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December 11, 2007

बिहार में विकास की राजनीति

संपादकीय



आज पूरी दुनिया में विकास की आंधी चल रही है। कभी राष्ट्रवाद और समाजवाद को लेकर भी ऐसी ही आंधी चली थी। विकास की इस आंधी ने राष्ट्रवाद को तो पूरी तरह और समाजवाद को बहुत हद तक अप्रासंगिक बना दिया है। जहां तक भारत की बात है जिस कांग्रेस ने कभी समाजवाद शब्द को भारतीय संविधान में भारतीय गणराज्य के साथ नत्थी कराने में अग्रणी भूमिका निभायी थी उसी ने उसे अप्रासंगिक बनाने में भी अग्रणी भूमिका निभायी है। अब बिहार में समाजवादी तबियत के नीतीश कुमार विकास की राजनीति की प्रस्तावना कर रहे हैं जिसकी एक झांकी पिछले १९-२१ जनवरी को पटना में हुए एक ग्लोबल कांफ्रेंस में प्रस्तुत हुई; जिसे एक एनजीओ ने बिहार सरकार के सहयोग से आयोजित किया था और जिसका उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने किया। राष्ट्रपति डॉ. कलाम विकास की राजनीति के पुराने प्रस्तावक रहे हैं। इसलिए उनका भाषण रश्मी तौर पर दिया गया भाषण नहीं, बल्कि मनोयोग से तैयार किया गया एक दिलचस्प भाषण था। उद्घाटन सत्र, जो पटना कें एक बड़े सभागार में ताम-झाम के साथ आयोजित था, में मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला। बिहार में कांग्रेस का जो पहला अधिवेशन हुआ था (१९१२, बांकीपुर कांग्रेस) उस में भाग लेकर जवाहरलाल नेहरू को जो अनुभूति हुई थी, कुछ-कुछ वैसी ही अनुभूति इस समारोह के बाद मेरी थी। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- 'I visited as a delegate, the Bankipore congress during christmas 1912. It was very much an English knowing upper class affair, Where morning coats and well-pressed trousers were greatly in evidence. Essentially it was a social gathering with no political excitment or tension.(Page-30)' इसमें यदि संशोधन की जरूरत है तो बस 'अपर क्लास` की तरह 'अपर कास्ट` भर की। कुलीन 'बुद्धिजीवियों` की इस खूबसूरत कांफ्रेंस में प्रतिभागियों की रूचि विकास में कम, अपनी धज प्रदर्शित करने में अधिक थी। इस समारोह को ग्लोबल नहीं गोलमाल समारोह कहने वाले लालू प्रसाद ने भी ठीक इसी समय को ब्राह्मणवादी ठीहे पर आत्मसमर्पण के लिए चुना था। इस दौरान वे अपने गांव में शंकराचार्य को बुलाकर उनके चरणों में लोट रहे थे। फुलवरिया में खुला ब्राह्मणवाद था तो पटना में प्रच्छन्न ब्राह्मणवाद। अब बिहार को इनके बीच से आगे या पीछे जाना है।

सवाल उठता है बिहार में विकास का मॉडल क्या हो? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद सोचते हैं तो उनके सोच में सामाजिक न्याय का एक पुट होता है। पंचायत चुनावों में अपनी सोच को साकार कर उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाया था। महिलाओं और बहुत पिछड़े तबकों को पंचायत चुनावों में आरक्षण सुनिश्चित कर ग्रामीण इलाकों में उन्होंने एक नया नेतृ वर्ग खड़ा किया है। इससे जो हलचल पैदा हुई है वह सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन का कारक बनेगा। लेकिन नीतीश कुमार यदि यह सोचते हैं कि बाहरी निरंकुश निवेश से बिहार में विकास होगा तो वे गलती पर हैं। वास्तविक विकास के लिए ग्रामीण स्तर पर कृषि क्षेत्र में पूंजीवादी रूझानों को बल देना होगा। आजादी के बाद से ही ब्राह्मणवादी-समाजवादी चेतना ने निचले स्तर पर पूंजीवादी रूझानों को हतोत्साहित किया और इसी का नतीजा है गांव और शहर की दूरी बढ़ती गयी। जिन लोगों ने यूरोप में औद्योगिक क्रांति के इतिहास का अध्ययन किया है वे यह भी जानते हैं कि किन लोगों ने वहां इसे विकसित किया था। पूंजीवाद एक अवस्था में प्रगतिशील कदम होता है क्योंकि यह सामंतवादी रूझानों को खत्म करता है। (फ्रांसीसी लेखक बॉल्जाक की रचनाओं को देखें। मार्क्स ने इसे रेखांकित किया है।) हमारे मुल्क में आयातित समाजवाद ने अपनी लड़ाई पूंजीवाद से शुरू की। (दरअसल समाजवाद पूंजीवाद से ही संघर्ष करता है।) इसका प्रतिफल हुआ कि एक तरफ तो समाज के सामंतवादी रूझान साबूत रह गये दूसरी तरफ ऊंची जातियों के प्रभुत्व वाले लोकतंत्र ने जिस समाजवाद को लाया वह ब्राह्मण-समाजवाद बन कर रह गया। उदाहरण के लिए भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर में ऊंची जातियों, खासकर ब्राह्मणों के प्रभुत्व को देखंे। यह सरकारी प्रयासों से हुआ है। (विस्तृत अध्ययन के लिए गेल ऑम्वेट का लेख 'रिजर्वेशन इन प्राइवेट सेक्टर` द हिन्दू ३१ मई-१ जून २००१) अब विकास के इस दौर में देखना होगा कि निचले तबकों को लेकर हम विकास का कैसा खाका बनायंे जिससे वास्तविक विकास हो सके। शायद इसे ही नीतीश कुमार न्याय के साथ विकास कहते हैं। इसके लिए पूंजी से अधिक ज्ञान और समर्पण की जरूरत है। फ्रांसीसी लेखक-चिन्तक गाइ सोमां इसे बेयरफुट कैप्टिलिज्म (नंगे पांव पूंजीवाद) कहते हैं। यह बेयरफुट कैप्टिलिज्म विकास का आधार बनेगा तभी सामाजिक न्याय भी संभव होगा। (मार्च अंक में इस विषय पर गाई सोमां का लेख देखेंगे) १९-२१ जनवरी को संपन्न ग्लोबल मीट पिछड़े बिहार को विकास की ओर नहीं, एक नयी राजनीतिक गुलामी की ओर ले जायेगा जो अंतत: एक जटिल सामाजिक गुलामी को भी जन्म देगा और जिससे जूझने में समानता और आजादी के सिपाहियों को दशकों का समय लग जायेगा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे की मजबूती के लिए रात-दिन परिश्रम कर रहे हैं। हर सभा-समारोह में लाठी फेंकने और कलम-कागज पकड़ने की बात कहते हैं। बिहारियों की लगनशीलता और काबलियत पर वे इतराते भी हैं। इस मानव संसाधन को उन्होंने अपनी पूंजी माना है। जाति और संप्रदाय से बाहर आकर वे बिहारीपन की, इसके स्वाभिमान की बात करते हैं। दरअसल यही वह महत्वपूर्ण कार्य है जिससे निचले स्तर से पूंजीवादी रूझान विकसित होंगे। इसी आधार पर सम्यक विकास की रूप रेखा बन सकेगी। यही वास्तविक सामाजिक न्याय भी है। जैसा कि राष्ट्रपति कलाम ने भी २०१५ तक पूर्ण साक्षरता और पूर्ण गरीबी उन्मूूलन की बात की है। इसे हर हाल में हासिल करना होगा। लेकिन प्रवासी निवेशकों की रूचि साक्षरता और गरीबी उन्मूलन में नहीं है। उनकी रूचि औन-पौन दाम में जमीन हासिल करने और येन-केन अपनी झोली भरने में है। किसी भी विकास पुरुष के लिए ऐसे लोगों से सावधान रहना ही श्रेयस्कर होगा।

- प्रेमकुमार मणि

प्रतिक्रिया

Greetings! It is reaffirming to see such commitment to social capital & Juslice. Best wishes for furthering your cause. -Ranjita Pal. Gaithersburg(Wash.Dc) ranjeeta@gwu.edu

अभी-अभी जन विकल्प की साईट पर पत्रिका पढ़ी। बहुत खुशी हुई कि आप जैसे लेखक ऐसे कार्य में जुटे हुए हैं।
-सौरभ आर्य, इटली

जन विकल्प की साईट देखी। बहुत ही सृजनात्मक काम कर रहे हैं आपलोग। व्यवस्था के साथ रहते हुए भी मणि जी विपक्ष की संवेदनशीलता के साथ इस पत्रिका में जुटे हैं। यही इसकी सार्थकता होगी; या शायद है भी। -अविनाश, एनडीटीवी, दिल्ली

Jai Bhim, Your webpage is excellent. You have done a good job. Rewritting history.. Dr. Ambedkar has said somewhere : जो इतिहास समझ नहीं सकते ,वे इतिहास बना नहीं सकते '
-Devendra Nikle, Mumbai

I am Glad that you are bringing out 'Vikalp' again. Please accept my good wishes. A long ago when Vikalp was introduced by Late Shailesh Matiyani from Allahabad, as a younger student, I wrote so the first two issues.
-Pranav Kumar Vandopadhya prankbanerjee@hotmail.com

पत्रिकाओं की बेमिसाल भीड़ में एक और गंभीर पत्रिका की बढ़ोत्तरी। यह सूचना अब उत्तेजक नहीं लगती क्योंकि इतना कुछ सोख सकने के लिए अपना सिस्टम असमर्थ होता जा रहा है। आपने स्वयं ही अपने पत्र में इस ओर इशारा किया है, फिर भी उगती-पनपती पीढ़ी को इसकी आवश्यकता होगी। किसी देश में इतनी सचेत होती वैचारिकी निश्चय ही अभिनंदनीय होनी चाहिए। मंगलकामनाएं! कहना यह भी है कि 'कालजयिता` और 'सामयिकता` में जिस तरह आपने भेद किया है वह काफी " स्टाईलाइज" लगाता है।
-राजी सेठ, दिल्ली

I have seen your online magazine. I can read and write hindi but the problem for me is the hindi vocabaluary. Tell me how can i improve my hindi?
-Sazid Khan, Partunistan, Pakistan. saajid@hotmail.co.uk

पटना में आप लोग जो कर रहे हैं वह बिल्कुल सही है। जन जागरण की बहुत जरूरत है, जो आप लोग सही तरह से निभा रहे हैं।
-विष्णु कोईरी, दिल्ली


जन विकल्प का प्रयास बहुत ही सराहनीय है। आजकल साहित्यिक-वैचारिक पत्रिकाएं कहां चलती हैं.. आपने जो प्रयास किया है उसके लिए मुझे हार्दिक खुशी है कि आज भी कुछ लोग ऐसे काम कर रहे हैं।
-अपूर्व कुलश्रेष्ठ, नार्वे

Good work.. I salute your spirits. I wish i could be with you in Patna. Hats off to you. Keep going...
-Vivek Sakpal sakpal-vivek@yahoo.co.in

Good going! Congrats. But how many OBC'S there, agree to establish casteless society. I don't think anybody there.
-Subash Arya. aryasubh@gmail.com


I saw the magazine Jan Vikalp Hindi monthly, It is a an excellent opportunity for the Indian population to read and discuss about their rights.
-Marria do socorro silva, Brazill. mpsocorros@gmail.com

अपने नाम के मुताबिक सामग्री लिए हुए है 'जन विकल्प`, पढ़वा लेने की जिद के साथ। आज के बेहद फरेबी वक्त में यह संघर्ष की एक लौ की तरह लगता है। जो धीरे-धीरे ऊपर उठेगी। फैलेगी। इसमें बहुत सारी ऐसी सामग्री की उम्मीद दिखने लगी है जिनसे हमारे समाज की पुरानी और नई गांठों की गुंझलकों को समझने और खोलने में मदद मिलेगी
-अनूप सेठी, मुंबई

I have gone through the editorial wirrlten by Prem Kumar Mani. His writing is good but not bassed on reserch. His writing is very near to Party line, not as researcher.
-Priyranjan, Amherst (NY)


राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं के विषय में आपकी चिंता जाय़ज है। यह तो बहुत बुरा हो रहा है कि लोग सिर्फ कठपुतली बनकर रह गए हैं । यह सब बताना तो अच्छा है लेकिन निवारण भी सोचना होगा।
-अजय कुमार, बिहार शरीफ, नालंदा



इनके भी संदेश मिले :

मनोज त्यागी, हैदराबाद,जयंत यादव, झांसी
अविनाश चंद्र, वाराणसी ,रिया यादव (यूनाईटेड स्टेट),राहुल, थाने, महाराष्ट्र
रेडिएन्ट, पटना ; अनंत आचार्य, कोलकाता , मनोहर एलवार्थी, बैंगलोर, एस.एन.राजू (पटना), कृष खां, दिल्ली अनामिल, बनारस ;, सरोज बाबू, बख्तियारपुर (पटना)
होली डेविल, आईआईटी, खड़गपुर, उद्धरमेश कुमार, हैदराबाद उपेन्द्र, आईआईटी, रूड़की, वैभव, नागपुर, एश्वरी गिल, मुंबई, किरण कुमार राय, असम ; देवेन्द्र चौबे, जेएनयू, नई दिल्ली
अजीत कुमार अमित, सिंगापुर ; यशवंत व्यास, संपादक अहा! जिन्दगी
ओमप्रकाश तिवारी, जालंधर ; मुशर्रफ़ आलम जौक़ी, दिल्ली ; रति सक्सेना, तिरूवंतपुरम् ;,मंजरी श्रीवास्तव, दिल्ली ;राजीव, भोपाल, संतोष सुमन, मुंबई, कलंदर दिलनवाज, नई दिल्ली, उमेश कुमार, बैंगलोर, भारत भारद्वाज, दिल्ली, प्रेमपाल शर्मा, दिल्ली, विजय कुमार, मुंबई, बजरंग बिहारी तिवारी, दिल्ली, पल्लव, उदयपुर, राजेन्द्र परदेसी, लखनऊ, शेखर मल्लिक, मऊ, रमेश उपाध्याय, दिल्ली, जितेन ठाकुर, देहरादून, सुनील कुमार फुल्ल, पालमपुर, विजय विशाल,मंडी, विजय सहगल, चंडीगढ़, मनोज सिंह, चंडीगढ़, प्रभा खेतान, कलकत्ता, हसन जमाल, जोधपुर, गुरदयाल सिंह, जैतो, पंजाब, रामश्रेष्ठ दीवाना, पटना, आलोक प्रकाश पुतुल बिलासपुर हरदर्शन सहगल, बीकानेर, रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति, दिल्ली, प्रकाशकांत, देवास, लालबहादुर वर्मा, इलाहाबाद, अखिलेश, लखनऊ, कमला प्रसाद, भोपाल, राजेन टोडरिया, देहरादून, राहुल अग्रवाल, भोपाल, रणवीर प्रसाद तमिलनाडु, मृत्युगामी, हैदराबाद, अभिषेक राय, गाजीपुर ; प्रदीप अत्री , होशियारपुर (पंजाब) कमलेन्द्र कुमार, बैगलोर, ओमा शर्मा, मुंबई आदि।

मनोरोग से जुड़े अंधविश्वासों पर चोट करती कविता

मतांतर


  • विनय कुमार

'यवन की परी` एक लड़ती हुई औरत की ही नहीं एक मनोरोगी की भी आवाज है। मनोरोग और आत्महत्या के शिकार कई लेखकों ने संतुलित ही नहीं विश्वस्तरीय लेखन किया है। रही बात परिपक्वता की तो वह इस बात पर निर्भर है कि परिपक्वता पहले आई या मनोरोग पहले हुआ। मनोरोग से उबर कर भी परिपक्वता प्राप्त की जा सकती है। यह कविता 'परी` की रोगमुक्ति की घोषणा है और अगर उसने आत्महत्या कर ली है तो यह उसके परिजनों और चिकित्सा व्यवस्था की विफलता है।



जन विकल्प के उद्घाटन अंक (जनवरी,०७) में प्रकाशित लेखों के वैविध्य और तेवर से आपकी तैयारी का पता चलता है और उम्मीद की जा सकती है कि पत्रिका एक बड़ा पाठक-वर्ग बनाएगी। कविता का यह अदना कार्यकर्ता आभारी है कि आपने न सिर्फ ३२ पृष्ठों में ६ पृष्ठ कविता को (अरुण कमल से उपयोगी बातचीत सहित) को दिए बल्कि कविता पुस्तिका 'यवन की परी` भी प्रकाशित की।

कविता पुस्तिका में रति सक्सेना के इंटरनेटीय सौजन्य से प्राप्त कविता 'एक खत़ पागल खाने से` एक अद्भुत उपलब्धि है। कविता की रचना की पृष्ठभूमि (अरब, एक बंद समाज का मानसिक अस्पताल और कवयित्रि की आत्महत्या) इसे और भी महत्त्वपूर्ण बनाती है। यह कविता एक सचेत और सक्रिय आत्मा की जानलेवा पीड़ाओं के दस्तावेज से ज्यादा प्रतिरोध की आवाज है-जुझारू और अपराजित। इसी अंक से अरुण कमल द्वारा उद्धृत एक पंक्ति दुहराना चाहूंगा- 'बोलता ही रहा तो हारा कैसे?`

एक अज्ञात और मनोरोगी कवि की इतनी संतुलित और प्रौढ़ रचना पर एक मित्र ने मुझसे पूछा कि क्या एक मनोरोगी ऐसी कविता लिख सकती है। चूंकि मनोरोग को असंतुलन का पर्याय समझा जाता है, इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है। उनके इस प्रश्न का संपूर्ण उत्तर एक किताब की शक्ल में ही संभव हो सकता है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि रचनात्मकता व्यक्ति की क्षमता होती है और सारे मनोरोग व्यक्ति की सभी क्षमताओं को पूरी तरह नष्ट करने वाले नहीं होते। मनोरोग और आत्महत्या के शिकार विश्व के कई लेखकों ने संतुलित ही नहीं विश्वस्तरीय लेखन किया है। रही बात परिपक्वता की तो वह इस बात पर निर्भर है कि परिपक्वता पहले आई या मनोरोग पहले हुआ। मनोरोग से उबर कर भी परिपक्वता प्राप्त की जा सकती है। नोबेल पुरस्कार विजेता गणितज्ञ जॉन नैश ने रोग के नियंत्रित हो जाने के बाद कई महत्वपूर्ण शोध किए। ज्ञातव्य है कि नैश स्क्जिाे़फ्रेनिया के मरीज हैं और प्रिंसटन (अमेरिका) में रहते हैं। इतना तय है कि सायकोटिक फेज में संतुलित और सार्थक रचना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में फार्म और कंटेंट दोनों पर मनोविकृतियों के (दु:) प्रभाव पड़ेंगे।

जहां तक 'परी` का सवाल है तो पुस्तिका के पाठ से उपलब्ध सूचनाओं और कविता की पड़ताल से अनुमान लगता है कि कवयित्री ने रचना-प्रविधि और कविता की समझ में महारत पहले हासिल की और कालांतर में अपनी 'हिमाकत` के कारण बाहरी दबावों को झेलने के लिए विवश हुई। इसकी तुलना एक आइने से की जा सकती है जो पत्थरों के शहर में अंतस में कौंधते अक्स के श्रोत को पाने की कोशिश में भागे और चूर हो जाए।
एक काव्य-साधन-संपन्न कवि अगर मनोरोग और अस्पताल के अनुभवों से भोक्ता बनकर गुजरे और इलाज की प्रक्रिया उसके 'लूजनिंग ऑफ असोशिएसंस` (विचारों की उश्रृंखलता) में कमी ला दे तो 'यवन की परी` का रचा जाना संभव है।

यह कविता एक लड़ती हुई औरत की ही नहीं एक मनोरोगी की भी आवाज है। यह आवाज मनोरोग से जुड़े कई अंधविश्वासों पर प्रहार करती है। यह कविता 'परी` की रोगमुक्ति की घोषणा है और अगर उसने सचमुच आत्महत्या कर ली है तो यह उसके परिवार, मित्रों, समाज और अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था की विफलता है।
साहित्य और मनोचिकित्सा दो अलग विधाएं हैं। इनमें जीवन को देखने, जानने और समझने के औजार अलग-अलग हैं। 'परी` जो कि 'पारानॉयड` स्टेज में है, उसे अस्पताल का वातावरण शत्रुवत् लगता है तो कोई अचरज की बात नहीं। किन्तु अस्पताल की जगह 'समाज` लिखकर कविता पढें तो पारानोइया के बावजूद 'परी` एक सार्थक रचनाकार के रूप में उपस्थित होती है।


विनय कुमार ख्यात मनोचिकित्सक व 'समकालीन कविता` के संपादक हैं।

विश्व : सद्दाम के बाद

समकाल

  • जुबैर अहमद भागलपुरी


इराक में एक शिया-प्रधान सरकार बन जाने से अमेरिका को अब यह चिंता विचलित कर रही है कि कहीं इराक और इरान की सरकारों में एकता न स्थापित हो जाए क्योंकि इरान भी एक शिया-प्रधान देश है।


वर्ष २००७ की पहली जनवरी; जब भारत समेत विश्व के हर हिस्से में लोग नववर्ष के आगमन के अवसर पर जश्न मना रहे थे, विशेष रूप से भारतवासियों के लिए सद्दाम हुसैन की फांसी का हृदयविदारक समाचार लेकर आई। भारत के सदा हितैषी रहे सद्दाम को फांसी देने के पीछे उद्देश्य जो भी रहा हो, आनेवाले दिनों में इस फांसी का परिणाम कूटनीतिक एवं राजनैतिक दृष्टिकोण से अमेरिका के लिए लाभदायक साबित नहीं होने वाला है।
आनन-फानन में मृत्युदंड का निर्णय, उसके तुरंत बाद सद्दाम को फांसी देने के पीछे अमेरिका की मंशा शायद दुनिया को यह संदेश देना हो कि जो भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरूद्ध सर उठाने की जुर्रत करेगा, उसका सर कुचल दिया जाएगा। एक दूसरा उद्देश्य यह भी हो सकता है कि सद्दाम को फांसी देकर जार्ज बुश वाहवाही लूटना चाहते हों; अपनी लोकप्रियता के घटते ग्राफ को सुधारना चाह रहे हों। अमेरिका ने इराक पर हमले से पूर्व यह तर्क दिया था कि वह इराक में मौजूद विनाशकारी हथियार से विश्व को मुक्त कराने के लिए उस पर आक्रमण कर रहा है लेकिन जब कोई घातक और विनाशकारी हथियार नहीं निकला, इराक मलबे का ढ़ेर बन चुका और अमेरिका की पोल खुल गई, तो वह कह रहा है कि इराक और मध्य-पूर्व एशिया में लोकतंत्र बहाली के लिए वह युद्ध कर रहा है।
सद्दाम को फांसी देकर अमेरिका ने वैसे तो अपने कई नापाक मंसूबों को अंजाम तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त कर ली परन्तु उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इसके दुष्परिणाम केवल इराक तक ही सीमित नहीं रहेंगे बल्कि इसका खामयाजा आने वाले दिनों में अमेरिका और उसके सहयोगियों को भी भुगतना पड़ेगा।

इसके प्रभाव इराक और उसकी जनता के लिए भी भविष्य में दूरगामी और घातक सिद्ध होंगे। हमें मालूम है कि अमेरिका शिया-सुन्नी साम्प्रदायिक वैमनस्य को हवा देने की शुरू से ही कोशिश करता रहा है। दोनों सम्प्रदायों के बीच कई खूनरेज संघर्ष कराने में वह कामयाब भी रहा है। कभी तो शिया के पवित्र स्थलों पर आतंकवादियों के भेस में अमेरिकी फौज के जवानों ने बमबारी कर सैकड़ों निर्दोषों की हत्या की, कभी सुन्नी बहुल इलाके में यही वाक़िया दोहराकर यह भ्रम फैेलाया कि शिया, सुन्नियों को तबाह करना चाहते हंै। यह सिलसिला सद्दाम की फांसी के बाद रूकने वाला नहीं। इराक और मध्य-पूर्व मामलों के लगभग सारे विशेषज्ञों का मानना है कि फांसी के बाद वहां हिंसा बढ़ेगी। भारत के सामरिक मामलों के विशेषज्ञ के.सुब्रमण्यम ने स्पष्ट कहा है कि सद्दाम की फांसी के बाद क्षेत्र में शिया-सुन्नी के बीच तनाव में और वृद्धि होगी। इस बात का समर्थन सेवानिवृत्त राजनयिक जी.पार्थसारथी ने भी की है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका सहित विदेशी बलों की मौजूदगी में फांसी दिए जाने से स्थिति और जटिल हो सकती है।

