October 4, 2007

सवाल दुनिया की व्याख्या का नहीं, उसे बदलने का है


इस बार लेख का आरंभ अपने एक पुराने, आत्मीय और आदरणीय मित्र के पत्र से करना चाहता हूं। डॉ. धीरेन्द्र शर्मा से १९७४ में परिचय हुआ। तब दिनमान साप्ताहिक में संस्कृत भाषा पर मेरी एक टिप्पणी छपी थी-जिससे भारत-व्याकुल लोग मर्माहत थे। मेरे लेख के पक्ष और विपक्ष में महीनों टिप्पणियां प्रकाशित हुई। मुझे याद आता है जिन दो लोगों ने जम कर मेरा पक्ष लिया था उनमें डॉ. धीरेन्द्र शर्मा और बिहार के दिवंगत जननेता जगदेव प्रसाद थे। जगदेव प्रसाद मेरे छात्रावास पर बधाई देने आये और अपने शोषित अखबार में मेरी टिप्पणी को पुनर्प्रकाशित किया। डॉ. धीरेन्द्र शर्मा ने दिनमान में मेरे पक्ष में जोरदार टिप्पणी लिखी। वे संस्कृत के काव्यतीर्थ भी थे इसलिए उनकी टिप्पणी का विशेष महत्व था। तब पत्र द्वारा हम परिचित हुए और आपात काल के दिनों में हमारा मिलना भी हुआ। वे ऑक्सफोर्ड की प्राध्यापकी छोड़ कर कुछ करने के ख्याल से भारत आये थे और उन दिनों दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फिलॉसफी के प्रोफेसर थे। वहीं से 'फिलॉसफी एण्ड सोशल एक्शन` अंग्रेजी त्रैमासिक भी निकालते थे। इसके उद्घाटन अंक में जयप्रकाश आंदोलन पर मैंने एक लेख लिखा था। विचारों से क्रांतिकारी और जुझारू व्यक्तित्व वाले डॉ. शर्मा से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। उनके माध्यम से देश-विदेश के अनेक विद्वानों से परिचय हुआ। लेकिन पिछले १२ वर्षों से उनसे मिलना नहीं हो सका था। 'जन विकल्प` को इंटरनेट पर देखकर उन्होंने प्रतिक्रिया दी और जब डाक से उन्हें पत्रिका भेजी गयी, तो उनका यह पत्र मिला। बिना किसी संपादन के उनका पत्र -

प्रिय मणि,
'जन विकल्प` की अगस्त २००७ प्रति हमारे पुराने नई दिल्ली के पते से लौटकर-आज ही देहरादून के पते पर मिली। पढ़ गया हूं। तुम्हारे प्रयासों के लिए सराहना के शब्द पर्याप्त नहीं होंगे। पिछली बार जब मिले थे-कुछ ख्याल आता है कि फिर मिलने की बात तय हुई थी।

१. पहली बात-हमारा देहरादून का पता नोट कर लो।

२. मौलिक प्रश्न है? २१वीं सदी में जब वैश्वीकरण की ओर हम बढ़ रहे हैं-तब दुनिया को जाति, धर्म, वर्ग और राष्ट्रवाद आदि के आधार पर बांटना विकास-विरोधी होगा।

कोई जाति, धर्म, राष्ट्र-ऐसा नहीं है-जिसने दुर्बल और अपने ही असहाय लोगों पर अत्याचार और अन्याय न किया हो। गोरी जातियों ने लाखों-करोड़ों गोरी जातियों का नरसंहार किया-वो श्वेत, यूरोपियन और ईसाई थे जो जर्मन, फ्रांसिसी, अंग्रेज, स्कॉट, इतालवी और आयरिश-लाखों की तादाद में एक दूसरे से लड़े थे। और फिर सैकड़ों सालों से अरब-मुसलमान-ईराकी-ईरानी-शिया और सुन्नी-मजहब के नाम पर-मरते-मारते-आ रहे हैं। लेकिन आज ८५ प्रतिशत हिन्दू वोटों से एक तामील मुसलमान डॉ. कलाम को भारत का सर्वलोकप्रिय आम आदमी का राष्ट्रपति माना गया है।

लेकिन एक बंगाली मुसलमान को पाकिस्तानी इस्लामी रिपब्लिकन का राष्ट्रपति नहीं बनने दिया और इस्लामिक सेना ने डॉ. मुज़ीबुर्रहमान और उसके परिवार का और हजारों बंगाली मुस्लिम बुद्धिजीवियों का कत्लेआम किया और आज तस्लीमा पर मौत का फतवा है।
बौद्धकालीन प्राचीन स्मारकों को अफगानिस्तान, पाकिस्तान और काश्मीर में बमों से उड़ाया गया है क्यों?

