September 18, 2007

मुक्ति संघर्ष के दो दस्तावेज

फिल्म

  • रेयाज-उल-हक

आज जब हम कश्मीर, चेचेन्या, इराक और फलस्तीन में आजादी और राष्ट्रीयता की लड़ाइयों से रू-ब-रू हो रहे हैं, लोकतंत्र, शांति और राष्ट्रवाद के रक्तस्नात नारों और मंत्रोच्चर के स्वर हमारे परिवेश को हिंसक संभावनाओं से भर रहे हैं-हम दो ऐसी फिल्मों को याद करना चाहेंगे, जिनमें हमारा परिचय आजादी की उत्कट आकांक्षा और उसके लिए कोशिशों से होता है।

यों तो हॉलीवुड और; ऐसा कहा जाता है कि बॉलीवुड में भी आजादी को केंद्र में रख कर अनेक फिल्में बनी हैं, मगर ये दोनों फिल्में इन दोनों ही फिल्म उद्योगों से बाहर की हैं, इनमें से एक लीबिया में बनी है और दूसरी ईरान में। ये दोनों देश कमोबेश साम्राज्यवादी देशों के निशाने पर रहे हैं। इन फिल्मों में से एक तो सीधे उन कुर्बानियों का ही सिनेमाई दस्तावेज हैं, जो आजादी के लिए दी गयीं और दूसरी सीधे किसी लड़ाई को अपनी केन्द्रीय विषयवस्तु न बनाते हुए भी मुक्ति की आकांक्षा को पूरी शिद्दत के साथ सामने लाती है।

'लायन ऑफ द डेजर्ट` मुस्तफा अक्काद की चर्चित फिल्म है। एंटोनी क्विन्न के कमाल के अभिनयवाली यह फिल्म लीबियाई जनता के महान संघर्ष पर आधारित है। १९११ में इटली की सेना द्वारा लीबिया पर कब्जा करने के बाद वहां के लोगों ने प्रतिरोध संघर्ष छेड़ दिया। एक साधारण से मदरसा शिक्षक उमर मुख्तार के नेतृत्व में लीबियाई जनता एकजुट हुई और उसने अपनी पुरानी बंदूकों और पुराने तरीकों से इटली की सेना के खिलाफ युद्ध की शुरुआत की। इटली के पास न सिर्फ लीबियाईयों के मुकाबले आधुनिक सैन्य साजो-सामान थे, तोपें थीं बल्कि उनके तरीके भी अधिक क्रूर थे। उन्होंने गांवों को उजाड़ दिया और फसलें जला डालीं। ताकि लड़ाकुओं को मदद और रसद न मिल सके। जो नागरिक आजादी लड़ाई में न जा सके थे, औरतें बच्चे और बीमार, उन्हें यातना शिविरों में रखा गया, जहां वे खुद मर जाते या उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता। इसके बावजूद लीबियाई जनता का अपराजेय प्रतिरोध तेज और मजबूत होता गया। उन्होंने अनेक लड़ाइयां जीतीं, अपने बहुत सारे साथियों के मारे जाने के बाद भी वे थके नहीं, हार नहीं मानी और एक से दूसरी जगह अपने ठिकाने बनाते हुए मुसोलिनी के फासिस्ट मंसूबों से लोहा लेते रहे।

प्रतिरोध आंदोलन जब शुरु हुआ, इसके नेता उमर मुख्तार ४९ साल के थे। उन्होंने २० साल से अधिक समय तक प्रतिरोध आंदोलन का नेतृत्व किया। इस दौरान इटली की सेना कभी भी निर्द्वंद्व होकर लीबिया पर काबिज नहीं हो पायी। १९३१ में उमर मुख्तार की गिरफ्तारी और उनको फांसी दिये जाने के बाद भी प्रतिरोध की उस लहर को समाप्त नहीं किया जा सका।

फिल्म इस पूरे घटनाक्रम को उसके सभी आयामों के साथ दर्ज करती है। गांववालों के संगीतमय उत्सव, वहां की लड़कियों का उल्लास, बच्चों की शरारतें और फिर एक दिन सब कुछ का खत्म हो जाना! १९८१ में प्रदर्शित हुई यह फिल्म इटली में बहुत दिनों तक प्रतिबंधित रही।

दूसरी फिल्म है मजीद मजीदी की 'चिल्ड्रेन ऑफ हैवेन`। १९९७ में ईरान में बनी फारसी भाषा की इस फिल्म को १९९८ का ऑस्कर अवार्ड भी मिला था। सरसरी तौर पर यह फिल्म दो बच्चों और उनके जूतों की कहानी लगती है, लेकिन अगर हम इसके बिंबों को पढ़ने की कोशिश करें, तो पाते हैं कि यह फिल्म एक समाज की अपने रूढ़ होते समय से बाहर आने की छटपटाहट से भरी है। फिल्म में ईरानी समाज में तीव्र वर्गीय विभाजन और लगातार बदतर होते राजनीतिक हालात के बारे में पता चलता है।