इस साम्प्रदायिक तनाव के हद से ज्य़ादा बढ़ने का सीधा अर्थ यह है कि भविष्य में कभी भी इराक की एकता भंग हो सकती है और शिया-सुन्नी और कुर्द तीन टुकड़ों में यह देश विभाजित हो सकता है। तानाशाह होने के बावजूद, सद्दाम की एक उपलब्धि यह थी कि उसने पूरे इराक को आंतरिक अशांति के बीच भी एक सूत्र में बांधे रखा। दुजैल की घटना, जिसमें सैंकड़ों लोग हताहत हुए थे और जो सद्दाम की फांसी का मुख्य कारण बनी, भी आंतरिक अशांति की ही मिसाल थी। सद्दाम के अलावा कोई दूसरा शासक भी होता तो वह दुजैल वालों के विरूद्ध सख्त़ कदम जरूर उठाता। केवल अमेरिका को सद्दाम की फांसी के लिए दोष नहीं दिया जा सकता। इसमें प्रतिशोध की भावना से प्रेरित शिया-प्रधान नूरी अल मालिकी सरकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ठीक ईदुज्ज़ुहा के दिन, जो मुस्लिम जगत में 'कुर्बानी` के प्रतीक के रूप में जाना जाता है, सद्दाम को फांसी देने में अमेरिका का नहीं, मलिकी सरकार का हाथ था; इस बात से सुन्नियों में भी शियों के विरूद्ध प्रतिशोध की भावना का उत्पन्न होना स्वभाविक है। ऐसे में अगर इराक कई टुकड़ों में विभाजित हो जाए तो आश्चर्य की कोई बात नहीं।

न केवल राजनैतिक और सामाजिक, बल्कि इस फांसी का परोक्ष रूप से असर इराक की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ेगा। इराक की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तेल-निर्यात पर ही आधारित है और अब इस व्यवस्था पर अमेरिका का प्रभुत्व स्थापित होना लगभग तय है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों ने तो स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका के इराक पर आक्रमण का एक मुख्य कारण वहां के तेल-भंडार पर नियंत्रण करना था। यदि इसे मान लिया जाए तो फिर यह तथ्य भी स्वीकार करना होगा कि अमेरिका इराक के संसाधनों को इराक की उन्नति की बजाए अपने हित में ही उपयोग करेगा और इराक की आर्थिक स्थिति, जो पहले से ही बदतर है, और दयनीय हो जाएगी इसके अतिरिक्त यहां की अर्थव्यवस्था की तबाही के अन्य कारण भी हैं।

एक तो लगातार आठ वर्षों तक इरान से युद्ध इस देश की अर्थव्यवस्था का मेरू-दंड तोड़ ही चुका था, उसके बाद सीनियर बुश द्वारा नब्बे दशक में इराक पर बमबारी ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। वर्तमान में सीनियर बुश द्वारा इराक पर पुन: आक्रमण से वहां की भयावह स्थिति का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। ज़ख्म पर नमक छिड़कने का काम वहां छिड़े गृहऱ्युद्ध ने पूरा कर दिया है। ऐसा अनुमान सहज ही लागया जा सकता है कि यह गृहऱ्युद्ध वर्षों तक जारी रहेगा। इसी आधार पर यह कहा जा सकता है कि इराक की अर्थव्यवस्था फांसी के बाद और चरमरा जाएगी।

ऐसा नहीं है कि सद्दाम की फांसी और उसके शासन के अंत का कुप्रभाव केवल इराक तक सीमित रहेगा, इसकी लपटें मध्य-पूर्व के देशों समेत अमेरिका तक पहुंचेगी। यह सही है कि इस अंतर्राष्ट्रीय एवं ऐतिहासिक घटना से अरब देश अधिक प्रभावित होंगे, परंतु इसके दूरगामी प्रभाव से अमेरिका भी अनछुआ नहीं रहेगा। नूरी अल मलिकी की सरकार पर शियाने एवं कुर्दों का प्रभाव है। इराक में एक शिया-प्रधान सरकार बन जाने से अमेरिका को अब यह चिंता विचलित कर रही है कि कहीं इराक और इरान की सरकारों में एकता न स्थापित हो जाए क्योंकि इरान भी एक शिया-प्रधान देश है। यदि ऐसा हो गया, जिसकी संभावना इराकी शासन-व्यवस्था में शियों के आ जाने से प्रबल हो गई है, तो मध्य-पूर्व एशिया में अमेरिकी कूटनीति को गहरा आघात लगना अवश्यंभावी है। अस्सी के दशक में ईरान-इराक के बीच आठ वर्षों तक युद्ध कराने में भी अमेरिका का हाथ था। तब सद्दाम हुसैन अमेरिका की आंख का तारा हुआ करते थे परन्तु इराक में शिया-प्रधान शासन आ जाने से मध्य-पूर्व एशिया का राजनैतिक समीकरण ही बदल जाएगा जिसका अरब देशों के प्रति अमेरिका की जोड़-तोड़ राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा।

दूसरी बात यह कि अभी मध्य-पूर्व के अनेक देशों में अमेरिका-समर्थक सरकारें हैं लेकिन वहां की जनता में उसके प्रति भारी विरोध व्याप्त है। अतएव मध्य-पूर्व की उलझी गांठें और अब सद्दाम की फांसी उसके लिए नई मुसीबतें पैदा कर सकती है।

अमेरिका पर इस फांसी का एक अन्य कुप्रभाव यह पड़ने वाला है कि अलकायदा नेताओं को बड़ी खेप में नए रंगरूट बहाल करने का अवसर मिल जाएगा। मुस्लिम-जगत में अमेरिका के प्रति घृणा एवं जनआक्रोश पहले से ही व्याप्त है। उधर अलकायदा वाले प्रारंभ से यह कहते आए हंै कि अमेरिका मुसलमानों को बर्बाद करना चाहता है, अतएव मुस्लिम नवयुवकों को 'जेहाद` के लिए आगे आना चाहिए। अब वह अपनी बात को और अधिक पुख्ता ढंग से प्रचारित करेगा और ऐसी संभावना है कि बड़ी संख्या में नौजवानों को अलकायदा में सम्मिलित कर अपने संगठन को मजबूत करेगा और अमेरिकी हित के विरूद्ध उनका इस्तेमाल करेगा।

इस प्रकार स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि सद्दाम की फांसी का अपरोक्ष रूप से अलकायदा फायदा उठाएगा। विदित है कि आज सुन्नियों की ओर से जो लोग लड़ रहे हैं, उनमें अधिकतर अलकायदा के लोग ही हैं। अब वे नए तेवर और नए जोश के साथ युद्ध में कूदेंगे और आक्रमण प्रतिआक्रमण का दौर जोर पकड़ेगा। यही नहीं फांसी के कुछ दिनों बाद ही अमेरिका ने एक तनावग्रस्त अफ्रीकी देश 'सोमालिया` पर अलकायदा को मारने के नाम पर हमला कर दिया। इस घटना का भी अलकायदा को ही फायदा मिलने वाला है।

भारत के लिए चिंता की बात यह है कि भारत का एक हितैषी खो गया। अब इराक में नई सरकार के आ जाने से भारत को नए सिरे से मलिकी सरकार से राजनैतिक संबंध स्थापित करना होगा। भारत का भी राजनैतिक और आर्थिक हित इराक में शांति-व्यवस्था कायम होने में ही निहित है। मध्य-पूर्व एशिया के बड़ी तेजी से बदल रहे परिवेश में भारत को अत्यंत ही सावधानी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाने करने की जरूरत है।


  • २८ अप्रैल १९३७ : राजधानी बगदाद से १५० किलोमीटर उत्तर में तिकरित के गांव एल आवजा में जन्म।
  • अक्टूबर १९५६ : देश के ब्रिटेनपरस्त शासकों के खिलाफ विद्रोह में शामिल। अखिल अरब धर्मनिरपेक्ष दल बाथ पार्टी में सक्रिय।
  • अक्टूबर १९५९ : देश में राजशाही के खात्मे के एक साल बाद प्रधानमंत्री अब्देल करीम कासेम की हत्या का प्रयास। विदेश भागे।
  • फरवरी १९६३ : बाथ पार्टी के सैनिक तख्तापलट द्वारा सत्ता हथियाने के बाद वापस बगदाद लौटे। लेकिन नौ महीने बाद ही बाथ पार्टी के हाथ से सत्ता छिनी। श्री हुसैन को जेल में डाल दिया गया। जेल में ही पार्टी के उपमहासचिव चुने गए।
  • जुलाई १९६८ : राष्ट्रपति अब्दुल रहमान आरिफ का तख्तापलट कर बाथ पार्टी को सत्ता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • १६ जुलाई १९७९ : राष्ट्रपति अहमद हसन अल बकर के रिवोल्यूशनरी कमांड काउंसिल (आरसीसी) अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद देश के राष्ट्रपति बने।
  • २२ सितम्बर १९८० : सीमा संघर्ष के बाद ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ा जो आठ वर्षों तक चला।
  • १६ मार्च १९८८ : इराकी सेना ने कुर्दों के शहर हलाबजा पर रासायनिक हथियारों से हमला किया जिसमें पांच हजार लोग मारे गए।
  • २ अगस्त १९९० : कुवैत पर हमला। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ने इराक पर प्रतिबंध लगाए।
  • १७ जनवरी १९९१ : अमेरिका नीत गठबंधन सेनाओं ने इराक पर हवाई हमले किए और कुवैत को मुक्त कराया। फरवरी अंत में इराकी फौजों के कुवैत से चले जाने के बाद खाड़ी युद्ध समाप्त।
  • १५ अक्टूबर १९९५ : राष्ट्रपति पद के लिए हुए जनमत संग्रह में सद्दाम हुसैन निर्विरोध चुने गए।
  • १५ अक्टूबर २००२ : आधिकारिक चुनाव परिणामों के अनुसार अगले कार्यकाल के लिए निर्विरोध राष्ट्रपति चुने गए। उनके पक्ष में शत प्रतिशत मतदान।
  • ७ दिसम्बर २००२ : कुवैत पर हमले के लिए माफी मांगी लेकिन कुवैती सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। कुवैत ने माफीनामे को खारिज किया।
  • फरवरी २००३ : दस वर्षों के अंतराल के बाद दिए गए साक्षात्कार में इराक के पास प्रतिबंधित हथियार होने और अंतराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन अलकायदा से संबंधों से इंकार किया।
  • २० मार्च २००३ : अमेरिका ने इराक के खिलाफ युद्ध छेड़ा।
  • ९ अप्रैल २००३ : अमेरिकी सेनाओं ने बगदाद में प्रवेश कर श्री हुसैन के तीन दशक पुराने शासन को समाप्त किया।
  • जुलाई २००३ : अमेरिकी सेना ने मोसुल में श्री हुसैन के दोनों बेटों उदय और कुशै के मारे जाने की पुष्टि की।
  • १४ दिसम्बर २००३ : अमेरिकी सेना ने हुसैन को गिरफ्तार करने की घोषणा की।
  • ५ नवम्बर २००६ : बगदाद की एक अदालत ने दुजैल में शियाओं के नरसंहार के मामले में दोषी करार दिया और सजाए मौत सुनाई।
  • ३० दिसम्बर २००६ : श्री हुसैन को फांसी पर लटका दिया गया।

भूंडलीकरण को स्वीकार करना ही होगा


प्रसिद्ध इतिहासकार विपिन चंद्र से भूमंडलीकरण,१८५७ और भगत सिंह पर रोहित प्रकाश की बातचीत


भूमंडलीकरण अब शुरू नहीं हुआ है। यह पूंजीवाद का हिस्सा है। अगर आप मार्क्स को पढ़ें तो पता चलेगा कि वह इसकी तरफ ध्यान दिलाने वाले पहले व्यक्ति थे।उन्होंने १८४८ में कम्युनिस्ट घोषणापत्र में लिखा है कि पूंजीवाद एक विश्व-व्यवस्था है। तो भूमंडलीकरण क्या है? यह भी विश्वव्यवस्था है। भूमंडलीकरण का मतलब और कुछ नहीं बल्कि यह है कि आप भी विश्व की आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं। उसने कहा कि यह बाहर के लोगों को सिर्फ दो विकल्प देता है। या तो आप इसमें शामिल हो जाइये या फिर इसके द्वारा पराजित।



रोहित प्रकाश : भूमंडलीकरण पूरी दुनिया में व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है, अलग-अलग अनुशासन के लोगों ने इसे परिभाषित किया है और इसके प्रभावों की व्याख्या की है, भूमंडलीकरण के बारे में आपके क्या विचार हैं?

विपिन चन्द्र : मेरे हिसाब से भूमंडलीकरण की आलोचना का आधार इसमंे निहित खामियां होनी चाहिए। यह कहना कि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया रूकनी चाहिए, बिल्कुल बेवकूफाना बात है, क्योंकि भूमंडलीकरण अब शुरू नहीं हुआ है। यह पूंजीवाद का हिस्सा है। अगर आप मार्क्स को पढ़ें तो पता चलेगा कि वह इसकी तरफ ध्यान दिलाने वाले पहले व्यक्ति थे। उन्होंने १८४८ में कम्युनिस्ट घोषणापत्र में लिखा है कि पूंजीवाद एक विश्व-व्यवस्था है। तो भूमंडलीकरण क्या है? यह भी विश्वव्यवस्था हैै। भूमंडलीकरण का मतलब और कुछ नहीं बल्कि यह है कि आप भी विश्व की आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं। उसने कहा कि यह बाहर के लोगों को सिर्फ दो विकल्प देता है। या तो आप इसमें शामिल हो जाइये या फिर इसके द्वारा पराजित। तीसरा कोई समाधान नहीं है। चीन एकमात्र देश है जिसने १९वीं सदी में भूमंडलीकरण का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि हम पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेंगे। १८४० और १८६० में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। उन्हें अपमानजनक स्थितियों को स्वीकार करना पड़ा। लेकिन उन्होंने फिर कहा कि हम इससे अलग ही रहेंगे। उसके बाद माओ तथा अन्य लोगों के अनुसार चीन एक अर्ध औपनिवेशिक देश बन गया। भारत की तुलना में अधिक पिछड़ा। दूसरी तरफ जापान की हार थी। लेकिन उन्होंने कहा हम इसलिए हारे हैं क्योंकि हम इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने उन स्थितियों को स्वीकार किया जो उनपर लादी गई थी। कोई आर्थिक या शारीरिक अपराध होता है तो उसकी जो कोर्ट होती थी उसमें अध्यक्षीय जज विदेशी होता था। अगर विदेशी जज न हुआ तो पार्षद या राजदूत या कोई और लेकिन कोई विदेशी दूतावास से जरूर होगा।

जापान ने मान लिया और फिर अपने लोगों को अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस भेजा। उन्हें कहा कि अध्ययन करके आओ उनके कानूनों को। यह नहीं कहा कि हमारे पारंपरिक कानून हैं। हम तुम्हारे कानून को नहीं मानेंगे, तुम हमें उपनिवेश बना रहे हो। फिर उद्योगों की तरफ ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि हमने अपनी न्यायिक व्यवस्था बदल ली है। हमारे जज तुम्हारे यहां से पढ़े हुए हैं। तुम किस आधार पर हम पर अधिकार जताते हो। हम जापानी कानून नहीं इस्तेमाल कर रहे हैं। हम आधुनिक कानूनों का इस्तेमाल कर रहे हैंं। हम आधुनिक प्रशिक्षित जजों का इस्तेमाल कर रहे हैं। जो तुम्हारे यहां प्रशिक्षित हुए हैं और अर्थव्यवस्था के बारे में उन्होंने कहा कि हम भी मजबूत हो गये हैं। अब शर्तों को हमारे ऊपर से हटाओ। बल्कि यह भी देखो कि हम तुम्हारी तरह साम्राज्यवादी भी हैं। उन्होंने चीन की तरफ कूच किया।

तो जापान एकमात्र एशियाई देश है जो स्वतंत्र बना रहा। चीन की तो बुरी स्थिति हो गई और भारत के पास तो विकल्प ही नही था। हम पराजित होकर विश्व-व्यवस्था का हिस्सा बने। क्योंकि हमारे यहां टीपू सुल्तान को छोड़कर १८वीं सदी में किसी ने समझा ही नहीं कि यह क्या हो रहा है। दुनिया के बारे में उसने भी थोड़ा-बहुत ही समझने की कोशिश की। तो मैं समझता हूं कि भूमंडलीकरण का विरोध नहीं करना चाहिए बल्कि गलत तरीके के भूमंडलीकरण का विरोध करना चाहिए। हमें कहना चाहिए कि भूमंडलीकरण को हम अपनी शर्तों पर चाहते हैं।


रोहित प्रकाश : तीसरी दुनिया के देशों के लिए या भारत जैसे देश के लिए क्या यह संभव है कि भूमंडलीकरण को अपनी शर्तों पर स्वीकार करे?

विपिन चंद्र : तीसरी दुनिया को पृथक योग नहीं बनाया जा सकता। आपको भूमंडलीकरण को स्वीकार करना ही होगा। आप पहले से ही भूमंडलीकरण का हिस्सा हैं, उपनिवेशवाद ने आपको इसका हिस्सा बनाया है। आप उत्तरी कोरिया की तरह पृथक होने की बात नहीं कर सकते। चीन क्या कर रहा है? चीन का बहुत बेहतर ढंग से भूमंडलीकरण हो रहा है। यह चीन की आर्थिक समृद्धि के रूप में आ रहा है। भूमंडलीकरण का विरोध करना महा बेवकूफी है। हमें उनकी शर्तों पर होने वाले भूमंडलीकरण का विरोध करना चाहिए। इसे अपने हित में इस्तेमाल करना चाहिए।

रोहित प्रकाश : आपने अपने एक पूर्व के साक्षात्कार में केंद्र और परिधि के देशों की चर्चा करते हुए कहा था कि भारत केंद्र का देश बनने की दिशा में बढ़ता हुआ देश है। अगर यह आर्थिक समृद्धि व्यापक और बहुसंख्यक भारतीय जनता के हित में नहीं है और साम्राज्यवादी नीतियों का अनुसरण करके ही इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, तो यह किस तरह उचित है?

विपिन चंद्र : यह दूसरी चीज है। जैसे जापान ने खुद का भूमंडलीकरण किया और विश्व पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा बना। लेकिन जापानी जनता को इससे कतई फायदा नहीं पहुंचा। जापान के टेक्स्टाईल मिलों में न्यूनतम मजदूरी की दर मुंबई के मजदूरों से भी कम थी, जबकि जापान बड़े पैमाने पर टेक्सटाईल का उत्पादन और निर्यात कर रहा था। जापान ने जनहित के आधार पर अपना भूमंडलीकरण नहीं किया। इसलिए जापान की समाजवादी और कम्युनिस्ट धारा ने १९२०-३० में इस शोषण का विरोध किया। उन्होंने कहा कि जापानी जनता को फायदा मिलना चाहिए। उन्होंने भूमंडलीकरण का विरोध नहीं किया क्योंकि वे मार्क्सवादी थे। उन्होंने यह नहीं कहा कि विश्व पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा मत बनो। उन्होंने कहा कि विकास करो लेकिन विकास जनता के हित में होना चाहिए।

रोहित प्रकाश : अगर भारत में भूमंडलीकरण जनहित के आधार पर नहीं हो रहा है बल्कि इसका चरित्र जनविरोधी है तो हम क्यों इसे स्वीकार करें?

विपिन चंद्र : इस बारे में हमारे अर्थाशायिओं और राजनीतिज्ञों से चर्चा करनी चाहिए। मैं तो यह कह रहा हूं कि भूमंडलीकरण का विरोध करने की जगह हमें इसकी नीतियों में बदलाव करने के प्रयास करने चाहिए। हमें भूमंडलीकरण विरोधी नहीं होना चाहिए बल्कि गलत तरह के भूमंडलीकरण का विरोध करना चाहिए। हम एक उपनिवेश के तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा थे। चीन एक अर्ध उपनिवेश के तौर पर इसका हिस्सा बना। जापान एक स्वतंत्र देश के तौर पर शामिल हुआ। जनता के साथ क्या हुआ चाहे ये पूंजीवाद था या कुछ और। सोवियत क्रांति हुई और रूस एक समाजवादी देश बना। लेनिन ने काफी कुछ किया इसका हिस्सा बनने के लिए। हर तरह की छूट दी जो वे चाहते थे सिर्फ विश्व व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए। ये तो स्तालिन ने बाद में कहा कि हम समाजवादी विश्व की पृथक अर्थव्यवस्था हैं । १९२३-२४ के लेनिन के लेखन का अध्ययन करना चाहिए।


रोहित प्रकाश : यह एक कार्यनीतिक कदम था..

विपिन चंद्र : कार्यनीतिक और रणनीतिक क्या होता है, यह लेनिन बखूबी जानते थे। आप विश्व अर्थव्यवस्था से बाहर नहीं रह सकते। कोई रास्ता नहीं है। आप अपने आंतरिक व्यवस्था के संदर्भ में इस पर चर्चा कर सकते हैं कि कौन सी शर्तों पर आप तैयार होंगे। लेकिन शर्तें ठेके जैसे नहीं हांेगी (हंसते हुए)। आप अमेरिका को यह नहीं कह सकते कि यह हमारी शर्त है तब तो हम भूमंडलीकरण में हिस्सा लेंगे वरना नहीं। हमें अपने यहां के भूमंडलीकरण की नीति के बारे में निर्णय लेना चाहिए। यह एक प्रक्रिया है। करना तो है ही, सवाल यह है कि प्रक्रिया क्या होगी।
रोहित प्रकाश : आपने उस साक्षात्कार में यह भी कहा है कि भूमंडलीकरण और उपनिवेशीकरण अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। क्या भूमंडलीकरण के द्वारा दूसरे किस्म का प्रभुत्व बड़े और विकसित देश स्थापित नहीं कर रहे हैं?
विपिन चंद्र : दोनों बिल्कुल अलग प्रक्रियाएं हैं। यह भूमंडलीकरण नहीं है। विदेशी पूंजी का कुछ उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कुछ खास उद्देश्यों के लिए। दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय कंपनियां अन्य उद्देश्यों के लिए भी हो सकती हैं। इनके प्रभावों पर चर्चा होनी चाहिए। वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हम कैसे बनने जा रहे हैं, आंतरिक स्थितियों में क्या परिवर्तन होने जा रहे है-इन सब पर चर्चा होनी चाहिए।


रोहित प्रकाश : क्या परिधि से केंद्र बनने की प्रक्रिया बाह्य या आंतरिक शोषण पर आधरित है? दूसरे देशों को अधीनस्थ करना भी इसमें शामिल है?

