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December 10, 2007

जनतंत्र की मुश्किलें : राजनीतिक दलों का आंतरिक जनतंत्र

संपादकीय



राजनीतिक पार्टियां देश में जनतंत्र के खतरों को चाहे जितना समझती हों, अपनी ही पार्टी के आंतरिक जनतंत्र के प्रति पूरी तरह उदासीन हैं। वाम दलों को छोड़कर (और इसमें थोड़े से इफ-बट के साथ भाजपा को भी रख सकते हैं ) बाकी तमाम राजनीतिक दल एक चौकड़ी अथवा लिमिटेड कंपनी बन कर रह गये हैं। कांग्रेस में यदि सोनिया गांधी की तानाशाही है, तो समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह और बसपा में मायावती की। ये तो उदाहरण भर हैं। आप उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम की किसी भी पार्टी का नाम ले सकते हैं और बड़ी आसानी से उसके तानाशाह को पहचान सकते हैं। (वामदलों और भाजपा में थोड़े भिन्न किस्म की तानाशाही चलती है।)

यह बीमारी कैसे और कब शुरू हुई इसका अध्ययन होना अभी बाकी है, लेकिन मोटे तौर पर इसकी शुरुआत कांग्रेस में इंदिरा गांधी के जमाने से हुई लगती है। राजनीति में परिवारवाद की शुरुआत भी कांग्रेस से ही शुरू हुई। आज यह बीमारी भी सभी दलों में व्याप्त हो गयी है।

क्या राजनीतिक दलों के आंतरिक जनतंत्र पर गहराते इस संकट का देश के जनतंत्र से कोई लेना-देना नहीं है? मैं समझता हूं है। जो राजनीतिक दल अपने आंतरिक जनतंत्र को ठीक नहीं रख सकता, वह देश के जनतंत्र को भी ठीक नहीं रख सकता। कमजोर जनतंत्र पर टिके ये राजनीतिक दल देश के जनतंत्र को कमजोर करेंगे ही। यह एक ऐसा खतरा है जिस पर समय रहते विमर्श आवश्यक है।

पचास के दशक में ही कांग्रेस के सदस्यता अभियान में आपाधापी शुरू हो गयी थी। थैलीशाह पार्टी कोष में एकमुश्त भारी रकम जमा करा देते थे। छोटे कार्यकर्त्ता वोटर लिस्ट से फर्जी सदस्यता का फार्म भर कर पार्टी मुख्यालय में जमा कराते थे। पार्टी चुनावों में ये कार्यकर्त्ता थैलीशाहों का समर्थन करते थे। इस तरह थैलीशाह तबके ने धीरे-धीरे राजनेताओं को अपने घेरे में लिया। पार्टी पर धीरे-धीरे साधनसंपन्न तबकों का वर्चस्व बढ़ने लगा। राजनीतिक कार्यकर्त्ता कमजोर होने लगे। कमजोर होते-होते इनकी स्थिति आज दासों जैसी हो गयी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज राजनीतिक कार्यकर्त्ता पूरी राजनीतिक प्रक्रिया का सबसे उदासीन और असहाय पात्र बन कर रह गया है।

जब राजनीतिक दलों में जनतंत्र मजबूत था तब पार्टी की सक्रियता बनी रहती थी। राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की पूछ होती थी। वे पार्टी के आधार होते थे। वे पढ़ते थे, बहस करते थे और जनसमस्याओं को लेकर संघर्ष करते थे। दल की रीति-नीति बनाने में उनका योगदान होता था। बड़े नेताओं का अपना प्रभाव अवश्य था, लेकिन जब वे कोई बात रखते थे या निर्णय लेते थे तब उनकी चिन्ता यह अवश्य होती थी कि सामान्य कार्यकर्त्ता इसे किस रूप में लेगा। इसे स्वीकारेगा या नकारेगा।

आज राजनीति में इस लोकलाज की कोई जगह नहीं है। कहीं कोई विचार-बहस नहीं है, संघर्ष नहीं है। दलीय तानाशाह की जय करने में ही पूरी राजनीतिक सक्रियता सिमट गयी है। राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की जगह चापलूसों की चल बनी है और लगभग सभी पार्टियों के नेता इन चापलूसों से घिरे हैं।

आंतरिक जनतंत्र को कमजोर करने में राजीव गांधी के जमाने में पारित दल बदल कानूनों की भी महती भूमिका रही है। एनडीए शासन काल में इसे और जटिल बनाकर दल के नेता की स्थिति और मजबूत कर दी गयी। सीमित और एकल विरोध का अब कोई मतलब नहीं था। सांसद विधायक ही जब इतने विवश हो गये तब सामान्य कार्यकर्त्ता की क्या बिसात थी। उनकी स्थिति और बदतर हो गयी।

राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं का हाशिये पर चला जाना एक गंभीर संकट है। बहुत पहले ख्यात् कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु ने इसकी ओर ईशारा किया था। उनकी कहानी 'आत्मसाक्षी` का गनपत ऐसा ही एक राजनीतिक कार्यकर्त्ता है, जो लगभग पैंतीस वर्षों की राजनीतिक सक्रियता के बाद अपनी ही पार्टी के नेताओं द्वारा अपमानित होकर महसूस करता है 'हम गलत रास्ते पर थे।` जर्मन विद्वान लोठार लुट्से ने इस कहानी का जर्मन में अनुवाद किया है और उन्हें यह कहानी इतनी पसंद थी कि जब वे रेणु से मिले और उनका इन्टरव्यू किया तब देर तक केवल इस कहानी पर बात करते रहे। यह १९७२ का समय था। १९७५ के बदनाम आपात काल से केवल तीन वर्ष पूर्व का समय। (हालांकि कहानी जनवरी १९६५ में लिखी गयी है।) रेणु की इस कहानी द्वारा लोठार लुट्से ने आने वाले संकट को पहचाना था। लुट्से का सवाल था- रेणु जी, मैंने आपको बताया कि आपकी इस (आत्मसाक्षी) कहानी का मैंने जर्मन में अनुवाद किया है, जो चार और कहानियों के साथ एक संग्रह में छपेगा। संग्रह का नाम मैंने रखा है 'आजादी की मुश्किलें`। आपकी कहानी का एक अंश मैंने सवाल का आधार इसलिए बनाया कि मुझे लगता है, आपका चरित नायक गनपत मानो एकाएक आजादी की मुश्किलें-बल्कि कह लीजिये आजादी की मुसीबतें पहचान लेता है -बिजली की कौंध की तरह।`

लुट्से ने आगे पूछा- 'क्या आप मेरी बात से सहमत होंगे?` और रेणु का जवाब था- 'हां, मैं आपसे सहमत हूं।`
रेणु और लुट्से आजादी (मैं कहूंगा जनतंत्र) की मुश्किलों से परिचित थे। लेकिन जिन मुश्किलों को उन दोनों ने १९६५ और १९७२ में देखा था, वे आज कहीं अधिक, कई गुना विकराल और भयावह हैं। कुछ अपवादों के साथ लगभग सभी राजनीतिक दल एक गिरोह के रूप में काम कर रहे हैं, जहां अनुशासन का अर्थ है दलीय तानाशाह की कारगुजारियों पर चुप्पी साधे रहना। सबसे अनुशासित कार्यकर्त्ता वह है जो सबसे अधिक चुप रहता है और सबसे सफल राजनेता वह जो राजनीति के अलावे बाकी सब काम करता है।

इस पूरे मामले में हस्तक्षेप तो जनता ही कर सकती है, लेकिन ऐसा कहना इसे अमूर्त रूप देना ही कहा जायेगा। वस्तुत: यह कार्य सभी राजनीतिक दलों के कार्यकर्त्ताओं को करना चाहिए। लेकिन यह भी कहा जायेगा कि क्या अपनी ही पार्टी में हस्तक्षेप करने की स्थिति में राजनीतिक कार्यकर्त्ता रह गये हैं?

  • प्रेमकुमार मणि

कट्टरवादी दृष्टि से किताब का पाठ

पुस्‍तक चर्चा


  • मुशर्रफ़ आलम जौकी

ज्ञानचंद ने पूरा जीवन उर्दू के नाम किया . अंतिम क्षणों में अपने बेटे के पास अमेरिका चले गए . इसमें शक नहीं कि बहुत हद तक उनकी सेवाओं को नजरअंदाज किया गया और ऐसे में यदि जीवन के 'बूढे पडाव' पर उनके लेखन में एक हिन्‍दू जागता है तो यह उर्दू वालों का भी कसूर है.


उर्दू के अस्सी वर्षीय प्रसिद्ध आलोचक ज्ञानचन्द जैन ने कुछ अर्सा पहले अमेरिका में रह कर एक किताब लिखी - 'एक भाषा दो लिखावट।` किताब भारत में छपी और उर्दू की अदबी दुनिया में ज़लज़ला आ गया। सब से पहले तथाकथित दानिश्वर शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी ने, 'मुसलमान-दृष्टि` से इस किताब को पढ़ा और जी भर कर ज्ञानचंद को कोसा। फ़ारूकी के इन लफ्जों से हिन्दुस्तान के अलावा पाकिस्तान की साहित्यिक दुनिया भी प्रभावित हुई। भारत में ज्ञानचन्द पर फ़तवे लगने शुरू हो गए। मुम्बई से निकलने वाली एक प्रसिद्ध पत्रिका के कवि-संपादक तो इतना उत्तेजित हुए कि अपनी पत्रिका 'शायर` में उन्हें जान से मार डालने का, फतवा तक दे गये। इस से पहले कि मैं अपनी बात आरम्भ करूं शमसुर्रहमान फ़ारूक़ी के आलेख के कुछ अंश यहां प्रस्तुत कर रहा हूं :
"संपादकीय के तहत प्रोफेसर जैन ने पहले शब्द के तौर पर लिखा है : 'मेरे उर्दू शगिर्र्दों और दोस्तों को शायद इस बात का दुख हो कि मैने जो कुछ लिखा है वो ऐसा है जैसे मैं कोई उर्दू दुश्मन या मुसलमान दुश्मन हूं।` अर्थात् उन्हांेने ये किताब खूब जान कर लिखी है कि इसके बाद उन्हें उर्दू दुश्मन और मुसलमान दुश्मन समझा जाएगा। वास्तविकता यह है कि यह किताब न केवल हिन्दुओं और मुसलमानों को, बल्कि उर्दू के हिन्दू और मुस्लिम लेखकों को भी एक दूसरे से तोड़ने के लिए लिखी गई है। मुसलमानों और उर्दू के लेखकों की पंक्तियां, चाहे वो किसी किताब के हों या भाषण के, या चिटि्ठयों के, वो किताब के विषय से सम्बन्धित हों या न हों, सम्मिलित किये गये हैं। और होशियारी ये कि उन बातों के उचित या अनुचित होने, सही या गल़त हाने पर कोई बहस नहीं है। लेकिन यह कि ये बातें किन उद्देश्य से कही गइंर् हैं, इसका भी पता नहीं। इसके अतिरिक्त, अक्सर मामलों में रावी या तो स्वयं जैन साहब हैं या उनका कोई शगिर्द या दोस्त, या उनका कोई क़रीबी रिश्तेदार। अब किताब के पहले अध्याय 'भूमिका` (पृष्ठ १३ से ४३) से कुछ उल्लेखनीय बातें देखें :

१. मेरी एक क़रीबी सिख महिला ने दिल्ली और उत्तर प्रदेश में रहने वाले मुसलमानों को देख कर कहा कि ये तो मुल्क की तक्स़ीम चाहते थे, फिर ये यहां क्यों हैं? (पृ०.२५)

२. मेरी निगरानी में पीएचडी के लिए रिसर्च करने वाले एक रिसर्च स्कालर ने मुझे बताया कि.. उसने इत्तिहादुलमुस्लिमीन के उम्मीदवार के हक़ में चार बार वोट दिया (पृ०-२५)

३. दो-तीन साल पहले सत्यपाल आनन्द पाकिस्तान घूम कर आए। वहां उन्होंने पाठ्य पुस्तक देखीं। इतिहास की किताबों में आम तौर पर लिखा है कि हिन्दुस्तान में इस्लाम आने से पूर्व यहां के बाशिन्दे जाहिल और असभ्य थे। इसमें इस्लाम की तारीफ़ और दूसरे समुदाय की झूठ बातों के अतिरिक्त कुछ नहीं। मालूम होता है जैसे ये पाठ्य पाकिस्तान के तालिबान ने तैयार किया है (पृ०-२४)

४. काली दास (गुप्ता रज़ा) ने (मेरे नाम) ५ जनवरी २००० को पत्र लिखा, 'मैने देखा है कि किसी हिन्दू प्रसिद्ध कवि या साहित्यकार को बख्श़ा नहीं गया। दयाशंकर नसीम, चकबस्त, फ़िराक़, मालिक राम, ज्ञान चन्द, गोपीचंद नारंग और अब मैं, सभी पर कीचड़ उछाली गई। केवल जगन्नाथ आजाद बचे हैं क्योंकि उन्हांेने इक़बाल की 'परस्तारी` में सब को पीछे छोड़ दिया है (पृ.२१ से २२)

५. (उर्दू की) छोटी आसामियों के लिए हिन्दुओं की अत्यधिक प्रशंसा और आवभगत की जाती है लेकिन बड़े स्थानों के लिये उम्मीदवार का धर्म भी देखा जाता हंै (पृ०-२३)

६. मुस्लिम बड़े साहित्यकार पर कोई छोटा साहित्यकार अपशब्द की हिम्मत नहीं कर सकता, लेकिन एक बड़े हिन्दू साहित्यकार के खिलाफ छोटा साहित्यकार भी अपने क़लम को बेलगाम छोड़ने के लिए आजाद है क्योंकि वो जानता है कि पत्रिकाओं के पाठक और सम्पादक की हमदर्दियां उसके साथ है (पृ०-२३)

७. बड़े से बड़े हिन्दू साहित्यकार को ख्य़ाल रखना पड़ता है कि उर्दू दुनिया में जीना है तो मुसलमानों की 'खुशनूदी` पर नज़र रखे (पृ०-२६)

८. उर्दू में भाषा के विषय पर जो किताबें लिखी गई हैं वो मुसलमानों को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं (पृ०-१४)

९. इतिहास में मुसलमानों की ये पॉलीसी रही है कि जिन इलाकों को विजय किया जाए, वहां की भाषा और लिपि को खत्म करके अपनी भाषा और लिपि को उन पर थोपा जाए। हिन्दुस्तान में भी ऐसी पॉलीसी पर अमल करने की कोशिश की गई...। सिंधी, पंजाबी, कश्मीरी आदि की लिखावट पूरी तरह बदल दी गई (पृ०-१६)।

१०. उर्दू को हिन्दू-मुसलमानों का मिश्रित भाषा कहा गया लेकिन क़याम पाकिस्तान के बाद इसका भांडा फोड़ दिया गया..। डॉक्टर फरमान फ़तेहपुरी ने अपनी किताब 'हिन्दी-उर्दू तनाज़` में स्पष्ट किया कि शुरू से ही अंजुमन तरक़़्की उर्दू और मुस्लिम लीग से उनका सम्बन्ध था। देश विभाजन से पहले ऐसे साम्प्रदायिक विचारों को, उर्दू वालों का हिन्दुओं से छिपाए रखना उर्दू आंदोलन का 'बुनियादी मकसद पाकिस्तान बनवाना` है, ऐसी गद्दारी है जिस पर मैं अफ़सोस करता हूं (पृ०१८ से १९)

११. अमेरिका और कनाडा में पाकिस्तानी अंग्रेज़ी साप्ताहिक हैं। इन सब की वफादारी पाकिस्तान से है। इन में खुल कर हिन्दुस्तान और हिन्दुओं को गालियों से याद किया जाता है। जब प्रत्येक देश के उर्दू जानने वाले इतनी शिद्दत से पाकिस्तान नवाज़ हंै तो संभव है हिन्दुस्तान के मुसलमान भी उनके सहयोगी हों। लेकिन हिन्दुस्तान में हिन्दू अक्सरियत के खौफ़ से शायद सूझ-बूझ से काम लेते हों (पृ०.२३ से २४)

१२. मैं अपने उर्दू वाले मुसलमान दोस्तों के लेख देखता हूं तो आश्चर्य होता है। इनमें अब भी वही इलाहदगी पसंदी दिखाई देती है जो पहले थी। अपने देश के बारे में उनकी भावनाएं वही हैं जो हिन्दुस्तान के बाहर के उर्दू वालों की है (पृ०-३३)

१३. उर्दू के कई बड़े शायर जैसे मोमिन, दाग,़ जिगर और असगऱ आदि की जिन्दगियों के साथ तवाइफों के मामले लिपटे हुए हैं (पृ०-३८)

१४. गोपाल कृष्ण मानक टाला ने (मुझे) अपनी २८ नवम्बर २००१ की चिट्ठी में लिखा, आपने उर्दू के मुस्लिम अदीबों के बारे में जो लिखा है वो बिल्कुल सच है लेकिन आप कुछ भी कर लीजिये ये लोग सुधरने वाले नहीं। बल्कि वो आपको इग्नोर करना शुरू कर देंगे (पृ०.३९ से ४०)

१५. हिन्दुस्तान में मुसलमान उर्दू वाले अपनी कमर पर दो क़ौमी नज़रिये का भारी गठर उठाये फिरते हैं। एक आम हिन्दू की समझ में नहीं आता कि देश में मुसलमानों को हिन्दुओं के बराबर क्यों रखा जाए (पृ०.३३)

१६. उर्दू साहित्य.. मैं गैऱ मुस्लिमों विशेष रूप से हिन्दुओं के धार्मिक आस्थाओं, माशरे और समकालिक व्यक्तित्वों पर इतनी स्याही पोत दी गई है कि कोई हिन्दी समकालिक इसे क़बूल नहीं कर सकता। वो ये महसूस करने लगता है कि यह मेरा साहित्य नहीं, किसी दूसरी मिल्लत की चीज़ है (पृ०.२०)

१७. हिन्दुस्तान में उर्दू के हिन्दू लेखक इतने घबराये हुए हैं कि वो मुसलमान उर्दू साहित्यकारों की खुशामद में लगे रहते हैं (पृ०.३९)

ऐसे शब्द किसी साहित्यिक किताब की बजाये विश्व हिन्दू परिषद या शिवसेना के या नरेन्द्र मोदी के भाषण के अंश मालूम होते हैं।

ये किताब ज्ञान से कितनी दूर हैं , इसकी यह मिसाल एक बयान है कि मुसलमान जिस इलाके को विजय करते हैं वहां की भाषा विशेष रूप से लिपि खत़्म कर देते हैं। ज्ञानचन्द साहब ने राजा राम मोहन राय की एक तहरीर विशेष रूप से फ़तेहपूरी के हवाले से नक़ल की है कि '' हिन्दुस्तान का बड़ा हिस्सा कई सदियों से मुसलमान शासकों के साये में चला आ रहा है. बंगाली शारीरिक तौर पर कमज़ोर थे वो हथियार उठाने से कतराते थे। उनकी जायदादें तबाह की जाती रहीं। उनके मज़हब की तौहीन होती रही...` यदि ये सही है कि सब से अधिक गुलामी बंगाल में रही तो सात सौ साल की मुसलमानों की हुकमरानी के बावजूद बंगाल की भाषा और उसकी लिपि मुसलमानों ने खत़्म क्यों नहीं कर दिया? भाषा नहीं तो लिपि तो ज़रूर खत़्म हो जानी चाहिए थी। फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ?

