December 24, 2007

जाति केवल मानसिकता नहीं

साक्षात्‍कार


  • चिंतक योगेन्द्र यादव से अनीश अंकुर की बातचीत


जाति एक सामाजिक ढांचा है, संगठन है। केवल मानसिकता होती तो उसका शुद्ध विचारधारा से विरोध किया जा सकता था लेकिन चुंकि वह शुद्ध मानसिकता नहीं है, उसके पीछे बहुत बड़ा सामाजिक संगठन है, जो दिन-रात अपने आपको पुनरुत्पादित करता है जो परंपरागत पेशे से जुड़ा है। जब तक उसमें कोई व्यवस्थित हस्तक्षेप नहीं किया जाए यह व्यवस्था अपने आपको पुनरुत्पादित करती रहेगी।


अनीश अंकुर : आपने-अपने कल के व्याख्यान में जाति को सिर्फ सामाजिक श्रेणी (सोशल कटेगरी) के रूप में देखा है जबकि यह एक आर्थिक श्रेणी (इकोनॉमिक कटेगरी) भी है। आप हमेशा शब्द इस्तेमाल करते हैं 'ब्राह्मणवाद।` जबकि यह एक स्थापित सा तथ्य है कि 'जाति` भारतीय सामंतवाद की विशिष्ट अभिव्यक्ति है। सामंतवाद का जिक्र आप प्राय: नहीं करते। क्या यह सचेत है?

योगेन्द्र यादव : हम आरक्षण या ऐसे किसी भी मामले पर मीडिया या बुद्धिजीवियों में पूर्वाग्रह को सीधे-सीधे उनकी जाति व उसमें एक सचेत जातिवाद से जोड़कर देखते हैं। अमूमन ऐसा विचार बन गया है कि जातिवादी पूर्वग्रह इसलिए आते है क्‍योंकि किसी न किसी स्तर पर यह अगड़ों का जातीय षडयंत्र है। मैं इस धारणा से दूर हटना चाहता था। मैने कहा कि जातीय चेतना जाति के असर का केवल एक स्तर है इसके अलावा अवचेतन स्तर पर जातीय संस्कारों का बड़ा असर होता है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण चीज है जातीय ढांचा। एक ढांचे के बतौर जाति कैसे उन परिस्थितियों का निर्माण करती है जिसमें हम सोचते हैं। जाति के कई और परिणाम होते हैं। जाति की खुद की बुनावट कई चीजों को लेकर बनी है जिसमें परंपरागत पेशा बहुत जरूरी चीज है। अगर मुझे समय मिले, जाति व्यवस्था के बारे में विस्तार से कहने के लिए, तो शायद मैं इन चीजों का जिक्र करूं। आरक्षण के सवाल पर मैंने खुद कहा था कि अब मेरी मान्यता है कि पिछड़ों के लिए आरक्षण केवल जातीय आधार पर नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारे समाज में जो भेदभाव है वह अनेक स्तरों पर व अनेक कारणों से बना है जिसमें आर्थिक कारण भी शामिल हैं। लेकिन एक बात आप ठीक कह रहे हैं कि 'सामंतवाद` शब्द का मैंने जिक्र नहीं किया। यह निश्चय ही किसी न किसी स्तर पर सचेत रहा होगा। मुझे अक्सर महसूस होता है कि भारतीय समाज की विशिष्टता को समझने के लिए सीधे-सीधे यूरोपीय इतिहास से रूपक उठाकर इस्तेमाल करना हमारी बहुत मदद नहीं करता। क्‍योंकि रूपक की अपनी ताकत होती है। वह किन्हीं स्मृतियों से नहीं चले आते। अगर आप यह कहें कि मै सामंतवाद शब्द व उससे जुड़े तमाम सिद्धांतों के बोझ से बचना चाहता हूं तो यह गलत नहीं होगा। मुझे यह जरूर महसूस होता है कि हमारे यहां के इतिहास लेखन में जिस किस्म से सामंतवाद शब्द का प्रयोग हुआ है वह बहुत उपयोगी नहीं है। खासतौर पर जाति व्यवस्था की विशिष्टता को समझने के लिए। इसकी उपयोगिता पर मुझे शंका होती है। इसका मतलब यह नहीं कि किसी भी बड़े फ्रेम का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मैं किसी भी मामले में पोस्ट मार्डर्निस्ट नहीं हूं और अपने लेखन व सोच में इसका आलोचक रहा हूं। तो आग्रह यह नहीं है कि किसी बड़े फ्रेम का इस्तेमाल न किया जाए लेकिन सामंतवाद वह बड़ा फ्रेम हो सकता है, इसमें मुझे संदेह है।


अनीश अंकुर : आपने कहा कि सामंतवाद से बचना सचेत कोशिश है। मैं थोड़ा और जानना चाहता हूं। इस जातीय चेतना को पुनरूत्पादित करने वाली कौन सी शक्तियां हैं? आप कहते हैं कि आधुनिकता 'जाति` को मजबूत बनाती है। जाति एक पूर्व आधुनिक श्रेणी (प्री-मॉडर्न कटेगरी) है। जब आधुनिकता आई तो स्वभाविक प्रक्रिया में जाति को खत्म हो जाना चाहिए था। क्या कारण है कि यह आधुनिक युग में भी बनी हुई है। आपने जाति को महज 'मानसिकता` का प्रश्न बताया। मैं यही जानना चाहता हूं कि इस मानसिकता को बनाए रखने वाली, इसे खुराक पहुंचाने वाली शक्तियां कौन सी हैं?