विपिन चंद्र : यह विश्वव्यवस्था है; मैं इससे सहमत नहीं हूं कि केंद्र होगा, परिधि होगी। यदि, हम केंद्र की ओर बढ़ते हैं तो इससे मेरा अर्थ यह है कि हम विकास की ओर बढ़ते हैं, लेकिन आपको इसके लिए किसी और स्वतंत्र अर्थव्यवस्था को अधीनस्थ करने की जरूरत नहीं है। बल्कि मैं पूर्णत: इस सिद्धांत से सहमत नहीं हूं कि एक केंद्र और दूसरी परिधि होगी। ऐसे में यदि एक देश केंद्र में जायेगा तो किसी अन्य देश को परिधि पर जाना होगा तो मैं यह सवाल करता हूं कि चीन और भारत यदि केंद्र के देश हो जायेंगे तो परिधि पर कौन देश होंगे। परिधि बहुत छोटी हो जायेगी (हंसते हुए), अगर अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी आदि देशों को भी ले लें तो परिधि बहुत छोटी होगी। इसलिए मैं इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता कि केंद्र और परिधि में हमेशा संतुलन रहेगा। केंद्र में दो देश नये आयेंगे तो केंद्र के दो पुराने देश परिधि पर पहुंच जायेंगे, मैं इसे स्वीकार नहीं करता। मेरा अर्थ यह था जो बहुत आसान और सीधा है कि हमें विकास के लिए प्रयास करने चाहिए। हमें आधुनिक अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए प्रयास करने चाहिए। आंतरिक तौर पर जो होता है वह हमारी सामाजिक व्यवस्था है, कैसे वह व्यवस्था बचे हुए वैश्विक समूह के साथ जूझती है, ये देखना चाहिए। देखिये, कई बार लोग भूमंडलीकरण का उपयोग एक किस्म के कूट शब्द के रूप में साम्राज्यवाद की जगह करते हैं, यह सही इस्तेमाल नहीं है। हम एक उपनिवेश या नवउपनिवेश या अर्थ-उपनिवेश नहीं बनने जा रहे। लेकिन वे इस मुद्दे से इस तरह इसलिए जूझते हैं क्योंकि वे चर्चा से बचते हैं। यदि हम ऑटोमोबाईल उद्योग का विकास कर रहे हैं तो क्या हम उपनिवेश बन रहे हैं? अगर हम मोटरगाड़ियों या पुर्जों का निर्यात कर रहे हैं तो कैसे हम उपनिवेश बन जायेंगे। अगर जनहित में नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि आप उपनिवेश बन जाने या किसी के द्वारा अधीनस्थ होने को मजबूर हैं, और आप स्वतंत्र नहीं रह सकते। अमेरिका की अर्थनीति जनहित में नहीं है तो क्या यह उपनिवेश है? आप बिना अधीनस्थ हुए या बिना किसी को अधीनस्थ किये पूंजीवाद का विकास कर सकते हैं। लेकिन पूंजीवादी विकास का मतलब असमान विकास होता है। यह लोगों को गरीब-अमीर और मध्यवर्ग में बांटता है। यह भूमंडलीकरण का हिस्सा नहीं है, बल्कि पूंजीवादी विकास का हिस्सा है, इसलिए मैं कह रहा हूं कि पूंजीवाद का विरोध करना चाहिए, भूमंडलीकरण का नहीं। उदाहरण के लिए चीन ने हमसे अधिक करोड़पतियों को पैदा किया है। हमारी तुलना में उनके उच्च-मध्यम वर्ग की संख्या दुगुनी है। चीनी यात्री, जो विदेशों का भ्रमण कर रहे हैं, भारतीय यात्रियों से दस गुणा ज्यादा हैं । फिर भी चीन में बड़े पैमाने पर असमानता है। लेकिन चीन एक उपनिवेश नहीं है, न ही अर्थ-उपनिवेश। सी.पी.आई, सी.पी.एम, नक्सलवादी या अन्य वामपंथी कोई यह नहीं कहते हैं कि चीन एक उपनिवेश है। चीन ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका और स्वीडन की तुलना में ज्यादा असमानता पर आधारित समाज है। आंतरिक तौर पर क्या होता है यह एक दूसरा प्रश्न है। चीन भूमंडलीकृत दुनिया का हिस्सा है, और कतई उपनिवेश नहीं है। हमें यह चर्चा करनी चाहिए कि क्या हम पूंजीवाद चाहते हैं? क्या हम इस तरह का पूंजीवाद चाहते हैं? लेकिन, आप भूमंडलीकरण के विरोध के नाम पर पूंजीवाद का विरोध नहीं कर सकते। पूंजीवाद का विरोध करना चाहिए, मुझे भी यह असमानता पसंद नहीं है, मैं भी इसका विरोध करना चाहूंगा जो कुछ भी हो इसमें बुरा है।


रोहित प्रकाश : इन दिनों यू.पी.ए. के शासन में भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रियाएं जारी हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां इसे समर्थन दे रही हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीतिक कार्यनीतिक लाइन से आप सहमत हैं?

विपिन चंद्र : मैं समझता हूं कि सांप्रदायिकता हमारे लिए एक बड़ा खतरा बन गई थी और उस सरकार को हटाकर नया शासन लाना जरूरी था।

रोहित प्रकाश : वर्ष २००७ भगत सिंह का जन्म शताब्दी वर्ष है। आप भगत सिंह पर काम कर रहे हैं। उनके बारे में आपकी क्या राय है?

विपिन चंद्र : मैं भगत सिंह को हिन्दुस्तान के सर्वश्रेष्ठ क्रियाशील और मार्क्सवादी विचारकों में से एक मानता हूं। वे प्रत्येक समस्या के साथ जूझते थे। उनमें एक विकासक्रम था। प्रत्येक ६ महीने मंे वे एक नये रूप में, नये विचारों के साथ सामने आते थे, वे भारतीय यथार्थ का अध्ययन करने में सक्षम थे। मैं उन्हें सर्वश्रेष्ठ विचारक एक विकासशील विचारक के अर्थ में कहता हूं। मैं नहीं समझता कि वह पूर्णत: विकसित विचारक थे और मैं यह भी नहीं कहूंगा कि जो उन्होंने कहा वह सब ठीक है, क्योंकि वह मात्र २३ वर्ष के युवा थे। वह विकास कर रहे थे, अगर आप लेनिन के १८९१-९२ के लेखन को पढें तो आज उस क्रियाशीलता को देख सकते हैं, मगर यह नहीं कह सकते कि वह महान मार्क्सवादी होगा ही। वैसे ही माओ के शुरूआती लेखन में भी देख सकते हैं । लेकिन यह कहना मुश्किल है कि १९२० के आसपास का माओ एक महान विचारक था। आप उनके अध्ययन के क्रम में यह कह सकते हैं कि यह आदमी है जो चीन का महान नेता बनने में सक्षम है। वैसे ही युवा ट्राटस्की में विकसित होने की तमाम संभावनाएं मौजूद थीं। इसलिए खासतौर पर भगत सिंह जिस तरह उपलब्धियां हासिल कर रहे थे और हर मुद्दे को समझने का प्रयत्न किया, यह नहीं कहा कि मार्क्स ने कहा है तो मान लो, मैं उनका सम्मान करता हूं, और समझता हूं कि उनकी मृत्यु आधुनिक भारत की बहुत बड़ी त्रासदी है।

रोहित प्रकाश : गांधी और भगत सिंह के अंतर्विरोध के बारे में आप क्या समझते हैं?

विपिन चंद्र : उन दोनों में बहुत अंतर था। गांधी ने वर्गीय दृष्टिकोण से चीजों को नहीं देखा जबकि भगत सिंह के पास वर्गीय दृष्टिकोण था। दूसरी तरफ भगत सिंह ने वर्गीय क्रांति को प्रधानता दी। मगर गांधी को लगा कि हमारा समाज दूसरों से अलग है इसलिए रास्ता भी अलग ही होगा। पहले बिंदु पर मैं भगत सिंह से सहमत हूं और दूसरे पर गांधी से। गांधी के विचार इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट हैं। आप स्थितियों के बीच का संघर्ष ( War of position) नहीं चला सकते, ऐसा सिर्फ लोकतंत्र में संभव है। ग्राम्शी ने जो अध्ययन किया वह हमने भी किया है कि क्यों किसी लोकतांत्रिक समाज में मार्क्सवादी क्रांति नहीं हुई। उन्होंने अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि लोकतंत्र में वार ऑफ पोजिशन जरूरी है न कि वार ऑफ मुवमेंट। रूसी क्रांति सिर्फ रूस में ही हो सकती थी, चीन की क्रांति सिर्फ चीन में, भारत पूर्णत: एक अलग देश है।

खासतौर पर अब यह एक लोकतांत्रिक समाज है एवं चीन की हम कभी पड़ताल नहीं करते कि भारत में क्रांति का चरित्र क्या होगा। हम इस सवाल को पूछते भी नहीं। १९६४ तक सी.पी.आई. और उसके बाद सी.पी.एम सश संघर्ष का पक्ष नहीं लेती, लेकिन वे कोई अन्य रास्ता भी नहीं चुनते कि कैसे और किस तरह बढ़ा जाये। यूरोप के सभी देशों में आंदोलन विफल रहा। हमें इससे सबक सीखना चाहिए कि उन्होंने रूसी क्रांति को दोहराने की कोशिश की। मैं नेपाल के बारे में ज्यादा नहीं जानता, लेकिन क्या माओ की चीनी क्रांति को कहीं और दोहरया जा सकता है। चेग्वारा ने भी सोचा था कि क्यूबा को बोलिविया और निकारागुआ में दोहराया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, अब वे देश दूसरी तरफ मुड़ रहे हैं।

रोहित प्रकाश : नेपाल से कोई आशा बनती है?

विपिन चंद्र : शासन को उखाड़ फेंका गया यह तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन मैं इन लोगों को बहुत बेहतर ढंग से नहीं जानता।

रोहित प्रकाश : आपने १९९० में एक लेख लिखा था 'आरक्षण और आर्थिक विकास` जो 'एशेज ऑन कन्टेमप्रोरी इंडिया` शीर्षक किताब में संकलित है। उसमें आपने लिखा था कि 'आरक्षणवादी और आरक्षणविरोधी दोनों यह भूल रहे हैं कि वर्तमान परिवेश में आरक्षण से भारतीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकालीन और दूरगामी नुकसान होगा`। आज लगभग १५ सालों बाद फिर से आरक्षण पर विवाद हो रहा है। मंडल दो के नाम से। इस पर बहुत बहसें भी हो रही हैं और पक्ष एवं विरोध में आंदोलन भी हो रहे हैं। आपके उस वक्त के दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन आया है?
विपिन चंद्र : मैंने उस वक्त विरोध किया था और आज भी विरोध करता हूं। मैं आरक्षण के समर्थन में नहीं हूं। मेरे ख्याल से यह आर्थिक विकास के लिए ठीक नहीं है। लेकिन यदि आरक्षण होता है तो क्रीमीलेयर को उससे बाहर नहीं रखा जाये। इस बार भी मेरा तर्क विकास से संबंधित है। अगर आप क्रीमीलेयर को बाहर रखते हैं तो किसे नियुक्त करेंगे, अशिक्षितों को या अर्धशिक्षितों को। यह और नुकसानदायक है। अगर आरक्षण हो तो उसमें क्रीमीलेयर को शामिल किया जाये। वे आरक्षण के द्वारा योग्यता प्रदर्शित कर सकते हैं और विकास में मदद भी कर सकते हैं। बहस बड़ी लंबी हो जायेगी।

रोहित प्रकाश : उस समय कम्यूनिस्ट पार्टियां आरक्षण का विरोध कर रहीं थी और आज समर्थन कर रही हैं..

विपिन चंद्र : हो सकता है वे सही हों। उन्होंने पुर्नविचार किया है लेकिन मैंने कोई पुर्नविचार नहीं किया है। मैं जाति को स्वीकार नहीं करता हूं। मैं समझता हूं कि यह हमारे समाज की सबसे बड़ी कमजोरी है। हमें जाति व्यवस्था का विरोध करना चाहिए और इसका संरक्षण करने की बजाय उखाड़ फेंकना चाहिए।

रोहित प्रकाश : ऐसा किस माध्यम से हो सकेगा?

विपिन चंद्रा : माध्यम बहुत आसान है। हमने बहुत सारी समाजिक कुरीतियों का सफलतापूर्वक विरोध किया है और इसका भी विरोध करना चाहिए। हमें लोगों को शिक्षित करना चाहिए और बताना चाहिए कि वे जाति छोड़ दें। गांधी के पास बहुत आसान समाधान था। नाम के आगे जाति सूचक शब्द मत लगाइये, ताकि किसी को आपकी जाति पता न चले।

रोहित प्रकाश : जो लगाना चाहते है, वे किसी भी तरह लगा लेते हैं।

विपिन चंद्र : मैंने छोड़ दिया है। क्या है मेरी जाति आप अंदाजा लगाईये। जब मैंने विरोध किया तो दक्षिण में कुछ लोगों ने कहा कि मैं ब्राह्मण हूं इसलिए डिफेंड कर रहा हूं। मैं ब्राह्मण तो हूं नहीं। मेरी जाति का आप अंदाजा नहीं लगा सकते।

रोहित प्रकाश : जाति के बारे में वर्गीय दृष्टि से सोचना आपको सही लगता है?

विपिन चंद्र : देखिये, मार्क्सवादी यह समझने में विफल रहे कि जाति वर्ग नहीं है। लेकिन दोनों में संबंध है। जाति को प्रमुखता देकर वह वर्ग की उपेक्षा कर रहे हैं, पहले जाति की उपेक्षा कर रहे थे। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। बुद्धिजीवी और कार्यकर्ताओं के आगे कई सामाजिक मुद्दे हैं जिससे उन्हें जूझना चाहिए। मैं कोई गुरू नहीं हूं। मेरे पास समाधान नहीं है। मेरे पास यही जवाब है। जिसमें मुझे विश्वास है कि आपको जाति को उखाड़ फेंकना है और इस व्यवस्था को भी। अगर यह व्यवस्था बनी रहती है तो आरक्षण कोई मदद करने नहीं जा रहा।

रोहित प्रकाश : १८५७ के विद्रोह के डेढ़ सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसे इतिहासकारों और विचारकों ने विभिन्न रूपों में परिभाषित करने की कोशिश की है। आज डेढ़ सौ वर्षों बाद आप इसकी महत्ता को किस रूप में देखते हैं?

विपिन चंद्र : मेरे हिसाब से १८५७ की सार्थकता इसमें निहित प्रेरणा है कि हमारे देशवासियों ने हमेशा अपने इस देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी है। १८५७ के पहले भी जब-जब अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान के किसी हिस्से पर कब्जा किया तो वहां जबर्दस्त विद्रोह हुए। यह बात ध्यान रखने योग्य है कि उन्होंने हिन्दुस्तान को एक बार में या एक समय में नहीं जीता था। सबसे पहले उन्होंने बंगाल लिया फिर दक्षिण भारत और उसके बाद पश्चिम भारत, सबसे अंत में उन्होंने मध्य भारत पर अधिकार प्राप्त किया। ऐसे आहिस्ता-आहिस्ता करके उन्होंने जहां-जहां कब्जा किया, कुछ सालों के अंदर ही वहां विद्रोह पनप उठे। इन विद्रोहों में किसान शामिल थे, जमींदार थे, कई जागीरें थी जिन्हें बेदखल कर दिया गया था, वह भी थे। जैसे बंगाल में १७५६ के बाद अंग्रेजी राज बढ़ा तो १७७० से संन्यासी विद्रोह हुए जो अगले २५ सालों तक चलते रहे। जिसका जिक्र वंकिम ने अपने उपन्यास में किया है। उस उपन्यास के पहले संस्करण में संन्यासी विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ ही थे। वैसे ही जब आगरा जीता गया तो वहां भी बगावत हुई, तमिलनाडु में, केरला में, सारे हिन्दुस्तान में। चूंकि उत्तरी भारत जो अवध है। नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस जिसे हम यू.पी. कहते हैं और बिहार के कुछ हिस्से १८२० के बाद कब्जे में आये और खासकर कब्जा जब खुले रूप में प्रकट हो गया तो भयंकर विद्रोह हुए, क्योंकि कई रजवाड़े जो थे वह अंग्रेजों के कब्जे में थे और नाम के लिए हिन्दुस्तानी बने रहते थे। तो सबसे बड़ी रिवोल्ट मानी जाती है १८५७ की।


मैं समझता हूं कि इसकी जो सबसे बड़ी महत्ता है वह इस बात में है कि इस बगावत या विद्रोह के सफल नहीं होने के बावजूद भी हमने लड़ाई लड़ी और कभी भी विदेशी शासन को हमारी जनता ने इसलिए स्वीकार नहीं किया कि हम हार गये हैं। जबकि जबरदस्त दमन हुआ था और १८५७ से हिन्दुस्तानियों ने यह भी सीखा कि अंग्रेजों को इस ढंग़ से नहीं हराया जा सकता, नये ढ़ंग से सोचना होगा। क्योंकि अंग्रेजी शासन बाकी विदेशी शासनों की तरह नहीं था। यह मूलत: आर्थिक आधिपत्य था, उद्देश्य भी आर्थिक ही थे, राजनीतिक नहीं, तो फिर नये ढंग़ से आजादी की लड़ाई लड़ी गई और १९४७ में हम सफल हुए। दूसरी मुख्य बात यह भी कि यह हमारी आखिरी लड़ाई थी, पुराने ढंग़ की। बल्कि सौ सालों से जो लड़ाई थी उसकी चरम स्थिति थी, आखिरी कड़ी थी उस तरह के बगावत या विद्रोह की। इसके बाद जनता और इंटेलिजेंसिया ने मिलकर नये ढ़ंग से सोचना शुरू किया और पिछली लड़ाइयों से प्रेरणा लेकर १९१८ के बाद हमारी लड़ाई अहिंसक ढंग़ से गांधीजी के नेतृत्व में लड़ी गई। प्रेरणा यह नहीं थी हम बंदूक से लड़ें बल्कि यह थी कि हम लड़ें और गांव-गांव में जनता ने उन पुरानी लड़ाइयों से प्रेरणा ली। इसका सबसे बड़ा सबूत फोक सांग्स है। यह दुर्भाग्य है कि वे गीत ज्यादातर नहीं छप सके क्योंकि अंग्रेजों के खिल़ाफ़ बात करना जेल जाने के बराबर था। सुभद्रा कुमारी चौहान का गीत हिन्दुस्तान का और खासतौर पर उत्तरी भारत का हर बच्चा जानता था, हालांकि वह कहीं छपी नहीं थी, तो खूब लड़ी मर्दानी रानी झांसी, तात्या टोपे, हजरत महल, कुंवर सिंह ये सब नाम हम जब बच्चे थे तो जानते थे, तात्या टोपे पर कई किताबें भूमिगत रूप से छपती और बिकती थीं, फोक सांग्स पर तो प्रतिबंध लग ही नहीं सकता था, अब हम कोशिश कर रहे हैं उन फोक सांग्स की स्मृति की। जो सत्याग्रही लड़ते थे वो इन गीतों को भी गाते थे, इसमें कोई विरोध नहीं था कि वह सश संघर्ष था और यह अहिंसक। सवाल यह था कि लड़ाई है और अंग्रेजों के खिल़ाफ है, अंग्रेजों के अधिपत्य के खिल़ाफ है।

रोहित प्रकाश : कुछ इतिहासकार और विचारक यह मानते हैं कि १८५७ का विद्रोह उच्च जाति के हिन्दुओं का विद्रोह था। आप इससे कितना सहमत हैं?

विपिन चंद्र : यह गलत बात है। बात सिर्फ इतनी है कि अंग्रेजों की नीति के हिसाब से सिपाही ज्यादातर उच्च जाति के होते थे और १८५७ की बगावत सर्वप्रथम उन्होंने ही शुरू की। लेकिन वे अपने लिए तो नहीं लड़े। ४ लाख के करीब अंग्रेजी फौज में हिन्दुस्तानी थे। बंगाल आर्मी में आधे हिन्दुस्तानी बागी बने। (बंगाल आर्मी सिर्फ बंगालियों की नहीं थी, ज्यादातर अवध और यू.पी. के लोग थे, कुछ बिहारी भी थे)। तो उस वक्त ज्यादातर ब्राह्मण नियुक्त होते थे या दूसरी उच्च जाति के। लेकिन सवाल यह नहीं है कि यह लड़ाई उच्च जाति की थी। वे किसलिए लड़े? कोई उच्चजाति की मांग नहीं थी। रानी झांसी हो या तात्या टोपे, हजरत महल थी, मौलवी फैजाबाद के लड़े थे, कुंवर सिंह थेऱ्ये तो नेताओं के नाम हैं। आम जनता में तो किसान-मजदूर थे। छोटे कारीगर थे-सब लड़े थे, वे तो ज्यादातर पिछड़ी जाति के होते थे, मुसलमान-हिन्दू सब थे। हो सकता है कि पिछड़ी जाति के लोग कम हों उच्चजाति के ज्यादा हांे। मैंने तो कोई विश्लेषण नहीं पढ़ा है। लेकिन वे सब हिन्दुस्तान की आजादी के लिए लड़े। उन्होंने अपनी कोई मांग नहीं रखी। सिर्फ इसलिए कि महात्मा गांधी उच्चजाति के थे उनकी लड़ाई उच्चजाति की लड़ाई हो गई। कोई पिछड़ी जाति का व्यक्ति अंग्रेजों के हक में लड़ता है तो वह पिछड़ी जाति का नेता बन गया। गांधी, नेहरु, लोकमान्य तिलक उच्चजाति के लोग थे? उनकी मांग क्या थी? दादाभाई नौरोजी तो न उच्चजाति के थे न पिछड़ी जाति के। सबसे पहले आलोचक थे उपनिवेशवाद के। जब उनसे कहा गया कि इन्कम टैक्स देने वालों की संख्या चार गुणा बढ़ गई है, तुम क्यों कहते हो कि हिन्दुस्तान गरीब है। उन्होंने कहा कि मैं अमीरों की बात नहीं करता, गरीबों की बात करता हूं, उनका क्या हाल हुआ है? और दुनिया में उपनिवेशवाद की सबसे पहली आलोचना दादाभाई नौरोजी ने की। तो हम कहें कि वह पारसी था इसलिए हिन्दू-मुसलमान या पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। पिछड़ी या अगड़ी जाति का मुद्दा तब आता है जब हम मांगों को देखें। सिपाहियों ने जो बगावत की तो उन्होंने एक भी उच्च जाति की मांग नहीं रखी। मेरठ के सिपाहियों ने जब लड़ाई की शुरुआत की तो थोड़े ही दिनों के अंदर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का और बाद में अवध का खड़ा हो गया लड़ने के लिए। तो कोई मांग उन्होंने नहीं रखी अगड़ी या पिछड़ी जाति की।

रोहित प्रकाश : १८५७ पर कई किस्म के अध्ययन प्रकाशित हुए हैं। नये अध्ययन भी हो रहे हैं। रामविलास शर्मा की किताब '१८५७ की राज्यक्रांति` में इसकी विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है। अभी विलियम डालरिम्पल की किताब 'द लास्ट मुगल` काफी चर्चा में है। आप उससे परिचित ही होंगे। क्या इन अध्ययनों के आलोक में विभिन्न दृष्टिकोणों से १८५७ के विद्रोह को देखने की जरूरत आप महसूस करते हैं?


विपिन चंद्र : मेरी रूचि उस कालखंड में नहीं है। मैं गांधीजी के ऊपर काम कर रहा हूं। अभी भगत सिंह के ऊपर भी काम कर रहा हूं। नेशनल अर्काइव में सैकड़ों बंडल पड़े हैं । १८५७ के ऊपर। वैसे ही स्टेट अर्काइव में भी काफी सामग्री है। १८५७ के बारे में, फिर लोक-स्मृतियां हैं , गीत हैं। इन सबके अध्ययन की जरूरत है। इतिहास में ऐसी कोई घटना नहीं होती जिसे नये और आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत नहीं होती। ऐसा पहले भी होता रहा है। १८५७ के बाद जो किताबें लिखीं अंग्रेजों ने ही लिखीं और उनमें इसे Sepoy Mutiny कहा गया और इस बात पर जोर दिया गया कि बागियों ने क्या-क्या गलत काम किये। हालांकि ठोस शोध के ऊपर आधारित उस वक्त की किताबें हैं । जैसे विलियम के. की जो अंग्रेजों के दृष्टिकोण से ही लिखी गयी। लेकिन सामग्री और सूचना उसमें इतनी है कि उसी को नये दृष्टिकोण और एप्रोच से देखा जा सकता है। उसके बाद १८५७ पर शोध तो नहीं हुआ क्योंकि इसकी इजाजत ही नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद काफी शोध हुए। एस.बी.चौधरी ने काम किया है। दो वॉल्यूम में उनकी किताब है। पहला, Civil rebelion up to 56 और दूसरा, Civil rebelion up to ५७-५८. उन्होंने सबसे पहले बताया कि इस तरह के विद्रोह पहले भी हुए थे लेकिन सीमित क्षेत्रों में ही थे, बड़े क्षेत्र को इसने अपने घेरे में नहीं लिया। १८५७ की प्रेरणा भी वहीं से मिली।

मुझे नहीं मालूम कि रामविलास शर्मा ने ऑरिजन सोर्सेज कितनी देखी थी और मैंने उनकी किताब पढ़ी भी नहीं है। इसके ऊपर आशु मुखर्जी की थीसीस है। कुछ अप्रकाशित पीएचडी थीसीस भी हैं। रूहेलखंड में जो मध्यप्रदेश और बिहार की भूमिका पर लिखे गये हैं एरिक स्ट्रोक्स ने इस पर काम किया है। नये शोध हमारे इतिहास के छात्रों को आकर्षित नहीं कर रहे हैं। शायद इसलिए क्योंकि बंडल खोलकर काम करना पड़ेगा।

रोहित प्रकाश : हिंदी वाले इसमें काफी रूचि ले रहे हैं।

विपिन चंद्र : अच्छा है। लेकिन वे डोक्यूमेन्ट नहीं पढ़ते। रामविलास शर्मा जी का तो मैं प्रशंसक रहा हूं। मैंने उनकी किताब 'भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद` पढ़ी है लेकिन वह पूर्णत: गलत सूचनाओं पर आधारित है। क्योंकि सेकेंडरी किताबों को आधार बनाकर लिखना ठीक नहीं। टेक्स्ट-बुक लो तो ठीक है, उसमें बड़ा रिस्ट्रेन करना पड़ता है। मुझे नहीं पता कि हिंदी वाले शोध कितना कर रहे हैं। जब तक आप नेशनल अर्काइव और स्टेट अर्काइव के मेटेरियल को न पढ़े आप बेहतर इतिहास नहीं लिख सकते।

रोहित प्रकाश : आपने १८५७ के प्रमुख नेताओं की चर्चा की। रानी झांसी, कुंवर सिंह, तात्या टोपे, हजरत महल आदि। आप इनकी भूमिका और योगदान को किस रूप में देखते हैं? क्या विद्रोह इनके नेतृत्व में कुशलतापूव्रक चलाया जा सका?

