December 10, 2007

बिहार में पंचायत चुनाव महिला-मुक्ति के सवाल

देशकाल

  • भारती एस. कुमार


जब स्वतंत्र-सोच के परिवारों की महिलाएं चुनाव-प्रचार में जोर-शोर से लग गइंर् तो इन 'मालिक` लोगों को अपनी औरतों को वोट मांगने के लिए बाहर भेजना पड़ा। घूंघट तो सिकुड़े ही; महिलाओं की अपनी पहचान भी बनी।



अस्‍सी के दश में शिवमूर्ति की एक कहानी 'तिरिया चरित्तर` चर्चित रही जिसमें ग्राम पंचायत ने शिउली नाम की औरत को व्यभिचारिणी घोषित कर उसके माथे को दाग दिया था, जबकि बलात्कारी उसका ससुर था। नब्बे के दशक में मैत्रेयी पुष्पा के चर्चित उपन्यास 'चाक` में नायिका सारंग सारी सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ती हुई प्रधान का चुनाव जीतकर दिखाती है। शिउली से सारंग तक का यह चित्रण नारी के अशक्त से सशक्त की ओर बढ़ने का संकेत है। मैत्रेयी पुष्पा का यह उपन्यास समाकालीन राजनीतिक-सामाजिक परिवेश में नारी सशक्तीकरण को नये रूप और अर्थ में ढालने का प्रयास है। इक्कीसवीं सदी के बिहार की औरतें भी अपने आप को इस नये रूप में ढालने के लिए तैयार हुइंर्। पंचायत-राज कानून लागू हुआ। विलम्ब से ही सही सन् २००१ में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण तो मिला, पर मुखिया, प्रखंड-प्रमुख अथवा जिला परिषद् अध्यक्ष आदि पदों के लिए कोई आरक्षण नहीं दिया गया, बल्कि इन्हें एकल-पद घोषित कर दिया गया।


राजनीतिक सत्ता के बदलाव के साथ सन् २००६ में बिहार में पंचायत के लिए ५० प्रतिशत आरक्षण की घोषणा के साथ चुनाव सम्पन्न हुए। निश्चित रूप में नई सरकार की इस पहल ने महिला-सशक्तीकरण की आशा को बल प्रदान किया। इस चुनाव में महिलाओं के बीच काफी उत्साह देखने को मिला। ग्रामीण समाज में एक हलचल पैदा हो गई। एकल पदों पर आरक्षण ने ग्रामीण महिलाओं में ऐसा उत्साह भर दिया कि वे चुनाव की तैयारी, उम्मीदवारी और प्रचार को लेकर घर-आंगन, गली-मोहल्लों और खेत-खलिहानों में इस पर चर्चा करती नज़र आईं।

आरक्षण के प्रावधान के अनुसार कुल ४२३२ मुखिया और इतनी ही सरपंच चुनी जानी थीं। लगभग २ लाख ३२ हजार वार्ड सदस्यों पंचों तथा ११,६१२ पंचायत समिति और ११६२ ज़िला परिषद् सदस्यों में आधी संख्या महिलाओं की होनी थी। चुनाव परिणाम इससे अधिक संख्या में महिलाओं के पक्ष में गये। इस स्तर पर महिलाओं का राजनीतिकरण-देश के क्रिया कलापों में उनकी भूमिका को चिहि्उात करना साबित हुआ। घर परिवार चलाने वाली महिलाएं पंचायत भी बखूबी चला पाने में समर्थ हैं- यह बिहार के बाहर महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान की महिलाएं सिद्ध कर चुकी हैं। परन्तु बिहार में इन चुनावों में पितृसत्तात्मक सोच और मूल्यों की दखलन्दाजी खुलकर सामने आई। बिहार का ग्रामीण सत्ताधारी वर्ग यानी जमीन्दार, कुलक एवं दबंग अब अपने बदले अपने परिवार की औरतों को चुनाव लड़वाकर परदे के पीछे से सत्ता पर काबिज होने का खेल खेलने लगे। जो लोग अपनी महिलाओं को जुलूस-प्रदर्शन-धरना आदि में नहीं जाने देते थे तथा ऐसी महिलाओं पर फब्तियां कसते थे, आज अपने परिवार की औरतों को चुनाव में खड़ा कर रहे हैं। परन्तु इनकी सामंती पुरूषवादी सोच ने उन्हें चारदीवारी से बाहर आने की इजाज़त नहीं दी। 'बड़े घरों` की औरतें वोट मांगने कैसे जा सकती हैं? यह उनका तर्क होता था। परन्तु जब स्वतंत्र-सोच के परिवारों की महिलाएं चुनाव-प्रचार में जोर-शोर से लग गइंर् तो इन 'मालिक` लोगों को अपनी औरतों को वोट मांगने के लिए बाहर भेजना पड़ा। घूंघट तो सिकुड़े ही; महिलाओं की अपनी पहचान भी बनी। 'किसी की घरवाली` अथवा 'किसी की महतारी` के सम्बोधन के स्थान पर अब वे सुखिया देवी, हीरामणी, लीलादेवी, सीता देवी आदि नामों से पुकारी जाने लगीं। उनकी अपनी पहचान बनी।