और एक लोकतंत्री संसद पर आत्मघाती हमला क्यों?
मैं कई बार काश्मीर गया और उनकी जनमत की मांग का समर्थन किया। लेकिन मेरे भाषण के बीच में नारे लग रहे थे-
'हंस के लिया है पाकिस्तान।
लड़ के लेंगे हिन्दूस्तान।।
मैं ये सब कुछ लिख रहा हूं तुम्हें-क्योंकि तुम संघर्षशील और चिन्तक-विचारप्रधान व्यक्तित्व हो। खून-खराबा बहुत हो चुका-जाति, धर्म और देशभक्ति के नाम पर। हमें वैज्ञानिक दृष्टि से सोचना और नये ढंग से वैज्ञानिक समाज की रचना करनी होगी। हम इधर पिछड़े पहाड़ी क्षेत्र में सक्रिय हैं, जहां दलित कम १० प्रतिशत और ऊंची जातियां-ब्राह्मण-राजपूत ८० प्रतिशत हैं। इन ८० प्रतिशत 'ऊंची` जात वालों में ६० प्रतिशत गरीब, अशिक्षित-बेरोजगार-शिवलिंग पर दूध-पानी-पशुबलि चढ़ाते हैं।

पाकिस्तानी रोगियों का भारत में इलाज होता है। उन्हें हिन्दुओं का खून दिया जाता है। तो आज के वैज्ञानिक युग में जीवन रक्षा के लिये ठसववक हतवनच मिलना चाहिये। जाति, धर्म और देश जरूरी नहीं। आज एक बार दुर्घटना में घायल होकर एमरजेन्सी-अस्पताल में ले जाया गया तो डाक्टर मेरे Blood group जानना चाहेंगे। धर्म, जाति और राष्ट्रियता की identity का कोई मतलब नहीं होगा। Blood group में दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण-गोरा-काला-काश्‍मीरी- सिंहली सब एक हैं।
कुछ हाल की लिखी भेज रहा हूं। यथावसर पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया लिखना।
शुभकामनाएं-
धीरेन्द्र शर्मा
२१.८.२००७
पत्र पढ़कर मैं देर तक सोचता रहा कि डॉ. शर्मा आखिर कहना क्या चाहते हैं? जाति, धर्म और देश को कौन जरूरी मान रहा है? खून के वैज्ञानिक ग्रुप के अलावे असली और कम-असली या फिर नस्लवादी उच्चताबोध की अहमन्यता कौन पाल रहे हैं? कौन हैं जो हमारे सामाजिक जीवन में बराबरी, भाईचारे और न्याय की जगह वर्चस्व की संस्कृति थोपना चाहते हैं?

मुझे यह भी लगा कि उत्तराखंड की 'देवभूमि` में निवास करते हुए हमारे आदरणीय मित्र को कोई दैवी ज्ञान तो प्राप्त नहीं हो गया!
लेकिन डॉ. शर्मा अकेले नहीं हैं। उनका पत्र जिन विचारों को उद्घाटित कर रहा है वह एक व्यक्ति नहीं, एक तबके की मानसिकता को हमारे सामने रखता है। सर्वोदय की यह भावना कोई नयी भी नहीं है। लेकिन इसके अपने खतरे हैं और उन पर विमर्श आवश्यक है। इसके अभाव में हम वर्चस्ववादियों के पक्ष में मैदान खाली कर देंगे और वर्चस्ववादी सबसे पहले निशाना डॉ. शर्मा जैसे लोगों का ही बनायेंगे। आर.एस.एस. की गोली से कम्युनिस्ट बाद में मारे गये, पहला निशाना तो सर्वोदयी गांधी ही बने।

