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November 30, 2007

स्‍त्री अस्मिता और पहचान की सशक्त आवाज

प्रभात खबर, १८ अप्रैल, २००७


रोहित प्रकाश

जन विकल्प के उदघाटन अंक के साथ एक कविता पुस्तिका आयी थी- 'यवन की परी`। यवन देश की एक महिला, जिसने पागलखाने में आत्महत्या कर ली थी, की एक लंबी कतिवा छपी थी-'एक पत्र पागलखाने से`। कविता में अनुभूति और अभिव्‍यक्ति की तीव्रता और तीक्ष्णता अवाक कर देनेवाली थीं। परी (कवयित्री का कल्पित नाम) की इस संपूर्ण कविता में सचेत स्त्री दृष्टि है, जो पितृसत्ता के ऊपरी शोषणचक्र को ही नहीं, बल्कि उसके आधार और संश्रयों को भी बखूबी समझती है -

'उन्हें प्यार है दीवारों से
उन्हें नफरत हैं खिड़कियों से
वे मुझे मार डालने के आदी हो गये हैं'

इस कविता की सार्थकता इन अर्थों में और अधिक बढ़ जाती है कि कविता लिखनेवाली स्‍त्री स्थिति की स्पष्‍ट समझदारी के साथ-साथ प्रतिरोध की चेतना से भी लैस है-

' कभी भी नहीं मागूंगी उनसे धर्मग्रंथ
पापों के प्रायश्चित के लिए
जिससे महसूस कर सकें वे अपने को
मजबूत'

यह कविता इनकार करती है और इकरारनामे की शर्त खुद ही तय करती है। कविता में पांच बार एक ही पंक्ति आंती है-' शॉक थेरेपी इससे बेहतर है ' । इसे पढ़ते हुए आलोकधन्वा की कविता ब्रूनों की बेटियां की प्रसिद्ध पंक्तियां याद आती हैं 'बातें बार-बार दुहरा रहा हूं मैं एक छोटी-सी बात का विशाल प्रचार कर रहा हूं` . लेकिन न तो स्‍त्री ‍ शोषण एक साधारण प्रक्रिया है और न ही स्‍त्री मुक्ति की लड़ाई साधारण है। पितृसत्ताओं और वर्गों का आपसी संबंध जितना जटिल है, जिस प्रकार पूंजीवाद खुद को बनाये रखने के लिए आत्म सुधार की प्रक्रिया में रहता है। वैसे ही पित्तृसत्ता भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए आत्म सुधार का रास्ता अपनाती है। इस तरह से काफी हद तक यह स्‍त्री मानस को अनुकूलित करता है और प्रतिरोध को कम या भ्रमित करने में भी सफल होता है। इस लिहाज से भी यह एक असाधारण लड़ाई है। और कई बार ऐसा होता है कि स्‍त्री मुक्ति की इस लड़ाई या विमर्श को 'पुरूष स्वार्थ` से वीशीभूत तत्व इसे खास दायरे में ले जाने या दिशा देने की कोशिश करते हैं।

परी की इस कविता में मानवीय सौंदर्य और गरिमा की भावपूर्ण अभव्यिक्ति मौजूद है-


' मुझे कतई यह बात झूठ लगती है
बम क्या खाक बच्चों को मारेंगे
वे तो दुश्मनों के लिए बने हैं'

बहुत 'इनोसेंट` सी नजर आनेवाली यह टिप्पणी साम्राज्यवादी हिंसा पर तीखा प्रहार करती है-

' मैं इस वक्त मृत चींटी के बारे में सोच रही हूं
सारे मीडिया वाले इस बात पर खामोश हैं
ये चीटीं अमेरिका की प्रेसिडेंट जो नहीं थी
ही कोई धार्मिक गुरु
दुनिया की आखिरी चींटी भी नहीं'

इस चींटी के साथ परी को रखा जा सकता है । परी के साथ असंख्य स्त्रियों को, असंख्य मनुष्‍यों को जो पितृसत्तात्मक, पूंजीवादी सम्राज्यवादी शोषण के शिकार हैं । स्‍त्री स्मिता और पहचान की सशक्त आवाज के तौर पर इसे कविता को देखा जा सकता है।

