October 4, 2007

भाषाशास्त्री राजमल बोरा


निधन



  • राजेंद्रप्रसाद सिंह


राजमल बोरा अपने लेखन के अंतिम दौर में और गंभीर होते गयेवह पालि, प्राकृत और अपभ्रंश विषयक गंभीर चिंतन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थेजीवन के अंतिम दिनों में वह इनके प्रकाशन को इसको लेकर चिंतित रहा करते थेउनकी कई पूरी-अधूरी पांडुलिपियां प्रकाशन के इंतजार में हैं

पिछले दिनों यह शोक संदेश मिला कि २७ जुलाई, २००७ को राजमलजी बोरा दिवंगत हो गये।

डॉ. बोरा का जन्म ५ फरवरी, १९३३ को अंबाजोगाई जिला बीड़ (महाराष्ट्र) में हुआ था। वह लगभग चौंतीस वर्षों तक वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, तिरुपति और बाबासाहेब अम्बेडकर विश्वविद्यालय, औरंगाबाद में प्राध्यापक रहे। उनका कार्यक्षेत्र साहित्यिक और भाषावैज्ञानिक दोनों था, पर वह मूलत: भाषावैज्ञानिक थे। भाषावैज्ञानिकों में डॉ. रामविलास शर्मा उन्हें अत्यंत प्रिय थे।
डॉ. राजमल बोरा संस्कृत, हिन्दी, मराठी, तेलगु, उर्दू और अंग्रजी के जानकार थे। भारत की प्राकृत भाषाएं उन्हें प्रिय थीं। उनका अधिकांश लेखन प्राकृत भाषाओं को केंन्‍द्र में रखकर हुआ है। प्राकृतों में भी पैशाची उन्हें अत्यंत प्रिय थी। इसे वे भारत की सबसे पुरानी भाषा मानते थे। 'भारत की प्राचीन भाषाएं` में उनकी यह स्थापना देखी जा सकती है। उनसे मेरी निकटता भी प्राकृत भाषाओं को लेकर हुई थी। यह घटना आज से कोई पांच साल पहले की है, जब मेरा एक लेख प्राकृत भाषाओं को केंद्र में रखकर साहित्य अकादमी की पत्रिका में छपा था। आगे भी यह विमर्श जारी रहा।

राजमल बोरा के लेखन पर नये-पुराने कई साहित्यकारों ने अपनी कलम चलायी है। उनमें से प्रमुख हैं डॉ. नगेंद्र, सत्यप्रकाश मिश्र, रामचंद्र तिवारी, गोपाल राय, कैलाशचंद्र भाटिया, आनंदप्रकाश दीक्षित और विश्वनाथप्रसाद तिवारी। रमेशचंद्रशाह, शिवमंगलसिंह सुमन और विष्णु प्रभाकर ने राजमल बोरा की पुस्तक 'चिंतामणि चिंतक रामचंद्र शुक्ल` की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। राजमल बोरा ने रामचंंद्र शुक्ल के अलावा हिंदी आलोचकों में से हजारीप्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह को चुना और किताबें लिखीं। समीक्षा की पुस्तकों में 'हिन्दी आलोचना की पहचान` और 'भारतीय भक्ति साहित्य` उनकी प्रमुख रचनाएं हैं। किन्तु उन्हें भक्ति साहित्य उतना प्रिय नहीं था जितना हिन्दी का वीरकाव्य। इसलिए उनकी पांच पुस्तकें 'भूषण और उनका साहित्य`,'पृथ्वीराजरासो : इतिहास और काव्य`, 'हिन्दी वीरकाव्य (१६००-१८०० ई)`, 'राजस्थान के गौरव ग्रंथ` और 'जुझौते बुंदेलों की शौर्य गाथाएं` वीरकाव्य पर केंद्रित हैं।

डॉ. राजमल बोरा का मुझ पर बड़ा स्नेह था। अभी हाल ही में उन्होंने मेरे लेखन को गंभीरता-पूर्वक दो लेखों में में आंका-परखा था। वह आगे चीनी-तिब्बती भाषा परिवार पर ढंग से काम करना चाहते थे और चाहते थे कि मैं कोल भाषा परिवार पर एक स्वतंत्र किताब लिखूं। अफसोस कि ऐसा काम उनके जीते जिंदगी न मैं कर सका, न वे कर सके। चाहूंगा कि भाषाविज्ञान के क्षेत्र में उनका यह सपना भविष्य में पूरा हो जाय।

डॉ राजमल बोरा की पुस्तकें हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, साहित्य अकादेमी, राजकमल, नेशनल पब्लिशिंग हाउस और वाणी प्रकाशन ने छापी हैं। बावजूद इसके पुस्तकों के प्रकाशन की समस्या उनके साथ जीवन भर रही। वे बार-बार कहा करते थे कि उनकी पुस्तकों का प्रकाशन नहीं हो पा रहा है। इसका प्रमुख कारण शायद यह था कि उनका भाषा विषयक लेखन व्यवसायिकता के प्रभाव से मुक्त था। डॉ. हरदेव बाहरी अपने जीवन के अंतिम वर्षों में व्यवसायिकता की चपेट में पूरी तरह से आ गये थे। इसीलिए उन्होंने भाषाविज्ञान का गंभीर कार्य क्षेत्र छोड़कर छात्रोपयोगी भाषाविज्ञान तथा कोश-कार्य में विशेष रूचि दिखाई थी, पर राजमल बोरा अपने लेखन के अंतिम दौर में और भी गंभीर होते गये थे। वह पालि, प्राकृत और अपभ्रंश विषयक प्राचीन एवं गंभीर चिंतन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। जाहिर है कि ऐसी सीमित पाठकों की संख्यावाली पुस्तकों को छापने में प्रकाशकों की कोई रूचि नहीं है। वे अपने जीवन के अंतिम दिनों में इसे लेकर चिंतित रहा करते थे। उनकी कई पूरी-अधूरी पांडुलिपियां प्रकाशन के इंतजार में हैं। बावजूद इसके अभी तक भाषा विषयक उनकी जो भी पुस्तक प्रकाशित हुई हैं वे उनको एक श्रेष्ठ भाषावैज्ञानिक साबित करने के लिए काफी हैं। 'अर्थानुशासन`, 'नामों का भाषाविज्ञान`, 'भारत की भाषाएं`, 'भाषा शिक्षण एवं भाषा भूगोल`, 'भारत के भाषा परिवार`, 'ऐतिहासिक भाषाविज्ञान`, 'भारत की प्राचीन भाषाएं` तथा 'भाषा : अर्थ और संवदेना` उनकी भाषा विषयक प्रमुख पुस्तकें हैं। यह भाषाविज्ञान की समृद्धि के लिए जरूरी है कि उनकी अप्रकाशित पुस्तकों का प्रकाशन सुनिश्चित कराया जाय।

1 comment:

  1. आपके पोस्ट का फ़ोंट नही दिख रहा है कपया इसे यूनिकोड में करें

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