विपिन चंद्र : देखिये, दिलचस्प चीज यह है कि उच्च वर्ग के जो पुराने शासक थे, बड़े जमींदार और बड़े शासक उनका भी नुकसान हुआ। किसान उठ खड़े हुए क्योंकि ईस्ट इंडिया कम्पनी ने रेवेन्यू बढ़ा दिया और कड़ाई से वसूली करने लगे। पुराने जमाने में यह था कि फसल खराब हो जाये तो माफी मिल जाती थी। अंग्रेज आधुनिक तरीके से काम कर रहे थे। वे कहते थे कि हमारा बजट वार्षिक है। हम अगर माफी देंगे तो हमारे वार्षिक बजट में नुकसान हो सकता है। हम सिपाहियों को तनख्व़ाह देते वक्त यह तो नहीं कर सकते कि ज्यादा वसूली हो तो ज्यादा लो और कम हो तो कम लो। इसके कारण किसान कष्ट झेल रहे थे और नाराज थे। हस्तशिल्पी इसलिए खड़े हुए क्योंकि हिन्दुस्तान उत्पादन-संकट झेल रहा था। अंग्रेजों ने अपने देश और उपनिवेशों में यहां के उत्पादक को प्रतिबंधित कर दिया और अपना माल मुफ्त भेजना शुरू कर दिया। जमींदार और शासक इसलिए खड़े हुए कि उनकी सत्ता जा रही थी। क्योंकि अंग्रेज न सिर्फ लैंड-रेवेन्यू बढ़ा रहा था बल्कि अवध के बड़े जमींदारों को भी हटाने की कोशिश कर रहा था। शासकों को हटाकर अपना सीधा प्रशासन थोपने की कोशिश कर रहा था। १८३० से लेकर १८५५-५६ डल्हौजी तक यह नीति अपनाई गई कि देशी रियासतों को खत्म करके उन्हें कम्पनी शासन के अधीन कर लिया जाये तो फिर जमींदारों ने भी विद्रोह में हिस्सा लिया। नाना साहेब ने इसलिए हिस्सा लिया क्योंकि उनकी पेंशन रूक गई थी। रानी झांसी इसलिए लड़ी कि जो बेटा उसने गोद लिया था उसे अंग्रेज उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार नहीं कर रहे थे, बल्कि उसने कहा कि तुम मेरे बेटे को मान लो मैं हिस्सा नहीं लूंगी। हजरत महल ने इसलिए हिस्सा लिया कि नवाबी खत्म हो गई। लेकिन दिलचस्प चीज यह है कि जब इन्होंने हिस्सा लिया तो बहुत बहादुरी से लड़े, पीछे मुड़कर नहीं देखा। रानी झांसी लड़ी तो जान दी, तात्या टोपे, नाना साहेब के आदमी थे, कुंवर सिंह थे-सब एक बार लड़े तो आखिरी दम तक लड़ते रहे। बहादुरशाह तक ने बहादुरी दिखाई जबकि राजनीति में उसकी कोई भूमिका नहीं थी।

बाद में अंग्रेजों ने इस बारे में अध्ययन और शोध किया। एक अमेरिकन स्कॉलर है टॉम्स मेडकॉफ उसकी भी एक किताब है। शायद इंडिया आफटर रिवोल्‍ट शीर्षक से। अंग्रेजों ने अपनी नीति में तीन बदलाव किये। जमींदारों से जमींदारी छीनना बंद कर दिया और जिनका लिया था उन्हें भी वापस कर दिया। जैसे कि अवध में उन्होंने यह किया कि जो लड़े थे, उन्हें तो मारा और उनसे जमींदारी ले ली, लेकिन उनके भाई-भतीजा या जो भी रिश्तेदार थे, जो लड़े नहीं थे या साथ दिया था, साथ न भी दिया तो कम से कम लड़े नहीं थे, उन्हें जमींदारी सौंप दी। अपने पास नहीं रखी, न जब्त किया। पहले तो बिना लड़े ही जब्त कर रहे थे। इसी प्रकार स्‍टेटस में इस नीति को उलट दिया। उन्होंने शासकों को नियंत्रण में रखने की नीति अपनाई। एक तिहाई हिन्दुस्तान स्‍टेटस में विभाजित था। उन्होंने देखा कि राजा-महाराजा भी लड़े हैं तो उन्होंने उन्हें खरीदना शुरू कर दिया। इनकी स्‍टेटस वापस कर दो और नई ैजंजमे किसी भी सूरत में मत लो। वे ही नेतृत्व दे सकते थे और यह सच्चाई थी कि हमारे ट्रेडिशनल सोसायटी में नेतृत्व था तो जमींदार के हाथ में होता था या राजा के। जो नई लड़ाई लड़ी गई तो इंटेलीजेंसिया सामने आया। तो उन्होंने कहा कि जमींदारी को हाथ में रखो, राजा को साथ रखो, यह नहीं कहा कि यह लड़े थे इसलिए इनको मारो। तीसरा यह था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता थी, इसका कोई प्रचार नहीं किया जाता था जैसे आज लोग करते हंै, उस समय सांप्रदायिकता नहीं थी। हिन्दुस्तान में ऐसी कोई लड़ाई नहीं लड़ी गई जिसमें एक तरफ हिन्दू हों और दूसरी तरफ मुसलमान। औरंगजेब लड़ता था शिवाजी से तो उसकी फौज में राजपूत ज्यादा होते थे। जयसिंह मुख्य कमांडर था। औरंगजेब के बाद दूसरे नंबर की हैसियत रखता था। दूसरी तरफ शिवाजी की सेना में तोप का इंचार्ज मुसलमान था। १८वीं सदी की हमारी सबसे बड़ी लड़ाई अब्दाली के खिल़ाफ़ थी। अब्दाली के साथ अवध के नवाब थे। उसने जो फौज भेजी वह नागा सिपाहियों की थी। जो बिना कवच के, नंगे बहादुरी के साथ लड़ते थे। मराठा लड़ते थे, तो उनके साथी जाट भी थे और इमादुर मुल्क वजीर भी था। मुगलों का पूरब कोर्ट भी उनके साथ था। हिन्दू-मुस्लिम की कोई लड़ाई नहीं थी। मध्यकालीन पीरियड पर लिखी गयी किताबों में यह बताया गया कि हम विधर्मियों या दूसरे धर्म के लोगों के ख्ा़िलाफ़ बहुत बहादुरी से लड़े तो उन किताबों को आधार बनाकर अंग्रेजों ने लिखा कि वे लड़ाईयां हिन्दू-मुस्लिम के बीच थी। हम यह देखते हैं कि औरंगजेब की तरफ से राजपूत लड़ रहे हैं और उसके दुश्मन दक्कन के मुसलमान हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता जान-बूझकर थोपी नहीं गई थी। यह हिन्दुस्तान की संस्कृति और राजनीति का हिस्सा था। लेकिन अंग्रेजों ने देखा कि इसमें बड़ा खतरा पैदा हुआ। इसकी उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी। तब उन्होंने बांटो और राज करो की नीति जोर-शोर से शुरू की। १८५८ के बाद उन्होंने कहना शुरू किया कि हम हिन्दुओं के पक्षधर हैं और दुबारा बगावत हुई और बहादुरशाह हजरत महल जैसे शासक जीते तो मुसलमानों का शासन होगा। उन्होंने हिन्दुओं को डराया जैसे कभी औरंगजेब ने किया था। १८७८ के बाद उन्होंने जब नये आंदोलन देखे जो इंटेलिजेंसिया के हाथ में थी जो पारसी थे, हिन्दू थे, मुसलमान कम थे तो फिर उन्होंने कहा कि वोट हुआ तो मुसलमान मारे जायेंगे, बल्कि १९३० के बाद उन्होंने यहां तक कहना शुरू किया कि आंदोलन उच्च जाति के लोगों के हाथ में है और अगर यह जीत गये तो ब्राह्मणों का राज होगा, उच्चजाति का राज होगा। हम दलितों के पक्षधर हैं इसलिए हमारा राज यहां रहना चाहिए। १८५८ से १८७८ के बीच यह कहा कि हम हिन्दुओं को बचा रहे हैं मुस्लिम डोमिनेशन से और १८७८ के बाद यह कहना शुरू किया कि हम मुसलमानों को बचा रहे हैं हिन्दू डोमिनेशन से।

रोहित प्रकाश : आप इससे कितना सहमत हैं कि १८५७ के विद्रोह में पुनरूत्थानवादी ताकतें सक्रिय हो उठीं और बंगाल और मराठी क्षेत्रों में हो रहे पुनर्जागरण का विस्तार हिन्दी प्रदेशों में नहीं हो सका या बाधित हुआ?

विपिन चंद्र : बिल्कुल गलत है। आप देखेंगे कि पुनर्जागरण की ताकतें १९२० और १९४०-४२ के बीच सबसे ज्यादा मजबूत कहां थी? हिंदी पट्टी में आप उस पीरियड के साप्ताहिक देखिये, आप हैरान होंगे कि १९२०-३२ के जर्नल में यह छपता था कि नौजवान मुवमेंट रोमानिया में क्या है, किसान आंदोलन हंगरी में कैसा चल रहा है। हिन्दी पत्रकारिता जो पैदा हुई १८७०-८० के बाद वह पुनर्जागरण में बंगाल और महाराष्ट्र से पीछे नहीं था, यह कहना कि पुनरूत्थानवादी ताकतें इससे बढ़ी, यह बिल्कुल गलत बात है। बल्कि दूसरा पहलू अलग है। जिसे लोग कहते हैं कि उस वक्त के इंटेलिजेंसिया ने १८५७ का समर्थन नहीं किया। उनका विचार था कि इससे पुनरूत्थानवादी ताकतें बढ़ेंगी, अगर १८५७ वाले जीत गये और पुनर्जागरण बाधित होगा। १८५५-५६ का जो नया इंटेलिजोंसिया था। वह समझता था कि अंग्रेजों के रहने से पुनर्जागरण की शक्तियां मजबूत होंगी। वे रूसो, बाल्तेयर, जॉन स्टुअर्ट मिल को पढ़ते थे। उनका ख्याल था कि अंग्रेजों की वजह से नई अर्थव्यवस्था आयेगी और नये विचार आयेंगे और विद्रोह सफल हो गया तो उल्टा होगा। वह यह भूल गये कि उपनिवेशवाद पुनर्जागरण की ताकतों के हक में नहीं है। वह न आर्थिक विकास करेगा न ही आधुनिक विचारों का प्रसार करेगा। १८५८ के बाद अंग्रेजों ने यह कहना शुरू किया कि हिन्दुस्तान में आधुनिक उद्योग लग ही नहीं सकते। इसके पहले कहा करते थे कि हम हिन्दुस्तान में डेमोक्रेसी लायेंगे, फ्री-प्रेस लायेंगे जिससे हमारा इंटेलिजेंसिया प्रभावित हुआ था। लेकिन फिर इंटेलिजेंसिया ने भी आलोचनात्मक अध्ययन करना शुरू किया। दादाभाई नौरोजी १८६०-६२ तक समझते थे कि अंग्रेज उन्नत हैं और ईस्ट इंडिया कम्पनी के उपनिवेश के रूप में आधुनिक अर्थव्यवस्था और विचारों से हम भी लाभान्वित होंगे। लेकिन १८७० के बाद उन्होंने उल्टा लिखना शुरू किया। इस बीच यह भी हमारे इंटेलिजेंसिया ने महसूस किया कि उपनिवेशवाद सामंती शक्तियों को मजबूत कर रहा है। देसी रियासत खत्म हो रहे थे और भारत राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर एक देश बनता जा रहा था। अंग्रेज फिर राजाओं के शासन को वापस ला रहे थे, एक तिहाई हिन्दुस्तान स्थायी तौर पर ैजंजमे में बंट गया। उन्हें समय नहीं लगा समझने में कि हिन्दुस्तान का एकीकरण कम हो रहा है बल्कि हिन्दू-मुस्लिम टकराव बढ़े, भाषायी और जातीय टकराव भी बढ़े, इसलिए जो नया इंटेलिजेंसिया था उसने उपनिवेशवाद का विरोध करना शुरू किया खासतौर पर आर्थिक मामलों में। उनका पहले ख्याल था कि इंग्लैंड अकेला आधुनिक देश है जहां आधुनिक उद्योग हंै, उस समय न अमेरिका में था न फ्रांस में। तो उन्होंने सोचा कि इनके सन्निध्य में आ गये हैं तो नम्बर दो हम हो जायेंगे। वे नई मशीनरी लायेंगे, उद्योग लायेंगे और अंग्रेज कहते भी थे, विलियम बेंटिक से लेकर डल्हौजी तक यही कहते थेऱ्यह करेंगे, वह करेंगे। लेकिन उन्होंने देखा कि अंग्रेज पुराने उद्योगों को भी खत्म कर रहे हैं और नये उद्योग पनपने नहीं दे रहे हैं। इसलिए हमारा आधुनिक इंटेलिजेंसिया पुनर्जागरण के हक में नही था। अंग्रेजों ने सामंती शक्तियों, मौलवियों, पंडितों को प्रोत्साहित करना शुरू किया। अवार्ड देने की स्कीम चलाई, रायबहादुर, राय साहब बांटने लगे, पंडितों के लिए भी रखा और मौलवियों के लिए भी। फिर उन्होंने आधिकारिक रूप से कहना शुरू किया कि हिन्दुस्तान का इतिहास ऐसा है वह डेमोक्रेटिक हो ही नहीं सकता, हमेशा उन्हें शासन चाहिए, Despot चाहिए । लेकिन वह उदार होना चाहिए। हम उदार हैं हम अशोक हैं, अकबर हैं, हम औरंगजेब नहीं हैं। यह लोकतंत्र के खिलाफ था, आधुनिक शिक्षा न फैले और बहाना यह बनाया कि प्राईमरी शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देने के उद्देश्य से ऐसा किया जा रहा है। लेकिन वह भी नहीं हो सका। दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं था। राष्ट्रवादियों ने कितनी बार कहा कि यदि आप प्राइमरी शिक्षा फैलाना चाहते हैं तो जितनी संख्या में स्कूल शिक्षक आपको चाहिए वे कहां से आयेंगे। हाइयर एडुकेशन और प्राइमरी एडुकेशन में कोई अंतर्विरोध नहीं है, दोनों फैलने चाहिए। प्राइमरी शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। गोखले ने १९१२ में बिल रखा। वे विश्वविद्यालय के हक में थे। अब भी कई लोग कहते हैं कि विश्वविद्यालयी शिक्षा में रुपये ज्यादा लगते हैं। सच तो यह है कि प्राईमरी शिक्षा के प्रसार के चक्कर में उच्च शिक्षा की उपेक्षा के कारण विश्वविद्यालय बर्बाद हो रहे हैं। कोई आदमी नहीं मिल रहा है विज्ञान-टेक्नालॉजी, इंजिनियरिंग-मेडिसीन में। सच तो यह भी है कि उस पीरियड में इंटेलिजेंसिया ने अपनी गलती को बहुत जल्दी महसूस किया कि ईस्ट इंडिया कम्पनी हमारी मदद के लिए आई है। असली पुनर्जागरण १८५८ के बाद आया जब ये मध्यवर्ग और निम्न-मध्य वर्ग तक पहुंचा। उसके बाद सैंकड़ों लोगों ने बी.ए. पास किया। नौकरियां छोड़कर हिंदी पत्रकारिता शुरू की। उर्दू पत्रकारिता में गये। कुछ लोगों ने राजनीति में भाग लिया। उस समय पत्रकारिता बहुत उन्नत क्षेत्र नहीं था। घोष ब्रदर्स ने साढ़े तीन रूपये में भूखों मर के अपनी पत्रिका शुरू की। यह कौन कहता है कि पुनर्रूत्थानवादी ताकतें बढ़ीं? कहां बढ़ीं? सब जगह पुनर्जागरण की ताकतें मजबूत हुइंर्। महराष्ट्र में भी, पंजाब में भी। दयाल सिंह ने 'ट्रिब्यून` शुरू किया। कॉलेज खोले। १८५७ में सामंती ताकतें नेतृत्व में थी। लेकिन वे लड़े इसलिए कि उनकी स्टेट जा रही थी। राज जा रहा था। सिपाही और किसान इसलिए लड़ा कि भू राजस्व बढ़ा दिया गया था। हस्तशिल्पी लड़े क्योंकि हस्तकला उद्योग चौपट हो रहा था। इस आंदोलन में कई किस्म की ताकतें इकट्ठे मिलकर लड़ी। इस आंदोलन ने चेतना का विस्तार किया और सबने महसूस किया कि यह रास्ता अब नहीं चलेगा। क्योंकि अंग्रेजों ने जमींदारों और राजाओं को खरीद लिया था। उन्हें ऐश करते रहने की छूट दी और जमींदारों से जमींदारी न छीनने का वादा किया। पहले जो छीनी गयी थी उसे भी वापस कर दिया गया। इसलिए जो नये आंदोलन हुए वह इंटेलिजेंसिया के नेतृत्व में लड़े गये।

ज्ञानेंद्रपति की चार कविताएं

( हिन्‍दी के प्रतिनिधि कवि ज्ञानेन्द्रपति को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है। जन विकल्प की ओर से बधाई! झारखंड के एक गांव में जन्मे ज्ञानेन्द्रपति के अब तक ५ कविता संग्रह 'आंख हाथ बनाते हुए` (१९७०), 'शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है` (१९८०), 'गंगातट` (२०००), 'संशयात्मा` (२००४) और 'भिनसार` (२००६) प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने अपनी काव्य-भाषा के निर्माण के क्रम में हिन्दी की बोलियों और तत्सम के मेल से कई नए शब्द खड़ी हिन्दी को दिए हैं। सामयिक विषयों को कविता का कथ्य बनाते हुए, उसकी तह तक पहुंचना उनकी कविता की विलक्षण विशेषता है। उनकी चार कविताएं (चयन : विनय कुमार, संपादक, समकालीन कविता) प्रकाशित की जा रही हैं। अगले अंक में आप ज्ञानेन्द्रपति का साक्षात्कार पढ़ेगें। - सं.)


चार कविताएं

  • ज्ञानेन्द्रपति


अकाट्य सिर


मेरे कटे हुए सिर का
यदि बनता पेपरवेट
नयनाभिराम
तो वे बहुत खुश होते
रखते मुझे सदा अपनी आंखों के सामने ही
कुलीन शालीन
प्रतिभा के, सौन्दर्य के, गरज़ हर अच्छी चीज के
पारखी वे
लेकिन
यह मेरा सिर
बेहूदा है
किसी जंगली पक्षी के घोंसले जैसा
लेकिन चलो!
उसका एक मुखोश ही बन जाएगा
अफ्रीका और बस्तर के आदिवासी मुखोशों के बीच
दीवार खाली है
उनके ड्राइंगरूम की

मुश्किल यह है/कि यह सिर है या खुराफात!
कभी बन्द न होने वाला एक कारखाना
कविताओं की आधी-अधूरी फैलती-सिकुड़ती
पंक्तियों से भरा हुआ
अपांक्तेय अनुभवों की पंक्तिशेष स्मृतियों से
जिज्ञासाओं से अभीप्साओं से विकल
कवि-माथ!
चाक पर घूमती
अत्यन्त हल्के हाथों सूत से कट जानेवाली
गरदन नहीं है यह
गीली मिट्टी नहीं, पकी हुई इंर्ट है
अकाट्य है त्याज्य है
फेंको इसे दूर घूरे पर
चुपचाप
सिवान पर बढ़ाओ चौकसी
बस्ती में गश्त रात-दिन
हर दिशा में हमेशा ताने हुए बन्दूकें
उपद्रवियों के खिलाफ!



गमछे की गंध


चोर का गमछा
छूट गया
जहां से बक्सा उठाया था उसने,
वहीं-एक चौकोर शून्य के पास
गेंडुरियाया-सा पड़ा चोर का गमछा
जो उसके मुंह ढंकने के आता काम
कि असूर्यम्पश्या वधुएं जब, उचित ही, गुम हो गई हैं इतिहास में
चोरों ने बमुश्किल बचा रखी है मर्यादा
अपनी ताड़ती निगाह नीची किए

देखते, आंखों को मैलानेवाले
उस गर्दखोरे अंगोछे में
गन्ध है उसके जिस्म की
जिसे सूंघ/पुलिस के सुंघिनिया कुत्ते
शायद उसे ढूंढ निकालें
दसियों की भीड़ में
हमें तो
उसमें बस एक कामगार के पसीने की गन्ध मिलती है
खटमिट्ठी
हम तो उसे सूंघ/केवल एक भूख को
बेसंभाल भूख को
ढूंढ़ निकाल सकते हैं
दसियों की भीड़ में


मानव बम

सुतली-बम से लेकर
ट्रांजिस्टर बम तक
कितनी तरह के बम फटे थे
मानव-बमों के फटने से पहले
जनसभाओं में जनपथों पर

सुतली बम के लिए देह-भर सुतली
मिल सकती थी किसी किराने की दुकान पर
कुण्डली बांधे लटकती कोने में, दंश-दृढ़
ट्रांजिस्टर बम के लिए
खोल-भर ट्रांजिस्टर मिल सकता था
चावड़ी मार्केट में या ठठेरी बाजार में थोक-का-थोक
और गुड़िया-बमों के लिए प्लास्टिक की गुड़ियाएं
चाहे जितनी
किसी भी खिलौनों की दुकान पर

मानव-बम के लिए
जिस मां-कोख ने जाया है
कांेपल-कोमल शिशु-तन
उसने तो बिकाऊ नहीं ठहराया है उसे
कितने भी ऊंचे दामों

किस मां-गली से खरीद लाए हैं वे
बम का खोल बनाने मानव-तन कि मानव-मन
भावनाओं की अनगिन उमगती कोंपलोंवाला
सद्य:प्रस्फुटित किसी विचार से महमहाता
मानव-मन
विकासी प्रकृति का परम
वर्द्धमान जीवन का चरम
मानव-मन
जिसकी ब्रेन-वाशिंग कर
बहुविध उपायों से
कभी किसी पवित्र पृथुल ग्रन्थ के हवाले से
कभी किसी गोपनीय गुटका किताब के बल पर
कभी किसी महान उद्देश्य की बारूद भर
कभी..ओह! इस या उस तरह
बनाए जा रहे हैं मानव बम
तैयार किए जा रहे हैं सुसाइड-स्क्वैड-आत्मघाती दस्ते
किन्ही सत्तालोलुप सेनानायकों के हित

और असीसती माएं कलपती रह जाती हैं
उसके लिए जो उनका ही पसार था
कि जिसके पंख अभी पसरे ही थे आकाश में


आवो, चलें हम


आवो, चलें हम
साथ दो कदम
हमकदम हों
दो ही कदम चाहे
दुनिया की कदमताल से छिटक

हाथ कहां लगते हैं मित्रों के हाथ
घड़ी-दो घड़ी को
घड़ीदार हाथ-जिनकी कलाई की नाड़ी से तेज
धड़कती है घड़ी
वक्त के जख्म़ से लहू रिसता ही रहता है लगातार

कहां चलते हैं हम कदम-दो कदम
उंगलियों में फंसा उंगलियां
उंगलियों में फंसी है डोर
सूत्रधार की नहीं
कठपुतलियों की
हथेलियों में फंसी है
एक बेलन
जिन्दगी को लोई की तरह बेलकर
रोटी बनाती

किनकी अबुझ क्षुधाएं
उदरम्भरि हमारी जिन्दगियां
भसम कर रही हैं
बेमकसद बनाए दे रही हैं
खास मकसद से
आवो, विचारें हम
माथ से जोड़कर माथ
दो कदम हमकदम हों हाथ से जोड़े हाथ