बहुजन नजरिये की महत्वपूर्ण मासिक पत्रिका

प्रभात खबर, 13 फरवरी, 2007



प्रेमकुमार मणि एवं प्रमोद रंजन के संयुक्त संपादकत्व में जन विकल्प नाम से सामाजिक चेतना की पक्षधर एक वैचारिक मासिक पत्रिका का पटना से प्रकाशन गंभीरमना पाठकों के लिए एक अच्छी खबर है। पत्रिका के अब तक प्रकाशित दो अंकों, प्रवेशांक (जनवरी, ०७) तथा फरवरी, ०७ की सामग्री से आश्‍वस्ति मिलती है कि यदि पत्रिका सतत निकलती रही तो अलग पहचान बना सकेगी। इसकी अधिकांश सामग्री बहुजन नजरिये से बनी है। और वस्‍तुनिष्‍ठ व तार्किक-वैज्ञानिक सोच की आग्रही है। संपादकीय में प्रेमकुमार मणि ने भारतीय राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक जनतंत्र के क्षरण पर चिंता व्यक्त की है। देशकाल स्तंभ के आलेख अंक की रीढ हैं। अनिलचमड़िया के आलेख 'सामाजिक न्याय की सत्ता-संस्कृति` में सामाजिक न्याय की राजनीति के खेल को उघाड़ा गया है। अभय मोर्य ने 'एक नायक का पतन` के जरिये जार्ज फर्नांडीज के विद्रोही नायक के समझौतापरस्त व विरोधभासी चरित्र के राजनेता में तब्दील हो जाने की विडंबना की कथा कही है। प्रवेशांक में पत्रिका के संपादकद्वय में से एक, प्रमोद रंजन की कवि अरुण कमल से बातचीत भी विचारोत्तेजक है। प्रश्नकर्ता के सूझबूझ भरे प्रश्नों पर कहीं-कहीं अरुण कमल का जवाब राजनेताओं के जवाब-सा गोलमटोल, तो कहीं एकदम 'गोल` हो गया है। कंवल भारती का आलेख 'बहुजन नजरिए से 1857 का विद्रोह ' गवेषणात्‍मक अध्ययन पर आधारित एवं सबऑल्टर्न दृष्टि से लैस है। यह उक्त विद्रोह की स्थापित धारणा को सिरे से खंडित करता है। इस लेख के साथ की गयी संपादकीय टिप्पणी इस विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तो मानती है पर महज इस अर्थ में कि इंग्लैंड के अशराफ तबके द्वारा भारत के अशराफ तबके से किया गया सीमित समझौता भर था, जिसके तहत भारत में समाज सुधारों से अंगरेजों ने अपना हाथ खींच लिया थहा। अध्ययन कक्ष स्तंभ के तहत राजू रंजन प्रसाद का शोधआलेख 'प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था और भाषा` सम्मिलित है। यहां वर्ण और भाषा की भेदक विभिन्नता में ब्रह्मणवादी, सामंती मानस की छल-कपट बदबूदार संस्कृति के आमद के रूप में उभर कर सामने आती है। इस अंक में 'पुस्तक चर्चा` के अंतर्गत मुशरर्फ आलम जौकी का लेख तथा 'अन्यान्य` के अंतर्गत् फजल इमाम मल्लिक का लेख भी पठनीय है। राजकुमार राकेश के 'आलोचनात्मक शीर्षक को भी कोई गंभीर पाठक पढ़े बिना नहीं रह सकेगा। प्रवेशां मे मैथिली कवि जीवकांत की चार मैथिली (कवि द्वारा ही अनुदित) कवितायें हैं। इनमें 'सूखे पत्ते ढेर` में अच्छी भाव-व्यंजना है। 'नकली` और अग्नि प्रलय` शीर्षक कविताएं सामान्य हैं, जबकि 'शहर में` कविता का अंतिम अंतरा अटपटा व भ्रामक है। मसलन कविता की अंतिम तीन पंक्तियों , पुराने, विधि-व्यवाहर/पुराने लोकाचार/संस्कृति व धार्मिक कर्मकांड व बासी व तेबासी होकर फेंके जा रहे।` इस कवि सत्य के उलट सांस्कृति धार्मिक आडंबर का प्रकोप महामारी की तरह हमारे आधुनिक होते शहरी समाज को ग्रस ही रहा है। जीवकांत की इन कविताओं के अतिरिक्त 'जनविकल्प` के पहले अंक के साथ कविता पुस्तिक 'यवन की परी` भी जारी की गयी है। इसमें अरब की एक ऐसी कवयित्री 'परी` की कविता दर्ज है, जिसने पागलखाने में आत्महत्या कर ली। त्रिवेंद्रम की रति सक्सेना के सौजन्य से उपलब्ध यह कविता भी विमर्श व विश्व राजनीति को संवेदनशील ढंग से परिभाषित है।

'जनविकल्प` का फरवरी अंक भी खासा विचारोत्तेजक है। विख्यात इतिहासकार विपिनचंद्र ने रोहित प्रकाश से बातचीत में जहां १८५७ के विद्रारेह को पारंपरिक नजरिये से देखा हे, वहीं भगत सिंह पर उनके दृष्टिटकोण में नयापन है। उन्होंने भूमंडलीकरण को आवश्यक बताते हुए इसका विरोध करनेवालों को 'महा बेवकूफ ` करार दिया है। जाहिर है नामचीन मार्क्सवादी इतिहाकसकार की ऐसी टिप्पणी कई विवादों को जन्म दे सकती है। अपने लंबे आलेख 'धर्म की आलोचना की आलोचना` में युवा समाजकर्मी अशोक यादव भारत में प्रचलित धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए यर्थाथपरक निष्‍कर्ष पर पहुंचते हैं कि हिंदू धर्म सबसे अमानवीय धर्म है।
संपादकीय के तहत प्रेम कुमार मणि ने एक ओर पिछले दिनों पटना में संपन्न ग्लोबल मीट को 'अपर कास्ट मीट` बताया है, वहीं यह भी कहा है कि नीतीश कुमार के सोच में सामाजिक न्याय का पुट होता है। उन्होंने बिहार के विकास के संदर्भ में 'बेयर फुट कैपिटलिज्म` (नंगे पांव पूंजीवाद) की प्रस्तावना की है। साहित्य अकादमी पुरस्कार के उपलक्ष्य में ज्ञानेंद्रपति की कविताओं का 'समकालीन कविता` के संपादक विनय कुमार द्वारा चयन प्रतिनिधिपरक है। कुछ ३२ पृष्‍ठों की यह दसटकिया पत्रिका अखबारी कागज पर मुद्रित है। सो इस वैचारिक पत्रिका के प्रकाशकों को मूल्य और कागज पर पुनर्विचार करना चाहिए।