मैं, डॉ. शर्मा को चालू अर्थों में सर्वोदयी नहीं बना रहा। यह उनका अनादर होगा। वे मार्क्सवादी समझ के कायल रहे हैं। उनकी पत्रिका पर मार्क्स की उक्ति कवर पृष्ठ पर ही प्रकाशित होती थी।
'दार्शनिकों ने अब तक विभिन्न तरीकों से विश्व की व्याख्या की है, लेकिन सवाल है कि इसे बदला कैसे जाय।`

दुनिया को बदलने का-सामाजिक परिवर्तन का-सवाल अहम सवाल है। कुछ लोग इसी परिवर्तन को क्रांति कहते हैं। लेकिन क्रांति और परिवर्तन में एक अंतर है। क्रांति एक परिघटना की तरह आती है और तब आती है जब छोटे-मोटे परिवर्तनों से काम चलना संभव नहीं होता। यह स्वत: भी हो सकती है और प्रयास पूर्वक भी। लेकिन परिवर्तन तो जीवन के मेटाबोलिज्म की तरह सतत् चलता रहता है। कुछ व्यवस्थायें निहित स्वार्थों से निर्देशित होकर परिवर्तन की प्रक्रिया को बाधित करना चाहती हैं। इन व्यवस्थाओं को जब सफलता मिलती है, तब समाज में जड़ता आती है। फलस्वरूप संत्रास, अन्याय और वर्चस्व फैलता है। फिर इसके प्रतिरोध की शक्तियां उत्पन्न होती हैं। वर्चस्व और प्रतिरोध का यह सिलसिला इस तरह चलता रहता है।

वर्चस्व और प्रतिरोध के द्वंद्व से समाज को मुक्त किया जा सकता है, बशर्ते सामाजिक परिवर्तन की नैसर्गिक प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जाय। मैं समझता हूं डॉ. शर्मा यही चाहते हैं। और यहां मैं उनके साथ हूं। लेकिन यह उस समाज में संभव है जहां संभव समानता और न्याय स्थापित हो चुका है। आप ऐसे समाज में जहां विषमता काफी हो और एक तबका या कुछ तबके दूसरे तबके या ज्यादा तबकों पर वर्चस्व रखना चाहते हैं, वहां प्रतिरोध को स्थगित करना प्रतिगामी प्रयास होगा।

डॉ. शर्मा कहते हैं 'खून-खराबा बहुत हो चुका-जाति धर्म और देश भक्ति के नाम पर। हमें वैज्ञानिक दृष्टि से सोचना और नये ढंग से वैज्ञानिक समाज की रचना करनी होगी।`

आखिर कौन नहीं सोचता वैज्ञानिक से? आधुनिक भारत के इतिहास में जोतिबा फुले ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व के प्रतिरोध को संगठित करने की कोशिश की। उन्हें यह अवसर अंग्रेजी राज द्वारा उत्पन्न सामाजिक स्थितियों के कारण मिल सका। वे जातिवाद के विरुद्ध थे। वर्चस्व के प्रतिरोध की यह ताकत शायद उन्होंने भक्ति आंदोलन से ली थी। उनके मानस शिष्य डॉ. आंबेडकर ने राष्ट्रीय आंदोलन में ब्रेक डालकर अपने जातिवाद विरोधी एजेन्डे को शामिल करना चाहा। (लाहौर के एक सम्मेलन १९३६ में प्रस्तुत उनका आलेख 'जातिवाद का उच्छेद` देखें।) उनका मजाक उड़ाया गया। ऐसा ही पेरियार आदि के साथ हुआ। राष्ट्रीय नेताओं ने तर्क दिया कि ये जातिवाद विरोध की बात कर रहे लोग साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन को डायलूट कर रहे हैं। जातिवाद का विरोध कर रहे नेताओं का कहना था कि हम आजादी को ज्यादा व्यापक अर्थों में लेते हैं। साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन ऊंची जाति के हिन्दू-मुसलमानों के हाथ में था और वे नहीं चाहते थे कि इससे ज्यादा लोग जुड़ें। वे साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन के साथ सामंतवाद विरोधी आंदोलन को नत्थी करने के पक्ष में नहीं थे। जातिवाद का विरोध करने वाले नेता ज्यादा वैज्ञानिक सोच वाले थे, वे आधुनिकता के समर्थक थे, समानता के अग्रही थे। लेकिन वे हार गये।