प्रोफ़ेसर जैन को इन सवालों से गऱ्ज नहीं, उन्हें तो उर्दू के विरोध के बहाने मुसलमानों पर कटाक्ष करना है। वह लिखते हैं :
'' बाहरी हमलावरों ने अपने शासन और बड़प्पन के एहसास के नशे में हिन्दुस्तानी भाषा और लिपि को क़बूल न करके अपनी डेढ़ इंर्ट की मस्जिद अलग बनाई। मध्यकालीन युग में मुसलमानों ने जब दूसरे देशों पर विजय प्राप्त किया, सब से पहले वहां भाषा और लिपि को नुक़सान पहुंचाया गया। उसकी अच्छी या बुरी मिसाल ईरान पर विजय प्राप्ति है (पृ०-१५३)"

मैं ज्ञानचन्द की हिमायत नहीं करता। बल्कि मेरा पूरा विश्वास है कि ऐसे प्रसंग या तथ्य रचते हुए ज्ञानचन्द एक बीमार मानसिकता के शिकार रहे होंगे। लेकिन मेरा आरोप उर्दू वालों पर केवल ये है कि किसी ने भी ज्ञानचन्द के मनोविज्ञान को नहीं समझा। ज्ञानचन्द ने पूरा जीवन उर्दू के नाम किया। अन्तिम क्षणों में अपने बेटे के पास अमेरिका चले गए। इस में शक नहीं कि बहुत हद तक उनकी सेवाओं को नज़र अंदाज़ किया गया। और ऐसे में यदि जीवन के एक 'बूढ़े पड़ाव` पर उनके लेखन में यदि एक हिन्दू जागता है तो ये उर्दू वालों का भी क़सूर है। लेकिन यह बात उर्दू वालों को भी समझनी चाहिए कि ज्ञानचन्द को गालियां देते हुए ज्यादातर लोग एक कट्टरवादी मुसलमान में बदल गए थे।

एक किताब नारंग की

साहित्य अकादमी को अपना साम्राज्य मानकर नारंग ज्यादा से ज्यादा अपनी किताबें प्रकाशित करने पर जोर दे रहे हैं। अभी हाल में उनकी एक किताब आई है। बीसवीं शताब्दी में उर्दू साहित्य। चलिए, एक नज़र उस किताब पर भी डालते हैं।

'बीसवीं शताब्दी में उर्दू साहित्य` - दूसरी किसी भी भाषा में ऐसी किसी भी किताब के प्रकाशन का अर्थ है कि उस भाषा के साहित्य की प्रामाणिक, मौलिक अथवा सही जानकारी मुहैया की जाये। ऐसा इस किताब के साथ नहीं है। सब से पहले तो मुझे इस पुस्तक के शीर्षक पर ही ऐतराज़ है। 'बीसवीं शताब्दी में उर्दू साहित्य` न होकर इस किताब का नाम 'बीसवीं शताब्दी में उत्तर आधुनिक साहित्य` होना चाहिए था। किताब में सम्मिलित लेखों के लेखक ज्य़ादातर वही लोग हैं जो किसी न किसी सतह पर 'साहित्य अकादमी` की सदस्यता से जुड़े हुए हैं। जैसे, निज़ाम सिद्दीक़ी, शीन काफ़ निज़ाम, बलराज कोमल, शाफे क़िदवई। महत्वपूर्ण लेखों में बीसवीं शताब्दी के उर्दू साहित्य की जगह इन बुद्धिजीवियों ने उत्तर आधुनिक साहित्य की परंपरा या गोपीचंद नारंग के गीत ही ज्य़ादा गाये हैं। (मसलन, 'प्रो० नारंग, प्राचीन और आधुनिक को संवाद में एकलम करने की सृजनात्मक क्षमता के धनी हैं।` -बीसवीं शताब्दी की वैचारिक अवधारणाएं - निज़ाम सिद्दीक़ी)


शायरी हो, कहानी हो, या बीसवीं शताब्दी की उर्दू तंक़ीद, ऐसा लगता है जैसे तंगनज़री की बुनियाद पर नाम गिनवाने की मुहिम चल रही हो। निज़ाम सिद्दीक़ी ने बीसवीं शताब्दी की वैचारिक अवधारणाएं में यह पुष्टि करने की कोशिश की है कि अब उर्दू साहित्य में सिवाये उत्तर आधुनिकता के कुछ भी शेष नहीं है। फिक्शन और शायरी के क्षेत्र में जब वह हमारे समय के महत्वपूर्ण उर्दू साहित्यकारों के नाम गिनवा रहे होते हैं तो उन की बेबसी पर रोना आता है। लखनऊ के अनीस अश्रफाक़ ने बीसवीं शताब्दी के उर्दू ग़़जल को सीधे लखनऊ से जोड़कर अपनी दृष्टि साफ रख दी है कि हम तो लखनऊ के हैं। बात लखनऊ की ही करेंगे। बीसवीं शताब्दी की उर्दू गज़ल की बात हो और अली मुहम्मद फर्शी, नसीर अहमद नासिर, खा़वर जीलानी, नोमान शौक़, सरीखे शायरों का नाम न लिया जाए, ये तो अदबी बद्दयानती है, या फिर ऐसा है कि शायरी पर लेख लिखने वाला यूं तो पूरी बीसवीं शताब्दी को अपने शिकंजे में कस रहा है, परन्तु उसे बीसवीं शताब्दी में होने वाले परिवर्तनों का एहसास तक नहीं।

कई बार मुझे आलोचक, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चक्रव्यूह में भी फंसे दिखाई दिये। क्योंकि पुस्तक का शीषर्क बीसवीं शताब्दी में उर्दू साहित्य है। न कि बीसवीं शताब्दी का भारतीय उर्दू साहित्य। और यह बात जान लेनी ज़रूरी है कि जब हम केवल उर्दू का तज़किरा करेंगे तो केवल भारत के उर्दू रचनाकारों तक हमारी दृष्टि सीमित नहीं होगी। क्योंकि हमारे सामने पाकिस्तान का भी समूचा उर्दू साहित्य है, जो शायरी और आलोचना की सतह पर ज्य़ादा समृद्ध और उर्जावान है। लेकिन ऐसा लगता है कि हमारे लिखने वालों की दृष्टि पाकिस्तान में फिक्शन की सतह पर इंतेज़ार हुसैन और शायरी की सतह पर नासिर काज़मी से आगे जाती ही नहीं। जबिक इनके बाद परिवर्तन के बड़े दौर में अगर उपन्यास की बात करें तो अशरफ शाद (बेवतन, वजीर आज़म, सदरे आला) आसिम बट्ट (दायरा) हामिद सिराज (मैया) मुस्तफ़ा करीम (आंधी की आहट) के नाम ज़रूर लिए जाने चाहिए, इसी तरह फिक्शन और शायरी में कई महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों का छूट जाना केवल एक छोटी सी गल़ती नहीं हो सकती। इसके दो ही कारण हो सकते हैं। या तो साहित्य अकादमी के अलमबरदार दानिश्वरों ने १९९० के बाद का साहित्य संजीदगी से पढ़ा ही नहीं। दूसरी सूरत में केवल उन्होंने अपने परिचित नामों की भरपाई करने की कोशिश की है। स्वयं नारंग साहब का आलेख, साहित्य और विचारधारा से संबंधित कई बड़े प्रश्न खड़ा करता है, जैसे आज भी उत्तर आधुनिकता का स्वर बुलंद करते हुए वे 'कंफ्यूज़` हों कि इसमें आधुकनिकता और प्रगतिशीलता दोनों को कैसे मिलाया जाये? और यदि वे इन दोनों को भी रिजेक्ट नहीं बल्कि तस्लीम करते हैं, तो आसानी से कहा जा सकता है कि - वे 'अपनी` उत्तर आधुकनिकता की खोज में उर्दू के दोनों महत्वपूर्ण आयाम को मिला कर एक तीसरी खिचड़ी परोसने जा रहे हों। जबकि अभी उर्दू का हाल यह है कि तीसरी खिचड़ी परोसने की जगह, साहित्य पर ईमानदारी से बात की जाये। और ये ईमानदाराना रवैया यहां दूर-दूर तक नज़र नहीं आता।

अंत में एक बड़ा सवाल- यह किताब नारंग साहब की कैसे हो सकती है? क्योंकि किसी भी ऐसी संपादित पुस्तक में संपादक का अपना नज़रिया तो होता ही है। प्रस्तुत पुस्तक में एक पन्ने की रस्मी बातचीत के अलावा संपादक का अपनी 'अनिवार्य संपादकीय` में कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि इस किताब को संपादित करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई। हां, अन्त में दूसरे लेखकों की तरह उनका भी एक लेख सम्मिलित है। लेकिन इससे उनके संपादक कहलाने पर प्रश्नचिह्न अपनी जगह बरक़रार रहता है। किताबें हों या साहित्य अकादमी की कुर्सी। नारंग लगातार अपनी मनमानी कर रहे हैं।



उर्दू-हिंदी में समान रूप से लेखन करने वाले कथाकार मुशर्रफ़ आलम जौकी की २५० से अधिक कहानियां व ५ उपन्यास प्रकाशित हैं।

सामाजिक न्याय की सत्ता संस्कृति

देशकाल

  • अनिल चमड़िया

लालू प्रसाद डा. वेणु गोपाल को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में निदेशक बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने अपने सांसदों को डा. वेणुगोपाल के विरोध में संसद में कुछ भी बोलने से मना कर दिया। सभी जानते हैं कि डा. वेणुगोपाल ने पूरे देश में भारत सरकार के इस संस्थान को आरक्षण विरोध का अखिल भारतीय केन्द्र बनाने में भरपूर सक्रियता दिखाई।


दिल्‍ली के हिंदी समाचार पत्रों ने महाराष्ट्र में पिछड़ा गांव खैरलांजी में दलित परिवार के चार सदस्यों की नृशंस हत्या को हरसंभव नजरअंदाज किया। उत्तर भारत के दलित और पिछड़े नेताओं में भी कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दी। जबकि महाराष्ट्र के कई जिलों में इस हत्याकांड को लेकर लगातार संघर्ष हुआ। पुलिस ने गोलियां चलाई। कफ्र्यू लगा। दलित हत्याकांड के विरोध में संघर्ष का एक नया रूप देखने को मिला। इससे पहले ऐसा संघर्ष पंजाब में तलहण की घटना के बाद मिला था। खासतौर से हिंदी मीडिया में यह रूखापन क्यों है? यह सवाल सभी के सोचने के लिए छोड़कर कुछ दूसरे पहलूओं को विचार के लिए रखता हूं। बेलछी से खैरलांजी तक दलितों की हत्या में पिछड़ी जातियों के दबंग समूह की भूमिका दिखाई दे रही है। दलितों पर कई बड़े आक्रमणों में हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिक विचारधारा के संगठनों, भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना जैसों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमिका होती है। राजस्थान के कुम्हेर, हरियाणा के गोहाना और महाराष्ट्र के खैरलांजी में घटनाएं उस समय घटी हैं जब वहां से संसद और विधानसभा का स्थानीय प्रतिनिधि भारतीय जनता पार्टी का रहा है। महाराष्ट्र के खैरलांजी में हत्याकांड के बाद शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी्र ने विरोध में अपनी प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की। प्रसंगवश यहां उल्लेख करना जरूरी है कि गुजरात में संघ परिवार ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों में पिछड़ी और दलित-आदिवासी जातियों का जमकर इस्तेमाल किया है। दलितों में खासतौर से वाल्मीकि जाति को साम्प्रदायिक आधार पर अपने घेरे में लेने की कोशिश संघ परिवार कर रहा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस से जुड़े गृहमंत्री आर आर पाटिल ने दलितों के आंदोलन को कानून एवं व्यवस्था के लिए गंभीर साबित करने के इरादे से उसे नक्सलवादी प्रभावित बताया। दो महीने तक हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई से बचाने की कोशिश की जाती रही। जबकि स्थानीय स्तर पर कई दलित पुलिस अधिकारी तैनात थे लेकिन उन्होंने भी खुद को असमर्थ पाया। राष्ट्रवादी कांग्रेस वहां बाल ठाकरे की राजनैतिक विरासत को लेकर छिड़े पारिवारिक विवाद के कारण शिव सेना के समर्थकों में अपनी जगह बनाना चाहती है। इसके लिए वह पिछड़े मराठों को अपना समर्थक बनाने की हर संभव कोशिश कर रही है। राष्ट्रवादी कांग्रेस में एक साम्प्रदायिक धारा के प्रति झुकाव इसके स्थापनाकाल से ही देखा जा रहा है।

यहां केवल स्थिति का बयान सूत्र रूप में इसीलिए किया जा रहा है ताकि जातियों के बीच राजनैतिक विचारधाराओं के संबंध के उभरते एक पूरे राजनैतिक परिदृश्य को देखा जा सके। एक तरफ ये स्थिति है तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में 'तिलक तराजू और तलवार उनको मारो जूते चार` कहने वाली बहुजन समाज पार्टी ब्राह्मण सम्मेलन कर रही है। अब नारा लग रहा है कि 'तिलक तराजू और तलवार, हो गए हैं हाथी पर सवार`। हाथी बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिह्न है। मायावती जी ने उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकायों के चुनाव के बाद यह बताया कि उन्होंने अपना वोट भाजपा और कांग्रेस की तरफ ट्रांसफर करा दिया। ऐसा उन्होंने एक मुसलमान उम्मीदवार को हराने के लिए किया। अतीत में बहुजन समाज पार्टी भाजपा के साथ सरकार बना चुकी है। वहां पिछड़े दलितों में लगातार दूरी बढ़ती चली गई है। मुलायम सिंह के साथ मिलकर बहुजन समाज पार्टी ने एक बार सरकार बनाई और उसके बाद आगे कभी राजनैतिक यात्रा साथ-साथ नहीं हो सकी। सौ में नब्बे शोषित हैं नब्बे भाग हमारा है। सौ में नब्बे का यह आंकड़ा कई रूपों में सामने आता रहा है। लेकिन उसका सार यही समझा जाता रहा है कि सौ में पिछड़े, दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों की ताकत का यह आंकड़ा है। लेकिन नब्बे के बाद इस तरह के गठजोड़ की राजनीति खत्म हो गई। पचास सालों से यह गठजोड़ बनाने की कोशिश कई स्तरों पर चलती रही। लेकिन न जाने कब बनी और कब तक चली और अब उसकी संभावना लगभग समाप्त भी हो गई। हो सकता है कि यह नब्बे प्रतिशत का नारा आर्थिक आधार पर फिर से मुखर हो। बहरहाल आज हर पिछड़ा और दलित नेता अपनी अगुवाई में सवर्णों को साथ करने के लिए आतुर है। मुलायम सिंह यादव ऐसा गठजोड़ बनाना चाहते हैं कि सवर्णों के बीच जातीय मतभेद को चुनाव जीतने में इस्तेमाल किया जाए। रघुऱ्यदु भाई भाई उनका नारा है। लेकिन यहां जातीय स्तर पर सवर्ण और पिछड़ा के किसी हिस्से को जोड़कर चुनावी गणित तैयार करने का सवाल नहीं है। नये जातीय समीकरण एक विचार धारा के करीब होने के लिए भी अभिशप्त होते हैं। भारतीय समज में जाति के साथ विचार और संस्कृति जुड़ी है। जाति विभेद को खत्म कर अपनी संस्कृति और विचारों को स्थापित करने के लिए सत्ता की प्राप्ति नब्बे वाले नारों का उद्देश्य रहा है। लेकिन मुलायम सिंह को भाजपा की तरफ कई बार झुकते देखा जाता है। उन्हें मुसलमानों का समर्थन लेने के लिए इस्लामिक कट्टरपंथ को हवा देने की जरूरत महसूस होती है। उनके मंत्रिमंडल के मुस्लिम सदस्यों द्वारा जारी फतवों आदि को देखा जा सकता है। यानी जातिभेद मिटाने की राजनीति या तो किसी न किसी कट्टरपंथ की तरफ जाने की नियति में पहुंचती है या फिर उद्योगपति अंबानी के कमरे की तरफ बढ़ जाती है। ये बात किसी एक पिछड़े नेता की नहीं है। जनता दल (यू) तो भाजपा के साथ मिलकर बिहार में सरकार ही चला रही हैं।

लालू प्रसाद के हाल के दो तीन किस्से यहां पेश करता हूं। शिक्षण संस्थानों में क्रीमिलेयर को आरक्षण नहीं दिए जाने की बात जब हो रही थी तो लालू प्रसाद ने उसका विरोध नहीं किया। संसद में अपने सांसदों को ऐसी आवाज उठाने से मना कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने इस तरह समझाने की कोशिश की है कि क्रीमिलेयर की व्यवस्था से दक्षिण के पिछड़ों को नुकसान होगा। देखने में ये लग सकता है कि वे पिछड़ों के बारे में केवल हिंदी पट्टी और खासकर बिहार के संदर्भ में सोचते हैं। लेकिन ये क्षेत्र विशेष के पिछड़ों का निषेध नहीं है। यह सिद्धांत से दूर जाने का सिद्धांत है। इसे आगे से कुछ उदाहरणों से विश्लेषित किया जा सकता है। लालू प्रसाद डा. वेणु गोपाल को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में निदेशक बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने अपने सांसदों को डा. वेणुगोपाल के विरोध में संसद में कुछ भी बोलने से मना कर दिया। सभी जानते हैं कि डा. वेणुगोपाल ने भारत सरकार के इस संस्थान को आरक्षण विरोध का अखिल भारतीय केन्द्र बनाने में भरपूर सक्रियता दिखाई। विरोध के सारे इंतजाम किए। उनके कार्यकाल में डा. आम्बेदकर के साहित्य को आरक्षण विरोधियों ने संस्थान के परिसर में जलाया। दलित छात्रों के साथ हर संभव भेदभाव किए गए। वेणुगोपाल ने दलित विरोधी विद्यार्थियों के उत्पीड़न के आरोपियों को कोई दंड नहीं दिया। उनके कार्यकाल में आरक्षण की व्यवस्था का भी घोर उल्लंघन हुआ। ये सभी बातें लालू प्रसाद जानते हैं। इसी कड़ी में समाचार एजेंसी यूएनआई को जीटीवी के मालिक सुभाष चंद्रा द्वारा हड़पने की कोशिश में लालू प्रसाद के सहयोग को भी ध्यान में रखना चाहिए। कंपनी मामलों के मंत्रालय के सहयोग के बिना यह संभव नहीं था। पनैतालीस साल से यह सहकारी संस्था पूरी दुनिया में समाचार भेज रही है और इस पर कभी किसी एक मालिक का नियंत्रण संभव नहीं हुआ। हो भी नहीं सकता क्योंकि इसका ढांचा इस तरह से विकसित ही किया गया है जिससे किसी भी तरह के दबाव से मुक्त होकर यह समाचार एजेंसी खबरों को प्रसारित कर सके। लालू प्रसाद ने इसमें जीटीवी के मालिक का सहयोग किन रूपों में किया यह उल्लेखनीय नहीं है। बल्कि राजनैतिक स्तर पर उनके रूख से इसके संकेत मिल सकते हैं। यूएनआई कैम्पस में सुभाष चंद्रा द्वारा संस्थान को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश के विरोध में आंदोलन चल रहा है। देश की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों ने इसमें हिस्सा लिया और सुभाष चंद्रा के कब्जा जमाने की योजना का खुलकर विरोध किया। केवल लालू प्रसाद की पार्टी की ओर से इस आंदोलन में भाग लेने के लिए कोई नहीं आया। बल्कि उनके सांसदों ने बताया कि उन्हें रेल भवन से हरी झंडी नहीं मिल रही है। लालू प्रसाद की इस लाल झंडी के रंग को बड़े बारीक तरीके से देखना होगा। आजकल एक रंग में कई रंग आ गए हंै। लाल रंग में जो बहुत तरह के नये नये लाल होते हैं, आम लोगों द्वारा उन रंगों के नाम तक ठीक-ठीक बता पाना संभव नहीं होता है। लालू प्रसाद जैसे नेता इसी का लाभ उठाते हैं। यह संस्कृति और विचार के साथ समझौते का रंग है। यह गंभीर बात नहीं है कि उन्होंने रेल मंत्रालय को लाभप्रद कंपनी के रूप में चलाया और एक दूसरी कंपनी के मालिक सुभाष चंद्रा का वे सहयोग कर रहे हैं। गंभीर बात यह है कि सुभाष चंद्रा के राजनैतिक उद्देश्यों को समझते हुए लालू प्रसाद सहयोग का रूख अपनाए हुए हैं। सुभाष चंद्रा राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। उन्होंने खुद आगरा में पांच साल पहले कहा था कि वे बचपन से संघ की शिक्षा लेते रहे हैं। उन्होंने भगवा रंग के सामने अपना सिर झुकाया और संघ को पूरा सहयोग देने का भरोसा दिलाया। यह भी सभी को पता है कि संघ हिंदी पट्टी में अपना प्रभाव बनाए रखने की हरसंभव कोशिश कर रहा है। वह मीडिया का सबसे ज्यादा दुरूपयोग करता है। उन्होंने पहले हिन्दुस्थान समाचार को जमाने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन यह समाचार एजेंसी जम नहीं सकी। लिहाजा ऐसी किसी एजेंसी की जरूरत उसे है जिसकी निष्पक्षता की साख हो। लालू प्रसाद चुनाव जीतने के लिए यदि सामाजिक न्याय करते हैं और सरकार चलाने में मैनेजमेंट गुरू को जरूरी समझते हैं तो यह एक गंभीर और खतरनाक राजनैतिक संकट का सूचक है। चुनाव में गांव गंवई भाषा और सत्ता में अभिजात्य संस्कृति को अपनाना उनके दोहरे चरित्र का सूचक है। यह बात लगभग सभी पिछड़े नेताओं के साथ लागू होती है। अपने समाज के विचारों, मूल्यों और संस्कृति को सत्ता में स्थापित करते ये क्यों नहीं दिखते हैं? सत्ता संस्कृति के सामने उन्हें आत्म समर्पण करते देखा जाता है। भारतीय संदर्भ में ये बात स्पष्ट हो चुकी है कि वर्णवादी व्यवस्था से साम्प्रदायिकता निर्मित होती है। साम्प्रदायिकता को जातिवादी व्यवस्था का अब तक नेतृत्व करने वाली शासक जातियां अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए जरूरी समझती रही हैं। पिछड़े नेता या दलित यदि ये समझते हों कि उनका मकसद केवल वर्णवादी व्यवस्था का नेतृत्व अपने हाथों में लेना है तो साम्प्रदायिकता खत्म होते नहीं दिखती है। पिछड़े और दलित नेताओं के उल्लेखित रूख भी इसी तरफ संकेत कर रहे हैं। ये भी कहा जा सकता है कि पिछड़े और दलित यानी सामाजिक न्याय का नारा सत्ता में जाने का एक तरीका भर है। वास्तव में वे सत्ता संस्कृति का स्वयं नेतृत्व करना चाहते हैं। इसीलिए वे अभिजात्य भी हो जाते है। पिछड़े और दलित जातियों पर एक दूसरे के हमले को संरक्षित करने लगते हैं। सामाजिक न्याय के नाम पर बनने वाली सत्ताएं पहले की सत्ताओं से अलग नहीं दिखती हैं । वे विकास के मॉडल को भी उसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं। मैनेजमेंट और आर्थिक लाभ उनकी सत्ता का लक्ष्य हो जाता है। यह सामाजिक न्याय की विचारधारा के कई धाराओं में बंटने, एक दूसरे के खिलाफ खड़े होने और एक दूसरे के खिलाफ हमलावर होने की स्थितियों को समझने के कुछ सूत्र हैं । शायद इन पर विचार करना जरूरी हो।



विभिन्न शोध-अध्ययन कार्यक्रमों से जुड़े अनिल चमड़िया अपनी स्वतंत्र टिप्पणियों के लिए चर्चित हैं।

एक नायक का पतन

देशकाल



  • अभय मोर्य

एक समय विद्रोही नायक जैसा दिखने वाला व्यक्ति पतन के ऐसे गर्त में गिर सकता है! देश को आज यह सवाल पूछने का अधिकार है कि आखिर बीते दिनों के उस 'डायनामाइट` नायक का यह हश्र क्यों हुआ?