...और एक स्कूल का अंत हो गया



  • राजू रंजन प्रसाद


इतिहासकार विजय कुमार ठाकुर पुस्तकों की दुनिया तक सीमित रहने वाले लेखक नहीं थे वरन् विभिन्न मोर्चों एवं संगठनों के माध्यम से सक्रिय भागीदारी भी निभाते थे। छात्रों को संगठित कर उन्होंने 'इतिहास विचार मंच` की स्थापना की थी। इस मंच से प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था एवं सबाल्टर्न स्टडीज जैसे अकादमिक महत्व के विषयों पर व्याख्यान आयोजित हुए थे।



विजय कुमार ठाकुर के असामयिक निधन से बिहार के इतिहास-जगत् को जो क्षति पहुंची है उसकी भरपाई दूर-दूर तक असंभव प्रतीत होती है। खासकर पटना विश्वविद्यालय का इतिहास विभाग तो उनके बगैर वर्षों तक बेजान ही रहेगा। ऐसा लगता है मानो इतिहास विभाग से इतिहास निकाल लिया गया और विभाग शेष रह गया। वे एक प्रतिबद्ध शिक्षक, प्रतिबद्ध इतिहासकार और छात्रों के सच्चे मार्गदर्शक थे। इन सब के ऊपर वे एक बेहतर मनुष्य थे। उनके जाने से एक साथ इतने सारे पदों की रिक्ति हो गई। भविष्य का कोई अकेला आदमी इन तमाम रिक्तियों को भर सकेगा, संदेह है।

ठाकुर जी को इतिहास विरासत में प्राप्त हुआ था। सन् ५२ में इनका जन्म उपेन्द्र ठाकुर के घर हुआ जो स्वयं प्राचीन इतिहास, संस्कृत और पालि के विद्वान थे। रामकृष्ण मिशन, देवघर से मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद सायंस कॉलेज, पटना में उन्होंने दाखिला लिया। इतिहास को शायद यह मंजूर न था, फलत: बी.ए. में वे बी.एन. कॉलेज आ गये, जहां इतिहास को उन्होंने अपना विषय बनाया। इतिहास विभाग से उन्होंने ७२-७४ सत्र में एम.ए. किया और मार्च १९७५ में उसी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त हुए। इसी दौरान राधाकृष्ण चौधरी के निर्देशन में भागलपुर विश्वविद्यालय से 'अर्बनाइजेशन इन एंशिएंट इंडिया` विषय पर अपना शोधकार्य पूरा किया। इनके शोध निर्देशक बिहार में मार्क्सवादी इतिहास लेखन की पहली पीढ़ी के इतिहासकार थे।

प्रो. ठाकुर के लेखन की शुरुआत सन् ८१ में उनकी पुस्तक 'अर्बनाइजेशन इन एंशिएंट इंडिया` के प्रकाशन से मानी जा सकती है। इस पुस्तक के बाद उन्होंने भारतीय इतिहास लेखन के सबसे विवादास्पद विषय अर्थात 'सामंतवाद` को चुना और उससे जुड़ी विभिन्न धाराओं की पड़ताल प्रस्तुत करते हुए सन् ८९ में 'हिस्ट्रीयॉग्राफी ऑफ इंडियन फ्यूडलिज्म` नामक पुस्तक प्रकाशित की। सन् ९३ में सोशल डायमेंशंस ऑफ टेक्नॉलॉजी : आयरन इन अर्ली इंडिया` प्रकाश में आई। २००३ में पीपुल्स हिस्ट्री श्रृंखला के तहत इरफान हबीब के साथ 'दि वेदिक एज` पुस्तक लिखी जो वेदकालीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति को समझने के लिए एक जरूरी किताब साबित हुई। विगत वर्ष यानी सन् २००६ में 'सोशल बैकग्राउंड ऑफ बुद्धिज्म` छपकर आई जिसमें बौद्ध-धर्म से संबंधित अद्यतन जानकारियों एवं अवधारणाओं को उद्घाटित करने की कोशिश थी। आपने कुछ महत्वपूर्ण किताबों का संपादन भी किया है जिनमें 'टाउंस इन प्री माडर्न इंडिया`, 'पीजेंट्स इन इंडियन हिस्ट्री-खंड-१`, 'सायंस, टेक्नॉलॉजी एंड मेडिसीन इन इंडियन हिस्ट्री` आदि प्रमुख हैं। 'पीजेंट्स इन इंडियन हिस्ट्री` का दूसरा एवं तीसरा खंड प्रेस में है। इनके अलावे सैकड़ों शोध आलेख विभिन्न पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में प्रकाशित हैं।

विजय कुमार ठाकुर महज पुस्तकों की दुनिया तक अपने को सीमित छोड़ देने वाले लेखक न थे वरन् विभिन्न मोर्चों एवं संगठनों के माध्यम से सक्रिय भागीदारी भी निभाते थे। सन् ९१ में जब मैं पटना विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग का छात्र था, उन्होंने अपने संरक्षण में विभाग के अन्य छात्रों को संगठित कर 'इतिहास विचार मंच` की स्थापना की थी। इस मंच की स्थापना में मेरे सहपाठी श्री अशोक कुमार का भी अपूर्व योगदान था। इस मंच से 'प्राचीन भारत में जाति-व्यवस्था एवं 'सबाल्टर्न स्टडीज` जैसे अकादमिक महत्व के विषयों पर व्याख्यान आयोजित हुए थे।

देश में इतिहास की सबसे बड़ी संस्था 'इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस` में बिहार की भागीदारी को निर्णायक बनाने में ठाकुर जी का योगदान प्रशंसनीय रहा। यह उनके निजी प्रयास व नेतृत्व-कौशल का नतीजा था कि बिहार से सैकड़ों इतिहासकार (विशेषकर युवा) हिस्ट्री कांग्रेस में अपनी उपस्थिति दर्ज कर पाते थे। ठाकुर जी १९७५ से इसके सक्रिय सदस्य थे। वे कार्यकारिणी सदस्य भी थे। सन् ९२-९५ के बीच वे संयुक्त सचिव रहे। सन् १९९७ में, अर्थात् बंगलोर अधिवेशन (५८वें) में प्रभागाध्यक्ष (सेक्शनल प्रेसीडेंट) रह चुके थे। सन् २००४ में वे आगामी तीन वर्षों के लिए जेनरल सेक्रेटरी चुने गये किंतु खराब स्वास्थ के कारण नवम्बर,२००५ में उन्होंने इस्तीफा दे डाला। इसके अतिरिक्त वे आंध्र इतिहास परिषद् तथा बंग इतिहास परिषद् के भी प्रभागाध्यक्ष रह चुके थे। ओरिएंटल कांफ्रेंस,२००६ (श्रीनगर) में भी वे प्राचीन भारत के प्रभागाध्यक्ष हुए। इधर वे प्राध्यापक से उपकुलपति हो गये थे।

कमलेश्वर

याद



( हिन्दी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का पिछले २७ जनवरी २००७ की रात दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। ६ जनवरी १९३२ को उत्तर प्रदेश के कस्बे मैनपुरी में जन्मे और इलाहाबाद में पढ़े-लिखे कमलेश्वर ने पचास के दशक में लिखना शुरू किया और अपने आरंभिक लेखन से ही हिन्दी संसार का ध्यान आकर्षित किया। राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश के साथ नयी कहानी का आंदोलन खड़ा करने वाले कमलेश्वर ने १९७० के दशक में 'सारिका` जैसी बहुचर्चित कथा-पत्रिका का संपादन किया और युवा लेखकों के साथ मिलकर एक बार फिर एक नये कथा आंदोलन 'समांतर` को जन्म दिया। उन्होंने कहानियां और उपन्यास तो लिखे ही जमकर पत्रकारिता और फिल्म-टी.वी स्क्रीप्ट लेखन भी किया। वे हमेशा विवादों में रहे। आज जिस दलित साहित्य की हिन्दी में चर्चा है उसका परिचय कमलेश्वर ने ही हिन्दी पाठकों से कराया। १९७५-७६ में सारिका के दो विशेषांक मराठी दलित साहित्य पर प्रकाशित हुए थे। इसके द्वारा ही हिन्दी पाठकों ने मराठी के दलित लेखकों को जाना। अपनी राजनीति को लेकर भी वे खासे चर्चित रहे। पिछले दिनों प्रकाशित उनका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान` एक बार फिर चर्चित और विवादित रहा। इस पर उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड भी मिला। पद्म भूषण सहित अनेक अलंकरणों से सम्मानित कमलेश्वर पूरी जिन्दगी आम आदमी के लिए अपने लेखन के द्वारा संघर्ष करते रहे। जन विकल्प उनकी स्मृति को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। उनके साहित्यकार मित्र राजेन्द्र यादव का एक पुराना आत्मीय लेख (लगभग ३५ वर्ष पूर्व लिखा गया) हम आदर के साथ प्रकाशित कर रहे हैं। -संपादक)



  • राजेन्द्र यादव
कमलेश्वर? कमलेश्वर सच बोल ही नहीं सकता!..` दुष्यन्त बीड़ी मुंह में लगाकर बोलता है। वह जब गम्भीर होता है, तब भी कुछ-न-कुछ उछालता लगता है, इसे छिपाने के लिए ढेर-सा धुआं नाक से निकालकर कहता है, "जरा-जरा- सी बातों में और बिना वजह झूठ बोलता है। आप पूछिए, 'मद्रास होटल की तरफ से आ रहे हो?` तो जवाब देगा, 'नहीं, सिन्धिया हाउस से चला आ रहा हूं।` ..सूरत से शैतान नहीं लगता?" मैं जोर से हंस पड़ता हूं। दिल्ली में रोहतक रोड पर मैं और दुष्यन्त काफी नजदीकी फासले पर रहते थे और रोज मिलना होता था। एक दिन मैंने दुष्यन्त को समझाने की कोशिश की, 'अब तू काफी बड़ा हो गया है। जिम्मेदार पद पर है। अपने अन्दर कुछ सीरियसनेस और सोब्राइटी ला और ये बचकाना हरकतें बन्द कर। एक तो तेरी शक्ल ही ऐसी है कि गिरहकट और उठाईगीरे का गुमान हो और फिर तेरी ये करतूतें..।` दुष्यन्त ने मुस्कराकर काइयां निगाहों से मेरी ओर गौर से देखा कि मैं कितनी गम्भीरता से अपनी बात कह रहा हूं, और फिर हो-हो करके अपनी मुरादाबादी हंसी हंसने लगा। बस, तभी से उसके दिमाग में बैठ गया कि वह शक्ल से भला आदमी नहीं लगता। और कोई दूसरा यह बात न कह बैठे, इसलिए खुद दूसरों के बारे में यही कहता फिरता है। सुबह से कमलेश्वर उसका दूसरा शिकार था...
लेकिन कमलेश्वर शक्ल से शैतान नहीं, तेज और इंटेलिजेण्ट लगता है। हां, यह हो सकता है कि दुष्यन्त ने कमलेश्वर को कैदियोंवाली उस पोशाक में देखकर ऐसा कहा हो, जिसे वह गर्व से नाइट-ड्रेस बताता है, या इलाहाबाद में अश्कजी के यहां उमेश की शादी पर उसे बाकायदा साबुन और ब्रुश लेकर मेरी और राकेश की हजामत बनाते देख लिया हो। लेकिन मूलत: कमलेश्वर शैतान नहीं, दुष्टऱ्यानी मिसचीवियस-अधिक लगाता है। शीन-काफ से दुरूस्त तलफ्फुज, साफ और तराशी हुई संतुलित आवाज, बात को निहायत प्रभावशाली तरीके से कहने की कला, पतले-पतले होंठ, तीखे और फोटोजिनिक नक्श, सांवला रंग और शातिर आंखें.. लगता है जैसे आप सचमुच किसी समझदार आदमी से बातें कर रहे हैं-एक हाथ की उंगलियां खोल-खोलकर, मेज पर हाथ पटक-पटककर वह आपको घंटों किसी ऐसी किताब, फिल्म, घटना, कहानी या चीज़ के बारे में विस्तार और पूर्ण आत्म-विश्वास से बताता रहेगा, जिसे न उसने पढ़ा है, न देखा है..
इसलिए दुष्यन्त की इतनी बात सच है-कमलेश्वर अव्वल नम्बर का 'झूठा` है। मुंह से जब वह 'झूठ` बोलता है, तो एक अच्छी कम्पनी होता है और कलम से बोलता है तो सफल कहानीकार।
हर 'झूठा` और पढ़ा-लिखा आदमी कहानीकार नहीं हो सकता, वरना आज सारे-के-सारे प्रयागवासी कवि, आलोचक, कहानीकार हो गये होते और उनके व्याख्याकारों की कहानी भी आधुनिक संवेदनाओं को वहन कर सकनेवाली विधा लगने लगी होती-लेकिन हर कहानीकार को कहीं-न-कहीं 'झूठ` को साधना जरूर पड़ता है। यह न हो, तो उसकी कला और फोटोग्राफी में फर्क करना मुश्किल पड़ जाये। लेकिन कमलेश्वर ने झूठ को आदत बना लिया है। अपने एक प्रेम-सम्बंध को लेकर, पहले वह झूठ बोला करता था; आज उसे ऐसे किसी बहाने की आवश्यकता नहीं है। जाने उसके कितने भाई और चाचा हैं, जिनके अकसर एक्सीडेंट हो जाते हैं और वह अपने वादे और एपॉइण्टमेंट निभा नहीं पाता। इसके अलावा अपनी तरफ से गढ़-गढ़कर झूठ बोलना, या घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर, नमक-मिर्च लगाकर सुनाना उसकी प्रिय हॉबी है, और उसने हम सब के बारे में कुछ बहुत ही दिलचस्प चुटकुले गढ़ रखे हैं। इन्हें सुना-सुनाकर अकसर महफिलों में वह कहकहे बटोरता है और 'खिंचाई करने` का आनन्द पाता है। दर्जनों चण्डूखाने के किस्से उससे आप सुन लीजिए। इनका उद्देश्य केवल दूसरों की टांग खींचकर मजा लेना है : लेकिन जिन लोगों से उसकी लगती है, उनके किस्सों में जहरीला डंक देना भी वह जानता है।



मेरा व्यक्तिगत परिचय कमलेश्वर से उन दिनों हुआ, जब दुष्यन्त, मार्कण्डेय और कमलेश्वर का त्रिशूल, त्रिवेणी का त्रास बना हुआ था। इन तीनों में सब से छोटे कद के, साफ कुरता-पाजामा पहने, लड़के-से लगनेवाले कमलेश्वर को ही मैंने सब से अधिक जिन्दादिल वार्तालापकर्ता के रूप में पाया। आज-जैसी टेढ़ी और सी.आई.डी. इन्सपेक्टरवाली मक्कार निगाहें तब उसके पास नहीं थीं, और देखने में मासूम लगता था, लेकिन बहुत ही हाजिरजवाब, पुरमजाक, समझदार और तेज वह तब भी था। दिल्ली का एक छोटा-सा किस्सा इस सिलसिले में सुनाये बिना नहीं रहा जा रहा।

एक भूतपूर्व आलोचक और नयी कविता के शास्ता कवि को दिल्ली रेडियो ने कुछ अपेक्षाकृत अधिक नये कवियों के साथ बुक कर लिया था, इसलिए जब प्रोग्राम के बाद वह बाहर निकले, तो निहायत भन्नाये हुए थे-चेहरा उतरा हुआ और पांव लड़खड़ाये हुए..सीधे स्टेशन की सवारी लेकर इलाहाबाद का टिकट लेने को उतारू। रेडियो और गैर-रेडिया के ये लोग दुनिया-भर की टीका-टिप्पणियां करते हुए पार्लियामेंट-स्ट्रीट पर चले आ रहे थे, लेकिन कवि जी एकदम चुप। कमलेश्वर से नहीं रहा गया और निहायत ही संजीदा स्वर में बोला, 'साहब, क्या आप घंटे-भर के लिए मुझे अपना चेहरा उधार दे देंगे?` सब लोग चौंकेऱ्यह क्या मांग है? कवि ने प्रश्न-दृष्टि से देखा, गला सूखा हुआ होगा, इसलिए इशारे से ही पूछा, 'क्यों?` 'बस, सिर्फ घंटे-भर को ही चाहिए। फिर लौटा दूंगा।` अब सबने आग्रह किया, 'क्यों भाई, आखिर मकसद तो बताओ!` तो निहायत मासूम लहजे में जवाब देता है-धीरे से, 'मार खाने को मन करता है!` बात शायद बहुत चुभ जाती, लेकिन कमलेश्वर का अन्दाजेब़यां.. वे कहकहे पड़े कि क्या कहना!
हां, तो मैं कह रहा था कि निहायत यथार्थवादी हाव-भाव, प्रभावशाली मुद्रामूड, साफ-सुथरी जबान, चरम आत्मविश्वास-भरा लहजा और उसे अर्थ देने का अपना व्यक्तित्व-और सारा ठाठ एक मूलत: 'झूठी` बात के लिएऱ्यह कमलेश्वर व्यक्ति नहीं, कथाकार है। काल्पनिक कथ्य, वास्तविक लगनेवाला कथानक और घोर यथार्थवादी परिवेश.. मैं इसे उसकी कला का गुरू मानता हूं और दिल्ली की जिन्दगी पर लिखी कई कहानियों तक में इसके भग्नावशेष हैं..शायद इसे ही रोमांटिक यथार्थवाद कहते होंगे, जो कृश्नचंदर में अपने सारे दोषों और खामियों के साथ मौजूद है। मैं अपने को पाठकों के उस दल में पाता हूं, जो कमलेश्वर की जबान पर मुग्ध हैं, लेकिन इस सत्य का ज्ञान मुझे सब से पहले उसकी 'नीली झील` कहानी पढ़कर हुआ। 'नीली झील` की भाषा, उसका वातावरण, उसकी शैली की सांकेतिकता, और एन्द्रिय बोध के अनेक स्तरों को छू सकने वाली बिंबऱ्योजना सभी ने मुझे इतना आच्छान्न कर लिया कि पहली बार तो मैं चकरा गया। जब दुबारा पढ़ा, तो लगा कि और तो सब ठीक है, लेकिन मूल बात में कुछ गड़बड़ है.. फिर कुछ समय बाद तो अपने-आप साफ हो गया कि एक असंभाव्य कहानी को यथार्थवादी जामा पहना दिया गया है; यानी निहायत सुरूचिपूर्ण, शिक्षित और सुसंस्कृत सौन्दर्यबोध और संवेदनावाले शहरी नवयुवक कवि को महेस पाण्डे का शरीर दे दिया गया है। 'राजा निरबंसिया` में भी यही कमजोरी थी, लेकिन दुहरी कथा का शिल्प उसे संभाल ले गया था। जहां यह कुंजी मेरे हाथ लगी, तो पाया कि 'तीन दिन पहले की रात`, 'डाक बंगला`, 'एक सड़क सत्तावन गलियां`-सभी का रहस्य मेरे सामने खुलता चला जा रहा है..कि क्यों 'नीली झील` में पानी की छोटी-से-छोटी लहरीली सलवट और उस पर तैरता मरा पक्षी, खून की लाल धार और मुलायम घास, सभी-कुछ याद आता है-नहीं याद आते, तो महेस पाण्डे और पारबती.. कि क्यों डाक-बंगला में चीड़-वन का एक-एक पेड़, पहाड़ी पगडण्डी पर दौड़ता घोड़ा, बर्फीली सुनसान घाटी में भटके हुए लोग-सभी याद रहते हैं, नहीं याद रहती, तो खुद वह औरत, जिसके बूते पर डाक बंगले का प्रतीक गढ़ा गया है..'एक सड़क सत्तावन गलियां` का बस का अड्डा (जिसे मैं शानी के कस्तूरीबाले बस के अड्डे से कभी-कभी कनफ्यूज कर जाता हूं), वहां आती बसें, उड़ती हुई धूल, आवाजें लगाते बीड़ी पीते क्लीनर-ड्राइवर, रामलीला.. सभी दृश्य सामने आते हैं..

कभी-कभी मुझे आश्चर्य हुआ करता था कि जिस व्यक्ति की निगाह से वातावरण का महीन-से-महीन डिटेल और नाजुक-से-नाजुक रेशा न छूटे, जो जड़ परिवेश को सजीव मूड दे देने की कला में माहिर हो, उसकी आंख कथानक और व्यक्तियों की मोटी-मोटी असंगतियों पर क्यों नहीं जाती? और क्यों काश्मीर का ऐसा खूबसूरत यथार्थवादी वर्णन देने वाली कलम अगली ही सांस में सुंदरनगर के ठेकेदार का बकवास सुनाने लगती है? मुझे लगता है कि कमलेश्वर का यही कॉन्फ़िडेंस उसे गलतफ़हमी देता रहा है कि सामने वाला उसकी मनगढ़न्त कहानी को सिर्फ इसलिए गले उतारता जायेगा कि उसे बहुत आत्मविश्वास, खूबसूरत जबान और सही हाव-भाव के साथ बात को कहने की कला आती है...

लेकिन इधर मैं देख रहा हूं कि 'कसबे के कहानीकार` का स्टंट सफल कर चुकने के बाद से ही कमलेश्वर अपनी इस कमजोरी से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि लेखक चाहे जितना झूठ बोले, जिन्दगी में चाहे जितना बहके, उसका दर्द और गलत करने का अहसास सब से ज्यादा उसे ही खाता है। लोग भूल जाते हैं, लेकिन वह खुद नहीं भूल पाता कि वह एक बिखरा और मरोड़ा हुआ व्यक्तित्व लेकर जी रहा है-जीने को मजबूर है। अनुभूति और कचोट की यह तीव्रता ही बताती है कि कहीं वह संवेदनशील और ईमानदार प्राणी है, वरना भटकन और खोयेपन के दर्द को वह 'खोयी हुई दिशाएं`-जैसी जबर्दस्त कहानी में कैसे उतार पाता? जाने-अनजाने गलतियों और झूठों के जितने गहरे तिलिस्मी जाल में कमलेश्वर फंसता जा रहा है, उतनी ही उसके लेखन में गहराई आती चली जाती है, उसकी भीतरी तड़प संवेदना को निखारती जाती है।

मैं जब-जब उसे इस पहलू से देखता हूं, मुझे ईर्ष्या होने लगती है-उसने जिंदगी में शब्दिक अर्थ में पापड़ नहीं बेले, यह सही है; लेकिन वह राकेश ओर मेरी तरह 'हॉटहाउस-ब्रीड` आदमी नहीं है। बाहरी और भीतरी कटुताओं ने उसके लेखन को निश्चित प्रगति और सान दी है, इसे उसकी पहली अच्छी कहानी 'गर्मियों के दिन` से लेकर 'खोयी हुर्ठ दिशाएं` और 'दिल्ली में एक मौत` में देखा जा सकता है। उसने अपनी गललियों से अकसर ही सीखा है।
जिंदगी हो या कला, सेकेण्ड-हैण्ड अनुभवों पर जीना उस समय बहुत भारी पड़ जाता है, जब अपने पास उन्हें पचा सकने लायक शक्ति न हो। दूसरों की तरह कमलेश्वर ने भी लेखक-प्रकाशक बनकर अपना व्यक्तित्व खड़ा करना चाहा था- बिना अपने और अपने साथियों की एकनिष्ठता को तौले हुए। उसी तरह सेकेण्ड-हैण्ड अनुभवों पर लिखने की गलती भी उसने की..