अगली पीढ़ी में इन्हीं हारे हुए लोगों ने जाति को आधार बनाकर सवर्ण वर्चस्व के विरुद्ध जिहाद छेड़ दिया। अब ऊंची जातियों के हारे हुए लोग जातिवाद विरोध और समानता के पाठ पढ़ रहे हैं। दलित-ओबीसी उन पर हंस रहे हैं। यही काम जब उनके नेता पचास साल पहले कर रहे थे, तो वो इसे उनकी मूर्खता मान कर हंस रहे थे।

इसलिए ऐसा होता है कि जाति, धर्म और राष्ट्र को आधार बनाकर वर्चस्व प्राप्त जाति, धर्म और राष्ट्र का प्रतिरोध किया जाय। भक्ति आंदोलन में ईश्वर के नाम पर वर्णवादी वर्चस्व को चुनौती दी गयी-जात-पात पूछे नहीं कोय, हरि को भजै सो हरि का होय। हमारे राष्ट्रीय आंदोलन में एक उत्पीड़ित राष्ट्र साम्राज्यवादी राष्ट्र के विरुद्ध खड़ा हुआ। उत्पीड़ित जातियां वर्चस्व प्राप्त जातियों के विरुद्ध जाति के नाम पर इकट्ठा हुइंर् और सार्थक प्रतिरोध प्रस्तुत किया। लेकिन ये सब रणनीति है, आदर्श नहीं। हमारा आदर्श तो वर्ग-वर्ण विहीन, शोषण विहीन एक विकासोन्मुख समाज ही है। ऐसा समाज जो निरंतर परिवर्तनशील हो। आप चाहे जितने पवित्र जल और कीमती साबुन से नहा लें, अगले ही दिन आपको फिर स्नान की जरूरत होगी। इसी तरह चाहे जितनी महान पद्धति से आप समाज को संवार दें, उसे बार-बार नयी पद्धति से संवारने की जरूरत पड़ेगी। यही प्रकृति का नियम है और यही वैज्ञानिक चिन्तन है। सब कुछ अनित्य है-लेकिन अनित्यता की भी निरंतरता है-इस निरंतरता के अपने लय हैं-इसे ही जीवन और प्रकृति कहते हैं।


कुर्रतुल ऐन हैदर (१९२८-२००७)


विख्यात उर्दू कथा-लेखिका कुर्रतुल ऐन हैदर अब हमारे बीच नहीं हैं। अलीगढ़ में जन्मी ऐनी आपा (उन्हें आदर और प्यार से लोग इसी नाम से पुकारते थे) ने कुल उन्नीस साल की उम्र में अंग्रेजी में एम.ए. किया था। इसी उम्र में पहला उपन्यास 'मेरे सनमखाने` भी लिखा। देश के बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान चली गयी और फिर १९६१ में भारत लौटीं। वो अपनी ही तरह की लेखक थीं। भारतीय संस्कृति को उन्होंने जिस विराटता से समझा था वह हमें आज भी हैरान करता है। अपने मशहूर उपन्यास 'आग का दरिया` में उनके इस चिन्तन और समझ को हम देख सकते हैं। गौतम नीलांबर और कमाल रजा जैसे उनके पात्रों के सुख-दु:ख एक आधुनिक भारतीय के सुख-दु:ख हैं। भारतीय पाठक ऐनी आपा को कभी भूल नहीं पायेंगे। 'जन विकल्प` की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।


  • प्रेमकुमार मणि

2 comments:

  1. बहुत सही लिखा है आपने ..एकदम लीक से हटकर ..पता नही ये धर्म का कीडा कब जाएगा ...
    बहुत ही अच्छा लिखा है आपने .......साधुवाद ....कभी हमारे ब्लोग पर भी आईये
    विचारों कि जमीन

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