योगेन्द्र यादव : मेरे हिसाब से जाति को पूर्व आधुनिक कहना गलत है। या यूं कहें कि पूर्व आधुनिक और आधुनिक शब्द का इस्तेमाल एक विश्लेषण के तौर पर करना बहुत ज्यादा उपयोगी नहीं है। किसी चीज को पूर्व आधुनिक इसलिए कहना कि वह औपनिवेशिक राज से पहले हिंदुस्तान में थी तो इस वर्णात्मक अर्थ में तो है पूर्व आधुनिक। लेकिन जब हम किसी चीज को आधुनिकता से पूर्व या कई बार परंपरागत संस्थाएं बोलते हैं तो उसके पीछे सिद्धांत, एक पूरे सिद्धांत का बोझ होता है; जो बताता है कि कौन सी चीजें पुरातन हैं। हमें आज के समाज का विश्लेषण करते वक्त जहां तक हो सके इस बोझ को परे रख कर सोचना चाहिए। मैं नहीं समझता जाति केवल मानसिकता है। जाति एक सामाजिक ढांचा है, संगठन है। केवल मानसिकता होती तो उसका शुद्ध विचारधारा से विरोध किया जा सकता था लेकिन चुंकि वह शुद्ध मानसिकता नहीं है उसके पीछे बहुत बड़ा सामाजिक संगठन है, जो दिन-रात अपने आपको पुनरूत्पादित करता है जो परंपरागत पेशे से जुड़ा है। व्यवसाय, शिक्षा में अवसरों और उनकी अनुपस्थिति, समाज में ऊंच-नीच, शक्ति समीकरण से जुड़ा है इसलिए जाति व्यवस्था, जब तक उसमें कोई व्यवस्थित हस्तक्षेप नहीं किया जाए यह व्यवस्था अपने आपको पुनरूत्पादित करती रहेगी। इसमें आधुनिकता के दो किस्म के बहुत बड़े योगदान हैं जिसे हमें समझना चाहिए। पहला आधुनिक शिक्षा का योगदान। जिसे हमने सोचा था कि जाति व्यवस्था को तोड़ने का सबसे बड़ा औजार बनेगी वही आधुनिक शिक्षा व्यवस्था दरअसल जाति व्यवस्था को पुख्ता करने का औजार बनी, दो-तीन मायनों में। एक तो यह कि हमारे समाज में आधुनिक शिक्षा, तामाम किस्म के जो विशेषाधिकार थे, उनका जरिया बनी। जिसके पास अंग्रेजी थी उनको जिंदगी में बेहतर नौकरी के अवसर मिले। चूंकि अंग्रेजी और आधुनिक शिक्षा समाज के उन्हीं वर्गों, जातियों, समुदायों को मिल पाई जो आज से १००-१५० साल पहले इस स्थिति में थे कि वह इस शिक्षा को ग्रहण कर सकें। इसलिए हमारे यहां अंग्रेजी और आधुनिकता एक जातीय ढांचे में घुल मिल गई। इस वजह से यह असर हुआ। दूसरा आधुनिक राजनीति। आधुनिक राजनीति ने जो प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थिति पैदा की, चुनावी राजनीति का जो गणित है उसने यह मांग पैदा की कि आपको अपने लिए वोट बैंक ढूंढना है, न मिले तो उसका आविष्कार करना है। इसलिए कई जगह जातियों का आविष्कार किया गया या तो खोज की गई। जिस जाति को बिहार में आजकल यादव कहा जाता है वह दरअसल तीन उपजातियों या समुदायों का राजनैतिक गठबंधन है। समझौतावादी राजनीति के चलते जिसका अविष्कार किया गया। इसी तरह से आप तमाम राज्यों में देखिए। चुनावी राजनीति जिसको हम पार्टी पॉलिटिक्स कहते हैं। हम भूल जाते है कि Party शब्द अंग्रेजी Part शब्द से निकला है यानी कि Party आस्तित्व में आती ही इसलिए है ताकि वो समाज का विभाजन कर सके। विभाजन एक संयोग नहीं है, वह इसका मूलमंत्र है। आधुनिक राजनीति इस मान्यता पर आधारित है कि समाज को टुकड़ो में बाटेंगे , उसमें प्रतिस्पर्धा कराके सत्ता का निर्धारण करेंगे इसलिए चुनावी राजनीति दुनिया के हर इलाके में यह मांग करती है कि उसके लिए विभाजन किया जाए या तो बने बनाए विभाजनों को प्रज्जवलित किया जाए या फिर विभाजनों का अविष्कार किया जाए। चाहे वह श्वेत-अश्वेत हो, फ्रेंच भाषा भाषी हो फ्लेमिस्ट भाषा भाषी का सवाल हो बेल्जियम में। चाहे वह नस्ल का सवाल हो, रंग काया धर्म का। दुनिया के तमाम देशों में आधुनिकता एक समुदाय के निर्माण की मांग पैदा करती है। हमारे यहां आधुनिकता ने जाति समुदाय के निर्माण की मांग का स्वरूप लिया है इसलिए आधुनिकता ने जाति को पुष्ट किया है और यही करना था। पता नहीं क्यों नेहरू के जमाने में हम इस भोलेपन में थे कि ये आधुनिकता के मंजर इन संस्कारों को समाप्त कर देंगे। यह उस जमाने का भोलापन था और कुछ नहीं। हकीकत उससे अलग थी। यह होना स्वाभाविक था।