चूंकि 'देवा की मां` या अन्य सारी कहानियां वे हैं, जिन पर अपने समय में काफी पुष्प-वर्षा हुई है, इसलिए मैं जानता हूं कि कमलेश्वर अपने उसी शातिर अन्दाज में कहेगा, 'यहां तो प्यारे, एक कहानी लिखते हैं और साल-भर को निश्चिन्त हो जाते हैं। जब तक उस कहानी का घाव ठण्डा होता है, तब तक अगले साल फिर एक लिख देते हैं। तुम सब साले (यानी मैं और राकेश) इसीलिए तो कुढ़ते हो कि इसकी हर कहानी क्यों झण्डे गाड़ती चलती है..।` मगर इधर उसने रोज-रोज झंडे गाड़ने शुरू कर दिये हैं और इतने गाड़ दिये हैं कि वे गड़े मुरदे होकर रह गये हैं। इसलिए उखाड़-उखाड़ कर एक-एक झंडे को पांच-पांच, छह-छह जगह गाड़ा है। शिकायत के जवाब में अब वह इतना ही कहता है, 'यार, इन सब को संग्रह में थोड़े ही दूंगा! लेकिन बताओ, इतना न लिखूं , तो क्या करू? कैसे रहूं?` इस सब के बावजूद, कमलेश्वर की शायद ही कोई कहानी हो, जिसने कहीं-न-कहीं मुझे अपनी असामर्थ्य का अहसास न करा दिया हो.. कभी प्रारम्भ का वाक्य ही ऐसा होता है कि तबीयत फड़क उठती है और कभी बीच में ऐसा कुछ आ जाता है कि गुस्सा आता रहता हैऱ्यह कमबख्त़ सारे दिन इस या उस तिकड़म में लगा रहता है और यह सब लिख किस समय लेता है? इसका कमरा क्या है, अच्छा-खासा वेटिंग-रूम है। कोई-न-कोई बैठा ही रहता है और हांड़ी-जैसी ऐश-ट्रे में चार-मीनार झाड़ते हुए आप उसे प्रवचन पिला रहे होते हैं। कभी-कभी वेटिंग रूम एक ऐसी धर्मशाला भी बन जाता है, जहां खाना-कपड़ा से लेकर हजामत का सामान, जूता और जेब-खर्च सभी-कुछ बिना 'ऑब्लिेगेशन` मिलता हो और गुसलखाना साफ करने वाला जमादार भी बिना किसी दुविधा-संकोच के सिगरेट या ब्लेड खुद निकाल लेना अपना अधिकार मानता हो। मैं इन मामलों में कुछ फ्यूडल हूं और ये बातें मेरा मूड खराब कर देती हैं; लेकिन खुद तंगी और तकलीफ में रहकर औरों की सुविधा जुटाने में कहीं कमलेश्वर का बड़प्पन तृप्त होता है, और वह धर्मशाला के यात्रियों के बीच निहायत इत्मीनान से औंधा लेटा अपनी बेहद सधी खूबसूरत हैंडराईटिंग में किसी कहानी, रेडियो या टेलिविज़न स्क्रिप्ट को पहली और अन्तिम बार लिख रहा होता है.. उसकी यह शान्ति और एकाग्रता मुझे जलाकर खाक कर देती है..

शान्ति और एकाग्रता.. केवल उस समय, जब कलम हाथ में हो, वरना कमलेश्वर से कभी मिल लीजिए..वह या तो कहीं से भागता-दौड़ता चला आ रहा होगा, या उसे कहीं जाना होगा। इस बीच के समय में बातें करते हुए हमेशा लगेगा कि दिमाग में वस्तुत: कोई दूसरी ही तिकड़म चल रही है.. कि वह मुंह से बातें कर रहा है, लेकिन दिमाग में जल्दी-जल्दी कुछ योजनाएं बना रहा है.. और मेरी 'लेखकीय दृष्टि` बता देती है कि यह प्लानिंग लेखन-प्रक्रिया नहीं है। इस तरह की तिकड़म-भरी प्लानिंग राकेश के दिमाग में भी चलती रहती है, लेकिन कमलेश्वर का चेहरा उस तनाव को जाहिर कर देता है। लगता है, जैसे वह कहीं फौजों को लड़ते छोड़ आया है और जाते ही उसे उनका चार्ज संभाल लेना है.. कोई लड़ाई है, जिसे जाकर फिर से लड़ना है..

और शायद इस तरह लड़ते हुए उसे बहुत दिन हो गये हैं। कभी-कभी आशंका होने लगती है, किसी दिन वह हार तो नहीं जाएगा और उसके मोती-जैसे अक्षर, लहजे का आत्मविश्वास, हाजिर जवाबी, और मजाकिया विट शैली की खूबसूरती और वातावरण को मूड देने की कला-टूटे हुए कवच की तरह दयनीय तो नहीं हो उठेंगे? क्योंकि यह लड़ाई सीधी और सरल नहीं है, यह विचित्र विरोधाभासों की लड़ाई है और यही क्या कम विरोधाभास है कि कमलेश्वर जिन्दगी के छोटे-छोटे झूठों के हथियार से युग के सब से बड़े झूठ के खिलाफ लड़ रहा है?

क्योंकि ऊपर की यह सारी तेजी सचमुच एक हथियार की तेजी है..एक स्वयं-आरोपित व्यक्तित्व..वस्तुत: जो व्यक्ति इस हथियार को लेकर लड़ रहा है, वह बहुत सरल और अज़हद भावुक है..ऐसा भावुक जो सिंसियर होने के सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता।

भावुक लोगों की बहुत किस्में हैं। मैं उनमें दो तरह के भावुकों को जानता हूं । कुछ लोग होते हैं, जिन्हें जरा-जरा-सी बातें छू जाती हैं। वे आपसे उम्मीद किये बैठे हैं कि मिलते ही आप उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछेंगे, 'हल्लो!` कहकर आप उनके गले से लिपट जाएंगे, लेकिन आप निहायत संयत-भाव से बिना कुछ बोले उनकी तरफ कॉफी सरका देते हैं। लीजिए साहब, उनकी भावनाओं को चोट पहुंच गई और वे अब आंखों में आंसू-भरे आपकी बेमुरव्वती पर खफा हैं। जरा-सी उपेक्षा उनमें आत्महत्या की इच्छा जगा देती है, और जरा-सा प्यार उनकी आंखों में आंसू ले आता है। छोटी-छोटी बातों पर वे ऊपर से रोते, सिर धुनते हैं, खुश होते और नाचते हैं, लेकिन भीतर से निहायत ही व्यावहारिक, स्वार्थद्रष्टा और निर्विकार, कोल्ड-हिसाबी.. उनका हर आंसू और कहकहा प्राणों का उन्मुक्त विसर्जन नहीं, सिर्फ हथियार या ढाल होता है, एक वैल-कैलक्यूलेटेड इन्वेस्टमेंट। इसलिए व्यवहार में ये लोग घोर प्रैक्टिकल और किसी हद तक क्रूर भी होते हैं। कोई बता रहा था कि गोयबेल्स की आज्ञाओं पर जब हजारों बेकसूर यहूदी गैस-चैम्बर्स में घुट-घुटकर दम तोड़ रहे होते थे, उस समय वह खुद बाख का संगीत सुनता हुआ भाव-विभोर हो रहा होता था .. गांधीवाद ने तो इस तरह के भावुकों की पूरी एक फौज ही पैदा कर दी है।

दूसरी तरह के भावुक न बात-बात पर रोते हैं, न गदगदाते हैं। उनकी आंखों में आंसू नहीं आता और भावना की एक नन्हीं-सी गंध चुपचाप जिंदगी की धार को मोड़कर चली जाती है, और पूरे होश में सुने हुए केवल दो-दो छोटे-छोटे वाक्य संघर्ष-रत सिपाही की आत्मा की धरोहर बन जाते हैं।..हो सकता है, यह हद दर्जे की भावुकता हो, लेकिन कमलेश्वर की भावुकता कहीं उस लहनासिंह की वंशधर भी है।..उस दिन वह मेरे लिए सचमुच अभिनन्दनीय हो उठा था, जिस दिन हर प्राप्त सुविधा और साधन की कीमत पर उसने इस भावना को खरीदा था..

पांचेक साल पहले की बात है, मैं कलकत्ता से आगरा जा रहा था। रीढ़ की हड्डी में दर्द था और बैठना मुश्किल था। कमलेश्वर ने हर तरह की सुविधाएं जुटायी थीं कि मैं 'कुलटा` का उत्तरार्ध पूरा कर लूं। होली का भूत बने हुए उसने मुझे कहीं से एक टाइपराइटर लाकर दे दिया था। रोज रात तो देर तक हम लोग गप्पें लड़ाते, योजनाएं बनाते। कमलेश्वर ने नया-नया प्रकाशन शुरू किया था, सो दुनिया-भर का जोश उन दिनों उसके मन में था। कुछ भी सुनने की फुरसत नहीं थी। रात को दो बजे जब वह मुझे छोड़ने स्टेशन आया, तो मैंने सवाल सामने रख दिया। खिड़की पर कुहनी टेके वह खड़ा था-'बेवकूफी ही सही, राजेन्द्र, लेकिन है।..जिंदगी में सभी-कुछ अच्छा करने का ठेका लेकर तो हम आये नहीं थे।..` रास्ते-भर वह मुझे निहत्थे अभिमन्यु की याद दिलाता रहा। शायाद 'अभिमन्यु की आत्महत्या` कहानी की पहली चिनगारी वहीं मिली..

शायद यह वह खुद जानता है कि ऐसी भावात्मक निष्ठा एडोलेसेन्स और बेवकूफी ही है, एक ऐसी कमजोर पतवार, जो जाने किस मंझधार में जाकर टूट जाये। शायद यही भी वह जानता है कि ऐसे ही नाजुक तलुए को बचाने के लिए नुकीले और खुरदरे जूते पहनते होते हैं, ताकि हर व्याधि उसे ही निशाना न बना ले। और तब आदमी हठपूर्वक 'झूठा` और सजग बनता है। भावात्मक निष्ठा सचमुच एक कमजोरी है, यह अहसास उसे उकसाता और ललकारता है कि वह प्रैक्टिकल और प्रेविलेज्ड लोगों को उनके स्तर पर उन्हें मात दे.. यह दूसरी चक्रव्यूही असहायता है.. यह उसका बहुत संवेदनशील होना है, जो उसे एक के बाद दूसरी भूल-भुलैयों में ले जाता है.. मजबूरी यह है कि न तो वह दूसरों की भावनाओं के प्रति क्रूर हो पाता है, न अपने प्रति गैर-ईमानदार.. लेकिन अपने और दूसरों के प्रति संगति नहीं बैठ पाती और निश्चय-अनिश्चय का द्वंद्व उसके जीवन का पर्याय बन जाता है.. उसके लिए निर्णय न ले सकना साहसहीनता नहीं-क्रूर और कैलस न हो पाना है। ईमानदारी से पूछा जाए, तो व्यक्तिगत नैतिकता और परम्परागत नैतिकता के इस द्वंद्व को पार कर लेना किस अकेले आदमी के बस का है? इसके लिए तो शायद पूरी एक संवेदनशील पीढ़ी को निर्णयहीनता की इस घुटन से गुजरना होगा, क्योंकि निर्णय..वरण..चुनाव कर सकने के लिए हममें से कौन स्वतंत्र है? कौन कह सकता है कि उसने किसी-न-किसी भीतरी-बाहरी, दूर और पास की लाचारी में अपना हर निर्णय नहीं लिया है? फिर एक की जगह दूसरे एब्सर्ड को चुनते चले जाने की अपेक्षा, न चुन पाने की इस मजबूरी को स्वीकार कर लेना सचमुच गैर-ईमानदारी ही है क्या? 'कुछ नहीं, कोई नहीं,` से लेकर 'नीली झील` तक कमलेश्वर की अनेक कहानियां भावात्मक निष्ठा, यानी परम्परागत नैतिकता के खिलाफ व्यक्तिगत नैतिकता की प्रतिष्ठा को आकस्मिक रूप से ही रेखांकित नहीं करतीं...बहरहाल, दुष्यन्त की इज्जत की खातिर मैं इतना मान लेता हूं कि कमलेश्वर अपना सच नहीं बोल सकता, मगर अपने युग और अपनी पीढ़ी का सच वह जरूर बोल सकता है, क्योंकि उसके पास जबान है और उसे बात करनी भी आती है..

है कुछ ऐसी ही बात, जो चुप हूं
वरना क्या बात कर नहीं आती।

December 10, 2007

धर्म की आलोचना की आलोचना

अध्‍ययन कक्ष


  • अशोक यादव

कोई भी आलोचना सापेक्षिक और तुलनात्मक होनी चाहिए। धर्म के किसी भी आलोचक को हिन्दू धर्म के उद्भव, विकास और अन्तर्वस्तु की तुलना अन्य धर्मों के उद्भव, विकास और अन्तर्वस्तु से करनी होगी और स्पष्ट करना होगा कि धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन से हम एक अप्रिय निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जहां अन्य धर्म अपने मूल स्वरूप में मानवतावादी हैं, वहीं हिन्दू धर्म एक अमानवीय धर्म है। हिन्दू धर्म की आलोचना का अर्थ उनकी अंतर्वस्तु में निहित वर्णव्यवस्था की आलोचना करना है।


मार्क्‍स के लेख 'हीगेल के अधिकार संबंधी दर्शन का आलोचना में योगदान` में उनके धर्म संबंधी चिंतन का निचोड़ मिलता है। प्रस्तुत लेख का प्रस्थान बिंदु मार्क्स के इस लेख की प्रथम पंक्ति है : 'जर्मनी में, धर्म की आलोचना मुख्यतया पूरी हो चुकी है, और धर्म की आलोचना ही समस्त आलोचना का पूर्व-आधार है।`

सवाल उठता है, क्या हमारे देश में धर्म की आलोचना पूरी हो चुकी है? उत्तर 'नहीं` होने पर निष्कर्ष निकलता है कि हमारी समस्त आलोचना अधूरी है क्योंकि धर्म की आलोचना ही समस्त आलोचना का पूर्व-आधार है। धर्म की अधूरी आलोचना समाज विज्ञान में इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र, संस्कृति आदि में अधूरी आलोचना का कारण बनता है और समाज विज्ञान में अधूरी आलोचना हमारी मुक्ति का, सर्वहारा, शोषित जनों की मुक्ति का, सबसे बड़ा बाधक बन जाता है। धर्म की मुकम्मल आलोचना हमारी मुकम्मल मुक्ति की एक शर्त है।

धर्म की आलोचना में सबसे बड़ी रूकावट सभी धर्मों का पुरोहित और अभिजात वर्ग है जो धर्म को रहस्यवाद के आवरण में रखने की हरसंभव कोशिश करता है। कौलनिशे जोटुंग के १७९वें अंक में 'मुख्य संपादकीय लेख` शीर्षक लेख में मार्क्स लिखते हैं : 'बेशक, अगर आप पहले से ही तय कर लें कि केवल वही चीज वैज्ञानिक शोध की होगी जो स्वयं आप के विचारों से मेल खाती है तो भविष्यवाणी करना आपके लिए कठिन नहीं होगा। किन्तु, तब आपके कथन का उस भारतीय ब्राह्मण के कथन से क्या अधिक महत्व होगा जो वेदों को पढ़ने के अधिकार को अकेले अपने लिए सुरक्षित रखकर उसकी पवित्रता प्रमाणित करता है।` धर्मशास्त्रों के अध्ययन की उपेक्षा आधुनिकता का संकेत नहीं है बल्कि यह आधुनिकता के अभियान को कुंठित करता है।

धर्म की आलोचना निरंतर जारी है। 'समयांतर` पत्रिका का धर्म की आलोचना पर केन्द्रित मार्च,२००३ के अंक को हम नमूना के तौर पर लें। इस अंक के कुछ हिस्सों को हम यहां उद्धृत करते हैं :

मस्तराम कपूर लिखते हैं : 'जब तक इस दुनिया में धर्मों का अस्तित्व रहेगा तब तक मानवता अज्ञान, अंधविश्वास, घृणा, द्वेष, बर्बरता और युद्धों से पीड़ित रहेगी। केवल धर्महीन समाज ही सही मायने में मानवीय समाज बन सकता है।`
'स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के सर्वोपरि मानव-मूल्यों पर आधारित समाज के विकास में धर्म सबसे बड़ी बाधा है। भारत के संदर्भ में इस बात को अधिक स्पष्टता से देखा जा सकता है। यहां धर्म ने वर्ण व्यवस्था के नाम से ऐसी समाज व्यवस्था बनाई जिसने दलित, पिछड़े, आदिवासी समूहों को और सभी वर्णों की स्त्रियों को तमाम मानवीय आधारों से वंचित रखा।`

महाश्वेती देवी साक्षात्कार में कहती हैं : 'यह जो हिन्दू धर्म है वह मूलत: विशद् और व्यापक है। कोई जीवन भर पूजा, अर्चना न करे तो उसके हिन्दुत्व का कुछ नहीं बिगड़ता। कोई हिन्दुत्व से उसे खारिज नहीं कर सकता।`

कात्ययानी का कहना है : 'यह सही है कि धर्म और सांप्रदायिकता दो भिन्न-भिन्न चीजें हैं। सांप्रदायिकता एक आधुनिक परिघटना है। यह पूंजीवादी समाज में धर्म की राजनीति है।`

ऊपर के उद्धरण धर्म की आलोचना के कुछ उदाहरण हंै। आज धर्म की जो आलोचनायें आ रही हैं, उनमें कुछेक अपवादों को छोड़कर, सब की सब उपर्युक्त उदाहरणों जैसी ही हैं। इन आलोचनाओं की आलोचना निम्न वर्णित हैं :

१. हिन्दू धर्म के अलावा हमारे देश में जैन, बौद्ध, इस्लाम, ईसाई तथा सिक्ख धर्म हैं। हिन्दू धर्म के खिलाफ बाकी धर्मों की इतिहास में प्रगतिशील भूमिका रही है। इसलिए धर्म की आलोचना में इस अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु का खयाल रखना होगा। सभी धर्मों की आलोचना हम एक ही मापदंड से नहीं कर सकते।

२. दलित लेखक धर्म की आलोचना में वर्ण-व्यवस्था का सवाल उठाते हैं। किन्तु वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ जैन, बौद्ध, इस्लाम, ईसाई तथा सिक्ख धर्मों की प्रगतिशील ऐतिहासिक भूमिका को सामने नहीं लाते हैं।

३. दलित लेखक धर्म की आलोचना करते हुए वर्ण-व्यवस्था का सवाल केवल हिन्दू धर्म एवं समाज के परिप्रेक्ष्य में उठाते हैं। अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था और उससे जुड़े धर्म के प्रश्न को गौण कर देते हैं।

४. धर्म के सभी आलोचक-समाजवादी, मार्क्सवादी, दलित आदि एक स्वर से धर्म को ज्ञान-विज्ञान, मानव विकास में बाधक समझते हैं। जबकि अपनी उत्पत्ति तथा परवर्ती समय में सभी धर्मों ने, हिन्दू धर्म को छोड़कर, ऐतिहासिक रूप से क्रांतिकारी भूमिका का निर्वाह किया था। धर्म के संबंध में इस तथ्य को प्रमुखता से सामने नहीं लाया जाता है।
५. धर्मों के उद्भव और विकास के इतिहास से उपजे बोध का धार्मिक कट्टरता तथा धर्मों का शोषक वर्गों द्वारा इस्तेमाल के खिलाफ लड़ाई लड़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है लेकिन 'लिबरेशन थियालॉजी` का सवाल धर्म की आलोचना का हिस्सा नहीं बन पाया है।

'हीगेल के अधिकार संबंधी दर्शन का आलोचना में योगदान` में मार्क्स लिखते हैं 'धर्म केवल वह मिथ्या सूर्य है जो मनुष्य के चारों तरफ उस समय तक परिक्रमा करता रहता है जिस समय तक वह स्वयं अपने चारों तरफ परिक्रमा नहीं करने लगता है।` भारतीय समाज की वास्तविक परिस्थितियों में धर्म के 'मिथ्या सूर्य` के साथ जाति का वास्तविक बंधन भी जुड़ा हुआ है। एक धर्म-विरोधी सवर्ण 'मिथ्या सूर्य` के रूप में धर्म की आलोचना करके नास्तिक हो जाता है, पुरोहितवाद के चंगुल से मुक्त हो जाता है, भौतिकवादी हो जाता है। लेकिन वह वर्ण-व्यवस्था की आलोचना को धर्म की आलोचना का हिस्सा नहीं बनाता है तो उसके द्वारा धर्म की आलोचना की नियति आलोचना की रस्मअदायगी होती है। वह धर्म विरोधी होने का दावा करते हुए वर्ण-व्यवस्था का लाचार और तरस खाने योग्य समर्थक ही रह जाता है। धर्मविरोधी होने के बावजूद फासीवादी हिन्दुत्व के खिलाफ लड़ाई में वह उदारवादी हिन्दुओं जैसे विवेकानंद और गांधी की शरण में जाने के लिए मजबूर होता है। दूसरी ओर एक दलित ईश्वर विरोधी एवं धर्मविरोधी होने के बावजूद अपनी जाति के कारण हिन्दू धर्म से मुक्त नहीं हो पाता। एक दलित जब अपना आत्मिक विकास इतनी दूर तक कर लेता है कि वह स्वयं अपने चारों ओर परिक्रमा करने लगता है तो भी जाति के कारण धर्म का 'मिथ्या सूर्य` उसकी परिक्रमा करना बंद नहीं करता। जाति के वास्तविक बंधन को नकारकर केवल 'मिथ्या सूर्य` के रूप में धर्मों की आलोचना का अर्थ वर्ण-व्यवस्था का उद्गम ो़त और पोषक हिन्दू धर्म के खिलाफ जैन, बौद्ध, इस्लाम, सिख एवं ईसाई धर्मों की प्रगतिशील ऐतिहासिक भूमिका को नकारना होगा।

आगे बढ़ने से पहले भारत में प्रचलित सभी धर्मों की उत्पत्ति, इतिहास और उसकी मुख्य शिक्षाओं को संक्षेप में बारी-बारी से देखना आवश्यक है।


हिन्दू धर्म

हम जानते हैं कि हिन्दू शब्द की उत्पत्ति १०वीं-११वीं सदी में मुसलमानों के आने पर हुई। जिसे आज हम हिन्दू धर्म कहते हैं वह अपनी उत्पत्ति और विकास की दृष्टि से ब्राह्मण धर्म था। वेदों की आरंभिक स्तुतियां, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के शब्दों में, अस्तित्व के प्रति आश्चर्य और श्रद्धा की उन लोगों की (अर्थात् आदिकालीन आर्यों की-ले.) सामूहिक प्रतिक्रिया की काव्यात्मक वसीयत हैं....जो जीवन में निहित अक्षय रहस्य की भावना से अभिभूत थे। ( दामोदरन, भारतीय चिंतन परंपरा, पृष्ठ : ३७)

सुप्रसिद्ध 'सृष्टि की उत्पत्ति` सूक्त आदिकालीन आर्यों की गवेषणात्मक प्रवृत्ति का एक महान प्रमाण है : 'असत् नहीं था, सत् भी नहीं था। रज नहीं था, नहीं उसके पार का आकाश था। क्या ऊंचा और क्या नीचा था? गहन गंभीर पानी कहां था? और ब्रह्माण्ड कहां था? मृत्यु नहीं थी, अमरत्व भी नहीं था। न तो रात का कोई चिह्उा था और न दिन का। अपनी आंतरिक शक्ति से परमेश्वर ने वायुहीन श्वास लिया। उनसे परे और कुछ नहीं था। पहले अंधकार था-अंधकार से ही आवृत। अन्य किसी चिह्उा के बिना, जो भेद का सूचक हो, सर्वत्र जल था। ...सबसे पहले कामना उत्पन्न हुई। फिर मन से सर्वप्रथम बीज उत्पन्न हुआ। ऋषियों ने अपने हृदय में, बुद्धिमत्ता से सोचते हुए, असत् में सत् को देखा। उनकी किरण ने अंधकार को खंर्डित कर प्रकाश को फैलाया।.. किसने बताया कि उद्भव किसमें से हुआ और यह सृष्टि कहां से आई? देवगण भी सृष्टि के बाद के हैं। तब कौन जान सकता है कि इसका उद्भव कहां से हुआ? इसे किसने रचा? या नहीं भी रचा? परम आकाश में जो नियामक के रूप में स्थित है, हे प्रिय, वह जानता होगा, न भी जानता हो।`
इस सूक्त में आदिकालीन आर्यों का अनीश्वरवादी, संशयवादी चिंतन स्पष्ट तौर पर परिलक्षित होता है। ब्रह्माण्ड, प्रकृति, सृष्टि, ईश्वर, देवता आदि के संबंध में आदिकालीन आर्यों के मन में सैंकड़ों प्रश्न उठ रहे थे। जिस इन्द्र की चर्चा वेदों में सभी देवताओं में सबसे ज्यादा बार हुई है, जिसकी स्तुति में सबसे ज्यादा सूक्त रचे गये हैं, उसके बारे में भी ऋगवेद में शंका जाहिर की गई है : 'इंद्र कौन है? उसे किसने देखा है? एक दूसरे से वे कहते हैं, इंद्र नहीं है। तो हम किसकी पूजा करें?`
(ऋगवेद, २.१२५)

राधाकृष्णन लिखते हैं 'अपने सर्वोच्च देवताओं के अस्तित्व के बारे में उसने प्रश्न उठाये। उसने आस्था तक के लिए प्रार्थना की। और, आस्था के लिए प्रार्थना तब तक सम्भव नहीं होती है जब तक कि आस्था में ही विश्वास डिग न जाये।`