आंतरिक जनतंत्र का सवाल

राष्ट्रीय सहारा 4 फरवरी , 2007

- सुरेश सलिल


' राजनीतिक पार्टियां देश में जनतंत्र के खतरे को चाहे जितना समझती हों , अपनी ही पार्टियों के आंतरिक जनतंत्र के प्रति पूरी तरह उदासिन हैं। जो राजनीतिक दल अपने आंतरिक जनतंत्र को ठीक नहीं रख सकता, व‍ह देश के जनतंत्र को भी ठीक नहीं रख सकता . कमजोर जनतंत्र पर टिके ये राजनीतिक दल देश के जनतंत्र को कमजोर ही करेंगे।..कुछ अपवादों के साथ लगभग सभी राजनीतिक दल एक गिरोह के रूप में काम कर रहे हैं जहां अनुशासन का अर्थ है दलीय तानाशाही की कारगुजारियों पर चुप्पी साधे रखना। यह उद्धरण नवजात पत्रिका 'जन विकल्‍प ` के संपादकीय अग्रलेख से लिया गया है जो पत्रिका के दो संपादकों में से एक सुपरिचित कथाकार प्रेमकुमार मणि के नाम से प्रकाशित है।

प्रेमकुमार मणि की दलीय प्रतिबद्धताओं से जो लोग परिचित हैं वे समझ सकते हैं कि ये पंक्तियां जहां व्यापक रूप से देश की संसदीय राजनीति के स्वास्थ्य की ओर संकेत करती हैं वहीं इसके आसन्न संकेत संपादक के अपने दल से संदर्भित भी हैं जिसकी पुष्टि जार्ज फर्नांडीज पर केंद्रित अभय मौर्य के लेख 'एक नायक का पतन` से भी होती हैं इस लेख को इंट्रो है, 'एक समय विद्रोही नायक सा दिखने वाला व्यक्ति पतन के ऐसे गर्त में गिर सकता है । देश को आज यह सवाल पूछने क अधिकार है कि आखिर क्यों बीते दिनों के उस डायनामाइट नायक का यह हश्र कैसे हुआ?` अपने ही दलीय मंच से उठाया गया दलगत आंतरिक जनतंत्र का सवाल निश्चय ही देश के वर्तमान और भविष्‍य की चिंताएं अपने में समेटे हैं लेकिन यहां एक अवधारणात्मक सवाल उठता है कि जनतंत्र के साथ नायक क्यों? जनतंत्र का तो मूल विचार ही नायकवाद के विरुद्ध है। हमारी विडंबना ही यह है कि हम किसी नायक की कल्पना से मुक्त नहीं हो पाते . जबकि सटीक जनतंत्र के लिए नायकवाद से मुक्ति पहली शर्त है। फ्रांस की राज्यक्रांति से अब तक हम बार बार नायकवाद से मुक्ति की आकांक्षा के बावजूद उसकी ही गिरफ्त में जाने को अभिशप्त रहे हैं। यही बुनियादी वजह है कि अपने लंबे इतिहास के बावजूद सच्चा जनतंत्र अब तक एक सपना ही बना हुआ है। दूसरी बात यह कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार अमेरिका दुनिया भर में लोकतंत्र को किस तरह परिभाषित रहा है, उसके साथ कैसा सुलूक कर रहा है। स्थापित तथ्य है कि जार्ज बुश के नेतृत्व वाला जो अमेरिका जहां दुनिया भर के सच्चे लोकतांत्रिक विश्वासों के लिए आतंक का प्रतीक बना हुआ है वहीं अमेरिका हमारे आंतरिक जनतंत्र की अनदेखी और उपेक्षा की प्रोटीन भी इंजेक्ट कर रहा है। अगर हम इस तथ्य को ध्यान में रख्कर देखें तो जनतंत्र के विमर्श में दिगंत व्यापक होंगें एक सच्ची वैचारिक पत्रिका या मंच को यहीं से शुरुआत करनी होगी। पूंजीवादी या जनवादी लोकतंत्र की बहस फिलहाल हम छोड़ भी दें तो वाल्ट व्हिटमैन, अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर किंग ने जिस लोकतंत्र का झंडा उठाया था और साम्राज्यवाद या उपनिवेशवाद के चक्के तले पिसती राष्‍टीयताओं को जिससे जीवनी शक्ति मिली थी, वह लोकतंत्र आज उन्हीं की जमीन पर तार-तार हो रहा है। पिछले डेढ़ सौ सालों से अमेरिका अपने तौर तरीकों से सारी दुनिया को प्रभावित करता रहा है। आज भी कर रहा है। इसलिए हमें तत्कालिक और स्थानीय लाभों को देखने के बजाय असली लक्ष्य को ही नजर में रखना होगा।