यही नहीं, महिलाओं को अपने मुद्दे भी समझ में आने लगे। गांव में अस्पताल, स्कूल, सड़क, पानी से लेकर विकास जैसे मसले उनकी जुबान पर चढ़ गये। रोजी-रोटी का सवाल प्रमुख होकर उभरने लगा। महिलाओं पर बढ़ती हिंसा, उत्पीड़न... के विरोध में स्वर उठने लगे।

सन् २००६ में बिहार में महिलाओं की इस उथल-पुथल ने उनकी मुक्ति के दरवाजे पर एक दस्तक अवश्य दी है। यह दरवाजा कब खुलेगा, यह प्रश्न अभी बरकरार है। चुनाव के बाद गांधी समिति की एक कार्यशाला में चयनित महिलाओं ने जो अनुभव सुनाए उनसे क्षणिक निराशा होती है। इन महिलाओं के घर के पुरुषों ने उनकी तरफ से शपथ ली तथा पंचायत का काम-काज भी संभाल लिया। औरतों की पारिवारिक जिम्मेदारी जस की तस रही। बच्चे पालना, खाना पकाना, खेत-खलिहान और पशुओं की देखभाल सब कुुछ पहले जैसा ही रहा। उन्हें मीटिंग तक में जाना मयस्सर नहीं हुआ। पंचायत चुनाव उनके पतियों के लिए अपना रूआब-रूतबा बढ़ाने का अवसर बन गया। उनकी नजर तो 'विकास` के नाम पर मिलने वाली रकम पर रहती है। अंग्रेजी के एक राष्ट्रीय दैनिक की एक खबर के अनुसार पश्चिमी चम्पारन और बेतिया की जिला परिषदों में चयनित महिला सदस्यों के स्थान पर उनके पतियों ने मीटिंग में शिरकत की-भाषण भी दिए। विडंबना यह है कि इन लोगों को 'पार्षद-पति` कहकर सम्बोधित किया गया।

पिछले कुछ सालों में-सशक्तिकरण की 'थीम` पर कई फिल्में बनी। 'बसुमती की चिट्ठी` जैसी डाक्यूमेण्ट्री; 'हू-तू-तू`, 'गॉडमदर` और 'सत्ता` जैसी फिल्मों के माध्यम से हिंदी सिनेमा में नारी-शक्ति के राजनीतिक उदय की दस्तक सुनाई दी। दूसरी ओर 'मिर्च-मसाला`, 'मृत्यु-दंड` और 'दमन` में संगठन की शक्ति को स्थापित किया गया तथा पितृ-सत्ता को तोड़ने का प्रयास हुआ। जाहिर है कि औरतों के बढ़ते सशक्त कदमों की पदचाप रचनात्मक कृतियों-कहानी, उपन्यास और सिनेमा में सुनाई देने लगी है।