अनीश अंकुर : यहां पर मैं सवाल के रूप में एक बात रखना चाहता हूं। कल आपने व्याख्य़ान में कहा था कि लालू यादव इसलिए हारे क्योंकि वे गलत लोगों के हाथों में फंस गए थे। उनके इरादे (इन्टेंशन) गलत नहीं थे जबकि कल ही आपने कहा था कि मैं सही-गलत इरादे के सिद्धांत, या तर्क को नहीं मानता। यह अंर्तविरोध क्यों है? क्या आपको नहीं लगता कि सामंतवाद शब्द इस्तेमाल न कर पाने की वजह से आपको इरादे वाले तर्क का सहारा लेना पड़ा। जैसे मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा। देखने का एक नजरिया यह है कि लालू यादव एक खास ऐतिहासिक अवसर पर लंबी-लोकतांत्रिक प्रक्रिया के दौरान आए। स्वामी सहजानंद का किसान आंदोलन, त्रिवेणी संघ, समाजवादी आंदोलन, कम्युनिस्ट आंदोलन व जयप्रकाश आंदोलन यानी लोगों के बीच जो सामंतवाद विरोधी चेतना थी उसकी अभिव्यक्ति लालू यादव में हुई। पर बाद में लालू यादव ने उन्हीं सामंती शक्तियों के साथ समझौता किया। रणवीर सेना इन्हीं के वक्त सबसे खूंखार रूप में आयी। यदि हमारे इलाके में जाएं वहां के बड़े सामंत लालू के साथ हैं। यदि आप पिछले चुनाव के ३-४ सीटों का विश्लेषण करें तो आप पाएंगे कि तमाम उच्च जातियों का ध्रुवीकरण उच्च जातियों का विरोधी मानी जाने वाली राजद के पक्ष में हुआ। विशेषकर जहां उसकी लड़ाई एमएल से थीऱ्यदि आप सामंतवाद से बचेंगे तो इसे कैसे समझेंगे?
लालू यादव की हार के कई विश्लेषणों में एक महत्वपूर्ण विश्लेषण यह है कि जिस सामंतवाद विरोधी मंच पर लालू आए बाद के दौर में उन्हीं शक्तियों से समझौते की वजह से निचली जातियों, तबको से उनका अलगाव बढ़ा। परिणामस्वरूप उनकी हार हुई।