पत्रिका के प्रथमांक का संयोजन सामाजिक न्‍याय , महिला मुक्ति , इतिहास विमर्श, सामाजिकी तथा भाषा और साहित्य, कवि अरुण कमल से प्रमोद रंजन की बातचीत, राजकुमार राकेश के समकालीन संदर्भों से जुड़ा हुआ है और निश्चय ही इस सामग्री में पाठकों के लिए सोचने और प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए बहुत कुछ है। मिसाल के तौर पर ज्ञानचंद की पुस्तक 'एक भाषा दो लिखावट` को लेकर उर्दूवालों के बीच जो तीखीं प्रतिक्रिया हुई और हो रही है, जौकी ने उस पर तार्किग ढंग से विचार किया है । वे ज्ञानचंद को बख्‍शते नहीं हैं लेकिन उर्दू वालों पर उंगली उठाने में भी कोई चूक नहीं करते। जिन्होंने पूरी जीवन उर्दू पर कुर्बान कर देने के बावजूद निरंतर उपेक्षा में जीते आए ज्ञानचंद के मनोविज्ञान को नहीं समझा। मुशर्रफ आलम जौकी की यह उदारवादी तार्किक दृष्टि , खेद के साथ कहना पड़ता है कि उर्दू में सोचने और लिखनेवाले लेकिन नागरी अक्षरों में छपने का हौसला रखने वाले हमारे दूसरे दोस्तों के पास नहीं है। वे उर्दू जबान और अदब के बारे में किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कही गई बात को सीधे भाडयंत्र और आक्रमण की भांति लेते हैं।

१८५७ पर लिखतेहुए कंवल भारती ने कोई नई बात नहीं कही है। सत्तावन को लेकर दो नजरिए शुरू से ही रहे हैं। एक नजरिया जहां उसे साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद विरोधी विस्फोट के रूप में लेता है तो दूसरा विशुद्ध सामंती असंतोष के रूप में और यह कि अगर सत्तावन के विद्रोह में उनकी जीत होती तो इतिहास का पहिया बजाय आगे बढ़ने के पीछे मुड़ जाता। हम आधुनिक पूंजीवादी चरण में पहुंचने की बजाय सामंती दौर में लौट जाते। नंबूरीपाद जैसे कम्युनिस्ट तक इस सोच के शिकार रहे हैं। कंवल भारती वहां तक भी नहीं जाते। उनकी पापुलर पालिमिक्स सत्तावन पूर्व के संथाल, मुंडा आदि आदिवासी जनजाति के विद्रोहों की उपेक्षा करते हुए अंबेडकरवाद के ही चक्कर लगाती रहती है। ऐसे पूर्वग्रहों के बीच इतिहास, साहित्य के किसी निरपेक्ष पुर्नमूल्यांकन की उम्मीद निरर्थक है।

एक बहुध्रुवीय दुनिया का सपना



(राष्ट्रीय सहारा 5 अगस्‍त, 2007, रविवार)

- सुरेश सलिल

आज जब हिंगलशिया शेखी कारपोरेट साम्राज्यवाद और उसके संवाहक मीडिया की प्रवक्‍ता बनकर इतिहास और विचारधारा यहां तक कि आदमी के अंत तक की घोषणाएं करते नहीं थक रही. 'सामाजिक चेतना की वैचारिकी` की मोटी लाइन के साथ 'जन विकल्प` की दस्तक ( जुलाई, २००७), उन जय घोषणाओं की ति‍ली लि-ली करती हुई प्रखर सामाजिक चेतना के साथ समाचार भूमि से उभर रही है. छत्तीस पृष्‍ठों की एक क्षीणकाय पत्रिका से उभरती यह दस्तक मुर्डोक के दैत्याकार मीडिया साम्राज्‍य के सामने उसी तरह की चुनौती पेश करती है जैसे बुश की साम्राज्यवादी सोच के सामने इराक की चुनौती. यह दस्तक अकेली एक पत्रिका की नहीं है. इसमें फिलहाल युवा संवाद, सामयिक वार्ता जैसी उन तमाम छोटी पत्रिकाओं के स्पष्ट रेसे मिले हैं जो तथाकथित मीडिया की पहुंच से बाहर के इलाकों की जनभावना को अभिव्यक्ति देती है और एक व्यापक वैचारिक युद्ध की पृष्‍ठभूमि तैयार करने में संलग्न है. फिर भी यहां चर्चा फिलहाल जन विकल्प` के जुलाई अंक की ही. ..

इस अंक की संपादकीय टिप्पणियां बिहार में माओवादी हिंसा, निवर्तमान राष्‍ट्रपति अब्दुल कलाम की विदाई तथा स्व चंद्रशेखर की स्मृति को समर्पित हैं. बिहार के विभिन्न हिस्सों में माओवादी हिंसा पर टिप्पणी करते हुए यहां कहा गया है- 'हम किसी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं करते. चाहे वह सरकारी हिंसा हो या किसी राजनीतिक संगठन की.. लेकिन जो सरकार एकाएक आगे बढ़कर १८५७ के सश्‍स्‍त्र विद्रोह की १५०वीं जयंती पर जलसों का आयोजन कर रही हो उसे इस तरह की हिंसा का विरोध करने का कोई नैतिक हक नहीं है. माअवोदी कह सकते है और कहते हैं कि यह उनका मुक्तियुद्ध है. ..हम एक बार फिर सरकार से कहना चाहेंगे कि वह उग्रवाद उभरने के वास्तविक कारणों तक जाए और उनका निराकरण करे बजाय पुलिसिया दमन के. इसके लिए आवश्यक है कि गरीबों को विश्वास में लिया जाए.