फिल्म की शुरुआत होती है जूतों की मरम्मत के दृश्य से। अली अपनी छोटी बहन जोहरा के जूते मरम्मत करा रहा है। मगर लौटते समय वह रास्ते में उन्हें खो देता है। जब जोहरा को पता चलता है कि जूते खो गये, उसके सामने सबसे बड़ी समस्या यह खड़ी होती है कि वह अब स्कूल कैसे जायेगी। अली जोहरा को यह बात मां-बाप से बताने को इसलिए मना करता है क्योंकि वह जानता है कि उनके पास पैसे नहीं हैं और वे जूते नहीं खरीद पायेंगे। जूते खो देने के कारण उसे मार खाने का भी डर होता है।

अली जोहरा को इस बात के लिए राजी कर लेता है कि वह अली के जूते पहन कर स्कूल चली जायेगी। वह लौटेगी तो अली स्कूल जाएगा। इसके बाद आप फिल्म के अधिकतर हिस्सों में इन दोनों बच्चों को बस दौड़ते हुए देखते हैं। जोहरा दौड़ते हुए स्कूल से लौटती है ताकि अली को स्कूल जाने में देर न हो। अली भी दौड़ते हुए स्कूल पहुंचता है और देर से पहंुच कर डांट खाता है।

बच्चों की यह दौड़ ईरानी समाज द्वारा आर्थिक शोषण मुक्ति के लिए की जाने वाली दौड़ का रूपक बन जाता है। अली के परिवार की गरीबी के दृश्य उस त्रासदी को और गहरा कर देते हैं, जो फिल्म के माध्यम से बार-बार उभर कर सामने आती हैं। फिल्म के एक दृश्य में अली और उसके पिता बागवानी का कुछ काम करके अतिरिक्त पैसे कमाने के इरादे से निकलते हैं। मगर उन्हें अधिकतर जगहों से फटकार ही मिलती है। अंत में जब उन्हें एक जगह काम मिलता है और वे कुछ पैसे कमा पाते हैंं लेकिन लौटते समय उनका एक्सीडेंट हो जाता है और कमाये हुए पैसे इलाज में लग जाते हैं।

जूतों की समस्या के हल के लिए अली प्रांतीय स्तर की दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेता है, जिसमें तीसरे स्थान पर आने वाले लड़के को एक जोड़ी जूते दिये जाने थे। अली इसी तीसरे स्थान के लिए दौड़ता है और जानबूझ कर अपने आगे दो प्रतिभागियों को निकलने देता है। मगर अंतिम समय में कई लड़कों के आगे आने के कारण वह दूरी बरकरार नहीं रख पाता और गति बढ़ाने के चक्कर में सबसे पहले जीत का निशान पार कर जाता है।
यह जीत अली के लिए बहुत बड़ी विडम्बना है। वह चाहता है कि उसे जूते मिलें और उसे एक कप थमा दिया जाता है, जिसका अली के लिए कोई मतलब नहीं।

थका-हारा अली जब घर लौटता है, जोहरा उसकी राह देख रही होती है। उसे उदास देखते ही वह सब समझ जाती है। फिल्म के अंतिम दृश्य में पानी में डूबा अली का फफोलों वाला पैर दिखता है, जिसे मछलियों ने घेर रखा है। अली ने फट चुका जूता अभी-अभी निकाल फेंका है। ईरान जैसे समाज में अपनी बात कहने के लिए जिस तरह के कौशल और बिंबों के इस्तेमाल की जरूरत है, मजीद मजीदी ने उन्हें गढ़ने में मेहनत की है। देखनेवाले को लगता है कि वह जूतों पर एक बेेहतरीन फिल्म देख रहा है, मगर वास्तव में वे जूते अंतत: ईरानी समाज की आर्थिक-गैरबराबरी से मुक्ति की चाहत और लोकतांत्रिक की आकांक्षाओं के प्रतीक बन कर उभरते हैं।
अगर इन दोनों फिल्मों को मिलाकर देखा जाये तो ये वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को मुकम्मल तौर पर अभिव्यक्ति देती नजर आती हैं। 'लायन आफ़ द डेज़र्ट` इराक, फलस्तीन, कश्मीर, चेचेन्या, फिलीपींस, पेरु और बाकी जगहों पर युद्धरत जनता के संघर्षों को स्वर देती है तो दूसरी ओर 'चिल्ड्रेंस हैवन` अमेरिकी साम्राज्य के कर्ताधर्ताओं द्वारा निर्यात की जा रही आजादी और लोकतंत्र की अवधारणओं और स्वरूपों के बरअक्स अपनी तरह की और सही मायनों में सच्ची आजादी और जनवाद का विकल्प सामने लेकर आती है, जहां उधार के जूते पहनने की मजबूरी और जरूरत न हो। यह एक तरह से 'लायन आफ़ द डेर्जट़` का उत्तरार्ध भी है।