योगेन्द्र यादव : लालू यादव चुनाव हारे इसलिए कि समाज के अलग-अलग तबकों का एक बड़ा गठबंधन जो उन्होंने बनया था वह गठबंधन बिखरने लगा। उस गठबंधन में सेंध लगी। क्योंकि लालू का राज लोगों की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाया। उसने एक सीमित अपेक्षा को पूरा किया और वह था जातीय वर्चस्व की घुटन से मुक्ति दिलाने का सपना। उसको उन्होंने आंशिक रूप से पूरा किया। उस लिहाज से १९९१ में लालू की जीत, १९८९ में जो जीत थी वो अधूरी थी, बहुत बड़ी जीत थी। लालू प्रसाद की पहली सरकार को यदि आप सामाजिक अर्थ में क्रांतिकारी कहें तो मैं उसको स्वीकार करूंगा। इसलिए नहीं कि सरकार ने कुछ क्रांतिकारी काम किया बल्कि इसलिए कि इस सत्ता परिवर्तन, कि सत्ता अगड़ों के संपूर्ण वर्चस्व से हटकर उसके बाहर हाशिये पर पड़े समूहों के हाथ में आ सकती थी, यह बात स्थापित करना बिहार के संदर्भ में क्रांतिकारी था। जैसे-जैसे समय बीता वैसे-वैसे यह क्रांतिकारी पक्ष जो था वह गौण होता गया। दो-तीन वजहों से। एक तो इसलिए कि वह धीरे-धीरे पिछडों की सत्ता होने की बजाए, पिछडों में एक जाति विशेष की सत्ता बनती गई और दरअसल जाति विशेष के साथ-साथ एक परिवार विशेष की सत्ता बन गई। और यह चेहरा बहुत खुल कर सामने आ गया था जो लोकतांत्रिक कतई नहीं था। दूसरा कि सरकार से लोगों की जो न्यूनतम अपेक्षा रहती है कम से कम सुरक्षा, थोड़ा बहुत विकास, वह लेशमात्र भी पूरी नहीं हुई। दरअसल गरीबों की असुरक्षा बढ़ी और यह बात गरीबों से बहुत समय तक ओझल नहीं रह सकती थी। इसके चलते, उन्हीं के जो पक्के समर्थक थे, उनका मोह भंग होना शुरू हुआ और उन्होंने विकल्प की तलाश शुरू की। बिहार की इतने सीमित विकल्पों की जो राजनीति है उसके चलते लोगों को नया विकल्प जल्दी से मिला नहीं, इसलिए ९० के दशक के चुनावों में बात नहीं बन पाई। २००० में भी किसी तरह काम चला। इसलिए इतना लंबा अरसा लगा। नहीं तो मेरे ख्याल में २००० आते-आते उस सरकार की जो कुछ भी, सामाजिक बदलाव की क्षमता थी, चूक गई थी। ९५-९६ तक काफी हद तक चूक चुकी थी उसके बाद कुछ बचा नहीं था सरकार में। लेकिन ये विकल्पहीनता थी बिहार की और जो सबसे बड़ा विकल्प था वो कहीं न कहीं अगड़ों के राज से जुड़ा था। यह भय इसको टाल रहा था। असली सवाल यह नहीं कि वह हारे क्यों बल्कि यह है कि वह इतना कम क्यों हारे? और इतनी देर से क्यों हारे अगर ऐसी सरकार कोई हरियाणा में चलाता, तमिलनाडु में चलाता तो उसे एक सीट भी नहीं मिलती। लालू सरकार का एक पक्ष जिसे 'शुद्ध सामंती` कहना चाहिए वह था उनका व उनके परिवार का व्यक्तिगत व्यवहार। उसका जो सांस्कृतिक पहलू है वह शुद्ध रूप से सामंती है, था। उनका व्यक्तिगत व्यवहार, परिवार व दूसरे लोगों से, उनकी बेटियों की शादियां, तमाम जो शैली है लालू की, उसे सामंतवाद की नकल कहा जा सकता है और वह एक बहुत बड़ी त्रासदी की तरफ इशारा करता है कि जो हाशिया ग्रस्त समूह सत्ता पर कभी काबिज भी होते हैं तो उनके सामने सत्ता का कोई मॉडल नहीं होता। सरकार बना के, 'राजा` बन के क्या करना है इनके सामने कोई स्वस्थ मॉडल नहीं है। राजा बनके पिछले राजाओं की नकल करनी है। वह भी भोंडी नकल। यह बताता है कि हमारे यहां का पिछड़ा नेतृत्व वाकई वैचारिक, मानसिक राजनैतिक तौर पर पिछड़ा हुआ है। वह न सिर्फ समाज के पिछड़े तबके का नेता है बल्कि दुर्भाग्यवश वह बहुत पिछड़ा नेता है। लालू यादव उसकी जीती जागती मिसाल हैं। इसको मैं सामंतवाद कहने से इसलिए कतराता हूं क्योंकि सामंतवाद केवल एक शैली नहीं है। सामंतवाद केवल एक सांस्कृतिक आग्रह नहीं है। वह एक आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था का नाम है। मुझे लगता है कि अगर लालू और उनके दरबारियों के व्यवहार के सामंती पक्ष को नोट कर लें, उसके बाद सामंतवाद जैसे भारी शब्द का इस्तेमाल करने से हमें विश्लेषण में भारी मदद मिलती है-ऐसा मुझे दिखाई नहीं देता। मेरे लिए कोई भी श्रेणी अपने आप में सच्ची या झूठी नहीं होती। वह उपयोगी अथवा अनुपयोगी होती है। मुझे अक्सर पश्चिम के इतिहास से ली गई इन बड़ी अवधारणाओं के बारे में यही लगता है कि वह दिखाती कम है छुपाती ज्यादा है। यह बात सच है कि राजनैतिक सत्ता अक्सर या कुछ बुनियादी मायने में ढांचागत सीमाओं के भीतर काम करती है लेकिन हम अक्सर इसे ढांचागत सीमाओं को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर देखते हैं । हम भूल जाते हैं कि उन सीमाओं के भीतर कितना कुछ किया जा सकता है। सामान्य दैनंदिन राजनीति उन सीमाओं के भीतर होने वाला खेल है अगर प्रश्न यह है कि लालू प्रसाद यादव की सरकार ने बिहार में बुनियादी आर्थिक क्रांति क्यों नहीं की तो उत्तर वही होगा, जो आपने कहा यानी जो यहां स्थापित आर्थिक-सामाजिक सत्ता के समीकरण से टक्कर नहीं लेगा। जिसका एक पक्ष सामंती है (पूरा नहीं) वो व्यक्ति आर्थिक सामाजिक जीवन में क्रांति नहीं ला सकता। लेकिन अगर आपका सवाल यह है कि उस सरकार ने १५ साल में सड़कें क्यों नहीं बनवाई? सरकार ने प्राइमरी स्कूल में व्यवस्था को दो सूत भी बेहतर क्यों नहीं किया? सरकार ने उच्च शिक्षा के संस्थानों का समस्त सत्यानाश क्‍यों कर दिया? यहां के प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओ की हालत बद से बदतर क्‍यों होती गई? इन सवालों का सीधा उत्तर आपको आर्थिक ढांचे में नहीं मिलेगा। क्योंकि अगर आप इसका उत्तर आर्थिक ढांचे में ढूढना चाहेंगे तो फिर आपको देखना पड़ेगा कि देश के अन्य राज्यों में जहां कमोबेश इस किस्म का आर्थिक ढांचा है बिहार जितना बुरा नहीं लेकिन कमोबेश रहा है। वहां ये चीजे क्यों हो जाती हैं ? हम जब राजनीति की ढांचागत सीमाओं की बात करते हैं या एक जमाने में मार्क्सवादी लोग 'बेस एवं सूपरस्ट्रक्चर` की बात करते थे हम कहते हैं In the last instance हम यह भूल जाते हैं कि राजनीति में उस last instance से पहले अनेकानेक instance होते हैं जिसमें हम अपना जीवन जीते हैं। रोजमर्रे की राजनीति को समझना, उस पर टिप्पणी करना उन सीमाओं के भीतर का खेल है वो एक बहुत बड़ा सवाल है। ढांचे को क्यों नहीं तोड़ा? ये प्रश्न बिहार में १९५२ से लेकर आज तक आ रही हर सरकार पर लागू होता है इससे यह आप समझ नहीं सकते कि लालू जी की सरकार १५ साल क्यों चली। जब गिरी तब क्यों गिरी? पहली बार क्यों नहीं गिर गई। हमारा ज्यादातर समय इन छोटे सवालों में गुजरता है इसलिए हमें उसे बारीकी से देखना पड़ेगा और कोई रास्ता मैं नहीं देखता।