ऋगवेद की ये ऋचायें उस काल की हैं कि जब वे खानाबदोशी का जीवन जी रहे थे। उत्पादन के साधनों में बढ़ोत्तरी तथा खानाबदोश अर्थव्यवस्था से कृषि अर्थव्यवस्था में रूपांतरण के चलते अतिरिक्त उत्पादन हुआ। ऋगवेद के दसवें मंडल में पुरुष सूक्त आता है जो वर्ण-व्यवस्था की स्थापना की उद्घोषणा करता है-ब्रह्मा के मुंह से ब्राह्मण, वक्ष से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और पैर से शूद्रों की उत्पत्ति होती है। जिस ऋगवेद की आरंभिक ऋचायें ब्रह्मांड, सृष्टि, ईश्वर, देवता पर प्रश्न खड़ा करती है, उसी ऋगवेद का दसवां मंडल वर्णव्यवस्था को ईश्वर की सृष्टि घोषित करता है जिसका उद्देश्य अतिरिक्त उत्पादन को हस्तगत करना था।

ऋगवेद की राह चलकर सभी हिन्दू धर्मग्रंथ वर्ण-व्यवस्था का ही पोषण करते हंै। इसकी सर्वोच्च अभिव्यक्ति गीता में हुई है। गीता की रचना मानो वर्ण-व्यवस्था को अजर-अमर बनाने के लिए ही की गयी थी।

चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागश:
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्
गुण और कर्म के अनुसार चार वर्णों में विभाजित समाज-चातुर्वण्य व्यवस्था-मेरी ही सृष्टि है। यद्यपि मैं इस व्यवस्था का स्रष्टा हूं किन्तु तुम यह जान लो कि मैं इतने पर भी अव्यय अकर्ता हूं।


जैन धर्म

बौद्धों की तरह जैन भी वेदों की प्रमाणिकता से इंकार और पुरोहितों तथा कर्मकाण्डों का विरोध करते थे। उनकी मान्यता भी यही थी कि ईश्वर की अवधारणा के बिना भी इस ब्रह्मांड के रहस्य को सुलझाना और पूर्णता प्राप्त कर लेना सम्भव है। जैन ग्रंथ सूत्र कृतांग के कुछ अवतरणों में इस वेदांती विचारधारा का कि हर वस्तु का मूल कारण आत्मा है, खंडन किया गया है। महावीर का शिष्य आद्रक कहता है-'यदि सभी प्राणियों में समान रूप से एक ही आत्मा होती तो उन्हें एक दूसरे से अलग पहचाना नहीं जा सकता था, न ही उन्हें अलग-अलग अनुभव करने पड़ते। तब न तो ब्राह्मण, न क्षत्रिय, न वैश्य और न शूद्र, न कीट-पतंगे, न पक्षी और न सर्प होते। तब सभी मनुष्य और देवता होते।`
जैन दर्शन में पर्याप्त मात्रा में आदर्शवाद भी मौजूद है यद्यपि जैन दर्शन भी बौद्ध दर्शन की तरह ईश्वर का निषेध करता है। वह आत्मा की अनश्वरता में विश्वास करता है। आगे चलकर, विशेषकर मध्य युग में जैन मतावलंबियों के दार्शनिक विचारों और धार्मिक विश्वासों में कितने ही परिवर्तन हुए। इस दर्शन की तर्क प्रणाली और इसका द्वन्द्ववाद और भी उच्च स्तर पर पहुंचा, किन्तु इसके साथ ही इसके आदर्शवादी पहलू भी दृढ़तर हुए। जैन धर्म, जिसका उदय स्वयं ब्राह्मणवाद और वर्णाश्रम व्यवस्था के विरूद्ध संघर्ष में हुआ था, अब विभिन्न संप्रदायों में बंट चला।

(श्रोत : भारतीय चिंतन परंपरा)



बौद्ध धर्म

एंगेल्स ने लुडविग फायरबाख में लिखा है, 'महान ऐतिहासिक मोड़ों के साथ-साथ धार्मिक परिवर्तनों का आना, केवल तीन विश्व धर्मों के साथ ही, जो अब तक जारी रहे हैं, सत्य सिद्ध हुआ है : बुद्ध धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म।`

ईसा पूर्व छठी शताब्दी में बौद्ध धर्म का उदय उस समय हुआ था जब पुरोहित वर्ग का बौद्धिक, सामाजिक और आर्थिक आधिपत्य समाज के विकास में रूकावटें खड़ी करने लगा था। बौद्ध धर्म अपने दृष्टिकोण में पुरोहित-विरोधी तथा कर्मकांड विरोधी था। किन्तु हमें यह नहीं मान लेना चाहिये कि जैसे ही बौद्ध धर्म का आविर्भाव हुआ, वैसे ही ब्राह्मणवाद विलुप्त हो गया। जैसा कि मैक्समूलर ने कहा है 'ब्राह्मणवाद उस समय पश्चिम में फलता-फूलता रहा होगा, जब बौद्ध धर्म पूर्व और दक्षिण में अपनी विजय पताका फहरा रहा था।`

पुरुष सूक्त पर बुद्ध की टिप्पणी को बौद्ध दर्शनिक दिगनाग ने 'धम्मपद` में इस रूप में प्रस्तुत किया है : 'ब्राह्मणों की पत्नियों को भी मासिक धर्म के चक्र से गुजरना पड़ता है, वे भी गर्भवती होती हैं, वे भी बच्चे को जन्म देती हैं, उन्हें दूध पिलाती हैं और उनका लालन-पालन करती हैं। इतने पर भी ये ब्राह्मण, जिनका जन्म स्त्रियों से होता है, यह दावा करते हैं कि वे ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए हैं, कि वे ब्रह्मा की सृष्टि हैं और उनके उत्तराधिकारी हैं। यह सरासर झूठ है।`

बुद्ध ने ईश्वर का निषेध किया और द्वंद्वात्मक तरीके से विश्व को देखा। उनके अनुसार विश्व परिवर्तनशील तथा क्षणभंगुर है तथा कुछ भी शाश्वत् नहीं है। बुद्ध का द्वंद्ववाद दार्शनिक रूप से प्राचीन यूनानियों द्वारा प्रस्तुत ऐसे ही दृष्टिकोण से कहीं अधिक विकसित था। बुद्ध निरीश्वरवादी थे, अत: भौतिकवादी थे। विश्व को देखने का उनका नजरिया द्वंद्वात्मक था। अत: द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का उन्मेष हमें बुद्ध के दर्शन में मिलता है। ढाई हजार वर्षों के बाद मार्म्स ने लिखा, 'कोई भी चीज शाश्वत नहीं है, सिवा परिवर्तन के।`
(शोत : भारतीय चिंतन परंपरा)


ईसाई धर्म

जीसस एक यहूदी थे। यहूदियों का स्वर्णिम समय खत्म हो चुका था। उन्हें एक मसीहा का इंतजार था। जीसस में यहूदियों को एक मसीहा का दर्शन हुआ। किन्तु जीसस से उनका जल्द ही मोहभंग हो गया। जीसस सामाजिक व्यवस्था तथा तात्कालिक परिस्थितियों के खिलाफ विद्रोह की भाषा बोलते थे। जीसस अमीरों तथा ढ़ोंगियों के विरोधी थे। उन्होंने अमीरों से कहा कि अपनी संपत्ति को निर्धनो में बांट दो। जीसस ने कहा कि सूई के छिद्र से ऊंट पार कर सकता है किन्तु अमीर स्वर्ग नहीं जा सकता है। जीसस जन्मजात विद्रोही थे, समाज की तात्कालिक परिस्थितियां उनके बर्दाश्त से बाहर थीं तथा वे समाज को परिवर्तित करना चाहते थे। यहूदी उनके खिलाफ हो गये और उनको पकड़कर रोमन साम्राज्य के अधिकारियों को सुपुर्द कर दिया। रोमन सम्राट ने जीसस को एक राजनीतिक खतरे के रूप में देखा और उनको मौत की सजा दी। मात्र बत्तीस साल की आयु में जीसस को मौत की सजा मिली।

जीसस की मौत के बाद उनके अनुयायियों ने जीसस की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया। रोमन साम्राज्य के अधीन ईसाइयों की संख्या बढ़ने लगी। इन प्राचीन ईसाइयों ने रोमन साम्राज्य के जुल्म, शोषण, मनमानी के खिलाफ महान संघर्ष किये तथा शहादतें दीं। रोमन साम्राज्य ईसाई क्रांतिकारियों का पूर्ण दमन करने में विफल रहा। रोमन साम्राज्य को ईसाइयों से समझौता करना पड़ा। चौथी सदी के आरंभ में रोमन सम्राट कान्सेंटनटाइन खुद ईसाई हो गये और ईसाई धर्म रोमन साम्राज्य का राज्य धर्म हो गया। इस तरह जो ईसाई धर्म शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए अस्तित्व में आया था, वह शोषक वर्गों का एक हथियार बन गया।


इस्लाम धर्म

इस्लाम के आगमन के पहले सैंकड़ों वर्षों से अरब में ज़हालत का युग था। अरब की जनता रेगिस्तानी जीवन जीती थी। उनके जीवन में कोई व्यवस्था नहीं थी। कबिलाई समाज था तथा कबीलों में छोटी चीजों को लेकर खूनी झगड़े होते रहते थे। बस दो ही शहर थे-मक्का और यथरीब जो समुद्र के किनारे बसे थे। अरब के सीमावर्ती कुछ इलाकों में यहूदी और ईसाई धर्म का प्रभाव था। अरब सैंकड़ों देवताओं की पूजा करते थे। साल में एक बार मक्का जाकर अपने देवता की पूजा करते थे जिनकी मूर्ति मक्का में रखी थी। काबा में काले पत्थर की पूजा अवश्य करते थे।

लाल नेहरू लिखते हैं : अन्य धर्मों के संस्थापकों की तरह मोहम्मद साहब एक सामाजिक विद्रोही थे। उनके चलाये धर्म में सादगी तथा स्पष्टता थी, जनतंत्र तथा समानता के भाव थे तथा पड़ोस के देशों की जनता, जो तानाशाह राजाओं तथा मनमाने और अहंकारी पुजारियों के सताये हुए थे, को अच्छा लगता था। इस्लाम ने उन्हें परिवर्तन का रास्ता दिया। जो परिवर्तन हुए वे स्वागतयोग्य थे क्योंकि इससे उनके जीवन में सुधार हुए तथा पुरानी व्यवस्था की ज्यादतियां खत्म हुई। इस्लाम ने कोई महान सामाजिक क्रांति नहीं लाई जो जनता के शोषण को खत्म कर सके। किन्तु जहां तक मुसलमानों का सवाल है इसने उनके शोषण को घटाया तथा एक महान भाईचारे के अन्तर्गत होने का अहसास दिया।

इस्लाम के जन्म के समय के विश्व परिदृश्य का जवाहरलाल नेहरू ने वर्णन किया है अफ्रीका और पश्चिम में भ्रष्ट और अन्तर्विरोध से ग्रस्त क्रिश्चेनिटी का बोलबाला था। पर्सिया में पारसी धर्म जनता पर लाद दिया गया था। यूरोप या अफ्रीका या पर्सिया की आम जनता तात्कालिक धर्मों से विमुख हो गयी थी। मुहम्मद ने संसार के राजाओं तथा शासकों को संदेश भेजा कि वे एक ईश्वर तथा एक पैगम्बर को मानें। कुस्तुनतुनिया के सम्राट, परसिया के सम्राट ने मुहम्मद के संदेश को प्राप्त किया। यह भी कहा जाता है कि चीन के ताई-सुंग को भी यह संदेश प्राप्त हुआ।

मुहम्मद की मृत्यु के पच्चीस वर्ष बीतते-बीतते अरबों ने परसिया, सीरिया, आरमेनिया तथा मध्य एशिया का कुछ हिस्सा, मिस्त्र तथा उत्तरी अफ्रीका के कुछ हिस्सों को जीत लिया।

इस तरह पुरानी व्यवस्था को नई व्यवस्था से बदलकर इस्लाम ने विश्व इतिहास में एक महान भूमिका निभाई।

किशोरी प्रसाद साहू ने अपनी पुस्तक 'इस्लाम : उद्भव और विकास` में लिखा है कि हजरत मुहम्मद महान समाजवादी थे। उन्होंने पाया कि आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों का शोषण सूदखोर करते थे। उन्होंने सूदखोरी को हराम करार दिया और समाज में जकात, सदका और फित्र आरंभ किए। समाज में धन के बंटवारे से पूंजीवाद को मर्मान्तक आघात लगा। मुहम्मद ने सामाजिक असमानताओं को दूर किया। ..उन्होंने विश्वव्यापी भ्रातृत्व की स्थापना की जिसमें ऊंचे और नीचे, अमीर और गरीब तथा काले और गोरे एक भ्रातृत्व में बंधे हुए थे। पैगम्बर कहते हैं : 'अल्लाह आपका वंश और चेहरा नहीं देखता। पर वह तुम्हारे दिल में झांककर देखता है। तुम जो अल्लाह के सबसे ज्यादा प्यारे और अल्लाह की सृष्टि की पवित्रतम रचना हो`। पैगंबर ने अरबों के बीच प्रचलित दास-प्रथा को भी समाप्त करने की कोशिश की। न केवल अरब में बल्कि यूनानियों, रोमवासियों, यहूदियों और ईसाइयों के बीच भी दास-प्रथा प्रचलित थी। पैगंबर ने कहा कि दासों को मुक्त करने से बड़ी, अल्लाह की स्वीकार्य सेवा और कुछ नहीं है। उन्होंने अनेक दासों को इसलिए खरीदा कि उन्हें मुक्त कर सकें। उन्होंने अपने अनुयायियों को परामर्श दिया कि वे दासों के साथ दया और न्याय का सलूक करें।

इस्लाम ने महिलाओं को ऐसे अधिकार और विशेष सुविधायें दी हैं जो उन्हें पहले न दी गयी थीं। कुरान कहता है 'स्‍त्री को पति के संबंध में वे ही अधिकार मिलने चाहिये जो पति को स्‍त्री के संबंध में मिले हैं।` ..उन्होंने कहा कि, 'मां के कदमों के नीचे जन्नत है और अपने पति के घर की प्रधान महिला ही है।` उन्होंने यह भी कहा, 'तुम लोगों में सबसे अच्छा वह है जो अपनी बीवी की इज्जत करता है।` हजरत मुहम्मद ने औरतों को अपना खाबिंद चुनने और अपने पिता और पति की मृत्यु के बाद पति की जायदाद में अपने हिस्से का उपयोग करने की आजादी देकर उसे पुरुषों के बंधन से मुक्त कर दिया। औरत अब अपने पति के अन्याय का शिकार न रही। हजरत मुहम्मद के पहले अरब प्रेतात्माओं, राक्षसों, परियों और इसी प्रकार के अंध-विश्वासों को मानते थे। हजरत मुहम्मद ने अरबों को अंधविश्वास की कड़ियों से मुक्त किया। इस तरह उन्होंने अरब की सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन किया और स्वभावत: अपने युग के सबसे बड़े क्रांतिकारी कहलाये।


सिख धर्म

गुरू नानक खत्री जाति के व्यापारियों के परिवार में एक पटवारी के घर में पैदा हुए थे। भक्ति आंदोलन के अन्य नेताओं की भांति नानक ने जनता का आह्वान किया कि वह जाति-पांति के भेद-भाव को त्याग दें। सिखों में, शहरों में रहने वाले केवल व्यापारी और कारीगर ही नहीं, नीची जाति के लोगों सहित साधारण किसान भी थे। नानक की शिक्षाओं और सिखों के भ्रातृत्व ने दलित-उत्पीड़ित जनता को एकजुट किया। नानक ने कहा : 'नीचों में भी नीचतम जो मनुष्य है, नानक उनके पास ही जायेगा। उसे बड़े आदमियों से क्या लेना-देना है? ईश्वर की कृपा-दृष्टि उन पर ही पड़ती है जो सबसे कुचले हुए लोगों की मदद करते हैं। जाति-पांति निरर्थक है, ओहदे और उपाधियां निरर्थक हैं` जाति-पांति में आखिर ताकत ही कहां हैं। कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जिसमें कुछ योग्यता नहीं। (जन्म साखी)

पांचवे गुरू अर्जुन देव जी ने गुरू ग्रंथ साहिब के सम्पादन कार्य के समय सिख गुरूओं के अतिरिक्त ३० अन्य वाणीकारों की वाणी शामिल करके, संसार के धर्म साहित्य में एक चमत्कार कर दिया था क्योंकि इन ३० वाणीकारों में बाबा फरीद, नामदेव, रविदास, कबीर, सदना, सेन जैसे दलित वर्ग के वाणीकार भी शामिल थे। गुरू अर्जुन देव जी ने हरमंदिर साहब का निर्माण करते समय, चार द्वार चारों दिशाओं में रखकर, चारों वर्णों के लिए धर्म-कर्म के द्वार खोल दिये। अमृत सरोवर में हर मानव को स्नान करने की छूट देकर वर्ण भेद को जड़ से उखाड़ दिया। मुगल सम्राटों ने उनके उपदेशों को राजद्रोही घोषित करके उनकी निन्दा की और गुरू अर्जुन देव को मौत के घाट उतार दिया। मुगलों के हाथों यही हाल नौवें गुरू का भी हुआ। दसवें गुरू गोविन्द सिंह जी ने घोषणा की थी 'मेरे सिख, हिन्दू-मुसलमान, छूत-अछूत, ऊंचा और नीचा के बीच के भेद-भाव को मिटाकर छोड़ेंगे और ईश्वर को पिता माननेवाले स्‍त्री और पुरुषों के भ्रातृत्व की सृष्टि करेंगे।` सिख गुरूओं ने वर्णभेद मिटाने कें लिए संगत, पंगत तथा धर्मसाल नामक संस्थाओं को स्थापित किया।

(श्रोत : भारतीय चिंतन परंपरा : के दामोदरन तथा डा. जसबीर सिंह सावर का लेख 'दलित चेतना और श्री गुरू ग्रंथ साहिब` युद्धरत आम आदमी : अक्टूबर-दिसंबर,२००३)


अन्य चिंतन प्रणालियां

भारतीय चिन्तन परम्परा में ऐसी अनेक चिंतन प्रणालियां विकसित हुइंर् जो वेदों की सत्ता के खिलाफ थी और वर्णव्यवस्था को चुनौती देती थी। लोकायत, सांख्य, वैशेषिक, न्याय, योग दर्शन की ऐसी ही प्रणालियां थी, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था को सीधे चुनौती देती थी, ईश्वर का निषेध करती थी तथा चिंतन की द्वंद्वात्मक और भौतिकवादी पद्धति को स्थापित करती थी। इनमें लोकायत प्रचीनतम है। लोकायत दर्शन का पुरोहित वर्ग के ऊपर इतना आतंक था कि उन्होंने लोकायतिकों द्वारा रचित ग्रंथों को नष्ट कर दिया। लोकायत दर्शन का खंडन करने के लिए माधवाचार्य ने अपने 'सर्वसिद्धांत संग्रह` में चार्वाक प्रणाली के बिखरे सूत्रों को इकट्ठा किया। इस तरह लोकायत के बारे में हमें जानकारी लोकायत के शत्रुओं से मिलती है।

लोकायत सिद्धांतों का उद्भव ऐसे काल में हुआ था जब ब्राह्मण पुरोहितों का बलि, यज्ञ और कर्मकांड पराकाष्ठा पर था। उनसे लोहा लेना लोकायतिकों के लिए जरूरी हो गया था। राधाकृष्णन लिखते हैं 'समय द्वारा प्रतिष्ठित और जनता के स्वभाव में गहरी जड़ें जमाये प्रथाओं को उदारपंथी प्रयासों से सुधारने का प्रयास निरर्थक होता यदि सदियों से चली आई उदासीनता और अंधविश्वास को चार्वाक सम्प्रदाय जैसी विस्फोटक शक्ति द्वारा हिलाया नहीं गया होता।` दक्षिणरंजन शास्‍त्री ने कहा है, 'लोकायत दर्शन के अनुयायियों ने जब सुसभ्य तथा सामान्य लोगों के हृदयों में घर बना लिया, तो इन सबने मिलकर अपनी तात्कालिक खुशहाली के लिए इस जगत में ही प्रयास करना शुरू किया। इस आन्दोलन के फलस्वरूप ही विविध कलाओं और विज्ञानों को भरपूर प्रोत्साहन मिला।`
(श्रोत : भारतीय चिंतन परंपरा)

प्राचीन काल से मध्ययुग में आने पर भक्ति आंदोलन पाते हैं जो एक महान सांस्कृतिक आंदोलन था। इसके तमाम नायक वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ खड़े थे तथा निम्न जातियों से आते थे। रैदास चमार थे, धर्मदास अछूत जाट किसान थे, सेना नाई थे, कबीर जुलाहा थे, दादू बुनकर थे, नामदेव दर्जी थे, तुकाराम नीची जाति के व्यापारी थे। बंगाल के महान संत चैतन्य भी एक गरीब परिवार में जन्मे थे। आंध्र के सुप्रसिद्ध कवि वेमन्ना एक निरक्षर किसान थे। तुंचथ एलुत्तछन, जिन्होंने रामायण और महाभारत के मलयाली संस्करणों की रचना की थी और मलयाली साहित्य के पिता माने जाते हैं, एक चक्काल अर्थात तेली थे। रामानंद ने देश में दूर-दूर तक भ्रमण किया और ब्राह्मणों के परमाधिकार और जाति-प्रथा का खंडन किया। उनका सरल मंत्र था : 'जात-पांत पूछै नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।` (श्रोत : भारतीय चिंतन परम्परा)


इस्लाम तथा ईसाई धर्मों ने भी वर्ण व्यवस्था को कमजोर करने में, भारतीय समाज को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने तथा दलितों को इज्जत की जिंदगी देने में महान योगदान दिया। इन धर्मों का आगमन तलवार तथा बंदूक के साथ हुआ था। इसलिए भारतीय समाज व्यवस्था में इनका हस्तक्षेप ज्यादा कारगर और मजबूत था, तथापि इस्लाम तथा ईसाइयत में जो भी धर्मांतरण हुए वे बलपूर्वक नहीं किए गये क्योंकि ऐसा होता तो, इस्लाम और ईसाइयत के साथ जो शासक भारत आये थे उनका कुल शासन लगभग एक हजार वर्षों का हुआ, एक हजार वर्षों में शायद एक भी हिन्दू भारत में नहीं बचते। सारी जनता मुस्लिम या ईसाई हो गयी होती। आज के माहौल में इस तथ्य को बार-बार दुहराने की जरूरत है। हिन्दू समाज आज भी मनुवादी मानसिकता से उबर नहीं पाया है। यही कारण है कि धर्मांतरण आज भी हो रहे हैं।

ऊपर के विश्लेषण की रोशनी में हम देख पाते हैं कि धर्म की आलोचना का अर्थ आवश्यक रूप से वर्णव्यवस्था की आलोचना करना है। कोई भी आलोचना सापेक्षिक तथा तुलनात्मक होनी चाहिए। वर्ण व्यवस्था की आलोचना करने मात्र से धर्म की आलोचना पूरी नहीं हो जाती है। धर्म के किसी भी आलोचक को हिन्दू धर्म के उद्भव, विकास और अन्तर्वस्तु की तुलना ऊपर वर्णित धर्मों के उद्भव, विकास और अन्तर्वस्तु से करनी होगी और स्पष्ट करना होगा कि धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन से हम एक अप्रिय निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जहां अन्य धर्म अपने मूल स्वरूप में मानवतावादी है, वहीं हिन्दू धर्म एक अमानवीय धर्म है।

इस बिंदु पर एक और प्रश्न हमारे सामने आ खड़ा होता हैै। न केवल हिन्दू समाज बल्कि अन्य धार्मिक समुदाय भी जाति-व्यवस्था से ग्रस्त समाज हंै। धर्म की आलोचना यदि वर्ण व्यवस्था की आलोचना होती है तथा वर्ण व्यवस्था हिन्दू धर्म का विशिष्ट चरित्र है तो वर्ण भेद से ग्रस्त अन्य धार्मिक समुदायों के लिए वर्णव्यवस्था की आलोचना कौन सा अर्थ ग्रहण करता है? मुस्लिम, ईसाई तथा सिक्ख समाज में व्याप्त जाति-व्यवस्था की आलोचना उन समाजों या धर्मों के आधुनिक स्वरूप की आलोचना करना है जबकि हिन्दू समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था की आलोचना प्राचीनतम हिन्दू धर्म के मूल स्वरूप तथा अन्तर्वस्तु की आलोचना करना है।