पिछले पंद्रह वर्षों के लालू राज में बिहार का विकास तो नहीं हुआ लेकिन पिछड़े दलितों में झूठा ही सही यह अहसास तो था कि लालू उनके हैं और उनके माध्यम से उनका राज चल रहा है. इस कारण अतिवादी ताकतें गरीब जनता को गोलबंद करने से विफल रहीं. नीतीश सरकार बनते ही एक अफवाह फैली कि सामंतों का राज फिर कायम हो गया. दुर्भाग्य से यह बात निचले स्तरों तक चली गई है।


..पूर्व राष्‍ट्रपति अब्दुल कलाम को यहां मुख्यत: मिसाइलमैन के रूप में ही रेखांकित किया है और यह कि एक मिसाइलमैन को देश का राष्‍ट्रपति बनाना दुर्भाग्यपूर्ण था. ' राष्‍ट्रपति के रूप में कलाम ने कोई आदर्श नहीं रखा. कबीर की बानी उधार ले लें तो कहा जा सकता है कि चाद मैली ही थी. ..उनकी मिसाइलें मानवता के विरूद्ध ही खड़ी हैं. यहां हिरोशिमा, नागासाकी पर एटम बम गिराने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक क्लाड इथरली को याद किया गया है जो बाद में पश्चाताप से पागल हो गया था. इथरली में इतनी चेतना तो थी कि वह प्रायश्चित कर सकता था. अग्नि की उड़ान की तरह अपनी सफलता की कहानी 'महाप्रलय` की तरह वह भी लिख सकता था. लेकिन उसने पागलखाने में रहना बेहतर समझा। इथरली के पागल होने की घटना ने सारी दुनिया को जो संदेश दिया उसे कलाम अगर समझते तो उन्हें मैं सलाम करता...'


कभी के युवा तुर्क और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के निधन पर उन्हें याद करते हुए उनके राजनीतिक जीवन के परवर्ती दौर में चंद्रास्वामी और सूरजदेव सिंह का निकट से निकटतर आते जाना संपादक को आहत करना है: 'आश्चर्य होता है जिस व्यक्ति के कभी आचार्य नरेंद्रदेव के शिष्‍यत्व में राजनीति धारण की थी, जो बहुत दिनों तक सत्तू और किताबों से घिरा, वह ऐसी वैचारिक अधोगति का शिकार बन गया.'


समसामयिक समाचारों से जुड़ी ये टिप्पणियां महान साहित्य नहीं है, इन्हें थोरा, इमर्सन, रसेल के अमर वक्तव्यों की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकती. लेकिन आज की मूल्यहीनता के दौर में ये गणेश शंकर विद्यार्थी की मूल्यपरक पत्रकारिता की परंपरा से अवश्‍य जुड़ती है और एक सार्थक हस्तक्षेप करती है. पत्रिका के इस अंक में 'सिर पर मैला ढोन की प्रथा` (ज्ञानेश्वर शंभरकर), 'भारत अमेरिकी परमाणु समझौता` (पंकज परशर), 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी के महासचिव गणपति का साक्षात्कार, कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल का 'जनयुद्ध और दलित प्रश्न` शीर्षक दस्तावेज, खड़ी बोली कविता के प्रथम पैरोकार अयोध्याप्रसाद खत्री के महत्व पर राजीव रंजन गिरि का दृष्टि संपन्न लेख और खत्री जी पर फिल्म बनाने वाले कवि फिल्मकार वीरेन नंदा का साक्षात्कार आदि कई ऐसे गद्य है जो जनमानस को शिक्षित प्रेरित करेंगे और मूल्यपरक पत्रकारिता का अर्थ बताएंगे। लेकिन अभी हाल मं संपन्न हुए राष्‍ट्रपति चुनाव की समीक्षा करता रजनीश का आलेख तथा पूर्व रूसी राष्‍ट्रपति बोरिस येल्तसिन के निधन के बहाने सोवियत यूनियन के बिखराव की बाहर और अंदरूनी साजिश की गहरी पड़ताल करता अनीश अंकुर का लेख विशेष रूप से पढ़े जाने चाहिए. ये हमारी दृष्टि और सोच को समृद्ध करते है. रजनीश का यह कथन सरकारी नाम की कथनी और करनी पर एक सशक्त टिप्पणी मानी जानी चाहिए. 'यदि योग्यता को ध्यान में रखकर यूपीए और वामपंथी दलों ने उम्मीदवार तय किया होता तो वो आजादी की लड़ाई में महान योगदान करके आई और पिदले चुनाव की उम्मीदवार कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नाम पर दुबारा गौर जरूर करते. गौर तो खैर उन्होंने आजादी की लड़ाई में मास्टर दा (सूर्यसेन) के साथ जान लड़ा देने वाली आशालता सरकार और अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली चर्चित लेखिका अंरुधति राय जैसी महिलाओं के नाम पर भी नहीं किया. ऐसा शायद इसलिए कि सत्ता के हुक्मरानों का संवैधानिक प्रमुख के पद पर कोई समझदार महिला नहीं बल्कि गूंगी गुड़िया चाहिए।