अनीश अंकुर : बिहार, पूर्वी उत्तरप्रदेश व बंगाल स्थायी बंदोवस्त (परमानेंट सेटलमेंट) का इलाका माना जाता है। जिसे लार्ड कार्नवालिस ने लागू किया था। बंगाल ने अपने आपको सचेत रूप से स्थायी बंदोवस्त से अलग किया। जो कि दूसरी जगहों पर संभव नहीं हो पाया। बिहार वगैरह चूंकि स्थायी बंदोवस्त का इलाका है कहीं इसी वजह से तो दिक्कत नहीं है?

योगेन्द्र यादव : राजनीति का बुनियादी विश्लेषण करने में यही एक खोट रहती है कि हम भूल जाते हैं कि एक ही बुनियाद पर अलग-अलग किस्म की इमारत बन सकती है। प्रश्न पर निर्भर करता है और मुझे लगता है कि हम अक्सर जरूरत से ज्यादा बुनियाद के आधार पर चीजों को विश्लेषित करने की कोशिश करते हैं । इससे एक आत्मिक सुख मिलता है कि हमने बहुत अच्छी एक्सप्लानेशन दे दी। लेकिन दरअसल रोजमर्रे की राजनीति की बहुत गहरी एक्सप्लानेशन देना कई बार बड़ा खतरनाक होता है। जैसे स्थाई बंदोबस्त के सवाल से पश्चिम बंगाल की सरकार को जोड़ देना। यह मान कर चलना है कि जहां-जहां स्थाई बंदोबस्त था वहां-वहां इस किस्म का वामपंथी उभार होना अनिवार्य था। सीपीआई जो बिहार की बहुत महत्वपूर्ण पार्टी थी वो बिहार में विफल क्यों हुई। बंगाल में सफल क्यों हुई। इन सवालों का जवाब देने के लिए मैं फिर कहूंगा हम बुनियाद का सहारा न लें, तो वह समझदारी होगी और पश्चिम बंगाल में सीपीएम इसलिए सफल है क्योंकि उसने सामंतवाद को खत्म कर दिया, मैं इससे सहमत नहीं हूं। देखिए बहुत बड़े जमींदार बचे ही नहीं थे। १९७७ में बिहार जैसी स्थिति नहीं थी। पश्चिम बंगाल में सीपीएम ने यही किया कि बंटाईदार बेदखल नहीं हो सकें इसकी गारंटी कर दी। अब उसे सीधे-सीधे कार्नवालिस से जोड़ना वो राजनीति की अपनी reductionists reding है। मुझे खौफ होता है क्‍योंकि मैंने इस प्रकार के अध्ययन के दुष्परिणाम देखे हंै। एक गैर यूरोपीय मुल्क के इतिहास और राजनीति को समझने के लिए यूरोप से ली गई विचारधारा को Reductionist तरीके से इस्तेमाल करना बहुत खतरनाक हो सकता है।

अनीश अंकुर : अब थोड़ी बात आरक्षण संबंधी बहस पर कर लें। १९९० में आरक्षण विरोधी आंदोलन हुआ था। उसके बाद आरक्षण करीब-गरीब हमारे राजेमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुका है। १६ वर्षों बाद फिर से दुबारा आरक्षण विरोधी उभार हुआ। इन दोनों उभारों में बुनियादी फर्क क्या है? वह क्या चीज है कि १६ वर्षों बाद दुबारा उसी ताकत से उभर कर आ जाती है?