1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद जॉर्ज फर्नान्डिज का सितारा बुलंदी पर था। उनका नाम सुनकर ही लोग, विशेषकर युवक, रोमांचित हो जाते थे। मोरारजी देसाई की सरकार में मंत्री बनने के बाद जब जॉर्ज साहब दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय में एक सभा को संबोधित करने आए तो सारी फिज़ा 'कॉमरेड जॉर्ज, लाल सलाम! कॉमरेड जॉर्ज, जिंदाबाद!` जैसे नारों से थर्रा उठी थी। विद्यार्थी और युवा अध्यापक, जिनमें आज की जानी-मानी हस्ती डॉ. चन्दन मित्रा भी शामिल थे, बढ़-चढ़कर नारे लगा रहे थे। युवा मन जॉर्ज फर्नान्डिज, जिन्हें तब 'डायनामाइट` कहते हुए एक विशेष गौरव की अनुभूति होती थी, की पोस्टरों पर छपी उन तस्वीरों से गद्गद थे जिनमें वे जेल की सलाखों के पीछे हथकड़ियों में जकड़े हुए अपने लिए वोट मांगते थे। बहुत सारे उदारवादी एवं प्रगतिशील बुद्धिजीवी इसलिए भी जॉर्ज साहब के कायल थे कि उन्होंने भारतीय दक्षिणपंथ के दिग्गज एस. के. पाटिल जैसों को चुनावों में धूल चटाई थी। जॉर्ज साहब की लोकप्रियता उस समय आसमान छूने लगी जब उन्होंने अमरीका के सर्वशक्तिमान कोका-कोला को भारतीय धरती से बाहर निकाल कर उसकी जगह स्वदेशी पेयजल '७७` को लांच किया।

युवकों को यह बात भी पसंद थी कि दकियानूसी और झक्की मोरारजी देसाई की सरकार गिराने में भी जॉर्ज साहब की काफी अहम भूमिका थी। प्रो. मधु दंडवते और जॉर्ज फर्नान्डिज जैसे नेताओं ने जनसंघ से आए जनता पार्टी के उन सदस्यों के विरूद्ध ठीक ही मुहिम छेड़ी थी कि वे जनता पार्टी के सदस्य होते हुए अभी भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सक्रिय सदस्य बने हुए थे। सरकार गिरने से पहले जॉर्ज साहब ने लोकसभा में सरकार के बचाव में एक धुंआधार भाषण दिया। पर, जैसा कि जॉर्ज साहब के साथ अक्सर होता है, उसके तुरंत बाद ही उन्होंने सरकार के विरूद्ध वोट भी डाला।

जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद जॉर्ज साहब एक बहुत लंबे अर्से तक राजनीतिक वनवास में छटपटाते रहे। अचंभे की कोई बात नहीं थी कि इसी राजनीतिक वीरानगी के दौर में जॉर्ज साहब में राजनीतिक सनक पनपने लगी होगी। वे बहुत लंबे समय तक राजनीतिक गतिविधियां चलाने के लिए आवश्यक साधनों से भी महरूम रहे। पर देशवासी उस समय स्तब्ध रह गए जब जॉर्ज साहब देश के एक और चोटी के नेता के साथ दूरदर्शन पर प्रकट हुए और टेलिकॉम स्कैम के खलनायक सुखराम के बचाव में खुलकर आए। जाहिर है जॉर्ज के चाहने वालों को अपने नायक की इस करतूत से गहरा धक्का लगा होगा। इसी समय बहुत सारे लोगों ने शायद पहली बार सोचा होगा कि जॉर्ज ने अपने बीते दिनों के आदर्शवाद को त्यागकर मौकापरस्ती की राजनीतिक दलदल की ओर बढ़ने का फैसला कर लिया था।

अवसरवाद की ओर पहला कदम उठ चुका था। अब जॉर्ज साहब, जैसा कि वे अकसर करते रहे हैं, अपनी नई राह पर तेजी से डग भरने लगे थे और शीघ्र ही वे देश की सांप्रदायिक शक्तियों की गोद में जा बैठे। इनाम में उन्हें मिला अत्याधिक महत्वपूर्ण रक्षा मंत्रालय, जिसमें लक्ष्मी भी थी और अर्जुन के धनुर्बाण का रोमांच भी। जॉर्ज साहब के चाहने वाले किंकर्तव्यविमूढ़ थे क्योंकि वे आर.एस.एस के चहेते बन चुके थे। अचंभे की कोई बात नहीं थी कि जब संघ परिवार के सदस्यों ने ऑस्ट्रेलियाई पादरी ग्राह्म स्टेन को उसके बेटों के साथ जीप में जिन्दा जला दिया तो जॉर्ज साहब के मुखारवंृद से ही संघ परिवार को क्लीन-चिट दिलवाई गई। गुजरात में जब मोदी बिग्रेड के सदस्यों ने ईसाई समुदाय के गिरजाघरों को जलाया और गिराया तब भी जॉर्ज साहब को ही मोदी ब्रिगेड के पाक-साफ होने का सर्टिफिकेट देना पड़ा। गोधराकांड के बाद परिवार के उन्मादी तत्वों द्वारा मुसलमानों का जो नरसंहार किया गया, उस समय भी जॉर्ज साहब को 'चित भी मेरी पट्ट भी मेरी` का ड्रामा करना पड़ा। परिणामस्वरूप उन्हें भयानक शब्दजाल रचते हुए भी अंततोगत्वा संघ परिवार के सामने घुटने टेकने पड़े।

रक्षा मंत्री के रूप में तो जॉर्ज साहब परले दर्जे के नटवरलाल बनते दिखे। उन्होंने नौसेना अध्यक्ष एडमिरल भागवत की इसलिए आनन-फानन में छुट्टी कर दी कि वे जॉर्ज साहब की चिलम भरने के लिए तैयार न थे। जाहिर था कि उन्हें स्वतंत्र विचार रखने वाले व्यक्ति की जरूरत नहीं थी। उन्हें महत्वपूर्ण रक्षा-सौदों को अनन-फानन में पक्का करवाना था, जिसके लिए भागवत का नहीं, बल्कि सुशील कुमार की आवश्यकता थी।

सारा देश यह जानकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ था कि एक डेढ़ साल से पाकिस्तानी सैनिक कारगिल में घुसपैठ कर भारतीय क्षेत्र में काफी अंदर तक बंकर बना चुके थे और देश के रक्षामंत्री को इसकी खबर तक नहीं थी। देश के सिपाहियों ने महान बलिदान देकर दुश्मन के सैनिकों को कारगिल से खदेड़ा, पर रक्षा मंत्रालय ने उस समय भी सैनिकों के खून के ऊपर सौदेबाजी करने से परहेज न किया। उसने ढ़ाई हजार रूपये में मिलने वाले एक ताबूत की कीमत ढाई लाख रूपये दिखाकर बड़ी संख्या में ताबूत अमरीका से मंगवाए। इसी समय सामरिक स्थिति का फायदा उठाकर और भी बहुत सारा सामान आनन-फानन में मुंहमांगे दाम देकर खरीदा गया। रक्षामंत्री के रूप में जॉर्ज फर्नान्डिज इन सौदों में हुए घपलों की जिम्मेदारी से भला कैसे बच सकते हैं? जॉर्ज साहब का अधोगमन उस समय विद्रुप बन गया जब उन्होंने एक अनाम से व्यक्ति श्री आर.के. जैन को समता पार्टी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया। जाहिर है कि सवाल उठेंगे कि ऐसे व्यक्ति को, जिसने न कभी किसी भी राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा लिया, न ही उसने किसी दल की सदस्यता ग्रहण की थी, क्यों राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया? क्या इसी कारण उसे इतने ऊंचे पद पर बिठाया गया कि उसने जॉर्ज साहब के सामने शेखी बघारी थी कि वह येन केन प्रकारेण धन जुटाने में सक्षम हैं । सवाल यह भी उठता है कि कोषाध्यक्ष के रूप में काम करते हुए जैन को हथियारों के व्यापारियों और आर्थिक अपराधियों से क्यों मिलने-जुलने दिया गया? क्यों उन्हें बार-बार मास्को और अन्य शहरों के दौरे पर भेजा गया? क्या जॉर्ज साहब यह कहकर पल्ला झाड़ सकते हैं कि उनके सरकारी आवास से चल रही नाना प्रकार की गतिविधियों का उन्हें पता नहीं था?

सवाल यह भी उठता है कि जॉर्ज साहब ने श्रीमती जया जेतली को समता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष क्यों बनाया था? देश की प्रबुद्ध जनता को तो इस बात का कतई इलम न था कि श्रीमती जया जेतली की कभी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि थी। कम से कम प्रचार माध्यमों से तो प्रबुद्ध पाठक या श्रोता को जया जेतली के राजनीतिक काम के बारे में कभी कोई सूचना नहीं मिली थी। फिर जॉर्ज साहब लालू प्रसाद यादव की क्यों आलोचना करते हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया? जॉर्ज साहब द्वारा जया जेतली को समता पार्टी्र का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना लालू जी की कारस्तानी से भला कैसे अलग था?

जॉर्ज साहब की 'जनतांत्रिकता` उस समय चरम सीमा पर पहुंचती दिखी जब 'तहलका` के पत्रकारों को उनकी सरकार ने सरकारी तंत्र की मदद से बेतहाशा रौंदना शुरू किया। जॉर्ज और जया की शह पर ही सरकार ने तहलका डॉट कॉम को तहस-नहस कर दिया। उसके पत्रकारों पर झूठे आरोप मढ़कर उन्हें जेलों में ठूंस दिया गया। क्या कसूर था उनका? बस यही न कि उन्होंने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बंगारू लक्ष्मण को कैमरे पर घूस लेते दिखाया था या जया जेतली को हथियारों के व्यापारियों से गुफ्तगू करते हुए पेश किया था। बस इतना-सा दोष और इतनी बड़ी सजा! क्या यह वही जॉर्ज साहब थे जो खुद हथकड़ियों में बंधकर कभी जेलों की सलाखों के पीछे रहे थे? विश्वास नहीं हो रहा था।

अब जया जेतली और जॉर्ज साहब बार-बार उछाल रहे हैं कि जस्टिस फूकन ने उन्हें बराक मिसाइलों के सौदे के संबंध में क्लीन-चिट दे दी है। पर सवाल यह उठता है कि जस्टिस फूकन को जांच अधिकरी क्यों और कैसे बनाया गया था? क्या यह सच नहीं है कि जस्टिस वैंकटस्वामी जस्टिस फूकन से पहले जांच कर रहे थे और वे जॉर्ज और जया के लिए कठिनाइयां पैदा करते दिख रहे थे? जाहिर था कि उनकी रिपोर्ट जॉर्ज और जया के लिए 'घातक` सिद्ध हो सकती थी। इसलिए पहले तो एक षडयंत्र के तहत जस्टिस वैंकटस्वामी को ऐसी सुविधाएं प्रदान की गइंर् जो उन्हें मिलनी नहीं चाहिए थीं। फिर योजनाबद्ध तरीके से इस सूचना को लीक कर दिया गया ताकि जस्टिस वैंकटस्वामी के सामने त्यागपत्र देने के सिवाय और कोई चारा न बचे और उनके स्थान पर फूकन साहब जैसे लचकदार व्यक्ति को जांच अधिकारी बनाया जा सके? यह प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि जॉर्ज साहब ने संयुक्त संसदीय समिति की जांच को टालने के लिए आनन-फानन में एक जज द्वारा जांच करवाने का फैसला वाजपेयी सरकार से करवाया क्योंकि संयुक्त संसदीय समिति में विपक्ष के सदस्य जॉर्ज साहब को रास नहीं आ सकते थे। अंत में यह बात भी रेखांकित की जानी चाहिए कि यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि बराक मिसाइल को खरीदने के लिए किसने सिफारिश की थी। सवाल तो यह है कि क्या इन सौदों को करते वक्त घूस दी या ली गई थी या नहीं? श्री आर. के. जैन को बराक मिसाइल के सौद के बारे में सारी जानकारी किसने दी? और क्यों दी? आखिरकार वे सारी जानकारियां मात्र रक्षा मंत्रालय के पास थी! जॉर्ज साहब इस सौदे में हुई धांधली के दोष से कैसे मुक्त हो सकते हैं? यह अति महत्वपूर्ण सवाल इस रूप में भी उठता है कि क्या बाराक मिसाइल के सौदे में कमीशन दूसरे देशों के राजधानियों में 'इन्वोयिस` के माध्यम से दिया गया है या नहीं? अगर ऐसा हुआ है तो क्या इसकी जिम्मेदारी जॉर्ज साहब पर आनी चाहिए या नहीं? और सवाल तो यह भी है कि कोकाकोला को धूल चटानेवाले जॉर्ज साहब उस समय साल भर से भी ज्यादा क्यों चुप रहे जब अमेरिकी पुलिस ने हवाई अड्डे पर भारत के रक्षामंत्री के कपड़े उतरवा दिए? क्यों छिपाई राष्ट्रीय अपमान की यह घिनौनी करतूत देशवासियों से जॉर्ज साहब ने?

प्रश्न बहुत सारे हैं। इनसे किसी पार्टी विशेष की नेता को भद्दी-भद्दी गालियां देकर नहीं बचा जा सकता। देश को आज यह सवाल पूछने का अधिकार है कि आखिर बीते दिनों के उस 'डायनामाइट` नायक का यह हश्र क्यों हुआ?




साहित्य में अध्ययन तथा शोध कार्य के लिए अलेक्सांद्र पुश्किन मेडल से सम्मानित अभय मोर्य ने विभिन्न विषयों पर ४० से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। संप्रति : दिल्ली विश्विद्यालय में रूसी साहित्य के प्राध्यापक।

बिहार में पंचायत चुनाव महिला-मुक्ति के सवाल

देशकाल

  • भारती एस. कुमार


जब स्वतंत्र-सोच के परिवारों की महिलाएं चुनाव-प्रचार में जोर-शोर से लग गइंर् तो इन 'मालिक` लोगों को अपनी औरतों को वोट मांगने के लिए बाहर भेजना पड़ा। घूंघट तो सिकुड़े ही; महिलाओं की अपनी पहचान भी बनी।



अस्‍सी के दश में शिवमूर्ति की एक कहानी 'तिरिया चरित्तर` चर्चित रही जिसमें ग्राम पंचायत ने शिउली नाम की औरत को व्यभिचारिणी घोषित कर उसके माथे को दाग दिया था, जबकि बलात्कारी उसका ससुर था। नब्बे के दशक में मैत्रेयी पुष्पा के चर्चित उपन्यास 'चाक` में नायिका सारंग सारी सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ती हुई प्रधान का चुनाव जीतकर दिखाती है। शिउली से सारंग तक का यह चित्रण नारी के अशक्त से सशक्त की ओर बढ़ने का संकेत है। मैत्रेयी पुष्पा का यह उपन्यास समाकालीन राजनीतिक-सामाजिक परिवेश में नारी सशक्तीकरण को नये रूप और अर्थ में ढालने का प्रयास है। इक्कीसवीं सदी के बिहार की औरतें भी अपने आप को इस नये रूप में ढालने के लिए तैयार हुइंर्। पंचायत-राज कानून लागू हुआ। विलम्ब से ही सही सन् २००१ में महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण तो मिला, पर मुखिया, प्रखंड-प्रमुख अथवा जिला परिषद् अध्यक्ष आदि पदों के लिए कोई आरक्षण नहीं दिया गया, बल्कि इन्हें एकल-पद घोषित कर दिया गया।


राजनीतिक सत्ता के बदलाव के साथ सन् २००६ में बिहार में पंचायत के लिए ५० प्रतिशत आरक्षण की घोषणा के साथ चुनाव सम्पन्न हुए। निश्चित रूप में नई सरकार की इस पहल ने महिला-सशक्तीकरण की आशा को बल प्रदान किया। इस चुनाव में महिलाओं के बीच काफी उत्साह देखने को मिला। ग्रामीण समाज में एक हलचल पैदा हो गई। एकल पदों पर आरक्षण ने ग्रामीण महिलाओं में ऐसा उत्साह भर दिया कि वे चुनाव की तैयारी, उम्मीदवारी और प्रचार को लेकर घर-आंगन, गली-मोहल्लों और खेत-खलिहानों में इस पर चर्चा करती नज़र आईं।

