December 17, 2007

नंदीग्राम : विकास का खूनी खेल

समकाल


  • रेयाज-उल-हक/सुनील


यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि पुलिस के पांच हजार जवान किसलिए नंदीग्राम भेजे गये थे? क्या यह उम्मीद की जा रही थी कि इतनी बड़ी संख्या में सश बलों को भेजने के बाद भी हिंसा नहीं होगी? आखिर हम कैसे समाज में रह रहे हैं, जहां सत्ता खुलेआम लोगों की हत्याएं करती है, उनकी लाशें गायब करवाती है और फिर इन हत्याओं को जायज भी ठहराती है! क्या हिंसा सत्ता का एकाधिकार है और जनता को हंसिये लहराने का भी अधिकार नहीं है? क्या वह रो भी नहीं सकती?




लोग कितनी आसानी से मार दिये जाते हैं!
यह अपने आप में पहली घटना हो जब हालांकि उनकी चीख तब भी निकलती है और दूर तक पहुंचती है। नंदीग्राम में, गैर सरकारी स्रोत बताते हैं कि एक सौ से ज्यादा लोग मारे गये। लाशें नदी में बहा दी गयीं। एक सौ से ज्यादा लोग अब भी लापता है। महिलाओं के साथ बलात्कार हुए हैं । और पत्रकारों को अभी भी नहीं जाने दिया जा रहा है। अन्यस्वर के संपादक सौमित्र घोष ने लिखा है कि १५ मार्च, ०७ की शाम को इस निर्जन जगह में १२ घंटे के स्थानीय बंद की घोषणा की। शायद शाम को बंद रखा गया। उन्होंने लिखा है कि किस तरह से जो लोग मिले उन्हें घरों से निकाल कर गोलियां मारी गयीं। यह १९७० के उन काले दिनों की याद दिला रहा था जब नौजवानों को घरों से निकाल कर गोलियां मारी जा रही थी। प्राप्त तथ्यों से पता चलता है कि जिन पांच घायलों को इलाज के लिए कोलकाता भेजा गया है, उनमें से मात्र एक के शरीर में पुलिस की गोली मिली है। तो फिर बाकी चार लोगों के शरीर में किसने गोली मारी? यह इस शंका की पुष्टि करता है कि सीपीएम के लोग भी पुलिस के साथ थे।

तो क्या हम लोकतंत्र में रह रहे हैं? १९४७ के बाद संभवत: यह अकेली बड़ी घटना है, जिसमें एक पूरे गांव को घेर कर उसे इस तरह कुचल दिया गया हो। और यह सब कौन कर रहा है? वही सीपीएम सरकार जो गरीबों-किसानों की पक्षधरता के दावे करती नहीं थकती। आप उसके नेताओं चेहरों को देखिए-वे फक पड़े हुए हैं, मगर कह रहे है-हत्याएं सही थीं, उनका कहना है कि नंदीग्राम में माओवादी शामिल थे, इसलिए गोली चलायी गयी। उनका यह भी कहना है कि नंदीग्राम की जनता ने विगत दो महीने से उस इलाके में सरकारी तंत्र को घुसने नहीं दिया था, इसलिए यह ऑपरेशन आवश्यक था। जनता सत्ता को चुनौती दे रही थी, तो क्या इसके लिए उसे मजबूर नहीं कर दिया गया होगा? दूसरे शब्‍दों में कहीं तो वह सीपीएम सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर रही थी। क्या जनता ने सरकार के पूरे तंत्र को ही अस्वीकार नहीं कर दिया था? नंदीग्राम के लोगों से सलेम ग्रुप को देने के लिए जमीन छीनी जा रही थी। सेज की रियायतों के तहत सलेम ग्रुप इसे ऐसी जगह में तबदील करनेवाला था जहां उस निश्चित भूभाग में उसके अपने नियम-कानून होते। अर्थात उसमें भारतीय राजसत्ता का हस्तक्षेप बहुत ही सीमित हो जाता। यदि सरकार सलेम ग्रुप को भारतीय भूभाग के अंदर भारतीय राजसत्ता से मुक्त जगह बनाने की अनुमति दे सकती है, तो फिर नंदीग्राम के लोगों द्वारा एक विदेशी कंपनी को शासन स्थापित करने से रोकना कैसे अनुचित ठहराया जा सकता है? यदि सलेम ग्रुप की समांतर सत्ता जायज है तो फिर अपनी ही भूमि पर नंदीग्राम की जनता सत्ता क्यों नहीं? बल्कि नंदीग्राम की जनता की लड़ाई उसकी मातृभूमि की रक्षा की भी लड़ाई है, जिस पर विदेशी कंपनी आकर सत्ता स्थापित करने वाली थी। इन तमाम सवालों के जवाब सीपीएम सरकार को देने ही होंगे। बुद्धदेव सरकार क्या पूरे ऑपरेशन के जरिये यह नहीं कह रही है कि सत्ता आम मेहनतकश जनता के जीने के तमाम अधिकारों पर पाबंदी लगा देगी, अगर वह जीने की आजादी की मांग करे?

याद आ रहा है वह अमेरिकी अधिकारी, जिसने कुछ दिन पहले बीबीसी पर सीपीएम को विकास की जरूरत और अमेरिकी हितों को सबसे अच्छी तरह समझनेवाली पार्टी कहा था। इससे समझा जा सकता है कि सीपीएम सरकार के हित किसके साथ गुत्थमगुत्था है, और सीपीएम विकास की जो अवधारणा पेश कर रही है वह कहां बनी है। मगर सिंगुर और नंदीग्राम के लोगों को यह समझने के लिए किसी अमेरिकी अधिकारी के बयान की जरूरत नहीं है। वे दरअसल उस आतंक को भोग रहे हैं, जो यह सरकार इन पर कर रही है। नंदीग्राम के लोग इंडोनेशियाई कंपनी सालिम को नहीं आने देने की कीमत चुका रहे हैं। यह वही सालिम ग्रुप है, जो इंडोनेशिया में १९६५ में कम्युनिस्टों के कत्लेआम के बाद अमेरिकी संरक्षण में फला-फूला। इसे भ्र ट सुहार्तो शासन ने विकसित होन में मदद की। अब सुदूर भारत में इसे एक जबरदस्त मददगार मिल गया है-बुद्धदेव भट्टचार्य।

इधर बंगाल में कथित विकास की प्रक्रिया पर ध्यान दें, तो पायेंगे कि बड़ी सफाई से आम किसानों, भूमिहीनों और मजदूरों की कीमत पर शहरों का विस्तार किया जा रहा है। शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स बनाये जा रहे हैं। कॉमरेड बुद्धा के विचार में यही विकास है, मगर वे जिस तरह के विकास की बात कर रहे हैं, वह लोगों को झांसा देने के लिए है। उनका कहना है कि वे राज्य को क़षि से उद्योग की तरफ ले जा रहे हैं। उनकी राय में विकास की यही प्रक्रिया है। मगर विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है, जिसमें अर्थव्यवस्था में पहले कृषि क्षेत्र की भूमिका प्रभावी रहती है। इसके बाद यह क्रमश: उद्योग एवं सेवा क्षेत्र की तरफ शिफ्ट करती है। लेकिन इसे यांत्रिक तरीके से देखना दरअसल विकास के नाम पर धोखा देना है। इस अवधारणा के सार में यह था कि पहले क़षि क्षेत्र का विकास होता है और यह उस स्तर पर पहुंच जाता है जहां लागत के अनुपात में आगत में गिरावट आती है एवं इसमें बड़े स्तर पर अतिरिक्त श्रम लगा रहता है। क़षि का यह विकास उद्योग के लिए न केवल पूंजी बल्कि औद्योगिक उत्पादों के लिए मांग भी पैदा करता है। इस प्रकार उद्योग क़षि के उस अतिरिक्त श्रम को सोख लेता है। इस प्रकार यह स्वाभाविक प्रक्रिया विकास को फिर अगले चरण में ले जाती है।