योगेन्द्र यादव : पहले देखिए कॉमन क्या है। हमारे समाज में अभी भी हालांकि आरक्षण व्यवस्था लागू है लेकिन सामाजिक न्याय के बारे में समाज में एक राय नहीं बन पाई है। खास तौर पर समाज के उस तबके में जिसे इसका कोई फायदा नहीं मिला। उस तबके में इसको लेकर एक छटपटाहट है। शहरी मध्यम वर्ग और अगड़ी जाति के लोगों में इसको लेकर कहीं दबा छुपा गुस्सा है। जैसे ही वक्त मिलता है वह गुस्सा बाहर आ जाता है। यह व्यवस्था भले ही ६० साल पुरानी हो लेकिन हमारे अगडे समाज का मानस इसे स्वीकार नहीं कर पाया है। इसकी वजह से जब भी मौका मिलता है यह बाहर आ जाता है। दूसरा, जो हमारी मीडिया है उसकी ताकत बहुत बढ़ी है, पिछले कुछ सालों में। मीडिया जो सवर्ण पूर्वग्रहों का काफी शिकार है, इसको काफी हवा देता है। आपने देखा होगा कि इस बार आरक्षण के खिलाफ जो आंदोलन हुआ उसे मीडिया ने लगभग आग्रह करके चलवाया। शुरू में तो लोग इस आंदोलन में शामिल नहीं हो रहे थे लेकिन जब टीवी चैनल चार-पांच लोगों के विरोध को रैली के रूप में दिखाने लगे तो जाहिर है उसमे थोड़ी जान आ गई। तो मीडिया उसका बहुत बड़ा पक्ष है। तीसरा, हमारी राजनैतिक मुख्यधारा है जो हमारे राजनैतिक दल हैं उनमें एक वैचारिक कमजोरी आई है। कहने को हर कोई इसके प्रति प्रतिबद्ध है क्योंकि किसी की हिम्मत नहीं है इसका विरोध करने की। हरेक को वोट दिखाई देता है लेकिन थोड़ा सा आप खुरचिए तो दलों के अंदर इस सवाल को लेकर उहापोह है। यह कुछ हद तक कांग्रेस में और बहुत हद तक बीजेपी में है। इन दोनों पार्टियों ने, जिन्होंने औपचारिक रूप से इसका समर्थन किया है, लेकिन कहीं न कहीं दुविधाग्रस्त हैं। तो ये तीनों पक्ष हैं जिसकी वजह से ये चीजें बार-बार आती हैं । अब अंतर क्या है? एक तो यह कि मीडिया की ताकत पहले से तो बढ़ी है लेकिन मीडिया का पूर्वग्रह पहले से कम हुआ है। सामाजिक न्याय के प्रवक्ता इस बात को मानते नहीं हैं लेकिन मेरी अपनी समझ है कि मीडिया खास तौर पर संपादकीय पृष्ठों में जहां मीडिया राय देता है, ९० की तुलना में ज्यादा संतुलित था। लेकिन मीडिया की ताकत कई गुना बढ़ गई तो उसका कम असंतुलित होना भी भारी पड़ा। दूसरा रोचक अंतर है कि इस बार आरक्षण का विरोध करने वाले अपने आपको समतावादी कह रहे थे। मतलब कि आरक्षण के विरोधियों ने १६ साल में कुछ सीखा। मुझे लगता है कि आरक्षण के समर्थकों ने १६ साल में बहुत कुछ नहीं सीखा। वे लगभग वहीं खड़े हैं जहां १६ साल पहले थे। वही बेचारगी, वही स्थूल तर्क और वहीं छुपाने की प्रवृत्ति यानी ओबीसी के भीतर जो तमाम सतहें हंै उनके बारे में चुप्पी साधने की प्रवृत्ति। वे इसके बारे में आंकड़े तर्क और सिद्धांत गढ़ने में असफल रहे लेकिन मंडल-२ का एक असर जरूर हुआ कि कहीं न कहीं सबके मन में ज्यादा डर बैठा हुआ है कि ये कुछ ऐसा है जिसको हाथ लगा दोगे तो पता नहीं कहां डसेगा इसलिए राजनैतिक सत्ता और आंदोलनकारी, सब इसकी सीमाओं के प्रति कहीं ज्यादा सजग हैं।


अनीश अंकुर : योगेन्द्र जी क्या आपको लगता है कि आरक्षण विरोध का इस बार एक अर्थशास्‍त्र था। उदाहरण के लिए मैं बताऊं जब ९३वां संविधान संशोधन आया तो उसमें कहा गया कि जितने वित्तरहित प्रोफेशनल कॉलेज हैं उसमें भी ५० प्रतिशत आरक्षण लागू होगा। एक अध्ययन के अनुसार निजी वित्तरहित प्रोफेशनल संस्थानों में ५ लाख १५ हजार छात्र हैं। २० हजार के लगभग मेडिकल छात्र हैं। मान लीजिए यदि एक छात्र के लिए इन संस्थानों में ३ लाख रुपया भी लिया जाता है तो कितनी बड़ी पूंजी इसमें शामिल है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। और क्या ये संयोग नहीं है कि मुंबई में जो आरक्षण विरोधी आंदोलन हुए उसे प्रोफेशनल Event managers ने ऑर्गेनाइज किया। चूंकि निजी संस्थानों को भी आर्थिक घाटा उठाना पड़ता आरक्षण लागू होने पर। अत: प्राइवेट में आरक्षण की बात पहुंचे इससे पहले सरकारी संस्थानों में ही आरक्षण के मुद्दे को ब्लॉक कर दिया जाए। क्या इसके पीछे एक सुचिंतित अर्थशा नहीं था? जिसकी ओर आप लोगों ने भी कम ध्यान दिया, मेरे ख्याल से सिर्फ पूर्वग्रह पर ही ज्यादा जोर रहा?