November 27, 2007

बुद्धिवादी समाज के निर्माण की वैचारिकी

  • शंभुकुमार सुमन

समकालीन राजनीतिक परिदृश्य एवं सामाजिक अंतर्द्वंद्व को उद्घाटित करती 'सामाजिक चेतना की वैचारिकी` जन विकल्प मासिक पत्रिका की शुरुआत जनवरी, २००७ से हुई । सोवियत रूस एवं पूर्वी यूरोप के देशों में समाजवादी सरकारों के पतन के बाद साम्राज्यवादी शक्तियां पूंजीवाद का जयकारा लगाते हुए संघर्षों एवं विकल्प की संभावनाओं का अंत मानने लगी है, वे आक्रामक प्रचार नीति के सहारे पिज्जा-बर्गर, कोक-पेप्सी, भक्ति और भोग की संस्कृति को एमकात्र विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश में तल्लीन हैं , इसी पृष्‍ठभूमि में असहमति का स्वर बुलंद करती और विकल्पहीनता की अवधारणा को चुनौती देतीं लघु पत्रिकाओं के बीच बहुत कम समय में जन विकल्प ने अपनी पहचान बनायी है। यह इस मायने में भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि व्यवस्था एवं सत्ता के करीब रहते हुए भी संपादक विपक्ष की संवेदनशीलता के साथ रचनाओं के चयन में परदर्शी दिखते हैं। कभी पटना से ही 'फिलहाल' पत्रिका निकालनेवाले प्रसिद्ध आलोचक वीरभारत तलवार लिखते हैं कि जन विकल्प के गेट अप, आकार-प्रकार और विषय सूची वगैरह को देख कर मुझे 'फिलहाल` की याद आ गयी, साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच जन विकल्प इस स्थिति में है कि इससे कोई विचार के स्तर पर असहमति रख सकता है, मगर नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसे दुनिया भर के हिंदी पाठकों से मिल रहीं प्रतिक्रियाओं से समझा जा सकता है।
किसी पत्रिका की पठनीयता को पाठकों की प्रतिक्रिया के आंका जा सकता है। हिंदी प्रदेश में सही सूचनाओं और नये शोधपरक विचारों का अभाव है। यहां का माहौल भावनात्मक और आस्थवादी ज्यादा, विचार-विवेकपूर्ण कम है। विज्ञान एवं तकनीक से संचालित जीवन जीते हुए भी वैज्ञानिक चिंतन एवं विश्लेशण से काई सरोकार नहीं। अक्तूबर-नवंबर, २००७ अंक में सेतु समुद्रम परियोजना मामले में 'राष्‍ट्र की संचित मूर्खता के भव्य दर्शन` से अचंभित संपादक लिखते हैं कि 'पूजा और आस्था से केवल अंधविश्वास फैलेगा और यह अंधविश्वास समाज को अन्याय और असमानता के गह्वर में धकेल देगा । `


इस संदर्भ में 'अंतरिक्ष की धर्म यात्रा` (जुलाई, २००७) शीर्षक लेख में युवा लेखक मुसाफिर बैठा लिखते हैं कि सुनीता विलियम्स की सफलता को भारतीय गौरव के साथ जोड़कर देखा जाना, वैज्ञानिक उपलब्धि में धार्मिक पूजा-अनुष्‍ठानों, दुआ-मन्नतों एवं ग्रह-नक्षत्रों आदि की अंधपरक ज्योतिष्‍कीय भूमिका का श्रेय दिया जाना, हमारे मीडिया की तार्किक सोच शून्यता तथा सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति घोर लापरवाही को दरसाता है।


पत्रिका के प्रकाशन को एक साल होनेवाला है। विभिन्न अंकों से गुजरते हुए यह साफ-साफ दिखता है कि समाज, संस्कृति, राजनीति एवं ज्ञान-विज्ञान के सभी अनुशासनों से खुद को जोड़कर पत्रिका ने अपने पाठकों को ज्ञान और विज्ञान के स्तर पर समृद्ध किया है। देश और दुनिया के तमाम जरूरी मुद्दों पर असहमति रखते हुए भी उन पर सामग्री प्रकाशित की गयी है। इस क्रम मे जून-जुलाई, २००७ अंकों में माओवादी नेता गणपति का लंबा साक्षातकार भी शामिल है। महत्वपूर्ण यह है कि माओवादियों से अपनी असहमति (मार्च, २००७) दिखाते हुए संपादक लिखते हैं कि माओवादी मित्रों को हम इस आशा के साथ सलाम करते हैं कि वे सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा की राजनीति का परित्याग करेंगे। साहित्य और संसकृति 'जनतंत्र` में इस तरह की उदारता देखने को कम ही मिलती है। विरोधी स्वर की आलोचना एवं सम्मान साथ-साथ चले तो हिंसा की संभावना क्षीण होती ही है। इसे नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारियों को संरक्षित करके ही पाया जा सकता है।


जीवन जीने की बुनियादी जरूरतें आम आदमी को अब भी हमारे देश में मयस्सर नहीं हो सकी है, रोटी, कपड़ा और मकान के सवाल अब भी अनुत्तरित हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य तो बाद में आते हैं। बिहार में सिर्फ 'चोरी भी आशंका` मात्र से अराजक भीड़ ने कुरेरी जाति के १० घुमंतु युवकों की पीट-पीट कर हत्या कर दी। बर्बर होते समाज के संकेतों को पढ़ते हुए डॉ विनय कुमार लिखते हैं कि 'हर व्यक्ति के भीतर हिंसक विचार होते हैं । मगर वह उन्हें प्रकट करने में उसी तरह झिझकता है, जैसे रोशनी में सबके सामने कपडा उतारने में - भीड़ में, अंधेरे में व्यक्ति की हिंसकता मुखर हो उठती है।`

