September 18, 2007

१५ अगस्त का सन्नाटा

संजय काक की डॉक्यूममेंट्री फिल्म १५ अगस्त, २००४ के से प्रारंभ होती है। कश्मीर के लाल चौक पर स्वतंत्रता दिवस के दिन एक अजीब सा सन्नाटा छाया है। फिल्म इस विचलित करने वाले सन्नाटे को समझने की कोशिश करती है। कश्मीर के मसले पर संवेदनशील लोगों की चुप्पियों पर सवाल खड़े करने वाली इस फिल्म 'जश्न-ए-आजादी` का अंग्रेजी नाम है "How we celebrate our freedom." जिसे संजय काक, जो खुद दिल्ली में रहने वाले एक कश्मीरी पंडित हैं, ने २००४ से २००६ के बीच शूट किया है। डॉक्यूमेंट्री २००४ से १५ वर्ष पीछे १९८९ तक जाती है। इसी वर्ष से वहां आजादी की मांग को लेकर सश संघर्ष प्रारंभ हुआ था।

फिल्म की शुरुआत में ही बड़े पैमाने पर सेना की तैनाती, संगीनों की मौजूदगी, कंटीले तारों की उपस्थिति यह बताती है कि कश्मीर में कुछ भी सामान्य नहीं है। वहां आज हर १५ नागरिक पर एक सैनिक मौजूद है। लगभग सात लाख सैनिकों को कश्मीर में तैनात कर भारत सरकार ने उसे दुनिया के सबसे बड़े सैन्यीकृत जोन में तब्दील कर दिया है। आज यह 'धरती का स्वर्ग` नहीं शायद धरती का सबसे बड़ा कारागार है। 'जश्न-ए-आजादी` का मुख्य विषय इस सैन्य कब्जे के बरक्स आम कश्मीरियों की प्रतिक्रिया को सामने लाना और पिछले १७ वर्षों से चल रहे अलगाववादी आंदोलन की तडं तलाशना है। निर्मम मुठभेड़, भयंकर विध्वंस, हजारों की संख्या में बेकसूर कश्मीरी नौजवानों की हत्या, इतने ही लोगों को लापता होना; फिल्म इन सबको सामने लाती है। फिल्म हिंसा के राजनैतिक, सामाजिक, नैतिक परिणााम क्या हैं, इसको भी समझाने की कोशिश करती है।

फिल्म में निर्देशक ने दो बार १२वीं सदी के इतिहासकार कल्हण को उद्घृत किया है 'कश्मीर को कभी भी फौजी ताकत के बलबूते नहीं जीता जा सकता। कश्मीर जीता जा सकता है तो सिर्फ आध्यात्मिक प्रतिभा (Spiritual merit) से।`

फिल्म के कई दृश्य स्तब्ध कर देने वाले हैं। जैसे बर्फ से ढंकी शहीदों की कब्रगाह (दाहिने, प्रकाशित चित्र में फिल्म में दिखाई गई कब्रगाह, जिसमें नई कब्रों के लिए जगह तक नहीं बची है।) में एक बूढ़ा पिता १० वर्ष पूर्व मारे गए अपने बेटे की कब्र ढूंढने की कोशिश करता है पर ढूंढ नहीं पाता। कई गांवों के लोगों से जब यह पूछा जाता है कि कितने लोगों की हत्या हुई, कितने गायब हुए तो उनके द्वारा ऐसे लोगों की संख्या को लेकर लगाया जाने वाला अनुमान बेहद तकलीफदेह अनुभूति कराता है।

एक प्रभावी दृश्य में पारंपरिक लोक कलाकार अपनी विशिष्ट वेशभूषा में आजादी की गहरी आकांक्षा को सामने लाते हैं। फिल्म के एक हिस्से में भारतीय सेना द्वारा निरीह बूढ़े कश्मीरियों को बंदूकों के साये में फिलिप्स के रेडियो बांटने का दृश्य कश्मीर की विडंबना को सामने ला देता है। ऐसे ही हिंसा के शिकार एक महिला का मनौवैज्ञानिक संतुलन इस कदर बिगड़ जाता है कि वह हर वक्त, यहां तक कि सोते समय स्वप्न में भी, खून, और लाश ही देखती रहती है। यहां मनोविश्लेषक एवं मोटिवेशनल एक्सपर्ट का संवाद है: 'लोग सोचतें हैं कि वे किसी भी किस्म के बदलाव के खिलाफ रहते हैं जबकि ऐसा नहीं होता। लोग बदलाव से होनवाले हानि की वजह से ऐसा करते हैं। वे बदलाव के प्रति जड़ पूर्वाग्रह की वजह से उसका विरोध करते हैं।`

'जश्न-ए-आजादी` कश्मीर के मरते पर्यटन उद्योग को भी सामने लाती है। कश्मीर में आनेवाला एक सैलानी जब यह कहता है 'कश्मीर भारत का हृदय है` तो जख्म़ एवं घावों से भरे कश्मीरी हृदय की त्रासदी ही उद्घाटित होता है।
फिल्म को जो दृश्य खास बनाता है वह है मारे गए कश्मीरी नौजवानों, जिन्हें सरकार आतंकवादी कहती है, की शवयात्रा में हजारों लोगों का गीत गाते, नारा लगाते चलना : 'हमें चाहिए आजादी.. ले के रहेंगे आजादी`। स्वतंत्रता की अनादि चाहत से भरे नारे गूंजते हैं 'तुम डंडे बरसाओ.. तुम गोली चलाओ, तुम आग लगा दो.. तुम कुछ भी कर लो.. हम तो कहेंगे-आजादी!` फिल्म की शुरुआत एवं अंत में हजारों लोगों का गुस्से एवं दु:ख से भरे शवयात्राओं में शामिल होने का दृश्य भी संवेदनशील मन को झकझोरने तथा कश्मीर के नाम पर राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाली भाररतीय संसद को सकते में डालने वाला है। बीच-बीच में नैरेशन एवं वायस ओवर भी चलता रहता है। नैरेटर खुद निर्देशक हैं। एक जगह एक महत्वपूर्ण टिपप्णी की जाती है 'दुनिया के इस सबसे सैन्यीकृत इलाके से निकलने वाला सबक यही है वर्चस्व का मतलब जीत नहीं होता।`

संजय काक की यह फिल्म कश्मीर के बारे में अंधराष्ट्रवादी प्रचारतंत्र के साए में पले दिमाग की समझ एकाएक तो नहीं बदल सकती। हां इतना अवश्य करती है कि असहज करने वाले कुछ सवाल खड़े करती है। हर अच्छी फिल्म दरअसल यही करती है।

(जश्ने-ए-आजादी` का प्रदर्शन जून, २००७ में पटना के हिन्दी भवन में किया गया था।)

समीक्षा : अनीश अंकुर

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