योगेन्द्र यादव : यह आसान अर्थशा तो नहीं ही था। आरक्षण विरोध के पीछे कुछ बहुत बड़े स्वार्थ काम कर रहे थे। उन स्वार्थों में आर्थिक स्वार्थ का हिस्सा भी था। अगर निजी वित्तरहित संस्थानों में भी आरक्षण होता तो ये स्पष्ट नहीं है कि वो आरक्षण में भी अधिक फीस क्यों नहीं मांग सकते। सीधा-सीधा आर्थिक घाटा उनको हो रहा है ये अभी स्पष्ट नहीं है। घाटा यह था कि उनको जाति विशेष के लोगों को लेना पड़ता। जो आर्थिक घाटा नहीं है एक दूसरे किस्म का घाटा है। जब तक आप जाति का द्वार नहीं खोलेंगे तब तक आप उस घाटे को घाटे की तरह समझ नहीं सकते। इसके पीछे दूसरी रणनीति थी वो यह कि निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण की बात भारत सरकार ने ठीक उसी समय चलाई थी। मुझे ऐसा महसूस होता है कि समझ यह थी कि यहीं पर इतना बवाल खड़ा कर दो, अगर इस बवाल खड़ा करने से शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण रूकेगा नहीं तो भी सरकार व राजनेता सचेत हो जाएंगे। भई ये तो बड़ा लफड़ा है। निजीक्षेत्र की अपने यहां तक आरक्षण न पहुंचने देने की एक रणनीति इसमें थी जो शायद सफल हुई लेकिन वह भी शुद्ध आर्थिक नहीं है।
टाटा को अगर ओबीसी के उम्मीदवारों को बहाल करना पड़े तो टाटा को आर्थिक घाटा क्या है, यह मुझे अभी स्पष्ट नहीं है। जब तक आप उनकी मानसिकता में जातीय पक्ष को नहीं देखेंगे तब तक आप इस नफे-घाटे को समझ ही नहीं पाएंगे। हिन्दुस्तान की राजनीति व समाज का विश्लेषण करने में जब तक आप आर्थिक पक्ष के अलावा कुछ भारतीय संदर्भ में आर्थिक पक्ष को नहीं समझेंगे जिसको हमारे मित्र कहते थे 'सोशल लॉजिक ऑफ कैपटलिज्‍म ' अन्यथा टाटा को ओबीसी को आरक्षण देने में क्या जाता है, लेकिन उसका कुछ जाता है। वो परेशान है। क्यों परेशान है, आर्थिक घाटे की वजह से नहीं। ये कोई दूसरा गेम है।


अनीश अंकुर : १९९० के बाद, ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ मीडिया की भूमिका में क्या बदलाव आया है? आपने कहा कि अब मीडिया ताकतवर हो गया है। क्या मीडिया ऐसी स्वतंत्र चीज ( Independent entity) है जो ताकतवर या कमजोर हो सकती है? या कहीं यह ताकतवार इस कारण तो नजर नहीं आती क्योंकि यह ताकतवर लोगों के पक्ष में खड़ी है? जैसे ही यह कमजोर लोगों का मुद्दा उठाती है इसे अपनी हैसियत, अपनी औकात पता चल जाती है, किसानों की आत्महत्या का मामला हो या फिर अन्य मुद्दे राज्य उन पर कोई ध्यान ही नहीं देता।
१९९० के बाद के दौर में जिसे मीडिया के शक्तिशाली हो जाने का दौर कहा जाता है। इस दौर में कहीं यह मीडिया का शक्तिशाली लोगों के पक्ष में निर्णायक झुकाव मयासंबद्धता (Decisive shift) तो नहीं है?