आरक्षण के प्रावधान के अनुसार कुल ४२३२ मुखिया और इतनी ही सरपंच चुनी जानी थीं। लगभग २ लाख ३२ हजार वार्ड सदस्यों पंचों तथा ११,६१२ पंचायत समिति और ११६२ ज़िला परिषद् सदस्यों में आधी संख्या महिलाओं की होनी थी। चुनाव परिणाम इससे अधिक संख्या में महिलाओं के पक्ष में गये। इस स्तर पर महिलाओं का राजनीतिकरण-देश के क्रिया कलापों में उनकी भूमिका को चिहि्उात करना साबित हुआ। घर परिवार चलाने वाली महिलाएं पंचायत भी बखूबी चला पाने में समर्थ हैं- यह बिहार के बाहर महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान की महिलाएं सिद्ध कर चुकी हैं। परन्तु बिहार में इन चुनावों में पितृसत्तात्मक सोच और मूल्यों की दखलन्दाजी खुलकर सामने आई। बिहार का ग्रामीण सत्ताधारी वर्ग यानी जमीन्दार, कुलक एवं दबंग अब अपने बदले अपने परिवार की औरतों को चुनाव लड़वाकर परदे के पीछे से सत्ता पर काबिज होने का खेल खेलने लगे। जो लोग अपनी महिलाओं को जुलूस-प्रदर्शन-धरना आदि में नहीं जाने देते थे तथा ऐसी महिलाओं पर फब्तियां कसते थे, आज अपने परिवार की औरतों को चुनाव में खड़ा कर रहे हैं। परन्तु इनकी सामंती पुरूषवादी सोच ने उन्हें चारदीवारी से बाहर आने की इजाज़त नहीं दी। 'बड़े घरों` की औरतें वोट मांगने कैसे जा सकती हैं? यह उनका तर्क होता था। परन्तु जब स्वतंत्र-सोच के परिवारों की महिलाएं चुनाव-प्रचार में जोर-शोर से लग गइंर् तो इन 'मालिक` लोगों को अपनी औरतों को वोट मांगने के लिए बाहर भेजना पड़ा। घूंघट तो सिकुड़े ही; महिलाओं की अपनी पहचान भी बनी। 'किसी की घरवाली` अथवा 'किसी की महतारी` के सम्बोधन के स्थान पर अब वे सुखिया देवी, हीरामणी, लीलादेवी, सीता देवी आदि नामों से पुकारी जाने लगीं। उनकी अपनी पहचान बनी।

यही नहीं, महिलाओं को अपने मुद्दे भी समझ में आने लगे। गांव में अस्पताल, स्कूल, सड़क, पानी से लेकर विकास जैसे मसले उनकी जुबान पर चढ़ गये। रोजी-रोटी का सवाल प्रमुख होकर उभरने लगा। महिलाओं पर बढ़ती हिंसा, उत्पीड़न... के विरोध में स्वर उठने लगे।

सन् २००६ में बिहार में महिलाओं की इस उथल-पुथल ने उनकी मुक्ति के दरवाजे पर एक दस्तक अवश्य दी है। यह दरवाजा कब खुलेगा, यह प्रश्न अभी बरकरार है। चुनाव के बाद गांधी समिति की एक कार्यशाला में चयनित महिलाओं ने जो अनुभव सुनाए उनसे क्षणिक निराशा होती है। इन महिलाओं के घर के पुरुषों ने उनकी तरफ से शपथ ली तथा पंचायत का काम-काज भी संभाल लिया। औरतों की पारिवारिक जिम्मेदारी जस की तस रही। बच्चे पालना, खाना पकाना, खेत-खलिहान और पशुओं की देखभाल सब कुुछ पहले जैसा ही रहा। उन्हें मीटिंग तक में जाना मयस्सर नहीं हुआ। पंचायत चुनाव उनके पतियों के लिए अपना रूआब-रूतबा बढ़ाने का अवसर बन गया। उनकी नजर तो 'विकास` के नाम पर मिलने वाली रकम पर रहती है। अंग्रेजी के एक राष्ट्रीय दैनिक की एक खबर के अनुसार पश्चिमी चम्पारन और बेतिया की जिला परिषदों में चयनित महिला सदस्यों के स्थान पर उनके पतियों ने मीटिंग में शिरकत की-भाषण भी दिए। विडंबना यह है कि इन लोगों को 'पार्षद-पति` कहकर सम्बोधित किया गया।

पिछले कुछ सालों में-सशक्तिकरण की 'थीम` पर कई फिल्में बनी। 'बसुमती की चिट्ठी` जैसी डाक्यूमेण्ट्री; 'हू-तू-तू`, 'गॉडमदर` और 'सत्ता` जैसी फिल्मों के माध्यम से हिंदी सिनेमा में नारी-शक्ति के राजनीतिक उदय की दस्तक सुनाई दी। दूसरी ओर 'मिर्च-मसाला`, 'मृत्यु-दंड` और 'दमन` में संगठन की शक्ति को स्थापित किया गया तथा पितृ-सत्ता को तोड़ने का प्रयास हुआ। जाहिर है कि औरतों के बढ़ते सशक्त कदमों की पदचाप रचनात्मक कृतियों-कहानी, उपन्यास और सिनेमा में सुनाई देने लगी है।

यह यूं ही नहीं है कि सानिया मिर्जा या शबाना आज़मी-कठमुल्लों के फतवे और प्रतिबन्धों को मानने से इंकार कर रहीं हैं। मुस्लिम समाज की महिलाएं भी राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए छटपटाहट महसूस कर रही हैं। मुस्लिम औरतों का वोट देने जाना, फोटो-पहचान पत्र बनवाना, चुनाव लड़ना आदि मुस्लिम समाज में पर्दा अर्थात् चहारदीवारी को तोड़कर स्वतंत्र होने की कसमसाहट की ओर इशारा है।

प्राय: हर क्षेत्र में आज महिलाएं पुरुषों को चुनौती दे रही हैं। उनसे बेहतर कर रही हैं। देश के विभिन्न परीक्षा परिणाम इसके साक्षी हैं। फिर भी आज क्यों औरतें स्वयं को असुरक्षित, परनिर्भर और कमजोर महसूस करने लगती हैं? एक के बाद एक अनेक घटनाएं-शाहबानो के हक, रूपकुंवर सती कांड, भंवरी देवी बलात्कार, शिवपतिया और मुखली की निर्व परेड, शिल्पी जैन, नैना साहनी, प्रियदर्शनी मट्टू, जेसिका लाल जैसे अनगिनत कांड हमारे सामने प्रश्न खड़े करते हैं। शायद इसीलिए औरत के हक में खड़ी एक सशक्त आवाज तसलीमा नसरीन को औरतों तथा प्रगतिशील पुरुषों का समर्थन भी नहीं मिल पा रहा है। अनेक बिहारी लड़कियां भी 'पावरविमेन` बनने के लिए देश-विदेश में संघर्षरत हैं। परन्तु दूसरी ओर वापस-घर के सामन्ती मूल्य अपनी 'पावर` दिखाने से नहीं चूकते।

हालांकि इन सभी पितृसत्तात्मक मूल्यों को तोड़ने की मुहिम खुल चुकी है। खेत-खलिहानों में जमींदारों, लठैतों और सवर्णों के खिलाफ लगातार संघर्ष करती दबी-कुचली दलित महिलाएं अपनी पहचान बना रही हैं। यही है असली 'फेमिनिज्म`, जो तेजी से उभर रहा है। नारीवाद का अर्थ केवल देह या कोख पर अधिकार मात्र नहीं है बल्कि पितृसत्ता के मजबूत चक्रव्यूह को तोड़ना है जो प्रच्छन्न तरीके से औरत को घेरे हुए है। संघर्ष की आग में तपकर निकली निम्न वर्ग की औरतों में जो आत्म-विश्वास देखने को मिल रहा है, वही सोच मध्यम वर्ग की महिलाओं में जब तक प्रवेश नहीं करेगी-पुरूषवादी सोच परास्त नहीं हो सकेगी।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पंचायतों में महिलाओं के लिए ५० प्रतिशत आरक्षण उनकी मुक्ति द्वार के खुलने जैसा है। अब आवश्यकता है ग्रामीण महिलाओं में शिक्षा के माध्यम से एक राजनीतिक समझ का विकास करने की। उस सोच से लड़ना जो उनकी देह पर हमला कर उनके मनोबल को तोड़ती है। बलात्कार, हिंसा, डायन-चुड़ैल कहकर प्रताड़ित करना ऐसे हथकण्डे हैं जिन्हें औरतों की ताकत को तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

हरियाणा की एक पंचायत में एक महिला प्रधान का बाल पकड़कर पिटाई और मध्यप्रदेश में शूद्र महिला प्रमुख को झंडा नहीं फहराने देना और उस स्थान को अपवित्र कहकर धुलवाना जैसी सवर्ण मानसिकता के विरूद्ध संघर्ष नारी मुक्ति अथवा सशक्तिकरण का रास्ता खोलेगा। बिहार की महिलाओं की मुक्ति संघर्षों से होगी, आरक्षण उसमें उत्प्रेरक का कार्य करेगा।



भारती एस कुमार पटना विश्विद्यालय के इतिहास विभाग की अध्यक्ष हैं व 'आधी जमीन` पत्रिका से जुड़ी हैं।

अरुण कमल से प्रमोद रंजन की बातचीत

साहित्य प्राय: उनका पक्ष लेता है जो हारे हुए हैं



प्रमोद रंजन : आपको २०वीं सदी के एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में रेखांकित किया गया और २१वीं सदी में भी आपकी रचना सक्रियता बनी हुई है। इस दौरान विश्व पटल पर कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं । हिंदी की मुख्यधारा की रचनाशीलता को दिशा देने वाला समाजवाद हाशिए पर चला गया है। अब भूमंडलीकरण को निर्मित करने वाली आर्थिक शक्तियां एक भिन्न किस्म का समाजशास्‍त्र भी गढ़ रही हैं। आप इन परिवर्तनों को कैसे देखते हैं?


अरुण कमल : किसी भी साधारण आदमी के जीवन में अचानक न तो एक सदी खतम होती है, न दूसरी शुरू। सब कुछ एक साथ लगातार चलता रहता है। दुनिया का बदलना और आपका लिखना पढ़ना भी। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप की समाजवादी सरकारें आज नहीं हैं। लेकिन यह भी सच है कि क्यूबा, चीन और वियतनाम हैं। और दक्षिणी अमेरिका में नये वामपंथी रूझान हैं। नेपाल में बदलाव है। भारत में भी वामपंथियों को आज संसद में पहले के मुकाबले ज्यादा जगहें हैं । पूरी दुनिया में पूंजीवाद त्रस्त है। और सबसे बड़ी बात यह कि हार जाने से न तो आदर्श समाप्त होते हैं न स्वप्न। साहित्य किसी बाह्य राजनीतिक सत्ता से नहीं, इन्हीं आदर्शों और स्वप्नों से प्रेरित होता है। अंधेरे में ही सबसे उज्जवल, सुगंध भरे फूल फूटते हैं। साहित्य प्राय: उनका पक्ष लेता है जो हारे हुए हैं, जो अपना सब कुछ खो चुके हैं। 'हो न सके जो पूर्ण काम उनको प्रणाम।`


प्रमोद रंजन : मौजूदा स्थिति में क्या भूमंडलीकरण का कोई व्यवहारिक विकल्प हो सकता है? इसे एकमात्र विकल्प मानने वाले भी इसमें निहित साम्राज्यवाद के खतरे को चिन्हित करते हैं। ऐसे में भारतीय जनता का स्टैंड क्या होना चाहिए? इस संदर्भ में सत्तागत नीतियां क्या होनी चाहिए?


अरुण कमल : आरम्भ से ही समूची दुनिया को एक में जोड़ने-बांधने का सिलसिला चल रहा है। पूंजीवाद ने यह काम सबसे ज्यादा और सबसे तेजी से किया जो मानव इतिहास में अभूतपूर्व है। इसके अनेक फायदे हैं। यह जरूरी भी है। तकनीकी क्रांति ने इसमें बहुत हाथ बंटाया है। आज पूंजी और श्रम-शक्ति दोनों अबाध गति से पूरे भूमंडल में संचरण कर रहे हैं। इसका अर्थ यह भी है कि पूंजीवाद के विरोध की शक्तियां भी एक साथ पूरे भूमंडल में फैल सकती हैं। हम पीछे नहीं लौट सकते। हम वापस स्वयंसम्पूर्ण ग्राम-व्यवस्था में नहीं जा सकते। जरूरत इस बात की है कि जो लोग नया संसार-समानता-स्वतंत्रता के मूल्यों पर आधारित शोषणमुक्त संसार-बनाना चाहते हैं वे भी एकजुट हों। ऐसी कोशिशें चल रही हैं।



प्रमोद रंजन : सूचनाओं के महाविस्फोट ने मध्यवर्ग को एक तरह के वर्चूअल (आभासी) संसार का निवासी बना दिया है। कहा जा रहा है कि जल्दी ही प्रतिरोध की बची-खुची कवायदें भी समाचार माध्यमों के दृश्य पटल का हिस्सा भर रह जाएंगी। क्या यह श्रेयकर होगा कि इस आभासी संसार का आनंद 'सभी` को उपलब्ध हो पाए?
ऐसा होना किस तरह मनुष्‍यता के खिलाफ जाएगा? रियल से वर्चूअल की यह यात्रा कितनी प्रायोजित है?



अरुण कमल : एक तरफ टेलिविजन, विज्ञापन आदि का 'आभासी` संसार है तो दूसरी तरफ स्वयं कठोर भौतिक जीवन का 'वास्तविक` संसार भी है। स्वयं अमेरिका और यूरोप का मध्यवर्ग इन दो संसारों के द्वंद्व को महसूस करता है जिसका एक प्रमाण इन समृद्ध देशों का अवसाद भरा, कुटुम्बहीन अकेलापन है। मध्यवर्ग को वास्तविक जीवन का पूरा अंदाज है-नौकरी में असुरक्षा, काम के बढ़ते घंटे, अवकाश का अभाव, प्रेम की कमी, जीवन में जोखिम जिसे टी.एस.इलियट ने बहुत पहले भांपा था- 'वेयर इज द लाइफ वी हैव लॉस्ट इन लिविंग?` कहां है वो जीवन जो हमने जीने में खो दिया? इसलिए पूंजीवाद का विरोध अंतत: वे लोग भी करेंगे जो आज इसके आश्रय हैं। क्योंकि नये समाज के निर्माण का अर्थ सुखभरे समाज का निर्माण है जहां आप चार घंटे काम करेंगे और बाकी समय पढ़ेंगे-लिखेंगे, संगीत सुनेंगे, घूमेंगे, मछली मारेंगे, बागवानी करेंगे और आजाद रहेंगे। मनुष्य को आभासी नहीं, वास्तविक सुख चाहिए। एक को नहीं। सबको।



प्रमोद रंजन : ऐसा लगता है जैसे वर्चस्व की सांप्रदायिक प्रवृत्ति ने 'सभ्यताओं के संघर्ष का वैचारिक चोगा पहन लिया है। अमेरिका द्वारा इराक के जबरन अपदस्थ किए गए रा ट्रपति सद्दाम हुसेन और भारतीय संसद पर हमला करने के आरोपी अफजल में क्या आप भी कोई समानता देखते हैं? एक समानता तो यह है कि दोनों विश्व के महान लोकतांत्रिक देशों (अमेरिका समर्थित देश द्वारा सद्दाम व भारत द्वारा अफजल) की न्याय व्यवस्थाओं द्वारा घोषित जघन्य अपराधी हैं और मृत्यु दंड की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
इसके अलावा एक इतर प्रश्न यह भी पूछना चाहूंगा कि भगत सिंह और अफजल में क्या असमानताएं हैं?


अरुण कमल : नहीं। सद्दाम हुसेन को पहले तो अमेरिका ने ही खड़ा किया था जैसे लादेन को, जैसे तमाम जनतंत्र और जन-विरोधियों को। फिर सद्दाम हुसेन को इराक की संप्रभुतासंपन्न सरकार ने नहीं, वरन् अमेरिकी कठपुतली सरकार ने सजा दी है, उसकी पोषित न्यायपालिका ने। इसलिए यह गलत है। जबकि जिस हत्यारे का आप नाम ले रहे हैं उसे एक संप्रभुतासम्पन्न संसद पर हमले के लिए सजा दी जा रही है, जिसके लिए उसके मुंह में कभी खेद का एक शब्द भी नहीं है। दोनों की तुलना गलत है।
मैं किसी भी प्रकार की हत्या या अत्याचार का विरोधी हूं। चाहे वह हत्या एक व्यक्ति करे या कोई समूह या सरकार।
आपके प्रश्न के अंतिम खंड के बारे में मेरा कहना है कि जिस पंक्ति में महान् शहीद भगत सिंह का नाम लिखा जाए उसमें किसी और का नाम न लिखें। स्वर्णाक्षर केवल शहीदों के लिए है, क्रांतिकारियों के लिए। पेशेवर हत्यारों के लिए नहीं।



प्रमोद रंजन : एक मार्क्सवादी होने के नाते इन दिनों सशक्त रूप से अभिव्यक्ति पा रहे सामाजिक समूहों की अस्मिताओं के संघर्ष को आप किस रूप में देखते हैं? क्या आपका कवि इनमें किसी मानवीय दृटि टकोण की तलाश कर पा रहा है? मार्क्सवादी दलों ने इधर अपने ऐजेंडे में वर्ग के साथ-साथ वर्ण को भी प्रमुखता से शामिल करना आरंभ किया है। जाति हिंदू समाज की मूल सच्चाई रही है। भारतीय मार्क्सवादियों को इसे समझने में इतनी देर क्यों लगी? राजनीति ही नहीं, बौद्धिक हलकों में भी समाज का इतना सूक्ष्म विश्लेषण करने वाले मार्क्सवादी इतिहासकार, साहित्यिक व अन्य समाज-संस्कृतिकर्मी इसे प्रमुखता देने से क्यों बचते रहे? इतने लंबे समय तक इस यथार्थ की उपेक्षा को क्या आयातित विचारों का खुमार भर माना जाए, या षययंत्र भी?



अरुण कमल : वंचित सामाजिक समूहों का उभार पिछले कुछ दशकों की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। और यह बहुत खुशी की बात है। जब तक हाशिया केन्द्र नहीं बनेगा और फिर एक ऐसा समाज न होगा जहां न तो केन्द्र होगा न हाशिया, तब तक यह उभार चलता रहेगा। लेकिन हमें केन्द्र-हाशिया नहीं, समतल एकरस भूमि चाहिए।
जहां तक वर्ग और वर्ण तथा मार्क्सवादी इतिहासकारों की भूमिका की बात है तो मैं विनम्रतापूर्वक कहूंगा कि मेरा ज्ञान इस विषय में बहुत कम है। आप किसी इतिहासकार से इस पर बात करें तो मेरा भी फायदा होगा। फिर भी मुझे लगता है, हांलाकि मैं गलत हो सकता हूं, कि आज भारतीय जीवन को चलाने वाली व्यवस्था न तो सामंती है न जाति-आधारित। जैसा कि आपके पूर्व प्रश्न भी बताते हैं आज यहां पूंजीवाद ही मुख्य चालक-शक्ति है। आज शोषण का मुख्य कारण पूंजी है। हांलाकि अंतर्विरोध अनेक हैं जैसे जाति, धर्म, योनि, क्षेत्र, भाषा आदि पर आधारित। एक ही साथ अनेक प्रकार के विभेद और शोषण मौजूद हैं। सबका खात्मा जरूरी है। आप कहते हैं कि जाति हिंदू धर्म की मूल सच्चाई है। हो सकता है। लेकिन क्या धर्म बदलने से यह खत्म हो जाता है। अगर ऐसा होता तो फिर दूसरे धर्मों के लोग जाति-आधारित फायदे क्यों चाह रहे हैं? मेरा अनुभव है कि पाकिस्तान में भी, जो शुद्ध मुस्लिम देश है, जात-पांत है, कबीले हैं, यहां तक कि गोत्र हैं और पंथ विभाजन जैसे शिया-सुन्नी-अहमदिया आदि तो है ही। और म्यांमार में भी जो शुद्ध बुद्ध-राष्ट्र है, जात-पांत तथा सामाजिक विभेद है। जबकि 'हिंदू` नेपाल में अपेक्षाकृत कम। स्वयं भारत में भी सभी धर्मों में जाति-भेद आज भी लगभग एक जैसा है। मैं नहीं जानता क्यों। लेकिन इतना लगता है कि वर्ण तथा जाति की व्यवस्था का संबंध केवल धर्म से नहीं है। कोई और कारण भी है। मार्क्सवादी इतिहास का इतिहास ज्यादा लंबा नहीं है। फिर भी मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इस बारे में सोचा है। इरफान हबीब का एक लेख जाति-व्यवस्था पर बहुुत महत्वपूर्ण है जिसमें वह पूछते हैं कि ऐसा क्यों है कि बुद्ध से लेकर अब तक जितने भी शासक आये-देशी या विदेशी-सबने जाति-व्यवस्था को लगातार मजबूत ही किया और आज भी कर रहे हैं। डॉ. रामशरण शर्मा ने भी विचार किया है। और भारत को समझने के लिए सर्वोपरि डी.डी. कोसाम्बी को पढ़ना जरूरी है। मैं यह भी सोचता हूं कि ऐसा क्यों है कि कोई ऐसी जाति नहीं जिसमें अमीर-गरीब दो वर्ग न हों? जहां मलाई और मट्ठा दोनों न हों? आज शोषण का मुख्य कारण पूंजीवाद है, जाति या धर्म नहीं। बेरोजगार हर जाति-धर्म में हैं। दरिद्रता हर जगह हर जाति में है, जैसे सम्पन्नता कहीं कम कहीं ज्यादा। फिर भी जाति की भावना है और शायद रहेगी। क्योंकि यह एक मानसिक अवस्था भी है; अपने को ऊंचा या नीचा समझना। चेखव ने लिखा है कि वह एक मोची के बेटे थे। उन्हें यह बात सालती थी। एक सुबह उन्होंने तै किया कि मैं इसे भूल रहा हूं और वह नये आदमी बन गये। ऐसा ही गोर्की ने भी किया। ऐसा ही राहुल जी ने भी किया। लेकिन यह रास्ता कठिन है। अपनी सारी पूर्वप्रदत्त पहचानों को छोड़ना सबसे कठिन है, पूर्वाग्रहों को तोड़ पाना उससे भी कठिन। जैसा कि आइन्सटाइन ने कहा है, 'एक परमाणु के विखंडन से कहीं अधिक कठिन है पूर्वाग्रहों का खंडन`। फिर भी हम सब उस जातिविहीन, वर्गविहीन और धर्मविहीन समाज की इच्छा करते हैं। चाहे जैसे हो, यह हो। इसके लिए जरूरी है कि पूरे सामाजिक जीवन को उन्नत, आधुनिक और तकनीक सम्पन्न बनाया जाय ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार काम पा सके, ताकि उसे पुश्तैनी काम करने पर मजबूर न होना पड़े। हमारे समाज के सबसे दलित भंगी-मेहतर और उनकी य़िां पहले माथे पर मैला ढोती थीं। नये आधुनिक शौचालयों ने उनको इस अमानवीयता से मुक्त किया। इसी तरह पूरा जीवन बदल सकता है। न तो मेहतर का बच्चा पाखाना धोने वाला मेहतर बनना चाहता है न ब्राह्मण का बेटा आरती घुमाने वाला भिखमंगा ब्राह्मण। बिना जाति-मुक्ति के देश का कल्याण नहीं हो सकता।