हम इन फिल्मों में देखते हैं कि इनकी देशभक्ति की अवधारणा किसी दूसरे देश के खिलाफ नफरत की बुनियाद पर नहीं खड़ी की गई है और न ही इनमें देशभक्ति किसी सनक की स्थानापन्न बनती है।
यह ठीक वह जगह है जब इनके साथ हिन्दी फिल्मों पर भी तुलनात्मक बात की जानी चाहिए। हमारे सामने हिन्दी फिल्मों का ७५ साल पुराना इतिहास है और यह शर्मनाक है कि हम उन हजारों हिन्दी फिल्मों में से उंगलियों पर गिनी जाने लायक महज कुछ 'कला` फिल्में ही बता सकते हैं जो अपने इतिहास और भविष्य को वैज्ञानिक और बौद्धिक तरीके से विषय बनाती हांे। हमारे यहां देशभक्ति की बड़ी भ्रमित करनेवाली अवधारणा प्राय: शुरु से ही रही है।

१९४७ के बाद जो फिल्में देश के लोगों और देशभक्ति को अपना केंद्रीय विषय वस्तु बनाते हुए बनीं, उनमें तो कुछ हद तक एक संतुलन था भी। अभी-अभी देश से गये साम्राज्यवादी शासकों के प्रति गुस्सा और देश में बचे रह गये उनके अवशेषों के प्रति संदेह की मौजूदगी उनमें मिलती है, खासकर प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा से जुड़ लेखकों-फिल्मकारों की फिल्मों में। आवारा और श्री ४२० जैसी फिल्में भी सीधे-सीधे देश भक्ति पर न होते हुए आजादी और आम आदमी से जुड़, आधारभूत सवालों को रेखांकित करती हैं। मगर इसी के साथ आदर्शवादी चरित्र और ऐतिहासिक दृष्टि से पूरी तरह गलत तथ्यों के आधार पर नायकों को गढ़ने का सिलसिला भी चला। 'दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल` जैसे हास्यास्पद और तथ्यहीन निष्कर्ष उसी दौर में थोपे गये। मगर ७० के दशक की शुरुआत से, जब कांग्रेस से मोहभंग शुरु हुआ, आजादी और देशभक्ति की अवधारणाओं में बदलाव दिखने लगा। अंगरेजों की जगह कुछ अजीब सी पोशाकोंवाले खलनायक देश के दुश्मन के रूप में सामने आये जिनके साथ कुछ अंगरेजी लहजे में हिंदी बोलनेवाले विदेशी रहते थे और जो मिलकर देश को तोड़ने और तरस्करी करने का धंधा करते थे। ९० के दशक में यह दौर भी खत्म हुआ और सीधे-सीधे पाकिस्तान हमारे लिए एक दुश्मन के रूप में बिठा दिया गया। देश की सारी समस्याओं, सारी बुराइयों का एकमात्र कारण!

आज इन विषयों पर जो भी फिल्में आ रही हैं उनमें यह साफ दिखता है कि वे बस लोगों में बैठा दी गयी असुरक्षा की भावना को भुनाना और उसे और गहरा कर देना चाहती हैं। देशभक्ति को बिना एक ठोस अवधारणा का रूप दिये, एक सनकीपन की तरह परोसा जा रहा है। कश्मीर ऐसी ही सनक के रूप में हमारी फिल्मों में प्रवेश पाता है। कश्मीर का संकट जितना गहराता गया, जितना बड़ा होता गया, फिल्मकारों के लिए उस पर फिल्म बनाना भी जटिल होता गया है, लेकिन किसी फिल्मकार ने इस विषय पर सरकारी नजरिये से अलग हटकर फीचर फिल्में बनाने की कोशिश नहीं की है।

इसके अलावा हिन्दी फिल्मों का वर्गीय चरित्र भी साफ है। हिन्दी फिल्मों के किसान शोषण और औपनिवेशिक अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए विद्रोह नहीं करते, वे लगान माफ कराने के लिए क्रिकेट खेलने में अपना वक्त जाया करते हैं।

इंतजार था जिसका ये वो सहर तो नही

पाकिस्तान

  • पंकज पराशर


आखिरकार 'ऑपरेशन साइलेंस` कामयाब रहा। राजधानी इस्लामाबाद स्थित लाल मस्जिद को आतंकवादियों से सेना ने मुक्त करवा लिया। इस मसले को लेकर पाकिस्तान की सरकार और आतंकवादियों के बीच पिछले छ: महीने से जारी वार्ता के विफल हो जाने के बाद से सैनिक हुकूमत लगातार पशोपेश की स्थिति से गुजर रही थी। आतंकवादी महिलाओं और बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल करके सरकार को लगातार दबाव की स्थिति में रखने की रणनीति पर अमल कर रहे थे। असल में लाल मस्जिद को लेकर तनाव तब पैदा होना शुरु हुआ जब कुछ पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों का अपहरण किया गया। मस्जिद परिसर में रह रहे कट्टरपंथी उन्हें गैर इस्लामिक गतिविधियों में मुब्तिला मानते थे। कई महीनों से लाल मस्जिद के मौलवी और छात्र राजधानी इस्लामाबाद में शरिया कानून लागू करने के लिए अभियान चला रहे थे और मस्जिद परिसर आतंकवादियों के शिविर में तब्दील होता जा रहा था। इसके बाद भी सरकार व्यापक जन विरोध के डर से कोई कार्रवाई करने से हिचक रही थी। यहां तक कि कार्रवाई से एक दिन पहले जनरल मुशर्रफ ने मस्जिद के प्रबंधन और आतंकवादियों को चेतावनी दी थी कि यदि वे हथियार नहीं डालते हैं तो सैनिक कार्रवाई में मारे जाएंगे। मगर कट्टरपंथी नेता अब्दुल रशीद गाजी ने जनरल मुशर्रफ की इस चेतावनी के बाद भी वही अड़ियल रुख अपना रखा था, जिसके बाद मुशर्रफ के सामने विकल्प लगातार सीमित होते जा रहे थे। अंतत: सेना को कार्रवाई का आदेश दिया गया और तकरीबन ३६ घंटे चली इस कमांडो कार्रवाई में सेना के १० जवान सहित ७५ लोग मारे गए। मारे गए लोगों में प्रमुख कट्टरपंथी नेता अब्दुल रशीद गाजी भी शामिल हंै। इस कार्रवाई से पहले लाल मस्जिद परिसर से करीब १३०० लोग बाहर निकलने में कामयाब रहे। हालांकि अभी तक यह खुलासा नहीं हुआ है कि सेना ने जब कार्रवाई शुरु की तो उस वक्त मस्जिद परिसर में कितने लोग थे?

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में स्थित लाल मस्जिद का इस्लामिक कट्टरपंथी और आतंकवाद से बहुत पुराना नाता रहा है। ९/११ की घटना के बाद जब पाकिस्तान आतंकवाद से कथित मुकाबले में अमेरिका का प्रमुख सहयोगी बन गया तब से लाल मस्जिद में चलने वाली संदेहास्पद गतिविधियां खुलेआम सामने आ गइंर्। खुफिया सूत्रों के हवाले से बताया गया कि खतरनाक आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद इसी मस्जिद से अमेरिका के खिलाफ रणनीतियां तैयार करने लगा था। इन गतिविधियों से यहां की सरकार वाकिफ नहीं थी, यह विश्वसनीय नहीं है। क्योंकि लाल मस्जिद इस्लामाबाद के अमीरों के इलाके में है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का मुख्यालय इस मस्जिद से सिर्फ कुछ ही कदमों की दूरी पर है। वहां आकर नमाज पढ़ने वालों में आईएसआई के अफसरों सहित वरिष्ठ नौकरशाह भी होते थे। लाल मस्जिद को वहां के वरिष्ठ अधिकारियों की सरपरस्ती हासिल थी जिसकी वजह से सरकार काफी दिनों तक कार्रवाई करने से हिचकती रही।

इस कार्रवाई के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि वे पाकिस्तान से दहशतगर्दी के खात्मे के लिए पूरी तरह वचनबद्ध हैं। इस कार्रवाई में शामिल सैनिकों की मौत को उन्होंने शहादत बताते हुए कहा कि उनका खून देश के काम आया। अफसोस के साथ मुशर्रफ ने कहा कि हमें अपने ही लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि वे रास्ता भटक कर आतंकवाद की ओर चले गए थे। इस संबोधन में उन्होंने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान अपने किसी भी मदरसे को आतंकवादियों का अड्डा नहीं बनने देगा। मगर मुशर्रफ की इन बातों का कितना असर हुआ इसका पता इसी से चलता है कि लाल मस्जिद पर कार्रवाई के तत्काल बाद पूरे पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया। अलकायदा के दूसरे नंबर के नेता अयमन अल जवाहिरी ने लाल मस्जिद पर हुई कार्रवाई का बदला लेने के लिए पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवादियों से हमला करने का आह्उाान किया है। एक इंटरनेट वेबसाइट पर जारी ऑडियो रिकॉर्डिंग में जवाहिरी ने कहा कि 'यह पाकिस्तानी मुसलमानों, पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों और इस्लामी दुनिया के बुद्धिजीवियों को स्पष्ट संदेश है कि पाकिस्तान के मुसलमानों को सिर्फ जिहाद के जरिये ही मुक्ति मिल सकती है।` इस आह्उावान का कितना असर हुआ है यह तो अभी आकलन नहीं किया गया है मगर लाल मस्जिद पर कार्रवाई के विरोध में पाकिस्तान में सूबा सरहद के काबायली इलाके उत्तरी वजीरिस्तान में एक आत्मघाती हमले में २४ सैनिक मारे गए। उसके एक दिन बाद ही एक और आत्मघाती कार बम हमले में तकरीबन १० और सैनिक मारे गए हैं। राजधानी इस्लामाबाद में मुतहिदा मजलिस-ए-अमल की एक रैली में सैकड़ों लोगों को संबोधित करते हुए गठबंधन के प्रमुख नेता मौलाना अब्दुल गफूर हैदरी ने कहा कि 'लाल मस्जिद में हुई कार्रवाई पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ के निरंकुश शासन के लिए आखिरी फैसला साबित होगा। अब पाकिस्तान के अंदर हर जगह लाल मस्जिदें होंगी।`

नवाज शरीफ की सरकार में विदेश मंत्री रह चुके सरताज अजीज कहते हैं कि अब मुशर्रफ के सामने वाकई गंभीर संकट है। अभी हाल ही में कराची में सरकार विरोधी और सरकार समर्थक पार्टियों के बीच भारी हिंसा हुई थी जिसमें तकरीबन ४० से ज्यादा लोग मारे गये थे। परवेज मुशर्रफ के पास जो भी विकल्प थे वह तकरीबन खत्म हो गये हैं। अगर मुशर्रफ ने आपातकाल की घोषणा करके देश में मार्शल लॉ लागू किया तो सड़कों पर हिंसा का दौर शुरू होने का खतरा है। ऐसी स्थिति में उन्हें अपने सहयोगियों के अलावा अंतरराष्ट्रीय बिरादरी, खासतौर से अमेरिका का भयंकर विरोध झेलना पड़ सकता है।

लाल मस्जिद की घटना के बाद से पाकिस्तान के सूबा सरहद और कबायली उत्तरी वजीरिस्तान में लगातार सैनिकों और पुलिस के जत्थों पर हमले जारी हैं। उस कार्रवाई के बाद इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने न केवल लाल मस्जिद के समानांतर कई और मस्जिद बना देने की घोषणा की है बल्कि वे अपने एलाने-जंग को अंजाम तक भी पहुंचा रहे हैं। लाल मस्जिद की घटना के असर का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि सीमा प्रांत के आतंकवादी संगठनों ने सरकार के साथ हुए शांति समझौते के करार को तोड़ दिया है और लगातार हमले कर रहे हैं। अल कायदा और पाकिस्तान के दूसरे भूमिगत चरमपंथी संगठन लाल मस्जिद पर सैन्य कार्रवाई का बदला लेने के लिए पहले ही राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ, उनके मंत्रियों और सेना को निशाना बनाने का संकल्प जता चुके हैं। इसी साल अप्रैल में गृह मंत्री आफताब शेरपाओ ऐसे ही आत्मघाती हमले में बाल-बाल बचे थे। राष्ट्रपति मुशर्रफ की हत्या की कई साजिशों का भी पूर्व में पर्दाफाश हो चुका है।

लाल मस्जिद पर कमांडो कार्रवाई के बाद से सूबा सरहद में चरमपंथियों और आत्मघाती हमलों में कोई ५० सैनिक मारे गए हैं।

जस्टिस इफितखार चौधरी के निलंबन को अवैध ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट में दोबारा उनकी बहाली हो गई है और फिलहाल उनके विरोध में वकील लाबी कुछ समय के लिए मौन हो चुकी है। मुशर्रफ की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। एक ओर जहां वह सैन्य शासन से आजिज आ चुके वकीलों और पेशेवरों के आंदोलन का सामना कर रहे हैं, वहीं विपक्षी पार्टियां भी उनके खिलाफ लगातार एकजुट हो रही हैं। संयुक्त अरब अमीरात में भूतपूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो से मुशर्रफ की मुलाकात भी बेनतीजा रही। बेनजीर ने कहा कि अगर मुशर्रफ वर्दी में बने रहते हैं तो उनकी पार्टी उन्हें राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार नहीं करेगी। परवेज मुशर्रफ की ओर से इस सिलसिले में अब तक कोई बयान नहीं आया है। घोर अलोकतांत्रिक बात यह है कि इस बातचीत के इस पूरे परिदृश्य में नवाज शरीफ कहीं नहीं हैं। गौरतलब है कि हाल में पाकिस्तान के मुख्य विपक्षी दलों के नेताओं ने लंदन में मिलकर 'ऑल पार्टीज डेमोक्रेटिक मूवमेंट` नाम से एक गठबंधन बनाने का फैसला किया था।

उधर अमेरिका ने आतंकवाद के मुद्दे पर सख्ती दिखाते हुए कहा है कि ओसामा बिन लादेन को पकड़ने या मारने के लिए अमरीका कुछ भी करने को तैयार है जिसमें पाकिस्तान के कबायली इलाके पर हमला भी शामिल है। इसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तानी अधिकारियों ने अपने हिसाब से आलोचना की है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे गंभीरता से लिया है।

बजट व्यवस्था अधिनियम और रोजगार का सवाल

आर्थिकी



  • अमित भादुरी

वित्त-संबंधी जिम्मेदारी-बजट व्यवस्था अधिनियम-२००३
ने रोजगार जैसे आवश्यक मामलों में धन खर्च करने में
सरकार के हाथ बांधे हुए हैं, इसे खत्म कर देना
चाहिए। सरकार अधिनियम की आड़ में निजीकरण
को बढ़ा़वा दे रही है और मूलभूत सुविधाओं पर
खर्च में कटौती कर वित्तीय अनुशासन के नाम
पर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ रही है।



यदि बहुदलीय-संसदीय लोकतंत्र का मतलब जनता को राजनीतिक चयन की अधिकतम स्वतंत्रता है, तो फिर ारत में इसके लिए अनेक छोटी-बड़ी पार्टियां मौजूद हैं; लेकिन आर्थिक मोर्चे पर शायद ही किसी भी पार्टी के पास कोई विकल्प है। वस्तुत: आज राजनीतिक दलों के पास न कोई राजनीतिक एजेन्डा रह गया है, न ही आर्थिक। फिर भी भ्रमित पार्टियां 'आर्थिक वृद्धि`, 'औद्योगिकीकरण` और 'विकास` के नारे लगा रही हैं। बहरहाल, यहां सवाल यह है कि अगर आर्थिक वृद्धि दर बढ़ाने के लिए औद्योगिकीकरण की जरूरत है, तो क्या चालू औद्योगिकीकरण को विकास का पर्याय माना जा सकता है?

आर्थिक वृद्धि दर बढ़ाने के लिए भारत में इस समय जिस तरह का औद्योगिकीकरण हो रहा है, उसकी तीन मुख्य विशे ाताएं नजर आती हैं। पहली, इसके पीछे बहुरा ट्रीय कंपनियां काम कर रही हैं। दूसरी, ये कंपनियां अधिकांशत: निजी क्षेत्र की हैं। तीसरी, केन्द्र व राज्य सरकारें नियामक की बजाय बहुरा ट्रीय कंपनियों की एजेन्ट बन गयी हैं। सभी राजनीतिक दल यथास्थिति से सहमत हैं। इस बात को बार-बार दोहराया जा रहा है कि ऐसे औद्योगिकीकरण के लिए त्याग की जरूरत है। लेकिन इस सच्चाई को सभी छुपाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह त्याग सिर्फ गरीबों को करना है। अमीरों को तो इसकी कोई जरूरत ही नहीं है, उस पर तुर्रा ये कि उन्हें सरकार से सहायता भी दी जा रही है।

उदारीकरण ने आज पारम्परिक राजनैतिक विभिन्नताओं को समाप्त कर दिया है। सिंगूर और नंदीग्राम की घटनाआंे ने यह बता दिया है कि वामपंथी दल भी विश्वबैंक, आईएमएफ और एडीबी जैसी संस्थाओं का समर्थन करने वाले केन्द्र में बैठे आर्थिक नीति-निर्माताओं से भिन्न नहीं हैं।

उदारीकरण के इस दौर में सभी राजनीतिक दल इस बात पर एकमत हैं कि बहुरा ट्रीय कंपनियों के नेतृत्व और राज्य की एजेन्ट वाली भूमिका वाला उद्योगीकरण ही एकमात्र विकल्प है। लेकिन दूसरी ओर देश में सब ओर इस तथाकथित विकास के विरूद्ध विद्रोह पनप रहा है। महारा ट्र, पंजाब, आंध्रप्रदेश में किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं, क्योंकि सरकार डब्लूटीओ के झंडे तले एक नए प्रकार की व्यवसायिक कृषि लाद रही है, जिसमें बहुरा ट्रीय कंपनियों का भारी निवेश तो है, लेकिन किसानों के उत्पाद का न तो उचित मूल्य है और न ही कोई सबसिडी। उधर छत्तीसगढ़ में भी सलवा-जुडुम के नेतृत्व में आदिवासियों को उग्रवाद के नाम पर उनके घरों से निकाला जा रहा है। क्योंकि वहां की खनिज संपदा पर बहुरा ट्रीय कंपनियां अपनी गिद्धदृष्टि लगाए हुए हैं। गरीब आदमी देश की अपार प्राकृतिक संपदा का मालिक है, फिर भी उसके इस अधिकार को नकारा जा रहा है।

संवैधानिक तौर पर भूमि राज्य का विषय होने के बावजूद विभिन्न राज्य सरकारें बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की कृपापात्र बनने के लिए भूमि कब्जाने की होड़ में लगी हुई हैं।

जमीनें अलग-अलग तरीकों से कब्जाई जा रही हैं-खनन, उद्योगों, विशाल रियासतों, आईटी पार्कों और विदेशी क्षेत्रों-सेज के नाम पर। विदेशी क्षेत्र का उपबंध-सेज के लिए भूमि के निजी स्वामित्व के अधिकार को जनहित में राज्य के अधिकार में बदल देता है। इसमें भूमि के साथ पानी, खनिज आदि भी शामिल है। एक कृषि प्रधान देश में जहां भूमि ही रोजी-रोटी का मुख्यस्रोत है, जहां किसान के लिए जमीन एक सम्पत्ति नहीं बल्कि रोजी है; वहां आम आदमी से जबरदस्ती संसाधन छीनकर निजी कंपनियों को दिए जा रहे हैं। अंग्रेजों के जमाने के पुराने अधिनियम-भूमि अधिग्रहण कानून में ही १९८४ में कुछ संशोधन करके बहुरा ट्रीय कंपनियों का हित साधने के लिए गरीब से न केवल निवाला छीना जा रहा है; बल्कि उसे घर से ही बेघर किया जा रहा है। प्राय: ऐसा कहा जाता है कि इस आर्थिक प्रक्रिया में लगातार ला प्राप्तकर्ता और खोने वाले होते हैं, जिसे शुम्पीटर ने 'रचनात्मक विनाश` का नाम दिया है। हालांकि वर्तमान संद र् में यह एक भ्रमित करने वाला आधा सच है। यदि ऐसा 'रचनात्मक विनाश` पूंजीवादी विकास की आम प्रक्रिया होती तो शायद निजी बहुरा ट्रीय कंपनियों की तरफ से जनहित के नाम पर राज्य को हस्तक्षेप करने की जरूरत ही न पड़ती। पर यहां तो इस लेन-देन में दो निजी पक्ष- बहुराष्‍ट्रीय कंपनी और जमीन का मालिक किसान शामिल है। राज्य का कार्य तो इस लेन-देन को ऐच्छिक बनाने के लिए होना चाहिए। क्योंकि इस सौदे में एक पक्ष यानी किसान आर्थिक रूप से कमजोर है। इसका मतलब होगा कि कंपनियां उस मूल्य पर जमीन खरीदें, जिस मूल्य पर किसान स्वेच्छा से उसे बेचने के लिए तैयार हों। उसका निर्णय चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक। आदिवासियों की जमीन के सौदे के लिए तो निर्णय सामूहिक ही होना चाहिए। लेकिन आज किसानों और कंपनियों के बीच खुली प्रतिस्पर्धा के बजाय राज्य सूचना के अधिकार की परवाह किए बिना हिंसा और दमन से जमीनें कब्जा रहे हैं।

सेज की योजना में भी बहुरा ट्रीय कंपनियों का हित-साधन ही है। ले ही नंदीग्राम और सिंगूर में टाटा व फिएट के ज्वांइट वेंचर और सलेम ग्रुप के लिए किया गया भूमि अधिग्रहण कानूनी रूप से सही रहा हो, परन्तु उसे किसानों के नजरिए से देखा जाए, जो उस जमीन से जीविका पाते थे, तो गलत है। नंदीग्राम की घटना के बाद ज्यादातर राजनीतिक दल, जिसमें वामदल भी शमिल हैं, ने सरकार को यह सलाह दी की कि स ी सेज को खत्म न किया जाए बल्कि उनका अधिकतम भूमि का दायरा सीमित कर दिया जाए। हालांकि बहुरा ट्रीय कम्पनियों को किसानों से छीनकर दिए गये संसाधनों में केवल जमीन ही दिखाई देती है, लेकिन समस्याएं तो और भी गहरी हैं। परोक्ष और अपरोक्ष दोनों रूपों से नीतियां गरीबों के खिलाफ बनाई जा रही हैं, योजनाओं में इस बात की सीधे तौर पर देखा जा सकता है। भारत की ६० फीसदी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। परन्तु पिछली जितनी भी पंचव र्ाीय योजनाएं थीं, उसमें सरकार ने पाँच फीसदी से अधिक कृषि को नहीं दिया। अपरोक्ष रूप फसल की खपत और पैदावार के प्रति सरकार द्वारा तय नीति में देखा जा सकता है। कई बड़ी परियोजनाएं जैसे मॉल्स, भूमिगत मैट्रो सब जनता के खर्च पर ाहरीकरण की अच्छी छवि बनाते हैं। इन सब चीजों को मूलभूत सुविधा मानकर स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि इनसे यात्रा में समय की बचत होती ही है, जीवन स्तर भी बेहतर बनता है, साथ ही निवेश को भी बढ़ावा मिलता है। यह तर्क गलत नहीं तो एकतरफा तो जरूर है। हमें जरूरत तो है, पर शायद ही हम उस ग्रामीण भारत को सुविधाएं और बेहतर बनाने के बारे में सोचते हैं। जहां देश की अधिकांश आबादी रहती है।
महानगरों में हमें मूलभूत सुविधाएं चाहिएं। मैनहटन जैसे शहर हमारा लक्ष्य बना दिए गये हैं। जबकि भारत में २५ से ६० फीसदी जनसंख्या को झोपड़पट्टी में मानवीय जीवन की सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। यह पक्षपात क्यों? इससे किसको लाभ होगा? उस धनाढ्य शहरी वर्ग को, जो कि शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है, जहां रोज बिजली-पानी और जगह की हवस बढ़ती जा रही है। इसलिए बिना पुनर्वास के झोपड़पटि्टयां उजाड़ी जा रही हैं। आवागमन के नए साधन जिनके लिए नए फ्लाई ओवर, नए तरह के शॉपिंग व आवासीय काम्पलेक्स को हम बढ़ावा दे रहे हैं, आश्चर्यजनक है! यह सब बहुत ज्यादा बिजली खपत करते हैं, जिसका खामियाजा उन लोगों को भी भुगतना पड़ता है, जो इसका उपयोग नहीं करते। इसलिए किसानों को पानी, बिजली, साफ पीने का पानी और शौचालय आदि गांवों में मयस्सर नहीं है।

