February 11, 2008

साहित्‍य वार्षिकी 2008 की विषय सूची


जन विकल्प की साहित्य वार्षिकी 2008 अब उपलब्ध


यह अंक

कहानियां
  1. संजीव- गली के मोड पर
  2. संतोष दीक्षित - पास फेल
  3. विमल कुमार -हंगर फ्री इंडिया
  4. कविता - समांतर
  5. अरविंद शेष-आबो हवा
  6. रणेंद्र - हमन को होशियारी क्‍या
कविताएं
  • 1 संजय कुंदन
  • 2 आर चेतन क्रांति
  • 3 सुंदरचंद ठाकुर
  • 4 पवन करण
  • 5कुमार अरूण
  • 6कुमार मुकुल
  • 7 मधु शर्मा
  • 8 प्रियदर्शन
  • 9 विनय कुमार
  • 10 मदन कश्‍यप
  • 11 शंकर प्रलामी
  • 12 बसंत त्रिपाठी
  • 13 अरूण आदित्‍य
लेख
  • 1 सुधीश पचौरी - अत्‍तरआधुनिकता और हिंदी का द्वंद्व
  • 2 अरविंद कुमार- आधुनिक हिंदी की चुनौतियां
धरोहर
  • 1 जवाहरलाल नेहरू - हिंदी में आत्‍मआलोचना का अभाव है

कहानियां
  • 1 गुरदयाल सिंह - ज्ञान विकार है
  • 2 बाबुराव बागुल - विद्रोह
  • 3 प्‍यास - मोहनदास नैमिश्‍राय
साक्षात्‍कार
  • 1 प्रतिभा आपको अकेला कर देती है राजेद्र यादव से स्‍वतंत्र मिश्र की बातचीत
कविताएं
  • 1 बाबुराब बागुल
  • 2ज्ञानेद्रपति
  • 3 चंद्रकांत देवताले
  • 4 विष्‍णु नागर
  • 5 भगवत रावत
  • 6 विजेंद्र
  • 7 अनूप सेठी
  • 8 नीलाभ
  • 9 खगेंद्र ठाकुर
उपन्‍यास अंश
  1. श्यामबिहारी श्यामल - शब् सत्ता

कहानियां
  1. राजकुमार राकेश- यह भी युद्ध है
  2. अनंतकुमार सिंह - बसंती बुआ
  3. शेखर मलिल्‍क- आखिरी औरत
कविताएं
‍‍
  1. रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति
  2. प्रमोद रंजन
  3. मुसाफिर बैठा
  4. पंकज पराशर
  5. मृत्‍युंजय प्रभाकर
  6. रोहित प्रकाश
  7. रमेश ऋतंभर
  8. शहंशाह आलम
  9. आशीष कुमार
  10. अजेय
  11. प्रणय प्रियंवद
  12. मोहन साहिल
  13. कल्‍लोल चक्रवर्ती
  14. विक्रम मुसाफिर
  15. लनचेबा मीतै
पृष्‍ठ -236, मूल्‍य - 50 रूपए.
संपर्क : 2 सूर्य विहार कॉलोनी, आशियाना नगर, पटना-800025
email : pramodrnjn@gmail.com

December 24, 2007

बुद्ध, मार्क्स और आज की दुनिया



मई महीने के पूरे चांद का दिन गौतम बुद्ध का जन्म दिन है और ५ मई कार्ल मार्क्स का। इसलिए इस बार जब लिखने बैठा तब इन दोनों का स्मरण स्वाभाविक था। इन दोनों के विचारों ने हमारी पीढ़ी और समय को प्रभावित किया था। पूरी बीसवीं सदी मुख्य तौर से मार्क्सवादी और मार्क्सवाद विरोधी खेमों में बंटी रही। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया को बुद्ध ने भी अपने अंदाज में प्रभावित किया।

कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र जब मैंने पहली दफा पढ़ा था तब हाई स्कूल में था। इस पुस्तिका की अधिकांश बातें हमारे सिर के ऊपर से निकल गयी थीं, फिर भी बहुत कुछ ऐसा था, जिसने सम्मोहित किया था। हमारी पीढ़ी घर में पिता और बाहर में परमपिता से डरने वाली पीढ़ी थी। तमाम नैतिकतायें हमें इनका पालतू होना सिखलाती थीं। इस घोषणा-पत्र के द्वारा हमने वर्ग-संघर्ष, पूंजी, सर्वहारा जैसे कुछ नये शब्द और परिवार, राष्ट्र व आजादी के नये अर्थ पाये थे। 'कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग कांपते हैं तो कांपे! सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है और जीतने के लिए उनके पास सारी दुनिया है` जैसे ओजपूर्ण समापन ने हमारे संस्कारों की चूलें हिला दी थीं। वास्तविक आजादी संस्कारों की आजादी होती है। कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र ने हमें आजादी का नया अर्थ दिया था। गांव में बैठ कर हम दुनिया की आजादी का स्वप्न देखते थे। इस आजादी की तलाश में हम साहित्य, राजनीति, इतिहास और विज्ञान के पृष्ठ-दर-पृष्ठ पलटते थे। कभी गोर्की और चेखब मिलते थे, कभी माओ और फिदेल को । इसी क्रम में जब हमने इतिहास में प्रवेश किया तब गौतम बुद्ध से मुलाकात हुई। बुद्ध और मार्क्स में हमने अद्भुत साम्य पाया।

मार्क्स वाया शॉपेनहावर बुद्ध के नाम से तो परिचित थे,उनकी विचारधारा से नहीं। हालांकि मार्क्स ने जर्मन दर्शनशा में ही अपनी जड़ें तलाशी हैं, और हीगेल के दर्शन को ही पैर के बल खड़ा किया है, लेकिन दर्शनशा का कोई विद्यार्थी कह सकता है कि हीगेल कि अपेक्षा बुद्ध मार्क्स के ज्यादा करीब हैं।

बुद्ध के गुजरे ढ़ाई हजार साल हुए और मार्क्स के गुजरे कोई सवा सौ साल। आज बहुत सी स्थितियां बदली हैं। अनेक आविष्कारों और अर्थशा व राजनीति के क्षेत्र में नये प्रयोगों ने हमें नये तरीके से सोचने के लिए विवश किया है। आज न बुद्ध का जमाना है, न मार्क्स का। इसलिए आज हम यदि बुद्ध और मार्क्स को हू-ब-हू वैसे ही अंगीकार करना चाहें जैसे वे अपने जमाने में थे, तो हम अजायबघर की सामग्री बन जायेंगे। लेकिन उन दोनों के अध्ययन का अभाव हमारी विचार प्रणाली को कमजोर करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

हमारे देश में बुद्ध और मार्क्स से लोग बीसवीं सदी के आरंभ में परिचित हुए। मार्क्स से बीसवीं सदी के आरंभ में परिचित होने की बात तो समझ में आती है क्योंकि उनका निधन १८८३ में हुआ और वे जर्मन थे, किन्तु बुद्ध तो हमारे ही देश के थे और कोई हजार वर्ष तक उनके धर्म की धूम हमारे देश में रही थी। यह अजीब बात है कि वर्णाश्रम धर्म वालों ने बुद्ध का निर्वासन इस तरह किया था कि वे पुन: विदेशियों के द्वारा ही हमारे बीच आ सके। एडविन अर्नाल्ड के काव्य 'लाइट ऑफ एशिया` के द्वारा उन्नीसवीं सदी के आखिर में हमारे भद्रलोक को बुद्ध की जानकारी मिली। बीसवीं सदी के आरंभ में पुरातात्विक खुदाइयों से जब मोहनजोदड़ो, हड़प्पा की खुदाई हुई तो आर्य श्रेष्ठता का दंभ ढीला पड़ा, क्योंकि पता चला कि आर्य संस्कृति से पूर्व ही यहां उससे कहीं श्रेष्ठ सभ्यता-संस्कृति मौजूद थी। कुम्हरार, नालंदा, विक्रमशिला आदि की खुदाई के बाद लोगों को अशोक और बुद्ध के बारे में विस्तार से जानकारी मिली।