हाल के वर्षों में हिन्दू और मुस्लिम समाजों में व्याप्त वर्णव्यवस्था पर दो कृतियां प्रकाशित हुई हैं-कंाचा इलैया का 'क्यों मैं हिन्दू नहीं हूं` तथा अली अनवर का 'मसावात की जंग`। अली अनवर मुसलमानों में व्याप्त वर्ण व्यवस्था का पर्दाफाश करते हुए कहते हैं कि यह इस्लाम के मौलिक उसूलों के खिलाफ है जब कि कांचा इलैया कहते हैं कि शाी़य हिन्दू धर्म के सिद्धांत खुद इस बात को सिद्ध करते हैं कि वे हिन्दू नहीं हंै। अंबेदकर ने घोषणा की थी कि हिन्दू धर्म में जन्म लेना उनके वश में नहीं था लेकिन हिन्दू होकर वे मरेंगे नहीं। एक हिन्दू दलित बहुजन जितनी सहजता और विश्वसनीयता से अपने हिन्दू नहीं होने का तर्क जुटा सकता है, यह सहजता एक बौद्ध, जैन, मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई को हासिल नहीं है। एक मुस्लिम अपने धर्म में रहते हुए जातिगत भेदभाव के खिलाफ जंग जारी रख सकता है क्योंकि 'कुरान` उसके जंग में सबसे बड़ा सहायक है। यही स्थिति एक सिक्ख तथा ईसाई के साथ भी है। बाबा साहब अंबेदकर तथा पेरियार का जीवन और दर्शन प्रमाणित करता है कि एक हिन्दू दलित-बहुजन को वर्णभेद से मुक्ति पाने के लिए धर्म का त्याग करने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचता है क्योंकि हिन्दू धर्मग्रंथ ही उसकी सामाजिक गुलामी का मूल कारण हंै।
अंबेदकर और पेरियार में एक मौलिक अंतर है। अंबेदकर हिन्दू धर्म को त्यागकर धर्मांतरण करते हैं तथा बौद्ध बन जाते हैं। पेरियार हिन्दू धर्म का त्याग नास्तिक बनकर करते हैं। पेरियार धर्मांतरण नहीं करते हैं।

अभी तक हमने धर्म की आलोचना के दो मापदंड निर्धारित किये हैं :
१. वर्ण-व्यवस्था की आलोचना धर्म की आलोचना का मुख्य आधार होना चाहिये।
२. वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ अन्य धर्मों की प्रगतिशील ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करना तथा हिन्दू धर्म के उद्भव, विकास एवं अन्तर्वस्तु की अन्य धर्मों के उद्भव, विकास एवं अन्तर्वस्तु के साथ तुलनात्मक अध्ययन करना धर्म की आलोचना का प्रमुख आयाम है।
धर्म की आलोचना फिर भी पूरी नहीं होती है। तमाम आधुनिक धर्म, बिना किसी अपवाद के साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शोषण का औजार बन चुके हैं। 'समाजवाद और धर्म` शीर्षक लेख में लेनिन लिखते हैं 'आधुनिक पूंजीवादी देशों में धर्म का आधार मुख्य रूप से सामाजिक है। आधुनिक धर्म की जड़ें मेहनतकश अवाम के सामाजिक उत्पीड़न तथा पूंजीवाद की अंधी शक्तियों, जो निर्धन मेहनतकश जनता के लिए असाधारण घटनाओं जैसे युद्ध, भूकम्प आदि से भी हजारों गुना ज्यादा तकलीफ घड़ी-दर-घड़ी लेकर आता है, में गहराई तक धंसा हुआ है। भय ने ईश्वर को पैदा किया।` पूंजी की अंधी शक्ति के भय ने-अंधी इसलिए कि आम जनता इसकी कार्यविधि को नहीं देख सकती है-एक ऐसी शक्ति जिसके कारण जीवन के प्रत्येक कदम पर मजदूर और टूटपूंजिये व्यापारियों को अचानक, अप्रत्याशित, असामयिक बर्बादी और तबाही-जो मुफलिसी, भूख से मौत, भिक्षावृति और वेश्यावृति साथ लेकर आता है-का भय बना रहता है। यही है आधुनिक धर्म का मूल श्रोत जो सभी भौतिकवादियों को, यदि वे हमेशा के लिए बचकाने भौतिकवाद में फंसे रहना नहीं चाहते हैं, सर्वप्रथम याद रखना चाहिये।`
धर्म की आलोचना राजनीति की आलोचना में तब परिवर्तित हो जाती है जब हम पाते हैं कि उत्पीड़ितों की राजनीति दो खेमों में बंटी है : एक वर्गवादी खेमा, दूसरा वर्णवादी खेमा। मार्क्सवाद-लेनिनवाद वर्गवादी खेमे का, जब कि बुद्ध, फुले, अंबेदकर, पेरियार तथा लोहिया के विचार वर्णवादी खेमे का सैद्धांतिक आधार हंै। दोनों खेमों के बीच श्रम-विभाजन की स्थिति बनी हुई है-वर्ग का सवाल वर्गवादी खेमा तथा वर्ण का सवाल वर्णवादी खेमा उठायेगा। वर्ण-व्यवस्था में निहित श्रम विभाजन का ही प्रतिबिंब राजनीति का श्रम-विभाजन है। यही श्रम विभाजन जनतांत्रिक शक्तियों की असफलता का मूल कारण है। वर्णवादी खेमा धर्म की आलोचना में वर्ण का सवाल तो उठाता है किन्तु पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का सवाल गौण कर देता है, दूसरी ओर वर्गवादी खेमा धर्म की आलोचना को पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की आलोचना से तो जोड़ता है किन्तु वर्ण के सवाल को गोल कर देता है। इस तरह धर्म की आलोचना कभी पूरी नहीं हो पाती है। धर्म की पूरी आलोचना इन दो खेमों को एकीकृत कर देगी या इन दो खेमों का एकीकरण आलोचना के खंडित अंगों को जोड़कर पूरा कर देगा।

भौतिकवाद मार्क्सवाद-लेनिनवाद का विकास दार्शनिक आधार है। हम पहले देख चुके हैं कि भारत में भौतिकवादी दर्शन का विकास पुरोहितवाद, कर्मकांड और वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष से हुआ। प्राचीन भौतिकवाद वेदों एवं अन्य धर्मग्रंथों में स्थापित भाववादी दर्शन का एंटीथीसिस है। वर्गवादियों को वर्णव्यवस्था की आलोचना को धर्म की आलोचना का आधार बनाना होगा। मार्क्सवादी इतिहासकारों तथा विद्वानों जिनमें डी.डी. कोसांबी सर्वप्रमुख हैं, ने वर्ण व्यवस्था की आलोचना की है। किन्तु वर्गवादी राजनीति, जहां दर्शन अपनी व्यवहारिक अभिव्यक्ति पाता है, भारतीय भौतिकवाद के खास चरित्र की अभिव्यक्ति अभी तक नही हो पायी है।


लिबरेशन थियॉलॉजी

शोषण के खिलाफ संघर्ष में धर्म का उपयोग करना लिबरेशन थियॉलॉजी है। लैटिन अमेरिका तथा अमेरिकी महादेश में अमेरिकी सम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई में लिबरेशन थियॉलॉजी अस्तित्व में आया। लैटिन अमेरिकी मार्क्सवादियों ने भी लिबरेशन थियॉलॉजी के महत्व को समझा। फिडेल कास्ट्रो ने आह्वान किया कि जो गरीबों का शत्रु है, वह यीशू का भी शत्रु है। ईसाई धर्म के मौलिक, विशुद्ध एवं प्राचीनतम स्वरूप से प्रेरणा पाकर लैटिन अमेरिका में पादरियों का एक ऐसा क्रांतिकारी दस्ता तैयार हुआ जो गरीबी, भूखमरी, बेगारी एवं साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शोषण के खिलाफ सेक्यूलर क्रांतिकारियों के साथ संघर्ष में शामिल हुए। क्रांतिकारी पादरियों के चिंतन और कर्म को 'लिबरेशन थियॉलॉजी` कहा गया।

लिबरेशन थियॉलॉजी के प्रवक्ता एवं ब्राजील के पादरी फ्रेई बेट्टो ने लिबरेशन थियोलॉजी पर क्यूबा के राष्ट्रपति फिडल कास्ट्रो के साथ एक लंबी बातचीत की थी, जो पुस्तकाकार मेंे प्रकाशित हुई है। यह किताब बताती है कि जनतंत्र के लिए लड़ाई में धर्म की प्रगतिशील भूमिका हो सकती है। लिबरेशन थियॉलॉजी पर फिडेल के विचारों को जानना जरूरी प्रतीत होता है क्योंकि 'लिबरेशन थियॉलॉजी` धर्म और जनतंत्र के संयोग से उत्पन्न विचारधारा है तथा फिडेल २०वीं-२१वीं सदी में जनतंत्र के एक महान योद्धा हैं। बातचीत के क्रम में फ्रेंड बेट्टो ईसा मसीह के जीवन की तीन घटनाओं का उल्लेख करते हैं जो यह साबित करता है कि ईसा मसीह का मानना था कि दूसरों का शोषण करके ही कोई अमीर बनता है। यह हिन्दू धर्म की उस मान्यता के ठीक विपरीत है जो गरीबी एवं अन्य कष्टों को पूर्व-जन्म में किए गये कर्मों का परिणाम बताता है।

१. एक बार एक अमीर व्यक्ति ईसा मसीह का शिष्य बनने के लिए उनके पास गया। ईसा मसीह ने उससे कहा, 'मेरा शिष्य बनने के लिए तुम्हें एक काम और करना होगा। तुम्हारे पास जो कुछ है उसे बेचकर गरीबों में बांट दो। जाओ, गरीबों के प्रति कर्तव्य को पूरा करो और तब मेरे पास आओ।`
२. ईसा मसीह एक बार जकाहाउस नाम के एक अमीर आदमी के घर गये। उसके घर की भव्यता देखकर ईसा मसीह ने कहा, 'तुम एक चोर हो क्योंकि तुम्हारे पास जो है वह तुमने गरीबों से चुराया है।`
३. कुछ लोगों के पूछने पर कि ईसा मसीह के दल में शामिल होने के लिए क्या करना होगा ईसा मसीह के शिष्य जॉन द बैपटिस्ट ने जवाब दिया कि जिनके पास दो कोट है वह एक कोट उसको दे दें जिसके पास एक भी कोट नहीं है।
फिडेल कहते हैं, 'क्राइस्ट ने उपदेश देने के लिए अमीरों को नहीं बल्कि बारह गरीब और निरक्षर मजदूरों को चुना था-उनमें कुछ सर्वहारा, कुछ मछुआरे तथा कुछ अपना काम धंधा करने वाले थे।`

फिडेल आगे कहते हैं, 'बाइबिल में क्राइस्ट के चमत्कारों की चर्चा है जिसमें क्राइस्ट लोगों को भोजन देने के उद्देश्य से जादू से रोटियां और मछलियां उत्पन्न करते थे। यह ठीक वही काम है जो हम क्रांति और समाजवाद के साथ करना चाहते हैं अर्थात् लोगों को खिलाने के लिए मछली और रोटी उत्पन्न करो, स्कूलों, शिक्षकों, अस्पतालों और डाक्टरों की संख्या बढ़ाओ, फैक्टरियों, खेतों तथा नौकरियों की संख्या बढ़ाओ, औद्योगिक और कृषि उत्पादन बढ़ाओ और इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रयोगशालाओं एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों की संख्या बढ़ाओ।`

फिडेल कहते हैं : 'जितनी समानता ईसाईयत और पूंजीवाद के बीच है उससे दस हजार गुना ज्यादा समानता ईसाईयत तथा साम्यवाद में है। क्यूबा की ननें जब कोढ़ियों, क्षयरोगियों तथा अन्य संक्रामक रोगों से ग्रस्त रोगियों की सेवा करती हैं तो वे वही काम करती हैं जो हम कम्युनिस्टों द्वारा करने की अपेक्षा रखते हैं।`

कास्ट्रो आगे कहते हैं- 'ईसाईयत गुलामों, शोषितों, गरीबों का धर्म था, जो कब्रिस्तान में रहते थे, जिन्हें भयानक दंड दिये गये, जिन्हें मनोरंजन के लिए सर्कस में शेरों तथा अन्य हिंसक पशुओं के सामने छोड़ दिया जाता था, जिन पर सदियों तक सभी तरह के लोमहर्षक अत्याचार किये गये। रोमन साम्राज्य ने, जो ईसाइयत को क्रांतिकारी सिद्धांत मानता था, इसके माननेवालों पर भयानक जुर्म किये।...जैसे अत्याचार प्राचीन ईसाइयों पर किये गये वैसे ही आधुनिक क्रांतिकारियों पर भी किये जा रहे हैं।`

अक्टूबर,१९८० में मध्य अमेरिकी देश निकारागुआ में सैंडिनिस्टा नेशनल लिबरेशन फ्रंट की क्रांतिकारी पार्टी की सरकार ने मार्क्स एंगेल्स एवं परवर्ती मार्क्सवादियों के धर्म विरोधी विचारों की ओर ईशारा करते हुए दस्तावेज जारी किया। जिसमें कहा गया, 'कुछ लेखकों का कहना है कि धर्म मनुष्य के अलगाव का एक औजार है जो कि वर्गीय शोषण को आसान बनाता है? निस्संदेह इस कथन का वहीं तक ऐतिहासिक महत्व है जहां तक राजनीतिक वर्चस्व के लिए धर्म ने सैद्धांतिक सहारे का काम किया है। इस कथन के समर्थन में हमारे देश में इंडियनों के गुलाम बनने और उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में मिशनरियों की भूमिका को याद करना पर्याप्त होगा। तथापि सैंडिनिस्टा का अपने अनुभवों के आधार पर कहना है कि ईसाई, जब अपने धर्म पर विश्वास करते हुए, इतिहास और जनता की जरूरतों के अनुसार सक्रिय होते हैं तो उनका विश्वास उनमें क्रांतिकारी जुझारूपन पैदा करता है। हमारा अनुभव बताता है कि एक व्यक्ति एक ही साथ धार्मिक और अडिग क्रांतिकारी दोनों हो सकता है और दोनों के बीच कोई अपराजेय अंतरविरोध नहीं है।`

लिबरेशन थियॉलॉजी मार्क्सवाद के विरोध में नहीं है बल्कि इसके सूत्र मार्क्सवाद में ही मिल जाते हैं। एंगेल्स ने 'दैवी संदेश का ग्रंथ` शीर्षक लेख में अर्नेस्ट रेनन नाम के एक जर्मन लेखक को उद्धृत करते हुए लिखते हैं : 'अर्नेस्ट रेनन ने एक अच्छी चीज कही है-'जब आप को यह जानने की इच्छा हो कि ईसाई धर्म के प्रारंम्भिक समुदाय ठीक किस प्रकार के थे, तो उनकी तुलना हमारे पादरियों की आजकल की धार्मिक परिषदों से आप न कीजियेगा। उनकी तुलना दरअसल अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ की स्थानीय शाखाओं से करना अधिक सही होगा।` रेनन की बात का समर्थन करते हुए एंगेल्स आगे लिखते हैं, 'और यह सही है। ईसाई धर्म ने आम जनता को उसी तरह प्रभावित किया था जिस तरह की आधुनिक समाजवाद आज करता है। इनके कुछ विचार अधिक स्पष्ट थे, कुछ अधिक उलझे हुए थे-अधिकांशतया वे उलझे हुए ही थे किन्तु.. 'अधिकारी वर्ग` के विरूद्ध थे। इसी लेख में एंगेल्स आगे लिखते हैं 'हर महान क्रांतिकारी आंदोलन की तरह ईसाई धर्म का भी निर्माण जनता ने किया था। उसका उदय फिलिस्तीन में हुआ था। यह कैसे हुआ था इसके बारे में हमको बिल्कुल जानकारी नहीं है। उसका उदय ऐसे समय हुआ था जब कि नये मत-मतान्तरों, नये धर्मों और नये पैगम्बरों का सैंकड़ों की तादाद में जन्म हो रहा था। वास्तव में, वह केवल एक ऐसा औसत है जिसका निर्माण इनमें से अधिक प्रगतिशील धार्मिक सम्प्रदायों के आपसी संघर्षण से अपने आप हुआ था।`

'बूनो बेयर तथा आरंभिक ईसाई धर्म` शीर्षक लेख में एंगेल्स लिखते हैं- 'यह नया धार्मिक दर्शन अपने अनुयायी गरीबों, दुखियारों, दासों तथा तिरस्कृतों के बीच ढूंढता है, धनियों, सत्ताधीशों तथा विशेषाधिकार सम्पन्न लोगों से वह घृणा करता है। समस्त सांसारिक सुखों का परित्याग करने तथा शरीर को पीड़ा पहुंचाने के धर्मोद्देश्य की उत्पत्ति इसी भावना के अन्दर से हुई थी।`

'चर्च विरोधी आन्दोलन-हाइड पार्क में प्रदर्शन` शीर्षक लेख में मार्क्स लिखते हैं-'ईसाई धर्म के महान संतों ने आम जनता की आत्माओं के उद्धार के लिए स्वयं अपने शरीर को यातना दी थी; आधुनिक शिक्षित संत स्वयं अपनी आत्मा के उद्धार के लिए आम जनता के शरीरों को यातनायें देते हैं।

इन दिनों लैटिन अमेरिका में वामपंथ की जो हवा चल रही है उसमें लिबरेशन थियॉलॉजी की बड़ी भूमिका है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति एवं फिडेल कास्ट्रो के बाद अमेरिकी साम्राज्यवाद के सबसे बड़े विरोधी नेता ह्यूगो शावेज अपने भाषणों में ईसा मसीह को याद करना नहीं भूलते हैं। सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप में समाजवादी व्यवस्था का सम्पूर्ण ध्वंस तथा चीन, वियतनाम में पूंजीवादी की वापसी वहां के मार्क्सवादियों द्वारा ईसाई तथा बौद्धों धर्मों को लिबरेशन थियॉलॉजी के रूप में विकसित न कर पाने की विफलता में भी ढूंढ़ा जा सकता है। लिबरेशन थियॉलॉजी लोकतंत्र की लड़ाई को मजबूत तथा तेज करने में एक बड़ा विचारधरात्मक योगदान है।


फासीवाद के दार्शनिक पिता नीत्शे ईसाई धर्म से बेइंतहा घृणा करता था। उसने अपने ग्रंथ 'एंटी क्राइस्ट` में ईसा मसीह के बारे में लिखा, इस अराजकतावादी संत ने समाज के निम्नतम तबका, समाज बहिष्कृतों, यहूदी धर्म के चांडालों को तात्कालिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करने के लिए भड़काया था और वह भी एक ऐसी भाषा में, यदि ईसाई धर्म ग्रंथों पर विश्वास किया जाए, जो आज भी किसी को निर्वासन में साईबेरिया भिजवा सकता है। वह व्यक्ति एक राजनीतिक अपराधी था।` अपने इसी ग्रंथ में नीत्शे ने ईसाई धर्म के सामाजिक समानता के सिद्धांत की आलोचना करते हुए लिखा, समानता के सिद्धांत से बढ़कर विषैला विष और कुछ नहीं है` तथा 'बुराईयों` का स्त्रोत अधिकारों की असमानता नहीं बल्कि समान अधिकरों की मांग करना है।` नीत्शे की नजर में बौद्ध तथा ईसाई धर्म 'सर्वविध्वंसक निहिलिस्टिक धर्म` तथा 'मरणशीलन धर्म` है। नीत्शे वस्तुत: मनु का जर्मन चेला था। वंचित वर्गों के लिए वह 'चांडाल` शब्द प्रयुक्त करता था जो उसने 'मनुस्मृति` से उधार लिया था। 'बाइबिल` उसकी नजर में एक घटिया तथा 'मनुस्मृति` एक महान ग्रंथ था। 'एंटी क्रांइस्ट` में उसने लिखा है कि 'मनुस्मृति` जैसे महान ग्रंथ की तो 'बाइबिल` जैसे निकृष्ट ग्रंथ से तुलना भी नहीं की जा सकती है। 'एंटी क्राईस्ट` में नीत्शे ने लिखा, 'मनुस्मृति एक समुदाय को भविष्य में स्वामित्व तथा जीवन की महानतम कला को प्राप्त करने की आकांक्षा करने का अधिकार देता है।` ऐसा नहीं था कि नीत्शे 'मनुस्मृति` के झूठ को नहीं समझता था। वर्गीय घृणा का यह साक्षात् देवपुरुष आगे लिखता है, 'इस साध्य (भविष्य में स्वामित्व तथा जीवन की महानतम कला को प्राप्त करना) ही प्रत्येक पवित्र झूठ का उद्देश्य है।` हिन्दुओं की तरह नीत्शे भी जाति-व्यवस्था को सनातन व्यवस्था मानता था। वह 'एंटी-क्राइस्ट` में आगे लिखता है, 'जाति-व्यवस्था एक प्राकृतिक व्यवस्था है जिस पर किसी आधुनिक विचारधारा का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता है। श्रेष्ठ जाति जिसे मैं अल्पतम जाति कहता हूं, को आदर्श और पूर्ण जाति होने के कारण अल्पतम का विशेषाधिकार मिला हुआ है : उनके ही ऊपर धरती पर सुख, सौंदर्य और अच्छाई को प्रकट करने की जिम्मेदारी है।` भारत के दलित-बहुजन जानते हैं कि वे कौन हैं जिन्हें नीत्शे के शब्दों में 'अल्पतम का विशेषाधिकार` मिला हुआ है।
सवर्ण वामपंथी बुद्धिजीवी सांप्रदायिक फाासीवाद को जर्मन फाासीवाद से प्रेरित बताकर उल्टी गंगा बहाते हैं जबकि सीधी गंगा यह है कि खुद जर्मन फासीवाद का दार्शनिक पिता 'मनुस्मृति` से प्रभावित था। नीत्शे के 'सुरपरमैन` की अवधारणा ही नाजीपार्टी के आर्य नस्ल की श्रेष्ठता की अवधारणा में परिवर्तित हुई तथा इतिहास के क्रूरतम नरसंहार, जिसमें साठ लाख यहूदियों को भीषण यातना देकर मारा गया, की पूर्वपीठिका बनी। नीत्शे का 'सुपरमैन` 'मनुस्मृति` से ही निकला था। पूरी 'मनुस्मृति` और कुछ नहीं बल्कि सुपरमैनों के बल पर शूद्रों और चांडालों पर शासन करने की योजना है। (देखें ब्रजरंजन मणि का लेख : ब्राह्मणवादी राष्ट्रीयता और सामाजिक फाासीवाद अर्थात मनु का ब्राह्मण और नीत्शे का सुपरमैन : हंस, फरवरी, २००२)
नीत्शे से पचास साल पहले पैदा हुए एक और जर्मन दार्शनिक शॅपेनहावर भी 'मनुस्मृति` से खासा प्रभावित था। जिन जर्मन दार्शनिकों की रचनाएं आगे चलकर नाजीवाद का वैचारिक आधार बनीं उन पर 'मनुस्मृति` तथा वैदिक दर्शन के प्रभाव की जांच पड़ताल करना एक अलग अध्ययन तथा शोध का विषय है।


ऊपर के उद्धरणों से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जब हम धर्म की आलोचना करते हैं, धर्म को एक सिरे से खारिज करते हैं तो ऐसा हम धर्मों के आधुनिक रूपों के संदर्भों में कर रहे होते हैं। यद्यपि हम ऐसा सचेत रूप में नहीं करते हैं। जनता पर धर्म के अफीम के नशे को तोड़ने के लिए धर्मों के इतिहास से उत्पन्न इतिहास बोध की जरूरत असंदिग्ध है। आधुनिक धर्मों के खिलाफ संघर्ष में प्राचीन धर्मों का महत्व स्वयंसिद्ध है। यह पुनरूत्थानवाद नहीं है, जो अपना आश्रय इतिहास के काल्पनिक बिंबों में ढूंढ़ता है, बल्कि अलोकतांत्रिक धर्मों के पुनरूत्थानवाद के खिलाफ इतिहास की वास्तविक घटनाओं का आह्वान है। लिबरेशन थियॉलॉजी, इस्लाम, बौद्ध, सिक्ख धर्मों के इतिहास और उसकी मूल अवधारणाओं एवं शिक्षाओं में ढूंढा जा सकता है। किन्तु 'लिबरेशन थियॉलॉजी` को हिन्दू धर्म में ढूंढ़ना असंभव है।


अशोक यादव युवा लेखक व सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं।