November 21, 2007

विहगावलोकन/ राष्ट्रीय सहारा

( 11 नवंबर,2007, रविवार)

- सुरेश सलिल




एक तरफ मुल्‍क में वैज्ञानिक तकनीकी संस्‍थानों का जाल बिछ रहा है, लाखों युवा विज्ञान और तकनीक की उम्‍दा पढाई कर रहे हैं और दूसरी ओर हमारी सामजिक प्रवृतियों में धर्मांधता , कट्टरता और अवैज्ञानिकता का जोर बढ़ता जा रहा है । 'जन विकल्' के नए अंक में संपादकी‍ के रूप में कथाकार / संपादक प्रेमकुमार मणि के लेख की शुरूआत इसी चिंता से होती है । थोडा विस्‍तार से देखें तो यह विडम्‍बना हमारे समय और समाज के साथ 19 वीं सदी के अंतिम दशकों से जुडी हुई है, जिसे नवजागरण के शुरूआत का समय माना जाता है और आधुनिक किस्‍म के स्‍वाधीनता आंदोलन की शुरूआत भी ।

टाटा आदि राष्‍टीय पूंजीपति इस समय जहां विज्ञान और तकनीक से जुडे राषटीय उद्योगों की पहल कर रहे थे , वहीं हाथ में गीता लेकर 'स्‍वराज्‍य हमार जन्‍मसिद्ध अधिकार है ' का सपना संजोया जा रहा था । वर्तमान में भी हम देखें तो हमारे पूर्व राष्ट्रपति विज्ञान और प्रभु कृपा के विचित्र घालमेल हैं। यदि वयक्तिगत आस्‍था तक ही बात सीमित हो तो कोई बात नहीं, लेकिन वे तो देश भर में घूमघूम कर बच्‍चों तक को वैज्ञानिक दृष्टि अपनाने और ईश्‍वर भीरू बनने का संदेश साथ - साथ देते रहे हैं । यह भी एक तरह का द्वंद्वात्‍मक भौतिकवाद ही है लेकिन समस्‍या तब और उलझ जाती है जब हम एक ओर धर्मांधता , कट्टरता और अवैज्ञानिकता का विरोध करते हुए दूसरी ओर आर्थिक प्रश्‍नों पर सामाजिक, सांस्‍कृतिक प्रश्‍नों के साथ घालमेल कर देते हैं। वर्ग संघर्ष के प्रश्‍नों को वर्ण संघर्ष में रूपांतरित कर देते हैं । खैर, यह कभी न खत्‍म होने वाली बहस है ।

पत्रिका में समाचार और विचार का संतुलन संपादकीय कल्पनाशीलता और पत्रकारिता मानदंडों के निर्वाह की एक मिसाल बनकर सामने आता हैवैशाली जिले के राजापाकर थानांतर्गत कुरेरी नामक घुमंतू जाति के दस युवाओंकी हत्या की घटना यहां यहां आवरण कथा की तरह प्रसतुत हैघुमंतू जातियों को इस प्रकार की हिंसा औरसामाजिक तिरस्कार का शिकार एक जमाने से होना पड रहा हैउनके मौलिक अधिकारों को लेकर संविधान मेंभी बहुत साफ स्थिति नहीं हैपत्रिका के इस अंक में उपरोक् जघन् हत्याकांड पर पांच रपटें और आलेख ( रजनीश उपाध्याय, अनीश अंकुर, नरेंद्र कुमार, गुलरेज शहजाद , डॉ विनय कुमार ) प्रकाशित किए गए हैं, जो वोटकी राजनीति से लेकर तथाकथित सामाजिक न्याय तक कई प्रश्नों , पक्षों को रेखांकित करते हैं ‍ ‍ ‍‍‍‍ ‍‍ दरअसल, यह गहरे समाजशास्त्रीय सवालों से जुडा मामला है जिसे उसी रोशनी में देखा जाना चाहिए और जिस पर निरंतर बहस चलाई जानी चाहिए

पिछडावाद की राजनीति को लेकर दिलीप मंडल का लेख तथा युरेनियम खनन , शिक्षा के सार्वजनीकरण से संदर्भित मेघालय व झारखंड राज्‍यों की रपटें , कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी गई खुली छूट के दुष्‍परिणाम और परमाणु संधि जैसे ज्‍वलंत प्रश्‍नों से जुडे आलेख सीमि‍त कलेवर में भी पत्रिका को समाचार विश्‍लेषण की एक दृष्टिसंपन्‍न पहचान देते हैं । इस अंक का विचार पक्ष , संपादकीय संबोधन के अनुंरूप पुरोहित पुराण और पुनरूत्‍थानवाद के विरूद्ध एक ऐजेंडे की तरह आता है । संपादकीय आलेख के अलावा यहां प्रेमकुमार मणि के एक और लेख ( एक और मिथक का पुनर्पाठ ) की ओर ध्‍यान जाता है । जो शक्ति पूजा की अवधारणा की शल्‍यक्रिया करता है । शक्ति अराधना के भारतीय इतिहास का विश्‍लेषण करते हुए उसे आर्यों के आगमन से जोडा गया है , जिसके अनुसार दुर्गा आर्यों की देवी हैं , जबकि भारतीय पौराणिक मिथकों के विश्‍लेषण करने वाले विद्वानों ने दुर्गा - काली आदि सभ्‍यता से जोडा है । स्‍त्री विमर्श के आनुसार ये दोनों देवियां पुरूष वर्चस्‍व के विरूद्ध स्‍त्री शक्ति का प्रतीक है

इसी क्रम में गीता से संदर्भित प्रखर युवा पत्रकार प्रमोद रंजन के अनुसार , ब्राह्मण्त् को बौद्ध प्रभाव से उबारने केलिए और पहली सहस्त्राब्दि के पूर्वार्द्ध के बौद्ध चिंतकों के बढते प्रभाव को कम करने के लिए गीता की रचना कीगईयही तर्क तुलसी के रामचरित मानस पर भी लागू किया गया है कि भक्तिकाल के शूद्र कवियों -कबीर औररैदास के बढते प्रभाव को रोकने अथवा हल्का करने के लिए रामचरितमानस का औजार विकसित किया गया‍‍ ‍ ‍ इन दोनों लेखों के तर्कों से सहमत - असहमत होना दीगर बात है । महत्‍वपूर्ण यह है कि युवा पीढी युगों से चले आ रहे इन विवादास्‍पद प्रश्‍नो से टकरा रही है और तथाकथित आस्‍था के विरूद्ध तर्क की भाषा वि‍कसित कर रही है ।


रामसेतु के हवाले से राम की ऐतिहासिकता को लेकर उठे विवाद पर भी दो लेख प्रकाशित किए गए हैं । पहला लेखसुरेश पंडित का है ,जिसमें दक्षिण भारत के दलित आंदोलन के जनक ई वी पेरियार की दृष्टि से वाल्‍मीकि रामायण और उसके चरित्रों का विश्‍लेषण है । दूसरा लेख राष्ट्रीय धारा के कवि रामधारी सिंह दिनकर की पुस्‍तक ' संस्कृति के चार अध्याय ' का एक अंश‍‍ है, जिसमें पुनरूत्‍थानवादी नजरिए से रामकथा के मूल स्रोत खोजने की कोशिश की गई है ।

यहां इतिहासकार सुधीर चंद्र से वसंत त्रिपाठी की बातचीत भी लक्ष्‍य की जाएगी । आज जब विचार के हर क्षेत्र में धडे बन गए हैं तो यहां पाठक के मन में प्रश्‍न उठना स्‍वाभाविक है कि सुधीर चंद्र किस धडे के इतिहासकार हैं । उनकी शैली और तर्क पद्धति उन्‍हें सवाल्‍टर्न हिस्‍टीरियोग्राफी के नजदीक ले जाती है , जो अपनी पूर्व अवधारणाओं के अनुसार तथ्‍यों को फ्रेंगमेंट्स्‍ या टुकडों में प्रस्‍तुत करने की रणनीति लेकर चलती है । कुल मिलाकर 'जन विकल्‍प' का यह अंक अपने सीमित कलेवर में भी विमर्श और विचार की इतनी बहुविध -सप्रश्‍न सामग्री संजोये है कि सृजन और विचार के नाम पर निकलने वाली मोटी - मोटी आतंककारी पत्रिकाएं भी बौनी नजर आएं ।

( जन विकल्‍प, अक्‍टू- नवं-2007, संपादक - प्रेमकुमार मणि- प्रमोद रंजन , संपर्क - 2 सूर्या विहार, आशियाना नगर, पटना - 25, मूल्‍य - एक प्रति 10 रूपए , वार्षिक 100 रूपए )

1 comment:

  1. Manjari SrivastavaTuesday, November 27, 2007

    bahut achha lag raha hai yeh dekhkar ki aapne jan vikalp ko kahan se kahan pahuncha diya hai.really i m so impressed. aap bahut bahut badhai ke paatra hain.par aapse ek guzarish hai ki apni patrika ko aur zyada utkrist banane ke liye zaroori hai ki aap spelling mistake se bachein.maine dekha hai ki uttam star ki patrika ke bawazood bhi ismein kai vyakarnik ashudhiyaan hain.kripya inpar dhayan de aur aasha hai ki agle ank mein inki punravriti nahi hogi.-Manjari Srivastava ,Delhi

    ReplyDelete