लेकिन इसी के साथ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये तमाम उदाहरण उस दौर के हैं, जब एकाधिकार पूंजी का दौर नहीं आया था। बीसवीं सदी के दौर में साम्राज्यवाद के विकास ने बिना श्रम के उत्पादन की प्रक्रिया को जन्म दिया, जिसमें औद्योगिक विकास के बावजूद क़षि में लगे श्रम में कोई खास बदलाव नहीं आता इसलिए यह जरूरी नहीं कि इस दौर में अर्थव्यवस्था में उद्योग का प्रभावी होना इसका संकेत हो कि अर्थव्यवस्था में वास्तव में विकास हो रहा है। हम अगर बुद्धदेव के मॉडल पर विचार करें तो एक तो यह उस प्रक्रिया पर भी खरी नहीं उतरता जो आर्थिक विकास के मॉडल के बतौर लिया जाता है, बल्कि बुद्धदेव का मॉडल साम्राज्यवाद के दौर में इसके हितों के लिए अपनाया गया मॉडल है, जिसमें क़षि का गला घोंट कर एवं पूंजी, वह भी विदेशी पूंजी, के ऊपर उद्योग खड़े किये जाते हैं, जिसमें न तो क़षि में लगे श्रम में कोई खास बदलाव लाता है, न ही वह उस भू-भाग की जनता की बुनियादी हालत को ऊंचा उठाने में मदद करता है। उल्टे यह गरीब किसानों का गला घोंट कर साम्राज्यों की कोठियां भरता है। हम पूरे देश में विकास की प्रक्रिया में यह देख सकते हैं कि उद्योग एवं सेवा क्षेत्र में विकास के बावजूद क़षि में लगे श्रम में कोई खास बदलाव नहीं आया है, एवं इसने रोजगारविहीन विकास को जन्म दिया है, साथ ही क़षि संकट भी गहराता जा रहा है। इसलिए आज बेलगाम औद्योगिक विकास का सीधा मतलब किसानों को उजाड़ना है। नंदीग्राम के किसान इस उजड़ने से ही बचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नंदीग्राम में हुई इस तरह की जुल्म-जबरदस्ती सिर्फ इसी बात का प्रमाण है कि यह सरकार किस हद तक अपने उद्देश्यों से दूर आ चुकी है और अपने लोगों के कितना खिलाफ जा सकती है। महाश्वेता देवी कहती है-'यही सीपीएम है।` मतलब यही सीपीएम का असली रंग है। विगत ३० सालों से बंगाल में जमी सीपीएम ने वहां अपना एक उच्चवर्गीय आधार तैयार कर लिया है, जो सिद्धांत में तो प्रगतिशीलता की बात करता है, लेकिन वास्तव में इसके वर्गीय हित साम्राज्यवाद एवं बड़े पूंजीपतियों से जुड़ गये हैं। इसलिए यह अपने वर्गीय हित को बचाने के लिए किसी हद तक जा सकता है। वैसे भी पश्चिम बंगाल संसदीय वामपंथ के सबसे मजबूत धड़े की भद्दी राजनीतिक प्रयोगशाला रहा है। कुछ वर्ष पहले सीपीएम के लोगों ने गड़बेता में माओवादियों के पूरे जत्थे को एक घर में बंद कर जला दिया था। न केवल माओवादियों बल्कि तमाम राजनीति प्रतिद्वंद्वियों पर सीपीएम जबरदस्त सशस्‍त्र दमन चलाती है। माओवादी इसलिए एजेंडे में सबसे ऊपर आ जाते हैं, क्योंकि सीपीएम के सश हमले के जवाब में वे भी प्रतिरोध करते हैं।
और नंदीग्राम में तो अब सीपएम का बर्बर चेहरा सबके सामने आ गया है। हालंकि बुद्धदेव कह रहे हैं कि उन्होंने नंदीग्राम में वही किया जो उन्हें पार्टी ने करने को कहा था। इसने स्प ट कर दिया है कि यह मसला केवल बुद्धदेव का नहीं बल्कि सीपीएम के पूरे चरित्र का है। देश के एक बड़े तबके में अब यह सवाल उठने लगा है कि भारत में संसदीय वामपंथ कहां आ पहुंचा है।

इस नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर दिया है। घटना के बाद वाले गुरुवार को कोलकाता की जादवपुर युनिवर्सिटी में गुस्साये छात्रों ने पुलिस को कैंपस से खदेड़ दिया। देश भर में कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए हैं। इंटरनेट पर युवकों की एक बड़ी संख्या संसदीय वामपंथ के इस चेहरे पर अपने गुस्से का इजहार कर रही है।

आखिर यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि पुलिस के पांच हजार जवान किसलिए गांव में भेजे गये थे? क्या यह उम्मीद की जा रही थी कि इतनी बड़ी संख्या में सश बलों को भेजने के बाद भी हिंसा नहीं होगी? आखिर हम कैसे समाज में रह रहे हैं, जहां सत्ता खुलेआम लोगों की हत्याएं करती है, उनकी लाशें गायब करवाती है और फिर इन हत्याओं को जायज भी ठहराती है! क्या हिंसा करना सत्ता का एकाधिकार है और जनता को, (क्या हम कह सकते हैं, अपार सैन्य शक्तिवाली सत्ता से नाराज, जवाब मांगती, प्रतिरोध करती, निरीह जनता को?) हंसिये लहराने का भी अधिकार नहीं है? क्या वह रो भी नहीं सकती? यदि हिंसा का अधिकार केवल राजसत्ता के हाथों में है, तब क्या इसके जरिये यह नहीं कहा जा रहा है कि निहत्थे लड़ोगे तब मारे जाओगे? क्या ये तमाम कार्रवाइयां माओवादियो के, उनके सश संघर्र्ष के, तर्कों को ही सही नहीं ठहराती?

जनता ही इतिहास का निर्माण करती है, एवं कोई, यहां तक कि बुद्धदेव और उनकी पार्टी भी, इतिहास की इन परिघटनाओं से परे नहीं हैं। नंदीग्राम ने पूरे देश को दो संदेश दिये हैं-एक तो यह कि भारतीय संसदीय पार्टियां अमेरिकी साम्राज्यवाद के हितों की रक्षा के लिए किस हद तक जा सकती है, दूसरा संदेश यह है कि ऐसी बेलगाम बर्बरता के खिलाफ जनता को किस तरह उठ खड़े होना चाहिए। बांग्ला रंगर्मी अर्पिता घोष का मानना है कि यह संघर्घ प्रकाश की रेखा है। वे कहती है-अगर हम इसके साथ नहीं हुए तो हम बच नहीं पायेंगे।

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