प्रमोद रंजन : भारतीय लेखन का विश्व बाजार निर्मित हुआ है। सलमान रश्दी, विक्रम सेठ आदि से लेकर अरुंधति राय तक की किताबें भारत में भी खूब बिक रहीं हैं। हिंदी में भी कभी लेेखकों को पर्याप्त सम्मान मिला करता था। आज वह स्थिति नहीं है। अपने समकालीन दिग्गज लेखकों को हिंदी समाज जानता तक नहींं। इस परिदृश्य के पीछे आप क्या कारण देखते हैं? क्या कोई सामाजिक कारण भी है-मसलन, गांवों में जागरण का समाप्त होना, एक किस्म के अभिजात्य पाठक का आगमन ..
अरुण कमल : जिसे आप भारतीय लेखन कह रहे हैं वह वास्तव में अंग्रेजी लेखन है। जो भारत के मध्यवर्ग की भाषा है। दूसरे देशों का मध्यवर्ग आज भी अपनी भाषा को प्रेम करता है। पर भारत का नहीं। हिंदी समाज स्वयं अपनी भाषा और साहित्य से प्रेम नहीं करता। दुनिया के किसी देश में कवियों का मजाक उड़ाने वाले चुटकुले, धारावाहिक और हास्यास्पद चौकड़े नहीं होते। भारत को छोड़ कर। हमारे गांव पहले से भी ज्यादा जहालत और बर्बादी में हैं। लेकिन इन सबके पीछे एक कारण यह भी है कि भारतीय भाषाओं का लेखन, हिंदी का लेखन, आपको चेतना के स्तर पर उकसाता है, वह व्यवस्था-विरोधी है जबकि भारतीय-अंग्रेजी लेखन मुख्यत: उपभोगवादी है। वहां न तो हेराल्ड पिंटर संभव हैं न हेराल्ड ब्लूम न मुक्तिबोध। यह सत्ता के लिए सुविधाजनक है।
प्रमोद रंजन : रूस के दिग्गज आलोचक मिखाइल बाख्त़िन कहते हैं कि "कविता एक विशे ााधिकार प्राप्त, बुनियादी रूप से सौंदर्यवादी विधा है। यह एकालापी (ऑटोटेलिक) है तथा सिर्फ 'कहने की भा ाा` में संभव हो पाती है। यह संवादपरक नहीं है जबकि उपन्यास रैटारिक तत्व से चालित विधा है।"
एक ऐसे समय में जब समस्याएं जटिलतम होकर अधिकाधिक संवाद की मांग करने लगीं, कविता हाशिए पर चली गई। क्या ऐसा नहीं लगता की बाख्त़िन का आकलन सही है? आप आधुनिक चुनौतियों के समक्ष कविता को कितना सक्षम पाते हैं?
अरुण कमल : बाख्त़िन को रूपवादी आलोचक माना जाता है जिन्होंने मार्क्सवादी धारणाओं का भी व्यवहार किया। उनका सबसे महत्त्वपूर्ण काम दॉस्तॉवस्की के उपन्यासों पर है। उन्होंने कहा कि दॉस्तॉवस्की के उपन्यास तॉल्सतॉय की तुलना में कहीं अधिक 'बहुस्तरीय`, 'बहुस्वरीय` तथा लेखक के अधिनायकत्व से मुक्त अनेक चरित्र स्वरों का स्वतंत्र संपुंजन हैं। इससे आप सहमत-असहमत हो सकते हैं, परन्तु इतना तै है कि बाख्त़िन ने खुले, समावेशी, बहुस्तरीय, बहुस्वरीय रचना की वकालत की। अगर हम इसे आधार मानें तो यह स्थिति सबसे ज्यादा शेक्सपीयर की कविता में घटित होती है। जहां कोई एक अंतिम स्वर नहीं है। कविता भाषा की अनन्त सम्भावनाओं का भी उपयोग करती है। प्रश्न कविता बनाम उपन्यास का नहीं है। ऐसा करना वाजिब नहीं। बाख्त़िन ने तो एक उपन्यासकार बनाम दूसरे की बात की। फिर भी साहित्य में कोई भी निर्णय अंतिम नहीं होता। बहुत से लोग तॉल्सतॉय को ज्यादा महत्त्व देते हैं और बहुत से लोग सर्वेन्तीज को। कविता एक अलग काम है। आधुनिक चुनौतियों ने ही आधुनिक कविता को जन्म दिया। फिर भी कविता बहुत कम लोग पढ़ते हैं। कविता हाशिए पर है या केन्द्र में यह सवाल नहीं है। हम जिसे प्रेम करते हैं वह अगर धूल में भी हो, कूड़े में भी हो, अंत्यज और क्षुद्र हो तब भी उसे ही प्रेम करते हैं । यही उसकी महानता है। कविता बहुमुखी संवाद है-दूसरे से भी और खुद से भी। 'सुनो भाई साधो` इसकी टेक है।



प्रमोद रंजन : मंत्रों से लेकर आधुनिक कविता तक को 'स्वत: स्थापित सत्य` की तरह कोट किया जाता है। जबकि वास्तव में वह एक व्यक्ति (कवि) का 'सत्य`- उसके द्वारा विश्लेि ात धारणा होती है। वह कौन से तत्व हैं जो काव्य को ऐसी विश्वसनीयता प्रदान करते हैं? और यह कितनी जेनुईन होती है?
अरुण कमल : हर रचना व्यक्ति ही करता है। यह व्यक्ति समाज का सर्वाधिक उर्वर तंतु होता है। फिर भी न तो कोई अंतिम सत्य है न अंतिम विश्वसनीयता। 'स्वत: स्थापित सत्य` तो होता ही नहीं। जब कोई कविता अधिक से अधिक लोगों को अधिक से अधिक कालों तक प्रभावित करती जाती है तो वह ऐसी विश्वसनीयता हासिल कर लेती है। जब कभी कोई पंक्ति आपको अचानक कभी याद आ जाए तो समझिए वह सच्ची है।
प्रमोद रंजन : आपके नए कविता संग्रह 'पुतली में संसार` में एक कविता है 'पक्ष का कारण`। 'पूरी बहस में मैं जूता उतारने के खिलाफ था/मेरा कहना था कि/जूता उतारकर अंदर आने को कहना/न सिर्फ असभ्यता की निशानी है बल्कि सामंती मनोवृति का अवशे ा भी..`। इस कविता के अंत में आप कहते हैं कि 'सच बात तो यह थी कि मैं जूता उतारने के/इसलिए खिलाफ था कि मेरा पैताबा/तार-तार था`। यह कविता प्रकारंतर से मोहभंग का संकेत करती लगती है!



अरुण कमल : मैं खुद नहीं कह सकता कि यह कविता 'मोहभंग का संकेत` करती है या नहीं। शायद आशय यह हो कि आपकी आर्थिक स्थिति जैसी होगी प्राय: आपका पक्ष भी वैसा ही होगा। आर्थिक स्थिति बदलते ही आपकी चाल-ढाल, बात-व्यवहार, चरित्र तथा रूप-रंग भी बदल जाते हैं। फ्रांसीसी उपन्यासकार फ्लॉबेय की एक पंक्ति है 'मादाम बुवारी` में : 'हिज कम्पलेक्शन वाज द कम्पलेक्शन ऑफ वेल्थ`। उसका रंग उसके धन का रंग था।


प्रमोद रंजन : हिंदी में इन दिनों हो रहे विपुल लेखन के पीछे कौन से कारक काम कर रहे हैं? आपका आलोचनात्मक विवेक इसे कितना प्रासंगिक पाता है? हिंदी पाठक कैसे अपने लिए किताबों, पाठ्य सामग्री का चुनाव करे; आप कुछ सुझाव देंगे?


अरुण कमल : हिंदी में इन दिनों हो रहे विपुल लेखन का अर्थ है कि पहले की तुलना में अधिक लोग लिख-पढ़ रहे हैं। जो वंचित समूह हैं उनसे भी लेखक आ रहे हैं। यह शुभ है। वैसे आलोचक वाल्टर बेंजामिन कहते थे कि रद्दी किताबें छापने वाले प्रकाशन को दंड मिलना चाहिए। मैं समझता हूं कि प्रत्येक सजग पाठक अपना चुनाव खुद कर लेता है। हर पुस्तक का अपना नियत पाठक, अपना गंतव्य, अपना भाग्य होता है। जिसको जो मन सो पढ़े। मैं पढ़ने में समाज में और जीवन में पूर्ण जनतंत्र चाहता हूं। मैथिली में एक कहावत है-बाजते रहलौं त हारलौं कि? बोलता ही रहा तो हारा कैसे?

बहुजन नजरिये से १८५७ का विद्रोह

  • कंवल भारती

( लेखक ने बहुजन नजरिये से १८५७ के विद्रोह का अध्ययन प्रस्तुत किया है। १८५७ का विद्रोह ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के विरूद्ध द्विज और असराफ हिंदू-मुसलमानों का संघर्ष था। भारत में कंपनी राज की स्थापना इंग्लैंड के निचले तबके के लोगों द्वारा हुई थी। इन लोगों ने भारत के 'बड़े` लोगों का विशेषाधिकार खत्म करना चाहा था। इसीलिए ये 'बड़े` लोग कंपनी राज के विरुद्ध थे। इंग्लैंड के लार्ड और अर्ल-ड्यूक (असराफ तबका) भी भारत में कंपनी राज खत्म करना चाहते थे। १८५७ के बाद भारत में कंपनी राज खत्म हो गया और ब्रिटिश महारानी ने घोषणा की कि वह भारत के अमीर-उमरांवों का सम्मान करेंगी। यह दो देशों के शासक तबकों का एक समझौता था। इंग्लैण्ड के असराफ तबके ने भारत के असराफ तबके से सीमित समझौता कर लिया था। भारत में समाज सुधारों से अंग्रेजों ने अपना हाथ खींच लिया। यह भारत के 'बड़े` लोगों के लिए सामाजिक स्वतंत्रता थी। इसी अर्थ में यह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। -संपादक )



किसी भी राष्ट्रीय विषय पर भारत के लोग समान मत नहीं रखते हैं, क्योंकि वे सामाजिक स्तर पर अलग-अलग वर्गों में विभाजित होते हैं। जिन लोगों का जैसा सामाजिक स्तर होता है, वैसी ही उनकी सोच बनती और विकसित होती है। यही कारण है कि इस देश के शासक वर्ग के लोगों ने, जो सामाजिक स्तर पर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग था और पूर्ण स्वाधीनता का उपयोग कर रहा था, १८५७ के गदर को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बताया है। यह मत भारत के ब्राह्मण वर्ग के विद्वानों का है, और उन लोगों का है जो हिन्दुत्ववादी थे और भारत में सामन्ती शासन चाहते थे। यह वह वर्ग था जो अपनी धर्म-व्यवस्था पर मुग्ध था और उसमें कोई परिवर्तन नहीं चाहता था। मुसलमान शासकों ने अपने आठ सौ साल के साम्राज्य में ब्राह्मणों की धर्म-व्यवस्था को नहीं छुआ और हिन्दुओं को उनकी धर्म-व्यवस्था पर चलने की पूरी आजादी दी। इसलिये मुस्लिम साम्राज्य के खिलाफ एक भी स्वतंत्रता संग्राम भारत में नहीं लड़ा गया।

किसी भी आन्दोलन को नेतृत्व और गतिशीलता देने का काम बुद्धिजीवी वर्ग करता है और दुर्भाग्य से भारत में बुद्धिजीवी वर्ग ब्राह्मण रहा है। बुद्धिजीवी और ब्राह्मण ये दोनों एक-दूसरे के पर्याय माने गये हैं। मुसलमान शासकों ने इसी ब्राह्मण वर्ग को सारी स्वतंत्रता और सुख-सुविधाएं देकर अपना वफादार बनाकर रखा था। लेकिन यही काम भारत में आने के बाद अंग्रेजों ने नहीं किया। उन्होंने उनकी धर्म-व्यवस्था में दखल देना शुरू किया और इसी दखल के परिणामस्वरूप उन्हें ब्राह्मणों के विद्रोह का सामना करना पड़ा। दूसरे शब्दों में अंग्रेजों का समाज-सुधार ऐजेण्डा ही उनके विरूद्ध आंदोलन का कारण बन गया। कम से कम दो बड़े विद्रोह भारत में समाज सुधार के फलस्वरूप ही हुए, जिनमें पहला १८०६ में वेल्लौर का सिपाही विद्रोह और दूसरा १८५७ का सिपाही विद्रोह। अंबेदकर ने लिखा है कि वेल्लौर का विद्रोह एक छोटी चिंगारी की तरह था, पर १८५७ का विद्रोह एक बड़ा अग्निकाण्ड बन गया था। (डा. आंबेदकर रायटिंग एण्ड स्पीचेस, वाल्यूम १२, पृष्ठ १४०) वेल्लौर का विद्रोह सिर्फ इस आधार पर हुआ था कि मद्रास आर्मी के चीफ कमान्डर जान क्रैडोक ने एक रेगूलेशन जारी करके सिपाहियों के लिये धार्मिक और जातीय पहचान वाली यूनिफार्म समाप्त करके उसकी जगह नयी यूनिफार्म लागू की थी, जिसमें पगड़ी, दाढ़ी और हाथों में अंगूठियां पहनने की मनाही कर दी गयी थी और इन सबके बदले एक नयी टोपी निर्धारित की गयी थी। सिपाहियों ने इसे अपने ईसाईकरण के रूप में देखा। हिन्दुओं ने नयी टोपी को गाय की खाल से बनी टोपी समझा और मुसलमानों ने दाढ़ी हटाने को अपने धर्म में दखल समझा। अत: दोनों धर्मों के सिपाहियों ने धर्म के नाम पर विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह को वेल्लौर किले में मौजूद टीपू के परिवार ने मदद की थी।

इस विद्रोह को भी ब्राह्मण लेखकों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम कहा है और यहां तक लिखा है कि इसी विद्रोह ने १८५७ में सिपाही विद्रोह के रूप में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का मार्ग प्रशस्त किया था। (दि हिंदू, सण्डे मैगजीन, ६ अगस्त, २००६ में देखिए ए. रंगराजन का लेख 'व्हेन दि वेल्लौर सिपाय`स रिबेल्ड`)
क्या यह सचमुच स्वतंत्रता संग्राम था? यदि यह वास्तव में ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम था, तो वे सिपाही कम्पनी की सेना में भरती ही क्यों हुए थे? फिर, यह विद्रोह नये यूनिफार्म रेगूलेशन जारी होने के बाद ही क्यों हुआ? इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह विद्रोह ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ नहीं था, बल्कि उसके द्वारा जारी रेगूलेशन के विरोध में था, जिसने सिपाहियों की धार्मिक और जातीय पहचान समाप्त कर दी थी। यदि कम्पनी इस रेगूलेशन को जारी नहीं करती, तो विद्रोह नहीं होता। तब यह स्वतंत्रता संग्राम किस आधार पर था? यदि यह 'कम्पनी सरकार` को हटाने के आधार पर था, तो स्वतंत्रता संग्राम नहीं था। परन्तु यदि यह धार्मिक और जातीय स्वतंत्रता के लिये था, तो यह स्वतंत्रता संग्राम था। तब हम इसे धार्मिक स्वतंत्रता संग्राम कहेंगे, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम नही।

१८५७ के विद्रोह का श्रेय सिपाही मंगल पाण्डे को दिया जाता है। वह एक रूढ़िवादी और अस्पृश्यता मानने वाला ब्राह्मण था। मेरठ की उसी बैरक में, जिसमें मंगल पाण्डे था, मातादीन सफाई का काम करता था। घटना है कि एक दिन झाड़ू लगाते समय पाण्डे का लोटा मातादीन से छू गया। अस्पृश्यता-धर्म को मानने वाले मंगल पाण्डे से लोटे का छूना सहन नहीं हुआ और उसने मातादीन को गालियां देकर अपमानित किया। इस पर मातादीन ने फटकारते हुए कहा कि लोटा छूने से तुम धर्मभ्रष्ट हो जाते हो, पर जब उन कारतूसों को दांतों से पकड़कर खोलते हो, तो भ्रष्ट नहीं होते, जिनके मुंह पर गाय और सुअर की चर्बी लगी होती है। मंगल पाण्डे ने जब यह सुना तो उसे लगा कि सभी हिन्दू सिपाहियों का धर्म-भ्रष्ट हो गया है। यही घटना सिपाही विद्रोह का कारण बनी। क्या सचमुच सिपाही विद्रोह का यही एक कारण था? यह गले नहीं उतरता, क्योंकि कारतूसों में चर्बी रहती थी, यह सभी सिपाही जानते थे, भले ही वह किसी भी पशु की हो। यदि मंगल पाण्डे मांसाहारी नहीं था, तो उसके लिये किसी भी पशु की चर्बी वर्जित थी। फिर गाय की चर्बी को लेकर ही विद्रोह क्यों? दूसरे, यह भी गौरतलब है कि बगावत के समय भी सिपाहियों ने कारतूसों का उपयोग किया था, तब वे उन्हें किस तरह खोलते थे? सम्भवत: मामला चर्बी का नहीं था, कुछ और भी था।

गाय और सुअर ये दो पशु हिंदू और मुसलमानों के धर्म से जुड़े हैं। हिंदू गाय को माता कहते हैं, जो उनके धर्म में एक पूजनीय पवित्र पशु है, जबकि मुसलमानों के लिये सुअर एक गंदा पशु है और इस्लाम में उसका छूना और मांस खाना हराम माना गया हैं। हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़ाने के काम में साम्प्रदायिक शक्तियां प्राय: इन्हीं दो पशुओं का उपयोग करती आयी हैं। १८५७ में भी ब्राह्मण शक्तियों ने यही किया। उन्होंने कारतूसों में गाय की चर्बी को अपनी धर्म-व्यवस्था की लड़ाई के लिये एक कारगर हथियार के रूप में देखा। इस धर्मऱ्युद्ध में मुसलमान भी ब्राह्मणों के साथ आ जायंे, इसलिये गाय के साथ सुअर को भी एक साथ जोड़ा गया।
यहां भी वही सवाल विचारणीय है, जो वेल्लौर विद्रोह में था। जिन ब्राह्मणों ने इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा, जैसा कि सावरकर और हरदयाल आदि ने कहा था, वे इस बात पर विचार नहीं करते कि यदि कारतूसों में गाय या सुअर की चर्बी न लगायी होती, या इसका भान ही न हुआ होता, क्या तब भी कोई विद्रोह होता? यदि चर्बी ही मुख्य कारण था, तो जाहिर है कि कोई विद्रोह नहीं होता। फिर, उसे स्वतंत्रता संग्राम किस आधार पर कहा जा सकता है? दरअसल यह विद्रोह भी समाज सुधार कार्यक्रम का प्रतिफल था। यह अपनी धर्म-व्यवस्था को बचाने का संग्राम था। यह हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता का मामला था, भारत की स्वतंत्रता से इसका कोई संबंध नहीं था। इस विद्रोह को भारत का स्वतंत्रता संग्राम का रूप देने की कोशिश रूढ़िवादी ब्राह्मणों और कुछ देशी राजाओं और नवाबों ने की थी, जिनकी रियासतें अंग्रेजी राज में खतरे में थीं।

सिपाही-विद्रोह के मूल कारण पर आते हैं। यह विद्रोह बंगाली आर्मी ने किया था। यह सिर्फ नाम की बंगाली आर्मी थी, इसमें बंगाल का कोई भी सिपाही नहीं था। यह आर्मी मुख्य रूप से अवध और दोआबा क्षेत्र के उच्च जातीय लोगों को लेकर बनी थी। इसमें अधिकांश ब्राह्मण सैनिक थे, जो अपना सबसे ज्यादा समय नहाने और पूजापाठ में लगाते थे। इसलिये, यह आर्मी ब्राह्मण साजिश का आसानी से शिकार हो गयी।

अवध प्रांत और बनारस के ब्राह्मण, अंग्रेजी सरकार के सामाजिक सुधार कानूनों से क्षुब्ध थे। वे चाहते थे कि मुगलों की तरह अंग्रेज भी उनकी धर्म-व्यवस्था में दखल न दें, पर अंग्रेजों ने कई मामलों में दखल देना जरूरी समझा।

इस संबंध में आंबेदकर ने कुछ सुधारों का उल्लेख किया है, जिनका संक्षिप्त वर्णन करना जरूरी है। (रायटिंग एण्ड स्पीचेस, वा.-१२, पृष्ठ-११६-१३७) वे लिखते हैं, सारी सामाजिक बुराइयां धर्म पर आधारित हैं। एक हिंदू, चाहे ी़ हो या पुरूष, वह जो भी काम करता है, धर्म के अनुसार करता है। वह खाता धर्म के अनुसार है, पीता धर्म के अनुसार है, नहाता धर्म के अनुसार है, पहनता धर्म के अनुसार है, उसका जन्म धर्म के अनुसार होता है, विवाह धर्म के अनुसार होता है और दाह संस्कार भी धर्म के अनुसार होता है। उसके सारे क्रिया-कलाप धर्म के अनुसार होते हैं। इसलिये धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण से जो बुराइयां पापपूर्ण दिखायी देती हैं, वे उसके लिये पापपूर्ण नहीं होतीं, क्योंकि उसका धर्म उन्हें पुण्य मानता है। इसलिये पाप के दोषी हिंदू का उत्तर यह होता है- 'यदि मैं पाप कर रहा हूं तो धर्म के अनुसार कर रहा हूं।` (वही, पृष्ठ.-११५)

समाज हमेशा रूढ़िवादी होता है। वह तभी बदलता है, जब उसे बदलने के लिये दबाव डाला जाता है। ऐसे दबाव जब भी डाले जाते हैंं, पुरातन और नवीन के बीच हमेशा संघर्ष होता है। इसलिये कानून की सहायता के बिना किसी बुराई को कभी समाप्त नहीं किया जा सकता, खास तौर से धर्म पर आधारित बुराई को तो बिल्कुल भी नहीं।
अंग्रेजों ने छ: सामाजिक बुराइयों को रोकने के लिये कानून बनाने की जरूरत समझी इनमें पांच कानून विद्रोह के पहले बने और छठा कानून विद्रोह के बाद १८६० में बना, जो उत्पीड़न और बलात्कार को रोकने के लिये एक्ट ग्स्ट (पैनल कोड) सेक्शन ३७५ था। विद्रोह के पहले के पांच कानून ये थे-

१. बंगाल रेगूलेशन ग्ग्प् (१७९५), जो बनारस प्रांत में, ब्राह्मणों के 'कुर्रा` की प्रथा को रोकने के लिये था, जिसमें वे अपनी स्त्रियों की हत्या कर देते थे। इसी कानून के तहत ब्राह्मण को हत्या करने पर मृत्यु दण्ड के दायरे में लाया गया, जिससे वह अभी तक बाहर था।

२. १८०२ का रेगूलेशन टप् जो मासूम बच्चों की धर्म के नाम पर बलि देने की प्रथा को रोकने के लिये था।
३. १८२९ का रेगूलेशन ग्टप्प्, जो सती प्रथा को रोकने के लिये था, जिसमें हिंदू अपनी विधवा य़िों को जिंदा जला देते थे।
४. जाति-निर्योग्यता निवारण अधिनियम ग्ग्प् (१८५०) यह सेक्शन-९, रेगूलेशन एक्‍ट (१८३२) का विस्तार था। यह दलित हित में था।
५. हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम ग्ट (१८५६) जो हिंदू विधवा के पुनर्विवाह को न्यायिक मान्यता प्रदान करने के लिये था।

ब्रिटिश सरकार के इस सुधार कार्यक्रम से यह स्पष्ट अनुमान लगाया जा सकता है कि ये कानून ब्राह्मणों की धर्म-व्यवस्था में हस्तक्षेप थे। जिस ब्राह्मण को किसी की भी हत्या करने पर मृत्युदण्ड नहीं दिया जा सकता था, उसे अन्य हत्याभियुक्तों के समान ही दण्ड के दायरे में लाने का कानून ब्राह्मणें के लिये, खास तौर से बनारस प्रान्त के ब्राह्मणों के लिये, जो अपनी 'कुर्रा` प्रथा के तहत किसी भी ी़ अथवा लड़की की हत्या करने में कोई संकोच नहीं करते थे, विद्रोह की चिंगारी बनने के लिये काफी था।

१८५७ में बंगाल आर्मी के विद्रोह के मूल में समाज सुधार की यही चिंगारी थी। दूसरी चिंगारी लार्ड डलहौजी की विलय नीति थी। इस नीति के तहत सतारा, जैतपुर, सम्भलपुर, बघाट, उदयपुर, झांसी और नागपुर की रियासतें विलय कर ली गयी थीं। अन्य रियासतों के अस्तित्व भी संकट में थे। मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर तक भयभीत थे और यह नहीं समझ पा रहे थे कि वह अंग्रेजों का विरोध करें या समर्थन।

झांसी को लेते हैं, जिसकी भूमिका इस विद्रोह में सबसे ज्यादा विख्यात है। झांसी पेशवा आश्रित राज्य था। झांसी के राजा गंगाधर एक विलासी और अत्याचारी शासक थे। उनका कोई पुत्र नहीं था। इसलिये उन्होंने अपने भतीजे के पुत्र को गोद ले लिया था, जिसको वे अपने बाद राज्य का उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। उनके पूर्वज सदैव कम्पनी सरकार के वफादार रहे। पर कम्पनी सरकार ने नहीं माना और रानी को ५ हजार रूपये मासिक की पेंशन देकर झांसी को अपने राज्य में मिला लिया। रानी ने पेंशन लेने से इनकार कर दिया और कहा कि 'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।` रानी ने झांसी को बचाने के लिए अंग्रेजों से युद्ध किया।ये सभी राजा अपनी रियासतों में अपनी सत्ता चाहते थे। इसलिये ब्राह्मणों के साथ इन राजाओं ने विद्रोह में साथ दिया।

यहां इस प्रश्न पर विचार करने की जरूरत है कि क्या यह स्वतंत्रता संग्राम था? यदि यह स्वतंत्रता संग्राम था, तो क्या सैकड़ों रियासतों में विभाजित भारत में एक अखण्ड स्वराज की अवधारणा तब तक विकसित हो गयी थी? स्पष्ट उत्तर है, नहीं। स्वराज की हिंदू अवधारणा भी ठीक से १९०० के बाद बनी थी। १९३० तक यानी गोल मेज सम्मेलन के समय तक पूर्ण स्वतंत्रता की परिकल्पना तक अस्तित्व में नहीं थी। गांधी और कांग्रेस के नेता डोमिनियन स्टेटस की मांग कर रहे थे। ये तो अंबेदकर थे, जिन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की थी। जब बीसवीं शताब्दी में यह स्थिति थी तो, उन्नीसवीं शताब्दी में १८५७ के विद्रोह को प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कहने का क्या अर्थ है? यह उन मूर्खों का आलाप था, जो सिर्फ हिंदुओं की स्वतंत्रता चाहते थे, और इस बात से उन्हें कोई मतलब नहीं था कि यदि १८५७ का विद्रोह (दुर्भाग्य से) सफल हो जाता, तो अलग-अलग रियासतों की स्वतंत्र सत्ताएं उन्हीं व्यवस्थाओं को जीवित रखतीं, जिनमें अछूतों को समस्त मानवाधिकारों से वंचित रखा जाता, विधवा को जिंदा जलाया जाता, मासूम बच्चों की बलि दी जाती, अरयाश सामन्त चाहे जिस लड़की का अपहरण कराते और बलात्कार करते और ब्राह्मण की हर हिंसा और बर्बरता क्षमा योग्य होती। न पूरे देश में कानून एक होता और न कानून की नजर में सब समान होते।

इस विद्रोह को भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहने वाले और अखण्ड हिंदू भारत का स्वप्न देखने वाले ब्राह्मण लेखकों ने यह देखने के लिये अपनी आंखों का मोतियाबिन्द साफ नहीं किया कि रियासतों को विलय करके भारत को अविभाज्य राज्य बनाने का क्रान्तिकारी कार्य तो अंग्रेज कर रहे थे।

कहावत है कि बारह साल बाद घूरे के भी दिन फिर जाते हैं। फिर ये तो इस देश के लाखों दबे-कुचले, दलित, पिछड़े, गरीब, आदिवासी, मेहनतकश लोग थे। उनकी हजारों सालों की बिगड़ी नियति को क्यों नहीं बदलना था? ब्राह्मण और राजा-महाराजा भले ही चाहते थे कि अंग्रेज के विरूद्ध विद्रोह सफल हो, अंगे्रज विदा हों और उनकी सामन्ती धर्म-व्यवस्था बहाल हो, पर पीड़ित बहुजनों के हित में नियति को यह स्वीकार नहीं था। विद्रोह देशव्यापी नहीं हो सका। दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बनारस, झांसी, ग्वालियर और बिहार के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रहा और शीघ्र ही इसको कुचल दिया गया। बम्बई और मद्रास की सेनाओं ने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया, वरन् उसे दबाने में भूमिका निभायी। यहां यह जानकारी देना जरूरी है कि बम्बई और मद्रास की सेनाओं का गठन अछूत जातियों के लोगों से किया गया था। उनमें अधिकांश महार (बंबई) और परिया (मद्रास) जाति के लोग थे। यही कारण था कि उन्होंने ब्राह्मणों के इस विद्रोह में भाग नहीं लिया। मई १८५७ में शुरू हुआ विद्रोह आखिर १८५७ तक पूरी तरह शांत हो गया था। हां, अंग्रेजों ने इससे कुछ सीख जरुर ली।

लेकिन एक अन्य विषय पर चर्चा किये बगैर यह लेख अपूर्ण होगा। वह विषय है, विद्रोह के दमन के बाद दलितों और समाज सुधार कार्यक्रम के प्रति अंग्रेजी सरकार ने अपनी नीतियों में क्या परिवर्तन किये थे? इस विषय पर मुझे डा. आंबेदकर के हवाले से विचार करना होगा। उन्होंने अपने शोध लेख 'दि अनटचेबुल्स एण्ड दि पेक्स ब्रिटानिका` में इस विषय में कुछ नये तथ्य प्रस्तुत किये हैं जो आज के दलित लेखकों को भी अंग्रेज सरकार के प्रति अपनी स्थापनाओं पर फिर से विचार करने के लिए बाध्य कर सकते हैं। भारत को जीतने के लिये ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पहली लड़ाई १७५७ में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की सेना से प्लासी में लड़ी और उसकी जीत हुई। बंगाल पर कब्जा करने के बाद कम्पनी ने दूसरी लड़ाई १८१८ में महाराष्ट्र के कोरेगांव में लड़ी। यही वह लड़ाई थी जिसने मराठा साम्राज्य को ध्वस्त किया और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना की। भारत को जिन लोगों की मदद से जीता गया, वे भारतीय थे। वे कौन भारतीय थे, जो विदेशियों की सेना में शामिल हुए? आंबेदकर लिखते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना में भर्ती होने वाले लोग भारत के अछूत थे। जिन्होंने प्लासी की लड़ाई में भाग लिया, वे दुसाध थे और जिन्होंने कोरेगांव की लड़ाई लड़ी थी, वे महार थे- और दोनों ही अछूत जातियां हैं। इस प्रकार, पहली और दूसरी दोनों लड़ाईयों में अंग्रेजो की तरफ से लड़ने वाले लोग अछूत जातियों के थे। इस तथ्य को मारक्वेस ने पील कमीशन को भेजी गयी अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया था। १८५७ के विद्रोह को कुचलने में भी बम्बई और मद्रास की जिस सेना ने मदद की थी, उनमें भी, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, महार और परिया अछूत जातियों के लोग ही अधिसंख्य थे। इस प्रकार, अछूत जातियों ने न केवल भारत में अंग्रेजी राज कायम करने में मदद की, बल्कि उसे सुरक्षित भी बनाए रखा।

पर, ब्रिटिश सरकार ने अछूतों की इन सेवाओं के बदले उनके साथ क्या व्यवहार किया? आंबेदकर लिखते हैं कि सरकार ने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। १८९० में उसने भारतीय सेना में अछूतों की भर्ती पर रोक लगा दी। उसने नये सिद्धांत के तहत सेना में भर्ती के लिये लड़ाकू और गैर-लड़ाकू दो श्रेणियां बनायीं और अछूतों को 'गैर-लड़ाकू` श्रेणी में रखकर उनकी सेना में भर्ती बंद कर दी। क्या वे लोग, जो भारत को जीतने और विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों की तरफ से बहादुरी से लड़े, गैर-लड़ाकू श्रेणी में रखे जा सकते हैं? हरगिज नहीं। उनको सेना में सिर्फ इस कारण से नहीं लिया गया, क्योंकि वे अछूत थे। यहां यह सवाल किया जा सकता है कि फिर १८९० से पहले तक ये अछूत ब्रिटिश सेना में क्यों लिये जाते रहे? इसका कारण था, सेना के गठन का नया सिद्धांत, जो १८९० में बनाया गया था। पहले सिद्धांत के तहत सेना में सर्वश्रेष्ठ लोगों को लिया जाता था, उसमें जाति और धर्म की कोई समस्या नहीं थी। पर, नए सिद्धांत में सेना में भर्ती के लिये आदमी की जाति ही उसकी शारीरिक और बौद्धिक योग्यता का मुख्य आधार बन गयी थी। अब एक दल या कम्पनी का गठन पूरी तरह एक ही वर्ग से किया जाने लगा। इस आधार पर सिख, डोगरा, गोरखा और राजपूत रेजिमेंटें बनायी गयीं। नये सिद्धांत में ये लड़ाकू श्रेणी में थे। आंबेदकर यहां सवाल करते हैं कि जब वर्गीय आधार पर सिखों, डोगरों, गोरखों और राजपूतों की रेजिमेंट हो सकती है, तो अछूत रेजिमेंट क्यों नहीं हो सकती थी? दूसरा सवाल उन्होंने यह उठाया कि यदि लड़ाकू वर्ग से भर्ती का सिद्धांत सही है तो जब तक यह साबित न हो जाय कि अछूत लड़ाकू वर्ग नहीं है, इस सिद्धांत के आधार पर अछूतों की भर्ती को कैसे रोका जा सकता है? वास्तविकता यह थी कि पुराने सिद्धांत के तहत सेना में सवर्ण हिन्दुओं की भर्ती बहुत कम होती थी, इसलिये अछूतों को भर्ती किया जाता था। किंतु, विद्रोह के बाद, जब नया सिद्धांत बना तो, जैसा कि आंबेदकर लिखते हैं, भारतीय शासकों की जाति ;त्ंबमद्ध निस्तेज हो गयी, तो हिंदुओं ने ब्रिटिश सेना में घुसना शुरू किया- उस ब्रिटिश सेना में, जो पहले से ही अछूतों से भरी हुई थी, तब दो वर्गों-सवर्णों और अछूतों के सापेक्ष स्तर ;च्वेपजपवदद्ध में समायोजन करने की समस्या पैदा हुई और अंग्रेजों ने, जो न्याय और सुविधा के बीच संघर्ष के मामले में हमेशा सुविधा को प्राथमिकता देते हैं, समस्या का समाधान अछूतों को अकृतज्ञ रूप से बाहर निकालने का फैसला लेकर किया। इस निर्णय ने अछूतों के जीवन को तबाह कर दिया। सेना में नौकरी अछूतों के सामाजिक स्तर में बदलाव का प्रतीक थी। वह उनमें स्वाभिमान का भाव पैदा करती थी। पर, अब अंग्रेजों ने उन्हें ऊपर से उठाकर नीचे फेंक दिया था।

अंबेदकर इसी लेख में आगे लिखते हैं कि १८५७ के सिपाही विद्रोह ने अंग्रेजों को हर प्रकार के समाज सुधार के भी विरूद्ध कर दिया था। अंग्रेज आगे कोई खतरा लेना नहीं चाहते थे, क्योंकि उनके दृष्टिकोण से यह खतरा बहुत बड़ा था। विद्रोह ने उन्हें इतना आतंकित कर दिया था कि उन्हें लगने लगा था कि वे समाज सुधार के कारण भारत को खो देंगे। इसलिए भारत पर अपने कब्जे के हित में उन्होंने समाज सुधार की किसी भी योजना को हाथ में लेने से इनकार कर दिया था। अत: कहना न होगा कि इस विद्रोह में ब्राह्मणवाद ने आंशिक रूप से अपना दबाव जरूर बना दिया था।



दलित लेखक कंवल भारती की पुस्तकें 'मनुस्मृति : प्रतिक्रांति का धर्मशास्त्र`, 'कांशी राम के दो चेहरे` व 'दलित विमर्श की भूमिका` चर्चित रही हैं। समसामयिक विषयों पर निरंतर लेखन।

प्राचीन भारत में वर्णव्यवस्था और भाषा

अध्‍ययन कक्ष
  • राजूरंजन प्रसाद


प्राचीन भारतीय समाज में वर्णों के आधार पर भाषा-विधान प्रसिद्ध है। प्राचीन भारतीय साहित्य के अध्ययन से निश्चित पता लगता है कि जातियों के अनुसार भाषा-विधान तथा व्यवहार प्रचलित था। शायद इसलिए शताब्दियों तक साहित्य में प्राकृत को मान्यता नहीं मिल सकी और उसका तिरस्कार होता रहा।


भाषा के बारे में मार्क्सवादी चिंतन यह है कि 'इसका निर्माण पूरे समाज के हितसाधन के लिए लोगों के पारस्परिक सम्पर्क-सूत्र के रूप में समाज के सभी सदस्यों के लिए हुआ है। पूरे समाज की एक भाषा होती है जो समाज के हर सदस्य का हितसाधन बिना उसकी वर्गीय स्थिति को ध्यान में रखे हुए करती है`।१ किंतु प्राचीन भारतीय समाज में वर्णों के आधार पर भाषा-विधान प्रसिद्ध है।२ प्राचीन भारतीय साहित्य के अध्ययन से निश्चित पता लगता है कि जातियों के अनुसार भाषा-विधान तथा व्यवहार प्रचलित था।३ शायद इसलिए शताब्दियों तक साहित्य में प्राकृत को मान्यता नहीं मिल सकी और उसका तिरस्कार होता रहा।

प्राचीन भारतीय समाज में ब्राह्मण अथवा श्रेष्ठ लोग संस्कृत बोलते थे जबकि अन्य लोग प्राकृत। मार्कण्डेय के ग्रंथ में कोहल४ का मत है कि यह प्राकृत राक्षसों, भिक्षुओं, क्षपणकों, दासों आदि द्वारा बोली जाती है। 'भरत` और 'साहित्य-दर्पण` में बताया गया है कि राजाओं के अंत:पुर में रहनेवाले आदमियों द्वारा मागधी व्यवहार में लाई जाती है। 'दशरूप` का भी यही मत है। 'साहित्यदर्पण` के अनुसार मागधी नपुंसकों, किरातों, बौनों, म्लेच्छों, आभीरों, शकारों, कुबड़ों आदि द्वारा बोली जाती है। 'भरत` तक में बताया गया है कि मागधी नपुंसकों , स्नातकों और प्रतिहारियों५ द्वारा बोली जाती है। 'दशरूप` में लिखा गया है कि पिशाच और नीच जातियां मागधी बोलती हैं और 'सरस्वतीकण्ठाभरण` का मत है कि नीच स्थिति के लोग मागधी प्राकृत काम में लाते हैं। 'मृच्छकटिक` में शकार, उसका सेवक स्थावरक, मालिश करनेवाला जो बाद में भिक्षु बन जाता है; वसन्तसेना का नौकर कुंभीलक वर्द्धमानक जो चारुदत्त का सेवक है, दोनों चाण्डाल, रोहसेन और चारुदत्त६ का छोटा लड़का मागधी में बात करते हैं। शकुन्तला नाटक में पृष्ठ ११३ और उसके बाद, दोनों प्रहरी और घीवर, पृष्ठ १५४ और उसके बाद शकुन्तला का छोटा बेटा 'सर्वदमन` इस प्राकृत में वार्तालाप करते हैं। 'प्रबोधचन्द्रोदय` के पेज २८ से ३२ के भीतर चार्वाक का चेला और उड़ीसा से आया हुआ दूत, पृष्ठ ४६ से ६४ के भीतर दिगम्बर जैन मागधी बोलते हैं। 'मृच्छकटिक` के पृष्ठ २९ से ३९ तक में जुआ-घर का मालिक और उसके साथ जुआरी जिस बोली में बातचीत करते हैं वह ढक्की७ है।

कहना होगा कि प्राकृत केवल जैन या बौद्ध सम्प्रदाय (पालि के रूप में) की भाषा नहीं थी वरन् भील, कोल, शबर, दस्यु, चाण्डाल आदि तक में यह भाषा बोली जाती थी। आचार्य अभिनवगुप्त ने इसे अव्युत्पन्न (अनगढ़, ग्राम्य) जनभाषा कहा है।८ संस्कृत चूंकि शिष्ट लोगों की भाषा थी इसलिए इसे श्रेष्ठ आसन प्रदान किया गया। अकारण नहीं है कि कई विद्वान प्राकृतों को कृत्रिम कहते हैं और संस्कृत को इसका मूल बताते हैं। इसके प्रमाण में मार्कण्डेय, चण्ड तथा हेमचन्द्र आदि की 'प्रकृति : संस्कृतम` वाली उक्ति उद्धृत की जाती हैं९ किंतु आज प्राकृत का मूल संस्कृत को बताना संभव नहीं है और भ्रमपूर्ण है।१०

संस्कृत के वैयाकरणों ने शब्दकोशों की भी रचना की है इसलिए व्याकरण ग्रंथों की भांति शब्दकोश भी लीक पीटते नजर आते हैं। उदाहरण के लिए अपभ्रंश शब्द के लिए व्याकरण का सबसे पहला प्रयोग है-'अपशब्द`। अमरकोश, विश्वप्रकाश, मेदिनि, अनेकार्थसंग्रह, विश्वलोचन, शब्दरत्नसमन्वय तथा शब्दकल्पद्रुम आदि कोशों में अपभं्रश का अर्थ 'अपशब्द` एवं 'भाषा विशेष` भी मिलता है। मेदिनि तथा अन्य कोशों में भी दोनों अर्थ मिलते हैं, पर अमरकोश में केवल अपशब्द अर्थ है।११ संस्कृत व्याकरणशा के प्राचीन आचार्य व्याडि का मत उद्धृत करते हुए भर्तृहरि ने कहा है कि 'शब्द संस्कार से हीन शब्दों का नाम अपभ्रंश है।`१२ वैयाकरण इस तथ्य से अपरिचित न थे कि भाषा का स्वभाव ही अपभंरश है।१३ पर वे 'साधु भाषा` के पक्षपाती थे। जो शब्द शिष्टजनों के द्वारा व्यवहृत नहीं होता वह अवाचक है तथा ऐसे ही अवाचक शब्द जब प्रसिद्ध हो जाते हैं तब वे अपभ्रंश बन जाते हैं।१४ स्प ट है कि शि टाजनों के द्वारा प्रयुक्त न होने से तथा संस्कारहीन होने से अव्यवहारणीय शब्दावली को अपभंरश कहते हैं।१४ महाभाष्य में अपभ्रंश का उल्लेख तीन स्थलों पर तथा अपशब्द का प्रयोग कई बार हुआ है। महर्षि पतंजलि का अपशब्द से अभिप्राय व्याकरण के नियमों से पतित शब्द से है। प्राय: 'म्लेच्छ` लोग अपशब्दों का व्यवहार करते हैं इसलिए ब्राह्मणों को अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।१५ महाभाष्य के अध्ययन से पता लगता है कि उस समय म्लेच्छ आदि आर्येतर जातियां तथा निम्न श्रेणी की जातियां शब्दों को 'बिगाड़कर` सहज प्रवृत्ति के अनुसार उनका उच्चारण करती थीं। शिष्ट भाषा के आग्रही वैयाकरणों ने जब देखा होगा कि नीची जातियां भी एक शब्द के लिए कई अप्रसिद्ध तथा शब्दानुशासन से हीन शब्दों का व्यवहार करती हैं तो उसे आर्य जाति और भाषा से गिरा हुआ, अपभ्रष्ट तथा अपभंरश कहा होगा। वैयाकरण यह भलीभांति जानते थे कि समाज में अपशब्दों का चलन अधिक है और शब्दों का व्यवहार कम है। पतंजलि हमें स्पष्ट बताते हैं कि प्रत्येक शब्द के कई अशुद्ध रूप होते हैं। इन्हें उसने अपभ्रंश कहा है। उदाहरणार्थ-उसने गौ शब्द दिया है जिसके अपभ्रंश रूप गावी, गोणी, गोता और गोपातालिका दिये हैं ।१६ जहां वैयाकरण शिष्टों के प्रयोग से हीन भाषा को अपभ्रंश कहते हैं वहीं साहित्यशाई अश्लील तथा ग्राम्यपदों को सदोष मानते हैं और काव्य में उनका निषेध करते हैं। स्पष्ट ही निम्न वर्ग के लोगों के शब्द प्रयोग सुनने में बुरे लगते हैं और संभवत: इसीलिए वे काव्य में अनुचित माने जाते हैं। भोज ने भी कहा है कि लोक को छोड़कर और कहीं ग्राम्य प्रयोग नहीं चलते। अश्लील, अमंगल और घृणासूचक शब्द को ग्राम्य कहते हैं।१७
ग्राम्य भाषा के प्रति शिष्टजनों की जो घृणा है उसे शूद्र शब्द के व्युत्पत्यर्थ निकालने के जो प्रयास हुए हैं, उससे समझा जा सकता है। सबसे पहले वेदांत सूत्र में बादरायण ने इस दिशा में प्रयास किया था। इसमें शूद्र शब्द को दो भागों में विभक्त कर दिया गया है-'शुक्` (शोक) और 'द्र` जो 'द्रु` धातु से बना है और जिसका अर्थ है दौड़ना।१८ इसकी टीका करते हुए शंकर ने इस बात की तीन वैकल्पिक व्याख्याएं की हैं। पाणिनि के व्याकरण में उणादिसूत्र के लेखक ने भी इस शब्द की कुछ ऐसी ही व्युत्पत्ति की है। ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तुत व्युत्पत्ति में शूद्रों की दयनीय अवस्था का चित्रण किया गया है और उसे 'पतित` बताया गया है। मनुष्यों में शूद्र एवं भाषाओं में अपभ्रंश समान रूप से घृणित हैं। प्राचीन भारतीय समाज में शूद्रों के प्रति घृणा की चरम अभिव्यक्ति मनुस्मृति में मिली। हालांकि शूद्रों की सामाजिक स्थिति के बारे में मनु के नियम बहुत हद तक पुराने निर्माताओं के विचारों की पुररुक्ति लगते हैं ।१९ कुछ नये नियम भी बनाये हैं। उन्होंने सृष्टि रचना की पुरानी कथा दुहराई है, जिसमें शूद्र का स्थान सबसे नीचे है।२० मनु ने चारों वर्णों के प्रति किये जानेवाले अभिवादन की रीति की निर्धारक विधियों को भी दुहराया है।२१ किंतु उन्होंने यह भी बताया है कि जो ब्राह्मण सही ढंग से अभिवादन का उत्तर नहीं दे उसे विद्वत्जन कभी अभिवादन नहीं करें , क्योंकि वह शूद्र के समान है।२२ पतंजलि बताते हैं कि अभिवादन का उत्तर देने में शूद्रों के संबोधन का ढंग गैर शूद्रों से भिन्न था। शूद्रों को संबोधित करने का स्वर तेज नहीं होना चाहिए। यदि कोई शूद्रों (और अक्सर वैश्यों के लिए भी) अपने मालिक की तरफ आंख उठाकर देख लेता था या उसके सामने अपमानजनक तरीके से कुछ कह देता था, तो इस अपराध के लिए भारी दंड का प्रावधान था। अधीनता से इनकार करना, उस समय सबसे ज्यादा असह्य था। कुछ स्मृतियों में तो शूद्रों द्वारा अपने मालिकों के प्रति उपयोग में लाये जानेवाले आदरसूचक शब्दों तक का प्रावधान कर दिया गया था ताकि भाषा के माध्यम से उनके भीतर नीचता की आत्मस्वीकृति का संस्कार पैदा किया जा सके।२३ यदि शूद्र अपने मालिक के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करे तो उसकी जीभ काट लेने तक की सजा दी जा सकती थी। शूद्रों को द्वेषी, हिंसक, आत्मप्रशंसक, तुनकमिजाज, असत्यभाषी, अतिलालची, कृतघ्न, विपथगामी, आलसी, प्रमादी और अशुद्ध बतलाया गया है।२४ अछूतों और चांडालों को विशेष तौर पर अशुद्ध, अविश्वासी, असत्यभाषी, चोर, दया के पात्र, क्रोधी और लालची बताया गया है। उन्हें निरर्थक झगड़े-फसादों में लगे रहने वाला बताया गया है।२५ मनु के अनुसार, यदि शूद्र जान बूझकर वेदपाठ सुनता है तो उसके कानों को पिघले हुए सीसे अथवा लाख से भर दिया जायेगा। यदि वह वैदिक मंत्रों का पाठ करता है तो उसकी जीभ काट डाली जायेगी। यदि वह इन मंत्रों को कंठस्थ करता है तो उसके शरीर को बीच से चीर दिया जायेगा। यदि वह बैठने, सोने, बातचीत करने अथवा सड़क पर टहलने में द्विजों की बराबरी करता है तो उसे शारीरिक दंड दिया जायेगा।२६

धर्मसूत्रों में वर्ण के अनुसार वंदना और अभिवादन के जो स्वरूप निर्धारित किये गये हैं, उनसे प्रकट होता है कि समाज में शूद्र कितने पराधीन थे। आपस्तंब में बताया गया है कि ब्राह्मण अपनी दाहिनी बांह को अपने कान के समानांतर, क्षत्रिय उसे अपनी छाती के स्तर तक, वैश्य अपनी कमर तक, और शूद्र उसे अपने पांव की सीध में रखकर अभिवादन करे।२७ विभिन्न वर्णों के लोगों के कुशल-क्षेम और स्वास्थ्य के संबंध में जिज्ञासा करने के लिए भिन्न-भिन्न शब्द विहित किये गये हैं।२८ क्षत्रिय के स्वास्थ्य की जिज्ञासा के लिए 'अमानय` और शूद्र के लिए 'आरोग्य।`२९ यह भी बताया गया है कि किसी क्षत्रिय अथवा वैश्य का अभिवादन करने में लोगों को केवल सर्वनाम का प्रयोग करना चाहिए, न कि उसके नाम का।३० इसका अर्थ हुआ कि मात्र शूद्र को उसके नाम से संबोधित किया जा सकता था। इस संबोधन की दृष्टि से द्विज वर्गों की स्थिति बहुत अच्छी थी। प्राचीन पालि ग्रंथों में निम्न वर्गों के लोगों ने किसी क्षत्रिय को उसके नाम से या उत्तम पुरूष में संबोधित नहीं किया है।३१ राजा उदय को गंगमाल हजाम पारिवारिक नाम से संबोधित करता है, इसपर उसकी मां बड़े रोष के साथ कहती है, इस नीच नापितपुत्र को इतना भी ज्ञान नहीं है कि वह मेरे बेटे को, जो पृथ्वी का मालिक है और क्षत्रिय जाति का है, ब्रह्मदत्त कहकर पुकारता है।३२
मनु ने बच्चों के नामकरण संस्कार में भी वर्ण विभेद किया है३३ जिससे स्वभावतया शूद्रों की हीनता झलकती है। उनका मत है कि ब्राह्मण का नाम मंगलसूचक, क्षत्रिय का नाम बलसूचक, वैश्य का नाम धनसूचक और शूद्रों का नाम निंदासूचक होना चहिए। इसी के अनुपूरक के तौर पर उन्होंने बताया है कि चारों वर्णों की उपाधि क्रमश: सुखवाचक (शर्मा) सुरक्षावाचक (वर्मा) समुन्नतिवाचक (भूति) और सेवावाचक (दास) होनी चाहिए।३४ कुल्लूक ने टीका की है कि ये उपाधियां क्रमश: शर्मन, वर्मन, भूति और दास होनी चाहिए। इसके प्रमाण नहीं मिलते कि यह परिपाटी व्यापक रूप से प्रचलित थी, किंतु नामों के संबंध में मनु के नियमों से जान पड़ता है कि नीच वर्ण के लोग ब्राह्मणकालीन समाज में घृणा के पात्र थे। इस प्रकार शूद्र के लिए प्रयुक्त 'वृषल` शब्द अपमानजनक माना जाता था। पाणिनि के समास संबंधी नियम का उदाहरण देते हुए पतंजलि ने बतया है कि 'दासी के सदृश (दास्या: सदृश:)` और 'वृषली के सदृश (वृषल्या: सदृश)` पद गाली हंै।४० वृषल को चोर की कोटि में रखा गया था और ब्राह्मण प्रधान समाज वैरभाव रखता था।३६ यह भी जानकारी मिलती है कि वृषल, दस्यु और चोर घृणा के पात्र समझे जाते थे।३७

संक्षेप में कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत में वैयाकरणों, कोशकारों एवं साहित्यालोचकों का भाषा चिंतन वर्णभेद के नियमों का शिकार है। प्राकृतों के प्रति घृणा शूद्रों के प्रति ब्राह्मणों की घृणा से समझ में आ सकती है। इस दृष्टि से प्राचीन भारतीय भाषा चिंतन देखा जा सकता है; एक सही तस्वीर के लिए।


संदर्भ

१. जोसेफ स्तालिन, मार्क्सवाद और भाषाविज्ञान की समस्याएं, परिकल्पना प्रकाशन, द्वितीय (संशोधित) हिंदी संस्करण, लखनऊ, २००२, पृ.-१३
२. डॉ. देवेन्द्रकुमार शाई, भूविसयत्तकहा तथा अपभ्रंश कथाकाव्य, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, १९७०, पृ.-१८
३. वही
४. 'राक्षसभिक्षुक्षपणकचेटादया मागधी प्राहु:` इति कोहल:।
५. औपस्थायिक (भरत नाट्यशा) निमुण्डा: का क्या अर्थ है, यह अस्पष्ट है।
६. यह बात स्टेंव्सलर की भूमिका के पृ.-५ और गौडबोले के ग्रंथ पृ. ४९३ में पृथ्वीधर ने बताई है। इन संस्करणों में वह शौरसेनी बोलता है; किंतु हस्तलिखित प्रतियों में इन स्थानों में सर्वत्र मगधी का प्रयोग किया गया है। देखें, आर. पिशल, प्राकृत भाषाओं का व्याकरण, हिंदी अनुवाद, पृ.-४६.
७. 'पृथ्वीधर` का मत है कि शाकारी, चाण्डाली और शाबरी के साथ-साथ ढक्की भी अपभंरश की बोलियों में से एक है।
८. प्राकृतमिति केचित्। नाट्यशा की विवृति, अभिनवगुप्त।
९. प्रकृति: संस्कृतम्। तत्र भवं प्राकृतम् उच्यते।-मार्कण्डेय: प्राकृतसर्वस्व, प्रकृते:१,१ संस्कृताद् आगतं प्राकृतम्। -वाग्भटालंकार की सिंहदेवगणिन् कृत टीका, २,२,. प्रकृतेरागतं प्राकृतम्। प्रकृति: संस्कृतम्।- धनिक: दशरूपक की टीका, २,९०, प्रकृति: संस्कृतम्। तत्र भवत्वात् प्राकृतं स्मृतम्। प्राकृतचन्द्रिका, पीटर्सन की तीसरी रिपोर्ट से। प्रकृत्ते: संस्कृतायास्तु विकृति: प्राकृती मता। -नरसिंह : प्राकृतशब्दप्रदीपिका। प्रकृति: संस्कृतम्। तत्र भवं तत आगतं वा प्राकृतम्।-हेमेचन्द्र: सिद्धहेमशब्दानुशासन, १,१. प्राकृतस्य तु सर्वम् एव संस्कृतम् योनि:। -कर्पूरमंजरी, वासुदेव कृत संजीविनी टीका। सिद्धं प्राकृतं त्रेघा। सिद्धं प्रसिद्धं प्राकृतं त्रेधा भवति। संस्कृतं योनि:। तच्चेदं-मात्रा, मत्ता। नित्यं, णिच्यं इत्यादि।-चण्ड; प्राकृतप्रकाश, सटिप्पण हस्तलिखित ग्रंथ से।
१०. इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए देखें प्राकृत भाषाओं का व्याकारण।
११. एम.एस. कत्रे, प्राकृत लैंग्वेज एंड देयर कंट्रिव्यूशन टु इंडियन कल्चर पृ-२२
१२. शब्द: संस्कारहीनो यो गौरिति प्रयुयुक्षिते। तमपभ्रशंमिच्छन्ति विशिष्टार्थ निवेशिनम्।- वाक्यपदीय, ब्रह्मकांड, १४८.
१३. डा. देवेन्द्रकुमार शासी, पूर्वोद्धृत, पृ.-१६.
१४. पारम्पर्यादपभ्रंशा विगुणेष्वमिधातृषु। प्रसिद्धिमागता येषु तेषां साधुरवाचक:।।- वही, १५४.
१५. ते%सुए हेलयो हेलय इति कुर्वन्त: पराबभूवु:। तस्माद् ब्राह्मणेन न म्लेच्छित वै नापभाषित वै, म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्द:। -महाभाष्य। अपशब्दत्वं व्याकरणानुगतशब्दस्येषद्भ्रंशन एव प्रसिद्धिमिति भाव:। वही.
१६. भूयांसो%पशब्दा:, अल्पीयांस: शब्दा इति। एकैकस्य ही शब्दस्य बहवोपभ्रंशा:। तद्यथा गौरित्यस्य शब्दस्य गावी गौणी गोता गोपोतलिकेत्यादयो बहवो%पभ्रंशा:।
१७. अश्लीलामङगलघृणावदर्थ ग्राम्यमुच्यते।- सरस्वतीकण्ठाभरण,१, १४४
१८. वेदांत सूत्र, १.३.३४ 'शुगस्य तदनादर श्रवणात तदाद्रवणत्: सूच्यते।`
१९. रामशरण शर्मा, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, १९९५, पृष्‍ठ.४८, पाद टिप्पणी संख्या-२०८
२०. मनुस्मृति, १.३१.
२१. वही, ११.१२७.
२२. वही, ११.१२६.
२३. भगवतशरण उपाध्याय, खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृ.-११६.
२४. एस. जी. सरदेसाई, प्राचीन भारत में प्रगति एवं रूढ़ि, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, १९८८, पृ.-७२
२५. वही.
२६. मनुस्मृति, १२.४-७; देखें प्राचीन भारत में प्रगति एवं रूढ़ि, पृ.-२१३
२७. आपस्तंब धर्मसूत्र, १.४.१४. २६-२९; गौतम धर्मसूत्र, अ ४१-४२,
२८. यह परंपरा आधुनिक काल में भी देखी गई। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने जैसा कि लिखा है, 'ब्राह्मण ही परस्पर एक दूसरे को नमस्कार करते हैं और दूसरे लोग प्रणाम ही करते हैं, परंतु यदि अन्य जाति नमस्कार शब्द का प्रयोग कर देवे तो दंगा मच जावे। हालांकि दोनों के अर्थ में कुछ भी भेद नहीं है। परंतु सांकेतिक भेद मान लिया गया है।` ब्रह्मर्षि वंश विस्तर, भूमिका से, पृ.-१९; 'भो` शब्द का प्रयोग राजन्यम या वैश्य के संबोधन में किया जाता था, शूद्र के संबोधन में नहीं। (भो राजन्यविशां वा) पतंजलि ऑन पाणिनीज ग्रामर अपपप.२.८२-८३
२९. आपस्तंब धर्मसूत्र, १.४.१४. २६-२९; गौतम धर्मसूत्र, अ ४१-४२.
३०. आपस्तंब धर्मसूत्र, १.४.१४.२३, 'सर्वनाम्ना यियो राजन्यवैश्यो च न नाम्ना।`
३१. फिक, दि सोशल ऑर्गेनारइजेशन ऑफ नार्थ इस्टर्न इंडिया, पृ.-८३
३२. जातक, पपप पृ.-४५२
३३. मनुस्मृति, पप ३१. 'शूद्रस्य तु जुगुण्सितम्।` देखें लेव तॉलस्तॉय, पुनरूत्थान, हिंदी अनुवाद, प्रगति प्रकाशन, मास्को, १९७७, पृ.-१४-१५ 'दोनों बहिनें उसे कात्यूशा कहकर बुलातीं। यह नाम इतना परिष्कृत नहीं था जितना कि कातेन्का, पर साथ ही इतना भद्दा भी नहीं था जितना कात्का`। और देखें, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, बिल्लेसुर बकरिहा, पृ.-१ 'बिल्लेमुर`- नाम का शुद्ध रूप बड़े पते से मालूम हुआ- 'बिल्वेश्वर` है। और देखें पंकज कुमार चौधरी की कविता 'श्राद्ध का भोज` जिसमें गांव के सवर्णों एवं अवर्णों के लिए अलग-अलग संबोधनों का प्रयोग है। गांव के सर्वण अरविंद के लिए 'अरविंद बाबू` और 'राजा भाई जी` जैसे संबोधनों का प्रयोग है। जबकि अवर्ण पात्रों के नाम 'अकलूआ`, 'चटूआ`, 'बिसेसरा` आदि हैं। भोज में सामग्री परोसने वाला एक ही व्यक्ति अरविंद बाबू से पूछता है तो 'सब्जी` का उच्चारण करता है जबकि अकलुआ, चटूआ और बिसेसरा से पूछते हुए 'तरकारी` शब्द का प्रयोग करता है।
३४. मनुस्मृति, ११.३२. मध्यकाल में भक्ति मार्ग के अधिकतर कवि, जो समाज के निचले तबके का प्रतिनिधित्व करते थे, अपने नाम के अन्त में दास लगाते थे। (मनुस्मृति, ११.३२ का संदर्भ देखें।) 'शर्मवद्ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम वैश्यस्यपुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्यसंयुक्तम्।
३५. पतंजलि ऑन पाणिनीज ग्रामर, अप २.११
३६. वही, 2 .२.११ और 3 . २.१२७.
३७. वही, . ३.३६.


