December 11, 2007

ज्ञानेंद्रपति की चार कविताएं

( हिन्‍दी के प्रतिनिधि कवि ज्ञानेन्द्रपति को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है। जन विकल्प की ओर से बधाई! झारखंड के एक गांव में जन्मे ज्ञानेन्द्रपति के अब तक ५ कविता संग्रह 'आंख हाथ बनाते हुए` (१९७०), 'शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है` (१९८०), 'गंगातट` (२०००), 'संशयात्मा` (२००४) और 'भिनसार` (२००६) प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने अपनी काव्य-भाषा के निर्माण के क्रम में हिन्दी की बोलियों और तत्सम के मेल से कई नए शब्द खड़ी हिन्दी को दिए हैं। सामयिक विषयों को कविता का कथ्य बनाते हुए, उसकी तह तक पहुंचना उनकी कविता की विलक्षण विशेषता है। उनकी चार कविताएं (चयन : विनय कुमार, संपादक, समकालीन कविता) प्रकाशित की जा रही हैं। अगले अंक में आप ज्ञानेन्द्रपति का साक्षात्कार पढ़ेगें। - सं.)


चार कविताएं

  • ज्ञानेन्द्रपति


अकाट्य सिर


मेरे कटे हुए सिर का
यदि बनता पेपरवेट
नयनाभिराम
तो वे बहुत खुश होते
रखते मुझे सदा अपनी आंखों के सामने ही
कुलीन शालीन
प्रतिभा के, सौन्दर्य के, गरज़ हर अच्छी चीज के
पारखी वे
लेकिन
यह मेरा सिर
बेहूदा है
किसी जंगली पक्षी के घोंसले जैसा
लेकिन चलो!
उसका एक मुखोश ही बन जाएगा
अफ्रीका और बस्तर के आदिवासी मुखोशों के बीच
दीवार खाली है
उनके ड्राइंगरूम की

मुश्किल यह है/कि यह सिर है या खुराफात!
कभी बन्द न होने वाला एक कारखाना
कविताओं की आधी-अधूरी फैलती-सिकुड़ती
पंक्तियों से भरा हुआ
अपांक्तेय अनुभवों की पंक्तिशेष स्मृतियों से
जिज्ञासाओं से अभीप्साओं से विकल
कवि-माथ!
चाक पर घूमती
अत्यन्त हल्के हाथों सूत से कट जानेवाली
गरदन नहीं है यह
गीली मिट्टी नहीं, पकी हुई इंर्ट है
अकाट्य है त्याज्य है
फेंको इसे दूर घूरे पर
चुपचाप
सिवान पर बढ़ाओ चौकसी
बस्ती में गश्त रात-दिन
हर दिशा में हमेशा ताने हुए बन्दूकें
उपद्रवियों के खिलाफ!



गमछे की गंध


चोर का गमछा
छूट गया
जहां से बक्सा उठाया था उसने,
वहीं-एक चौकोर शून्य के पास
गेंडुरियाया-सा पड़ा चोर का गमछा
जो उसके मुंह ढंकने के आता काम
कि असूर्यम्पश्या वधुएं जब, उचित ही, गुम हो गई हैं इतिहास में
चोरों ने बमुश्किल बचा रखी है मर्यादा
अपनी ताड़ती निगाह नीची किए

देखते, आंखों को मैलानेवाले
उस गर्दखोरे अंगोछे में
गन्ध है उसके जिस्म की
जिसे सूंघ/पुलिस के सुंघिनिया कुत्ते
शायद उसे ढूंढ निकालें
दसियों की भीड़ में
हमें तो
उसमें बस एक कामगार के पसीने की गन्ध मिलती है
खटमिट्ठी
हम तो उसे सूंघ/केवल एक भूख को
बेसंभाल भूख को
ढूंढ़ निकाल सकते हैं
दसियों की भीड़ में


मानव बम

सुतली-बम से लेकर
ट्रांजिस्टर बम तक
कितनी तरह के बम फटे थे
मानव-बमों के फटने से पहले
जनसभाओं में जनपथों पर

सुतली बम के लिए देह-भर सुतली
मिल सकती थी किसी किराने की दुकान पर
कुण्डली बांधे लटकती कोने में, दंश-दृढ़
ट्रांजिस्टर बम के लिए
खोल-भर ट्रांजिस्टर मिल सकता था
चावड़ी मार्केट में या ठठेरी बाजार में थोक-का-थोक
और गुड़िया-बमों के लिए प्लास्टिक की गुड़ियाएं
चाहे जितनी
किसी भी खिलौनों की दुकान पर

मानव-बम के लिए
जिस मां-कोख ने जाया है
कांेपल-कोमल शिशु-तन
उसने तो बिकाऊ नहीं ठहराया है उसे
कितने भी ऊंचे दामों

किस मां-गली से खरीद लाए हैं वे
बम का खोल बनाने मानव-तन कि मानव-मन
भावनाओं की अनगिन उमगती कोंपलोंवाला
सद्य:प्रस्फुटित किसी विचार से महमहाता
मानव-मन
विकासी प्रकृति का परम
वर्द्धमान जीवन का चरम
मानव-मन
जिसकी ब्रेन-वाशिंग कर
बहुविध उपायों से
कभी किसी पवित्र पृथुल ग्रन्थ के हवाले से
कभी किसी गोपनीय गुटका किताब के बल पर
कभी किसी महान उद्देश्य की बारूद भर
कभी..ओह! इस या उस तरह
बनाए जा रहे हैं मानव बम
तैयार किए जा रहे हैं सुसाइड-स्क्वैड-आत्मघाती दस्ते
किन्ही सत्तालोलुप सेनानायकों के हित

और असीसती माएं कलपती रह जाती हैं
उसके लिए जो उनका ही पसार था
कि जिसके पंख अभी पसरे ही थे आकाश में


आवो, चलें हम


आवो, चलें हम
साथ दो कदम
हमकदम हों
दो ही कदम चाहे
दुनिया की कदमताल से छिटक

हाथ कहां लगते हैं मित्रों के हाथ
घड़ी-दो घड़ी को
घड़ीदार हाथ-जिनकी कलाई की नाड़ी से तेज
धड़कती है घड़ी
वक्त के जख्म़ से लहू रिसता ही रहता है लगातार

कहां चलते हैं हम कदम-दो कदम
उंगलियों में फंसा उंगलियां
उंगलियों में फंसी है डोर
सूत्रधार की नहीं
कठपुतलियों की
हथेलियों में फंसी है
एक बेलन
जिन्दगी को लोई की तरह बेलकर
रोटी बनाती

किनकी अबुझ क्षुधाएं
उदरम्भरि हमारी जिन्दगियां
भसम कर रही हैं
बेमकसद बनाए दे रही हैं
खास मकसद से
आवो, विचारें हम
माथ से जोड़कर माथ
दो कदम हमकदम हों हाथ से जोड़े हाथ

1 comment:

  1. ज्ञानेन्द्रपति को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है...
    कविताई तो ठीक है लेकिन साहित्य अकादमी का उल्लेख कर आप किसकी महानता का आतंक प्रदर्शित करना चाहते हैं। ज्ञानेंद्र की कविता का, या सरकारी चटोरदान अकादमी का?

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