योगेन्द्र यादव : मैं निश्चित मानता हूं कि मीडिया ताकतवर हुआ है। निश्चित ही वह ताकतवर लोगों के पक्ष में खड़ा है लेकिन यह मानना कि केवल ताकतवर लोगों के पक्ष में खड़े होने की वजह से वो ताकतवर बना है यह बात कतई गलत है। आज से २० साल पहले मीडिया ताकतवर लोगों के पक्ष में खड़ा था। हिन्दुस्तान का मीडिया कभी भी गरीब-गुरबे का मीडिया नहीं रहा है लेकिन उस वक्त मीडिया की यह औकात नहीं थी कि सरकारों को झुका दे, राजनेताओं पर इतना दबाव बनाए कि उनके लिए असंभव हो जाए उसका प्रतिकार करना। ये बात सच है कि जब मीडिया की आवाज समाज में ताकतवर आवाज के साथ जुगलबंदी करती है तो उसका असर बढ़ जाता है लेकिन मीडिया की अपनी ताकत को आप कम करके मत आंकिए। फिर मैं यही कहूंगा कि ये तो विश्लेषण है क्यांेकि जो आपका प्रश्न है उसके पीछे यह समझ है कि एक शासक वर्ग है जिसके हाथ में कई औजार हैं और महत्वपूर्ण बात वह औजार नहीं वह वर्ग है जो उन औजारो को चला रहा है। मीडिया उनमें एक औजार है। मैं समझता हूं यह एक अधूरी समझ है। गलत नहीं है। इसलिए कि हर औजार अपनी एक स्वायत्तता लेकर आता है। यह बात सच नहीं है कि मीडिया ने जब-जब गरीब की आवाज उठाई है तो उसका असर कुछ नहीं हुआ है। यह बात सच नहीं है कि मीडिया ने किसानों की आत्महत्या के मामले को उठाया। केवल दो अखबारो ने उठाया, केवल कुछ दिनों के लिए उठाया। अगर हिंदुस्तान का मीडिया जिस किस्म से आरक्षण जैसे छोटे सवाल को डेढ़ महीने तक पहले पेज की सुर्खियां बनाए रख सकता है तो अगर उस तरह से किसानों की आत्महत्या को १५ दिनों के लिए सुर्खियां बना देता तो आप देखते कि देश की सरकार हिल जाती। यह सच नहीं है कि मीडिया ने राजस्थान के अकाल की कोई खबर नहीं बनाई। हकीकत ये है कि मीडिया ने देश की गरीबी पर बहुत व्यवस्थित रूप से पर्दा डाला है। गरीब के सच को लोगों की आंखों से ओझल किया है। इसलिए मेरा मानना है कि मीडिया खास तौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद से मीडिया की ताकत बढ़ी है। आप कह सकते हैं कि जो शासक होते हैं वो अलग-अलग मुंह के जरिए अपनी बात रखते हैं। कभी-कभी मीडिया भी वैसा ही प्रतीत होता है लेकिन अगर ऐसा भी है तो हमारे लिए जरूरी है ये देखना कि कब शासक वर्ग किस मुंह से बोलता है और कब कौन सा मुंह पीछे हो जाता है। अगर हम यह विश्लेषण नहीं करेंगे तो फिर हम रोजमर्रा की राजनीति के दांव-पेंच को नहीं समझ पाएंगे।


अनीश अंकुर : आरक्षण के समर्थन में जो बड़ी-बड़ी रैली आयोजित हुई, मीडिया ने उसे लगभग उपेक्षित किया। पिछले १६-१७ वर्षों में मीडिया की जो सामाजिक भूमिका रही है उसमें क्या बदलाव आया है? वैसे तो मीडिया के भीतर अभी भी पहले की तरह एक प्रतिबद्ध समूह है, जो मिशनरी जील के साथ काम करता है। लेकिन सामान्य प्रवृति देखें तो पिछले डेढ़ दशकों के बदलाव को आप कैसे देखते हैं? बड़े सवालों पर भयानक व रहस्यमय चुप्पी और गैर महत्वपूर्ण सवालों को जरूरत से ज्यादा उछालना। इसे कैसे देखते हैं आप?


योगेन्द्र यादव : आप ठीक कह रहे हैं। मैं इसको एक दूसरी चीज से जोड़कर देखता हूं जो लोग नहीं देखते। वो ये कि पिछले १५ सालों में मीडिया का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। अखबरों का पाठक वर्ग और टीवी के दर्शकों की संख्या में एक अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। पहले ५० साल में मीडिया का जितना विस्तार हुआ होगा लगभग उतना विस्तार पिछले १०-१२ साल में हो गया। छोटा मीडिया कुछ चंद लोगो के एजेंडे से चल सकता था। उन चंद लोगों में से कुछ सदाशय लोग होते तो उनका एजेंडा बड़े पैमाने पर दिखता। लेकिन मीडिया का अभूतपूर्व विस्तार हुआ, प्रतिस्पर्धा बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ी, जिस प्रतिस्पर्धा के चलते मीडिया इस बारे में बहुत सचेत हुआ कि उसका श्रोता-पाठक कौन है? चूंकि मीडिया वालों को अब पता लग गया है कि उसका श्रोता खासकर उसके विज्ञापनों का श्रोता पाठक वर्ग मुख्यत: शहरी मध्यम वर्ग है। इसलिए मीडिया पहले से कहीं ज्यादा सचेत रूप से शहरी मध्यम वर्ग को निशाना बना रहा है व उसके चलते जो शहरी मध्यम अगड़े वर्ग की चिंताएं है वो चिंताएं अब मीडिया में बड़ी बेशर्मी से परोसी जा रही हैं। पहले इस बारे में लाज-संकोच था क्योंकि आज से १५ साल पहले संपादक प्रसार के आंकड़े नहीं देखा करते थे। १५ साल पहले समाचार संपादक टीआरपी भी नहीं देखा करते थे। उन्हें पता भी नहीं होता था कि टीआरपी आखिर किस बला का नाम है। आज चूंकि मीडिया ज्यादा प्रोफेशनल है इसलिए वो ज्यादा बेशर्म है। इसलिए वो देश के सामान्य व्यक्ति के सरोकार से ज्यादा कटा हुआ है वो समाज के एक छोटे वर्ग की इच्छाओं पर नाच रहा है।

1 comment:

  1. बहुत अच्छी बातचीत। जातिवाद की मानसिकता और उसके सामाजिक ढाँचे, आरक्षण और मीडिया के सवर्णवाद का सटीक विश्लेषण।

    शुक्रिया इसे यहां प्रस्तुत करने के लिए।

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