कभी-कभी सोचता हूं कि जोतिबा फुले को यदि बुद्ध की जानकारी मिल गयी होती तो क्या होता। फुले भारत के दलितों के लिए इतिहास ढूंढते पौराणिक कथाओं में पहुंचे और बलि राजा को अपना नायक बनाया। भारत के लिपिबद्ध इतिहास में उनके लिए कुछ नहीं था। उन्हें अपने लिए एक गॉड की जरूरत थी, निर्मिक नाम से उन्होंने अपना भगवान गढ़ा। फुले को यदि संपूर्णता के साथ बुद्ध और बौद्ध इतिहास की जानकारी होती तो अपनी वैचारिकी को वे अपेक्षाकृत ज्यादा विवेकपूर्ण बनाते और तब संभवत: आधुनिक भारत के इतिहास का चेहरा जरा भिन्न होता। फुले रेगिस्तान के प्यासे हिरण की तरह बहुत भटकते रहे। वे समानता के आग्रही थे। ब्राह्मणवाद से वे मुक्ति चाहते थे। हिन्दू वर्णधर्म का खात्मा चाहते थे। किसानों और शूद्रों का राज चाहते थे। अपनी चेतना से जितना हो सका उन्होंने किया। अंबेडकर को बुद्ध और मार्क्स दोनों उपलब्ध थे, उन्होंने दोनों का उपयोग भी किया। इसलिए वैचारिक रूप से वे ज्यादा दुरुस्त और संतुलित हैं।

आज यह कहना मुश्किल है कि बुद्ध और मार्क्स हमारे समय को कितना प्रभावित कर रहे हैं। कुछ सामाजिक दार्शनिक विचारहीनता के दौर की बात करते हैं। लेकिन जिसे लोग विचारहीनता कहते हैं, वह भी अपने आप में एक विचार है। पुराने जमाने के चार्वाक की बातों को लें तो कमोबेश ऐसी ही विचारहीनता अथवा सभी मान्य विचारों के निषेध की बात वह भी करते थे।आज कहीं-न-कहीं चार्वाकवाद के प्रभाव में हमारा जमाना आ चुका है। कम से कम ऋण लेकर घी पीने की उनकी सलाह (ऋण संस्कृति) तो हमारे समय का सबसे बड़ा विचार बन गया है। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि चार्वाकवादियों ने वेद और ईश्वर का चाहे जितना निषेध किया हो सामाजिक परिर्वतन के लिए कुछ नहीं किया। वर्ण धर्म पर वे चुप थे। इसीलिए कुछ मुकम्मल मार्क्सवादी मित्र जब भारतीय दर्शन में लोकायत और चार्वाक से अपनी नजदीकी तलाशते हैं तो मुझे एतराज होता है।

मार्क्स ने बहुत सी बातें की हैं लेकिन उनकी बात जो आज भी हमें उत्साहित करती है वह यह कि अब तक के दार्शनिकों ने विभिन्न तरह से विश्व के स्वरूप की व्याख्या की है, लेकिन सवाल यह है कि इसे (विश्व समाज को) बदला कैसे जाय।
बुद्ध और मार्क्स यहां एक साथ नजर आते हैं।
  • प्रेमकुमार मणि

प्रतिक्रिया

पत्रिका का तीसरा अंक मिला। मेरी शुभकामनाएं! मौजूदा समय में जब विचारों और इतिहास के अंत की घोषणाएं धूम-धाम से की जा रही हो, तब 'जन विकल्प` जैसी पत्रिका की जरूरत ज्यादा ही महसूस होती है। आप एक बहुत ही जरूरी काम कर रहे हैं। यह पत्रिका ये बता रही है कि इतिहास का अंत नहीं हुआ है, हुआ सिर्फ यह है कि नया इतिहास नया किरदार लिख रहा है। सामंती युग के हीरो अब इस खेल में नहीं दिख रहे, तो कुछ लोग कम रोशनी का बहाना कर गेम रोकना चाहते हैं। भारतीय संदर्भ में, ब्राह्मणवाद इस समय लोकतंत्र और बाजार के दोहरे हमले से चरमरा रहा है। शहरीकरण और इंटरकास्ट शादियों की वजह से जाति की बुनियाद हिल रही है। समाज में इसकी वजह से तनाव है, पर ये शुभ नहीं है। आपकी पत्रिका इस तनाव को दर्ज कर रही है। आप मौजूदा समय का इतिहास लिख रहे हैं। इतनी बड़ी भूमिका निभाने में आपको कामयाबी मिले।
-दिलीप मंडल, दिल्ली

American detained for Puri temple visit ( 3rd March 2007, TOI), temple administration took a fine of Rs 209 from him even as some shrine priests insisted that the BHOG for the day should be dumped as it had been defiled by the presence of a non Hindu inside the temple.
The religion which teaches you to not to treat people with equal is not a religion. Csateism is backbone of Hinduism & only emancipation is a conversion. These were the people those were talking stupidly over the Racism, without knowing that Casteism is much more dangerous than racism.
A recent study has shown that in India about 63% Hindu temples prohibits Dalits. We do not want to go there as a worshiping Hindu’s fake gods but we demand equal rights over everything.
-Pradeep Atri. Mukerian, Punjab.


मार्च अंक में स्वामीनाथन पर आलेख पूरा पढ़ गया। पत्रिका इस दृष्टि से अच्छी है कि इसे पढ़ने में कठिनाई नहीं होती। मैं तकनीकी पहलू की बात कर रहा हूं। यह ठीक है कि इसे यूनीकोड पर यानी मंगल फौंट पर इन्टरनेट पर लगा कर सारी दुनिया के पाठकों के पास पहुंचाना चाहिए।
-विनोद रिंगानिया, गुवाहाटी

साहित्य के लिए किया गया प्रयास समाज के लिए एक वरदान है। 'जन विकल्प` द्वारा किए जा रहे आपके कार्य सराहनीय हैं।
-Devi Nangrani

I am not comfortable with Hindi. But Hindi speaking friends of HETUBADI magazine are appreaciating Jan Vikalp very much. we will be able to organise a good no. of subscribers.
-Ananta Acharya, Kolkatta. asim.ananta@gmail.com

इनके भी संदेश मिले : एसआर हरनोट, शिमला, विजेन्द्र एस विज, दिल्ली, गणेश मिश्र, अम्बिकापुर कपिल, अमरावती, हर्षित पाण्डे, आईआईटी, रूड़की, मृत्युंजय प्रभाकर, दिल्ली, अनन्त आचार्य, कलकत्ता, मनोरंजन मुकेश, दिल्ली, नचिकेत, थाने, विन्नु पहवानी धीरेश सैनी, मुजफ्फरनगर, पूरन मुद्गिल, भोपाल, कमल सिहं चौहान, खंडवा, मप्र, महेश सांख्यधर, बिजनौर, संतकुमार टण्डन 'रसिक`, इलाहाबाद, अजेय, लाहुल स्पिति।

फिर उभरा फासीवादी जिन्न



  • स्वतंत्र मिश्र

सीडी जैसे तमाम प्रकरण भाजपा की रणनीति के औजार हैं । इस घटना से जुड़ी तमाम खबरों के अध्ययन के बाद जाहिर तौर पर यह घटना प्रायोजित मालूम पड़ती है। भाजपा के मातृ संगठन आरएसएस का गठन १९२५ में इसी आधार पर किया गया था।


किसी कारण से मेरे टेलीवीजन के रिमोट ने काम करना बंद कर दिया था। मेरी मजबूरी यह हो गयी कि मैं एक मात्र खबरिया चैनल आईबीएन-७ का दर्शन कर सकूं, जिस पर भाजपा द्वारा प्रचारित जहरीली सीडी का विज्ञापननुमा समाचार अनगिनत ब्रेकों के बाद भी अबाध गति से प्रसारित हो रहा था। खबरों में सीडीमयता के प्रवाह के बारे में अगर कहूं कि चैनल आकंठ 'जहरीली सीडी` में डूब गया था तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन, केशरीनाथ त्रिपाठी, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, रविशंकर प्रसाद, वैंकेया नायडू, लालकृष्ण आडवाणी समेत तमाम लोग सीडी के इस जहरीले प्रकरण पर कभी शर्माते , कभी घबराते हुए, कभी दहाड़ते हुए भीगते-सूखते बारी-बारी से मीडिया के जरिये आम वोटरों से रू-ब-रू होते रहे। अभी तक यूपी में अमिताभी करिश्मा के जरिये समाजवादी पार्टी ने 'यूपी में बड़ा दम है` की तर्ज वाले ढेर सारे प्रचारों के जरिये लाभ लेने की कोशिश की थी ताकि 'मुलायम कायम रहें`। इसके बाद कांग्रेस ने विज्ञापन के जरिये राज्य की खस्ताहाल तस्वीरों को दिखाकर जनता को यह बताने की कोशिश की कि 'इससे तो अच्छी १९ साल पहले कांग्रेस की सरकार` थी। भाजपा इस चुनाव में एक सिरे से गायब मालूम पड़ रही थी। चुनाव प्रचार के अंतिम चरणों में अचानक चैनलों के सौजन्य से एक सीडी को चलाने की कोशिश की गयी। साथ में चैनल के एंकरों द्वारा यह बताया जाता रहा कि वे इसलिए सीडी का प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं क्योंकि इससे दो संप्रदायों के बीच दंगा भड़क जाने का निश्चित खतरा पैदा हो जाएगा। चैनल वालों ने इस सीडी का राज आम दर्शकों के सामने साफ तौर पर बयां नहीं किया इसलिए दंगा नहीं भड़का। हालांकि भाजपा को इस विस्फोट का जो लाभ पाना था, वह उसे चुनाव समीक्षकों के अनुसार मिल जाएगा। जनता के बीच सौहार्द बना रहे चैनल की इस सदिच्छा के लिए उन्‍हें धन्यवाद दिया जाना चाहिए। परंतु उनकी सदिच्छा जनता के हित की कुछ खबर विशेष तक क्यों सिमट कर रह जाती है, इस पर कभी और बात करना ठीक होगा। फिलहाल अभी हिट हो चुकी सीडी की सुनिश्चित और सफल होती योजनाओं के वर्तमान संदर्भों पर चर्चा लाजिमी होगी।

सीडी के जारी होते ही टेलीविजन और समाचार पत्रों में आती दनादन खबरों ने उत्तर प्रदेश चुनाव में हाशिये पर खड़ी भारतीय जनता पार्टी को चुनाव के केंद्र में ला दिया। हालत यह है कि तीसरे चरण का चुनाव संपन्न होने के बाद एनडीटीवी एक्जिट पोल में चुनाव समीक्षकों ने माना कि भाजपा अब तक २०-२४ सीट पर बढ़त बनाते हुए सबसे आगे चल रही है। वैसे कुल मिलाकर इस एक्जिट पोल के अनुसार बसपा इस बार की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आएगी। चुनाव में सबसे ज्यादा घाटा समाजवादी पार्टी का होना तय माना जा रहा है। सीडी प्रकरण से पूर्व टीवी पर आ रहे विज्ञापनों के हिसाब से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच जबरदस्त घमासान की तस्वीर बनती दिख रही थी। परंतु सीडी की नौटंकी के बाद अब समीकरण बदल चुका लगता है। इस प्रकरण से भाजपा को मिलता लाभ देखकर तमाम तरह की क्षुद्रता से कोई भी पार्टी बचना नहीं चाह रही है। इस घटना के बाद राहुल गांधी ने भी विवाद खड़ा करने की मानसिकता से परिवारवादी परिभाषा से रचा बसा हुआ बयान दे डाला।


परिवारवाद कांगेस की राजनीति का मूल आधार रहा है। बहुजन समाज पार्टी पर भाजपा ने यह आरोप लगाया कि पार्टी ने 'बहनजी का संदेश` पुस्तिका जारी की है। इस पुस्तिका में उन्होंने सीधे तौर पर विभिन्न जातियों के लिए आपत्तिजनक बातें कहीं हैं। वास्तव में आज की राजनीति का जो मूल सार है उसके हिसाब से ऐसी बात जायज सी हो गयी लगती है। चुनाव में बाजी मारने के लिए सारी बुर्जुआ पार्टियां नैतिकता आदि राजनीति के मूल सवालों को दरकिनार करके जाति, संप्रदाय, दंगे, मंदिर-मस्जिद, सीडी, साड़ी आदि जैसे कुछ बेहूदा खेल रचकर सत्ता हासिल कर लेना चाहती हैं। बुर्जुआ राजनीति में सत्ता पर काबिज होने की दौड़ में यह हमेशा से एक नियम की तरह लागू रहा है। गांधी इस देश के आज तक के सबसे ताकतवर जन नेता के रूप में उभरे हैं। परंतु इतिहास के पन्नों में आप झांककर देखें तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस से पट्टाभी सीतारमैया की हार पर गांधी जी ने जो बयान दिया था, वह उनकी महानता की सीमाओं को दर्शाता है। सत्ता की लालसा मनुष्य की सीमाओं को उजागर करती है। इसकी पुष्टि के लिए गांधी जी का उद्धरण दे रहा हूं। उस समय की राजनीति में नैतिकता का स्थान था। इसलिए नेताजी ने इस घटना के बाद अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था। वे बापू का सम्मान पूर्ववत् करते रहे। राजनीति में त्याग की भावना का महत्व था। आज की राजनीति और राजनेताओं, नेताओं से स्वार्थ की बू आती है। हो सकता है कि एक-आध लोग इस सामान्यीकरण से परे हो सकते हैं। इसलिए आज के दौर में ऐसी तात्कालिक घटनाओं के संदर्भ में मैं व्यक्तिगत तौर पर विभिन्न पार्टियों द्वारा इस्तेमाल किये जानेवाले ऐसे चुनावी प्रस्तावों को और उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि के आधार पर इन प्रकरणों को समझे जाने की जरूरत महसूस करता हूं। दरअसल इन तमाम बुर्जुआ पार्टियों में से किसी भी पार्टी के लिए ऐसे तमाम प्रतीकों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी पार्टी की ऐसी हरकतें अनायस कहीं आसमान से नहीं टपक पड़ती हंै और न ही पाताल फोड़कर आश्चर्यजनक रूप से सामने आ जाती हंै। यह सब कुछ उनकी विचारधारा के तहत् पनपती और बढ़ती रहती हैं। ऐसे प्रकरण ज्वालामुखी की तरह या बादलों के संधनन प्रक्रिया की तरह मौके की ताक में रहती हैं, मौका पाते ही यह जबरदस्त ढंग से फट पड़ती हैं। इन प्रकरणों के उत्स ढूंढे जाने चाहिए।

सीडी जैसे तमाम प्रकरण भाजपा की रणनीति का एक औजार हैं। इस घटना से जुड़ी तमाम खबरों के अध्ययन के बाद जाहिर तौर पर यह घटना प्रायोजित मालूम पड़ती है। भाजपा के मातृ पार्टी आरएसएस का गठन १९२५ में इस बिना पर ही किया गया था। वे मुगल शासन में हुए हिंदुओं पर अत्याचार के नाम पर सांस्कृतिक तौर पर हिंदुओं के मन में विष भर देना चाहती थीं। लेकिन लंबे समय की कार्यवाही के नतीजों के तौर पर और खासकर गांधी की हत्या के बाद आरएसएस का दमन बड़े स्तर पर हुआ। आरएसएस कलंकित होकर हाशिये पर चली गयी थी। इस घटना के बाद सबक के तौर पर आरएसएस को लगा कि केवल सांस्कृतिक स्तर पर कार्यकर्ता तैयार करने से काम नहीं चलने वाला है। उसने राजनीतिक कार्यकर्ता तैयार करने के लिए संघ (फैक्ट्री) का निर्माण किया जिसने आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में 'राष्ट्रीय` पार्टी का आकार ले लिया। गांधी की हत्या से कलंकित आरएसएस को राजनीतिक स्वीकृति जेपी आंदोलन में जयप्रकाश नारायण के जीवन की सबसे बड़ी भूल के तौर मिल पायी। गांधी के मृत्यु के समय राजनीति का मतलब चरित्र की ऊंचाईयों से लगाया जाता था। यही कारण है कि गांधी की हत्या आरएसएस को बहुत लंबे समय तक महंगी साबित होती रही। आज राजनीति का मतलब अपनी सारी इच्छाओं के पूरित होने या सबकुछ गटक लेने से लगाया जाता है। इन हालातों में जहरीली सीडी, अयोध्या, गोधरा, नांदेड़ आदि जैसे षड्यंत्र हों या फिर लालजी टंडन द्वारा पिछले लोकसभा चुनाव में साड़ी बांटने के दौरान मची अफरा-तफरी से कई लोगों की मृत्यु का मामला हो कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। एक बात और है कि राजनीति में ऐसी शक्तियों को चुनौती देने के लिए किसी जन-संगठन ने अपना जनाधार इस रूप में नहीं फैलाया जिससे इन शक्तियों को सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर पराजित किया जा सके। समाज को सही दिशा में गतिमान किया जा सके यह जन-संगठनों के लिए एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी होगी। जन-संगठनों को गोलबंद होकर इन फासीवादी ताकतों द्वारा रोजी, रोटी के मसलों को पीछे धकेलकर सीडी जैसे खेल खेलने से रोकना होगा। अन्यथा रोजी, रोटी और बुनियादी सवालों की लड़ाई को अपमानित होने से नहीं रोका जा सकेगा।