यह यूं ही नहीं है कि सानिया मिर्जा या शबाना आज़मी-कठमुल्लों के फतवे और प्रतिबन्धों को मानने से इंकार कर रहीं हैं। मुस्लिम समाज की महिलाएं भी राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए छटपटाहट महसूस कर रही हैं। मुस्लिम औरतों का वोट देने जाना, फोटो-पहचान पत्र बनवाना, चुनाव लड़ना आदि मुस्लिम समाज में पर्दा अर्थात् चहारदीवारी को तोड़कर स्वतंत्र होने की कसमसाहट की ओर इशारा है।

प्राय: हर क्षेत्र में आज महिलाएं पुरुषों को चुनौती दे रही हैं। उनसे बेहतर कर रही हैं। देश के विभिन्न परीक्षा परिणाम इसके साक्षी हैं। फिर भी आज क्यों औरतें स्वयं को असुरक्षित, परनिर्भर और कमजोर महसूस करने लगती हैं? एक के बाद एक अनेक घटनाएं-शाहबानो के हक, रूपकुंवर सती कांड, भंवरी देवी बलात्कार, शिवपतिया और मुखली की निर्व परेड, शिल्पी जैन, नैना साहनी, प्रियदर्शनी मट्टू, जेसिका लाल जैसे अनगिनत कांड हमारे सामने प्रश्न खड़े करते हैं। शायद इसीलिए औरत के हक में खड़ी एक सशक्त आवाज तसलीमा नसरीन को औरतों तथा प्रगतिशील पुरुषों का समर्थन भी नहीं मिल पा रहा है। अनेक बिहारी लड़कियां भी 'पावरविमेन` बनने के लिए देश-विदेश में संघर्षरत हैं। परन्तु दूसरी ओर वापस-घर के सामन्ती मूल्य अपनी 'पावर` दिखाने से नहीं चूकते।

हालांकि इन सभी पितृसत्तात्मक मूल्यों को तोड़ने की मुहिम खुल चुकी है। खेत-खलिहानों में जमींदारों, लठैतों और सवर्णों के खिलाफ लगातार संघर्ष करती दबी-कुचली दलित महिलाएं अपनी पहचान बना रही हैं। यही है असली 'फेमिनिज्म`, जो तेजी से उभर रहा है। नारीवाद का अर्थ केवल देह या कोख पर अधिकार मात्र नहीं है बल्कि पितृसत्ता के मजबूत चक्रव्यूह को तोड़ना है जो प्रच्छन्न तरीके से औरत को घेरे हुए है। संघर्ष की आग में तपकर निकली निम्न वर्ग की औरतों में जो आत्म-विश्वास देखने को मिल रहा है, वही सोच मध्यम वर्ग की महिलाओं में जब तक प्रवेश नहीं करेगी-पुरूषवादी सोच परास्त नहीं हो सकेगी।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पंचायतों में महिलाओं के लिए ५० प्रतिशत आरक्षण उनकी मुक्ति द्वार के खुलने जैसा है। अब आवश्यकता है ग्रामीण महिलाओं में शिक्षा के माध्यम से एक राजनीतिक समझ का विकास करने की। उस सोच से लड़ना जो उनकी देह पर हमला कर उनके मनोबल को तोड़ती है। बलात्कार, हिंसा, डायन-चुड़ैल कहकर प्रताड़ित करना ऐसे हथकण्डे हैं जिन्हें औरतों की ताकत को तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

हरियाणा की एक पंचायत में एक महिला प्रधान का बाल पकड़कर पिटाई और मध्यप्रदेश में शूद्र महिला प्रमुख को झंडा नहीं फहराने देना और उस स्थान को अपवित्र कहकर धुलवाना जैसी सवर्ण मानसिकता के विरूद्ध संघर्ष नारी मुक्ति अथवा सशक्तिकरण का रास्ता खोलेगा। बिहार की महिलाओं की मुक्ति संघर्षों से होगी, आरक्षण उसमें उत्प्रेरक का कार्य करेगा।



भारती एस कुमार पटना विश्विद्यालय के इतिहास विभाग की अध्यक्ष हैं व 'आधी जमीन` पत्रिका से जुड़ी हैं।

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