सवाल लोकतंत्र को भीड़ तंत्र बनने से बचाने का है। मगर दुर्भाग्य यह है कि वामपंथी पार्टियों को छोड़कर तमाम राष्‍ट्रीय और क्षेत्रिय राजनीतिक पार्टियों के पास जन शिक्षण एवं जनचेतना विकसित करने का कोई कार्यक्रम नहीं है। उल्टे विचार और विवेक से रहित भीड़ की संस्कृति विकसित की जा रही है। भीड़ की संस्कृति के खिलाफ एक अनवरत संघर्ष की जरूरत को शिद्दत से महसूस कराती है यह पत्रिका।

हालिया अक्तूबर-नवंबर अंक में दिलीप मंडल का लेख उत्तर-भारत में पिछड़ावाद, रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखित राम कथा के विविध रूप, राम पुनियानी का संविधान है राष्ट्रीय धर्मशास्‍त्र आदि लेख भेड़चाल के बरअक्स विचार एवं बुद्धिसंगतता के पक्ष को पुष्‍ट करते हैं।

शरद यादव के लेख 'संविधान पर न्यायपालिका के हमले के खिलाफ` एवं प्रमोद रंजन का लेख 'ब्राह्मणवाद की पुनर्वस्थापना का षडयंत्र` खास उल्लेखनीय है। पत्रिका ने माइक थेवर जैसे व्यक्तित्व को भी सामने लाया है, जो चुपचाप अपने काम से उन भ्रामक आशंकाओं की जड़ खोद रहे हैं, जिन्हें अभिजात वर्ग की-जान से पनपाने में लगा हुआ है।

  • समीक्षा

  • प्रभात खबर, 20 नवंबर,2007, पटना

November 21, 2007

विहगावलोकन/ राष्ट्रीय सहारा

( 11 नवंबर,2007, रविवार)

- सुरेश सलिल




एक तरफ मुल्‍क में वैज्ञानिक तकनीकी संस्‍थानों का जाल बिछ रहा है, लाखों युवा विज्ञान और तकनीक की उम्‍दा पढाई कर रहे हैं और दूसरी ओर हमारी सामजिक प्रवृतियों में धर्मांधता , कट्टरता और अवैज्ञानिकता का जोर बढ़ता जा रहा है । 'जन विकल्' के नए अंक में संपादकी‍ के रूप में कथाकार / संपादक प्रेमकुमार मणि के लेख की शुरूआत इसी चिंता से होती है । थोडा विस्‍तार से देखें तो यह विडम्‍बना हमारे समय और समाज के साथ 19 वीं सदी के अंतिम दशकों से जुडी हुई है, जिसे नवजागरण के शुरूआत का समय माना जाता है और आधुनिक किस्‍म के स्‍वाधीनता आंदोलन की शुरूआत भी ।

टाटा आदि राष्‍टीय पूंजीपति इस समय जहां विज्ञान और तकनीक से जुडे राषटीय उद्योगों की पहल कर रहे थे , वहीं हाथ में गीता लेकर 'स्‍वराज्‍य हमार जन्‍मसिद्ध अधिकार है ' का सपना संजोया जा रहा था । वर्तमान में भी हम देखें तो हमारे पूर्व राष्ट्रपति विज्ञान और प्रभु कृपा के विचित्र घालमेल हैं। यदि वयक्तिगत आस्‍था तक ही बात सीमित हो तो कोई बात नहीं, लेकिन वे तो देश भर में घूमघूम कर बच्‍चों तक को वैज्ञानिक दृष्टि अपनाने और ईश्‍वर भीरू बनने का संदेश साथ - साथ देते रहे हैं । यह भी एक तरह का द्वंद्वात्‍मक भौतिकवाद ही है लेकिन समस्‍या तब और उलझ जाती है जब हम एक ओर धर्मांधता , कट्टरता और अवैज्ञानिकता का विरोध करते हुए दूसरी ओर आर्थिक प्रश्‍नों पर सामाजिक, सांस्‍कृतिक प्रश्‍नों के साथ घालमेल कर देते हैं। वर्ग संघर्ष के प्रश्‍नों को वर्ण संघर्ष में रूपांतरित कर देते हैं । खैर, यह कभी न खत्‍म होने वाली बहस है ।

पत्रिका में समाचार और विचार का संतुलन संपादकीय कल्पनाशीलता और पत्रकारिता मानदंडों के निर्वाह की एक मिसाल बनकर सामने आता हैवैशाली जिले के राजापाकर थानांतर्गत कुरेरी नामक घुमंतू जाति के दस युवाओंकी हत्या की घटना यहां यहां आवरण कथा की तरह प्रसतुत हैघुमंतू जातियों को इस प्रकार की हिंसा औरसामाजिक तिरस्कार का शिकार एक जमाने से होना पड रहा हैउनके मौलिक अधिकारों को लेकर संविधान मेंभी बहुत साफ स्थिति नहीं हैपत्रिका के इस अंक में उपरोक् जघन् हत्याकांड पर पांच रपटें और आलेख ( रजनीश उपाध्याय, अनीश अंकुर, नरेंद्र कुमार, गुलरेज शहजाद , डॉ विनय कुमार ) प्रकाशित किए गए हैं, जो वोटकी राजनीति से लेकर तथाकथित सामाजिक न्याय तक कई प्रश्नों , पक्षों को रेखांकित करते हैं ‍ ‍ ‍‍‍‍ ‍‍ दरअसल, यह गहरे समाजशास्त्रीय सवालों से जुडा मामला है जिसे उसी रोशनी में देखा जाना चाहिए और जिस पर निरंतर बहस चलाई जानी चाहिए