राजू रंजन प्रसाद युवा इतिहासकार व शोधकर्ता हैं।

चार मैथिली कविताएं

अनुवाद कवि स्वयं



  • जीवकांत


सूखे पत्ते ढेर में

आप चुनकर आए ऊपर आ गए
जमा करने लगे हथियार
अपने से फुर्सत नहीं पा रहे आप
नीचे आप नहीं उतर रहे कि उन लोगों से पूछें
जो खेतों के बीच
फूस के झोपड़ों के बीच छूट गए हैं

आपके क्षेत्र में मतदाता हैं
वे फूलों का हार नहीं बना रहे
वे इकट्ठे कर रहे हथियार
बम बना-बनाकर जमा करते हैं
सड़कों में फिट कर रखे विस्फोटक

प्रजातंत्र में एक लकीर खिंच गई
सत्तासीन एक तरफ/दूसरी ओर दीन-दुखियार
दोनों तरफ होड़ हथियारों की
बांटना था अन्न/पानी बांटना था
एक अवसर अभी बचा है
जाओ तो वहां दिन में जाओ
हथियार पीछे छोड़ते जाओ/पुल बनाकर जाओ
सड़क बनाकर जाओ
अस्पताल का उद्घाटन करने जाओ

जा रहे हो तो एक पुस्तकालय ले जाओ
खेती की मशीनें लेकर जाओ
कुएं लेकर जाओ/गन्ने पेरने की मिल बैठाने जाओ
साथ में दस शिक्षक लेकर जाओ
सभी प्रकार की मशीनें चलाने के लिए
एक वर्क शॉप बिठाने जाओ

एक अवसर अंतिम है
वे अंतिम सड़क पर फिट करने वाले हैं विस्फोटक
वे प्रत्येक आगंतुक के लिए तैयार रखते हैं
एक जिन्दा कारतूस
वे प्रजातंत्र को आग में चढ़ाएंगे
आग के लिए जमा कर रखा है वहां
सूखे पत्तों का ढेर



नकली

गांवों के लिए कोई बजट नहीं
खेत में उगते अनाज की कीमत नहीं
बड़े कारखानों में बनता गुणवत् माल
मनोहारी पैकिंग
ललचानेवाले विज्ञापन गांव के लिए नहीं

नकली सामान बना रहे लोग
अंधेरे गोदामों में
नकली स्टाम्प पेपर/नकली नोट
नकली दवाएं
नकली पैकिंग और नकली 'रैपर`
ठेलते रहते देहातों में

देहात का पब्लिक स्कूल
अथवा सरकारी पाठशाला सारे नकली
गेस पेपर नकली छपता है
डाक्टर वहां झोला छाप
जहर मिलावटी

देहात की ओर पलटकर नहीं देखता
कपड़ा असली
सिमेंट असली


अग्नि-प्रलय

भादों की बरखा
हर जगह समान दिखती है भिंगोती हुई
आसिन में खेतों में फट आती हैं दरारें
धान के पौधे मुरझाते हैं
मुदा जलधर ताल और झील
अथवा गड्ढे, चहबच्चे
इकट्ठा रख लेते हैं, पानी
पहले साझा होते थे पोखरे और कुएं
आज की लंबी-चौड़ी झीलें
खुदसर कुओं में तब्दील कर ली गई हैं
किधर जा रहा प्रजातंत्र
भ्रष्टाचार और देश-सेवा में किस जगह
कितना अंतर छूट रहा है

बोलो, गिनने के लिए कितना पैसा चाहिए
चोरी-चोरी रखने के लिए चाहिए कितना बड़ा गोदाम
पैसे को फूस के ढेर की तरह उठाते हो
यह आदमी के खिलाफ है
यह है गंगा की धारा और पीपल वृक्ष के विरूद्ध
संगीन कार्रवाई
पीपल वृक्ष बोलता है उसे कौन सुनता है
एशिया और अफ्रीका में मारी गइंर्-गिद्धों की प्रजातियां
वह आंख किसे है
कौन खोलेगा मुंह और विरोध करेगा

रूपयों के ढेर पर बैठा आदमी
हो जाता है अंधा
कहते हैं उल्लू को नहीं दीखता दिन में
नया उल्लू बढ़ा है तादाद में
उसे रात में भी नहीं सूझता
मारा जाएगा जीवन का बीज
प्राण धारण के विरूद्ध है यह विकास
सारा वाणिज्य
चाट-पोंछकर रख देगा
उत्तरी ध्रुव से लगाकर दक्षिणी धु्रव को

आग पकड़ती है जंगल को
वनस्पति के सूखे पत्ते धू-धूकर जलते हैं
साथ में हरे पत्ते लपट पकड़ लेते हैं
घास राख में बदलती है
बड़े पेड़ भी धुंधुआते हैं सात दिनों तक

आखिर यह जमाखोरी
मृत्यु के सौदे में कल्पित हो गई
विकास के तेज वाहन ने पकड़ ली है गति
कौन रोकेगा, बोलो?
इस अग्नि-प्रलय को कौन दबाएगा?
भोगेगा, भोगेगा, निश्चय ही भोगेगा....


शहर में

शहर में उड़ती है गर्द-गुबार
साफ-साफ दिखता नहीं
कौन है जो तेजी से आ रहा है
सड़कें बिकने लगती हैं
खरीदार आते ही आधा शहर बिक जाता है
एक रात में

जो देखता है
देखता-ही-देखता रह जाता है
पुराने हिस्से शहर के
भूतनाथ के डेरे में तब्दील होते हैं
दिन में भी डरावने

जो कुछ करने का माद्दा रखता है
कर जाता है बहुत सारा महज साल भर में
उठा देता है गगनचुंबी निर्माण
बरसने लगती है लक्ष्मी/तो अम्बार लग जाता है

वह कब्जे में लेना चाहता है धरती
देशों और महादेशों में फैला देता है कारोबार
उसका विज्ञापन टी.वी. की ट्यूब पर
पानी की लहरों जैसा तैरता है
लहरें आती हैं जाती हैं/अधिकतर झिलमिलाती हैं

शहर रोज बिकता है
बेचकर जो निकल गया
वह आसिन के बादल की तरह
खो जाता है शून्य में

शहर किसी की बपौती संपत्ति नहीं है
दिन-रात खरीद-बिक्री
घाटा-मुनाफा/मिनट-मिनट में तेजी-मंदी

पुराने लोक-व्यवहार बदल जाते हैं
पुराने अखबार रद्दी के भाव बिकते हैं
किसी के आगे कोई पिछली बात
उठाना बकवास है
बेकार हो जाते हैं/पुराने संस्कार
कपड़े पहनने का पुराना तरीका हास्यास्पद
पुराने विधि-व्यवहार/पुराने लोकाचार
संस्कृति और धार्मिक कर्मकाण्ड
बासी और तेबासी होकर फेंके जा रहे

आलोचनात्मक हस्तक्षेप की आवश्यकता

विकल्‍प की तलाश में


  • राजकुमार राकेश

खुद को हताशाओं के समंदर में डूबो देने की बजाए जीवन को सक्रियता और उसके प्रयोगात्मक फॉर्मों को अपनाने के लिए आगे अनवरत अल्पसंख्यक होते फार्म लेखकों को सीधे आलोचनात्मक हस्तक्षेप की तरफ खींच रहे हैं। अरुंधति की सामाजिक व लेखकीय सक्रियता एक उदाहरण है। यह किसी भी कविताई या औपन्यासिक फार्म से कमतर नहीं आंकी जा सकती।


वर्षों से मैं जार्ज आर्वेल के 'एनीमल फार्म` की तरह का कोई उपन्यास लिख डालने की कोशिश में हूं जिसने अपने समकालीन वक्त में इस उपग्रह पर उभरती किसी अराजक व्यवस्था और उससे जन्मने वाली तानाशाहिक सभ्यता विशेष के विरोध में यह विडम्बनामूलक नारा दिया था- 'सब पशु समान हैं किंतु कुछ पशु दूसरों से ज्य़ादा समान हैं।` लेकिन इस कोशिश में मैं सफल तो क्या होता, उस संभावित उपन्यास के लिखे जा सकने वाला पहला शब्द भी मेरे लिए सम्भव नहीं हो सका, जबकि इस उपग्रह की सीमित धरती पर एक अन्तराष्ट्रीय गुंडई-दादागिरी की काली छाया तले बन चुकी अमानवीय व्यवस्था में पिसते भारतीय समाज में इस नारे के समानधर्मा नारों की एक पूरी फेरहिस्त मेरे दिमाग में हर समय कोई बड़ा विस्फोट कर डालने में अनवरत जुटी हुई है। पिछले दो वर्षों से घोर मानसिक अवसाद और एक ऐसे तथाकथित अपराध के आतंक की घुटन में जीते हुए, जिसे कभी कर सकने की सोच पाना भी मेरे जैसे व्यक्ति के लिए असम्भव और मानसिक तौर पर स्व-अक्षम्य रहा है, उस स्थिति में ऐसा पहला नारा जो मैं शब्दों में उतार सकता हूं वह 'अन्याय ही न्याय` है। यह हमारी न्याय व्यवस्था पर नहीं बल्कि इस समाज की पूरी व्यवस्था पर की गई आतंकित व्यक्ति की टिप्पणी भर नहीं है। बल्कि एक उस व्यक्ति की टिप्पणी है जो अपने आज तक के पूरे जीवन में यह एक सपना देखता रहा है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति समानधर्मिता के आधार वाले समतामूलक और समानतापरक जीवन जीने योग्य खुद को न केवल पा सके, बल्कि सचमुच में इस स्वप्न को अपने जीवनऱ्यथार्थ में तब्दील होता अनुभव करे।
एक भयानक व समूचे अंधकार से परिपूर्ण इस अन्यायी व्यवस्था के आतंक तले मकौड़ों की तरह जीते करोड़ों-करोड़ लोगों की शारीरिक एवं मानसिक तकलीफों को पूरी तरह महसूस करते हुए अगर हम किसी सार्थक विकल्प की तलाश और उसे पा सकने की आशाओं से सराबोर हैं, तो इसे व्यर्थ का आशावाद मानकर खारिज करना उचित नहीं होगा। एक अनवरत व मौन प्रक्रिया उस दिशा में चल रही है, यह मान लेना अधिक महत्त्वपूर्ण है। हालांकि आज सतह पर जो यथार्थ तैरता दिख रहा है वह सचमुच यही है कि आज की खबरों में अन्याय से पीड़ित लोगों का पक्ष लेने वाली तीस्ता सीतलवाड़ नहीं होगी, बल्कि वे ही खूंखार, खूनी और आतंकित कर डालने वाले चेहरे होंगे जो सत्ता के घोड़ों पर सवार, समाज के हर चेहरे, आदर्श और भविष्य के हर उजाले को कुरूप कर डालने में जुटे हैं। उनके के लिए 'सत्ता ही शक्ति` है, भले ही वह कितना ही अल्पजीवी, अमानवीय और खूंखार क्यों न रहती आई हो। शायद भूमंडलीकृत समय के चौधरी इस भ्रम में हैं कि उनकी इस तथाकथित लोकतांत्रिक सत्ता जिसे वे हारे हुए राष्ट्रों पर जबरन थोपना चाहते हैं-का कोई विकल्प है ही नहीं। एक हताशा है जो सभी राजनैतिक दलों के एकरूप चेहरे से जन्म लेकर वर्तमान सत्ताधारियों और इसी सत्ता के आगामी लालच में जीभ नरम किए हुए सांसे गिनते पल-छिन काट रहे हैं। वे आपसी भ्रमों में आश्वस्त हैं कि उनमें से कोई किसी का विकल्प नहीं है बल्कि एक ही कुरूप चेहरे में विभिन्न रूप हैं। सभी को अंतत: उन्ही बेलगाम घोड़ों की सवारी करनी है और उन्हीं की पीठ पर हिचकोले खाते हुए इस उपग्रह की धरती और जीवों पर अश्वमेध के स्वप्न को जीना है।

सम्पूर्ण अश्वमेध का यह स्पप्न पूरा होता है शक्ति की उपासना से और आज के युग में 'शक्ति ही अराजकता` है। अवैध धन अराजक गतिविधियों का पक्का सबूत है और इसका उद्गम भ्रष्टाचार, डांगबाजी, लठैती, हवाला और कबूतरबाजी इत्यादि के बिना कहां सम्भव है। जिस वैश्विक आतंकवाद को दिन रात पानी पी-पी कर कोसा जाता है उसकी जड़ों में आर्थिक शोषण का महासमुद्र ठाठें मारता है। कानून की आड़ में भामाशाहों को डरा धमकाकार ही इसे संचय करना सम्भव है। यह डराना-धमकाना कोई शाब्दिक या सांकेतिक भर नहीं है बल्कि आतंक से दिलों में कंपकपी पैदाकर थैलियों के मुंह खुलवाना है। जन की मेहनत की कमाई पर डाका डलवाने की शुरूआत यहीं से शुरू होती है। दाल, नमक, चावल और आटा अचानक बाजार से यूं ही गायब नहीं हो जाता और रातों रात कीमतें यूं ही आसमान नहीं छूने लगतीं। दरअसल आज की इस दुनिया में कुछ भी यूं ही नहीं होता। अफगानिस्तान और इराक को यूं ही ध्वस्त नहीं कर दिया जाता। उत्तरी कोरिया और ईरान पर दादा की कुदृष्टि यूं ही नहीं जा टिकती। फिर इस 'पुरातन` भारत में यूं ही कुछ हो जाएगा, यह मान लेना बहुत भोलापन है या बहुत बड़ी शातिरता। शक्ति यूं ही बिना किसी अराधना के नहीं मिलती। कुछ भी यूं ही.. यही आज के इस संसार मंे प्रचलित 'बहुरूपीय` लोकतन्त्र का नियम है।

जार्ज आर्वेल सम्भवत: आज के अपने नए 'पशुवाड़े` के लिए 'गुंडागर्दी ही लोकतन्त्र है`, जैसा कुछ ईज़ाद करते। निश्चय ही निर्णय का अधिकार इस लोकतन्त्र में भाभाशाहों की थैलियों में कैद है। अंडरवर्ल्ड के शिखर पुरूषों (कृपया 'व्यक्ति` पढ़ें) के दरबारों में हाजिरी करने वाले तब खुद कितना खुश होते हैं जब प्रताड़नाओं और आतंक से निजात पाने के लिए पीड़ित जन उनके अपने दरबारों में गिड़-गिड़ा रहा होता है और लोकतंत्र तब तानाशाही होने का सुबूत दे रहा होता है। सार्थक विकल्प की तलाश यहीं से शुरू होती है जिसके बारे में पूंजीवादी-भूमंडलीकृत लौह-व्यवस्था ताल ठोंककर व गर्व से कहती है कि बिना किसी भारी भरकम खून-खराबे के विकल्प की सोच पाना ही व्यर्थ है।

इस समाज के वंचित से वंचित व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में (प्रतीत होता है) मध्यवर्गीय चकाचौंध का एक ऐसा सपना कुलबुला रहा है जिसके आलोक में कुरीतियां ही समाजिक रीतियां बनती चल रही हैं। वे शायद नहीं जानते वे अपने लिए किसी अंधसुरंग का निर्माण कर रहे हैं। और विकल्प की तलाश में भटकते फिरने वाले स्पप्न द्रष्टाओं की जमात का लुप्तप्राय: होने का खत़रा मंडरा रहा है। इसके मूल में निरर्थकता बोध से उपजती हताशाएं तो हैं ही, लेकिन बाजारवाद उदारीकरण और भूमंडलीकरण जैसी आर्थिक शब्दावलियों ने एक ऐसी लहर पैदा कर डाली है जो इस लुप्तीकरण की प्रक्रिया को अधिकाधिक तेज कर रहीं हंै। इसलिए भी खुद को हताशाओं के समंदर में डुबो देने की बजाए जीवन की सक्रियता और उसके प्रयोगात्मक फॉर्मों को अपनाने के लिए आगे बढ़ना होगा। आज के युग में कविता और कहानी जैसे अनवरत अल्पसंख्यक होते फार्म लेखकों को सीधे आलोचनात्मक हस्तक्षेप की तरफ खींच रहे हैं। अरुंधति की सामाजिक व लेखकीय सक्रियता एक उदाहरण है। यह किसी भी कविताई या औपन्यासिक फार्म से कमतर नहीं आंकी जा सकती।

आर्थिक विकास की वृद्धिदर के आंकडों का तब सचमुच कोई महत्व नहीं रह जाता जब 'जन` अपने लिए ऐसे किसी विकल्प की तलाश में निकल पड़े।



राजकुमार राकेश कथाकार व मार्क्सवादी आलोचक हैं। तीन उपन्यास और तीन कहानी संग्रह प्रकाशित। आलोचना व संवाद की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य।