पिछडावाद की राजनीति को लेकर दिलीप मंडल का लेख तथा युरेनियम खनन , शिक्षा के सार्वजनीकरण से संदर्भित मेघालय व झारखंड राज्‍यों की रपटें , कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी गई खुली छूट के दुष्‍परिणाम और परमाणु संधि जैसे ज्‍वलंत प्रश्‍नों से जुडे आलेख सीमि‍त कलेवर में भी पत्रिका को समाचार विश्‍लेषण की एक दृष्टिसंपन्‍न पहचान देते हैं । इस अंक का विचार पक्ष , संपादकीय संबोधन के अनुंरूप पुरोहित पुराण और पुनरूत्‍थानवाद के विरूद्ध एक ऐजेंडे की तरह आता है । संपादकीय आलेख के अलावा यहां प्रेमकुमार मणि के एक और लेख ( एक और मिथक का पुनर्पाठ ) की ओर ध्‍यान जाता है । जो शक्ति पूजा की अवधारणा की शल्‍यक्रिया करता है । शक्ति अराधना के भारतीय इतिहास का विश्‍लेषण करते हुए उसे आर्यों के आगमन से जोडा गया है , जिसके अनुसार दुर्गा आर्यों की देवी हैं , जबकि भारतीय पौराणिक मिथकों के विश्‍लेषण करने वाले विद्वानों ने दुर्गा - काली आदि सभ्‍यता से जोडा है । स्‍त्री विमर्श के आनुसार ये दोनों देवियां पुरूष वर्चस्‍व के विरूद्ध स्‍त्री शक्ति का प्रतीक है

इसी क्रम में गीता से संदर्भित प्रखर युवा पत्रकार प्रमोद रंजन के अनुसार , ब्राह्मण्त् को बौद्ध प्रभाव से उबारने केलिए और पहली सहस्त्राब्दि के पूर्वार्द्ध के बौद्ध चिंतकों के बढते प्रभाव को कम करने के लिए गीता की रचना कीगईयही तर्क तुलसी के रामचरित मानस पर भी लागू किया गया है कि भक्तिकाल के शूद्र कवियों -कबीर औररैदास के बढते प्रभाव को रोकने अथवा हल्का करने के लिए रामचरितमानस का औजार विकसित किया गया‍‍ ‍ ‍ इन दोनों लेखों के तर्कों से सहमत - असहमत होना दीगर बात है । महत्‍वपूर्ण यह है कि युवा पीढी युगों से चले आ रहे इन विवादास्‍पद प्रश्‍नो से टकरा रही है और तथाकथित आस्‍था के विरूद्ध तर्क की भाषा वि‍कसित कर रही है ।


रामसेतु के हवाले से राम की ऐतिहासिकता को लेकर उठे विवाद पर भी दो लेख प्रकाशित किए गए हैं । पहला लेखसुरेश पंडित का है ,जिसमें दक्षिण भारत के दलित आंदोलन के जनक ई वी पेरियार की दृष्टि से वाल्‍मीकि रामायण और उसके चरित्रों का विश्‍लेषण है । दूसरा लेख राष्ट्रीय धारा के कवि रामधारी सिंह दिनकर की पुस्‍तक ' संस्कृति के चार अध्याय ' का एक अंश‍‍ है, जिसमें पुनरूत्‍थानवादी नजरिए से रामकथा के मूल स्रोत खोजने की कोशिश की गई है ।

यहां इतिहासकार सुधीर चंद्र से वसंत त्रिपाठी की बातचीत भी लक्ष्‍य की जाएगी । आज जब विचार के हर क्षेत्र में धडे बन गए हैं तो यहां पाठक के मन में प्रश्‍न उठना स्‍वाभाविक है कि सुधीर चंद्र किस धडे के इतिहासकार हैं । उनकी शैली और तर्क पद्धति उन्‍हें सवाल्‍टर्न हिस्‍टीरियोग्राफी के नजदीक ले जाती है , जो अपनी पूर्व अवधारणाओं के अनुसार तथ्‍यों को फ्रेंगमेंट्स्‍ या टुकडों में प्रस्‍तुत करने की रणनीति लेकर चलती है । कुल मिलाकर 'जन विकल्‍प' का यह अंक अपने सीमित कलेवर में भी विमर्श और विचार की इतनी बहुविध -सप्रश्‍न सामग्री संजोये है कि सृजन और विचार के नाम पर निकलने वाली मोटी - मोटी आतंककारी पत्रिकाएं भी बौनी नजर आएं ।

( जन विकल्‍प, अक्‍टू- नवं-2007, संपादक - प्रेमकुमार मणि- प्रमोद रंजन , संपर्क - 2 सूर्या विहार, आशियाना नगर, पटना - 25, मूल्‍य - एक प्रति 10 रूपए , वार्षिक 100 रूपए )