यह सोच कि उद्योग कृषि से ज्यादा सक्षम हैं, वास्तव में किसान और गरीब विरोधी हैं। लग ग दो-तिहाई ारत की कामकाजी जनसंख्या कृषि कार्य करती है। हमें खोजना होगा कि क्या दूसरे तरह के विकास करने वाला आर्थिक विकल्प भी संभव हैं? क्या इसके तत्व आज के राजनीतिक-आर्थिक पद्धति में मौजूद हैं? हां, यह तीन बातों पर निर्भर हैं; पहला, 'हमें विदेशी बाजार की बजाए अपने रेलू बाजार पर विश्वास करना होगा। आम आदमी की क्रयशक्ति बढ़ाने के लिए रोजगार के अवसर को बढ़ाना होगा। कुछ सालों में भारत का रिकॉर्ड इस दिशा में कुछ खास अच्छा नहीं रहा है। ऐसा सोचना तो मूर्खता ही होगी कि कंपनियांे से रोजगार पैदा होंगे, क्‍योंकि इनको मुनाफा चाहिए, जिसके लिए वह कम से कम लागत में काम करना चाहती है, इसमें श्रम की लागत भी शामिल है। अगर हम भूमण्डलीकरण को बिना शर्त स्वीकार करते हैं, तो बजाए घरेलू बाजार के विदेशी बाजार ही मजबूत होगा, मतलब निर्यात बढ़ाने के लिए श्रम की लागत में कमी होगी, ज्यादा निर्यात का मतलब, यहां की जनता की जरूरत के हिसाब से उत्पादन का नहीं होना है। घरेलू बाजार के विकास के लिए जरूरी है, रोजगार के अवसर। अत: हमें भूमण्डलीकरण का चुनाव सोच-समझ से करना होगा।`

दूसरा, 'रोजगार की बढ़ोत्तरी से आर्थिक विकास होना चाहिए न कि आर्थिक विकास के लिए रोजगार ही खत्म कर दिए जाएँ। रोजगार वृद्धि आर्थिक वृद्धि दर में कितना योगदान देती है यह इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी उत्पादकता से श्रम को लगाया जा सकता है।` भारत इस क्षेत्र में बहुत पीछे है, जिसके नतीजे अच्छे नहीं हैं। कारण केन्द्रीकृत नौकरशाही, जो स्थानीय स्तर पर लिए गए निर्णयों को खत्म कर देती है। हमें एक नई शुरूआत करनी होगी, सामाजिक रूढ़िवाद और नवउदारवादी नीतियों के मिले-जुले स्वरूप के साथ। एक ओर तो हमें बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के चंगुल से बचना है, जिसके लिए हमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि को केन्द्रीय बिन्दु बनाना होगा, दूसरी तरफ़ हमें मौजूदा केन्द्रीकृत नौकरशाही को खत्म करना होगा। यह तभी संभव है, जब मौजूदा राष्‍ट्रीय रोजगार गारन्टी योजना को पूर्ण रोजगार में तब्दील कर पंचायतों तथा स्थानीय लोगों को अधिक से अधिक शक्तियां दी जाएं ताकि वे अपने स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा कर रोजगार दें। इसके लिए जमीन से संबंधित स्थानीय नियंत्रण पंचायतों को अधिकतम आर्थिक स्वायत्तता देना पहली शर्त है। हालांकि संविधान के अनुच्छेद २४३ के अनुसार ग्राम्य/वार्ड स्तर के स्थानीय निकायों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने और सहायता देने के लिए १९९३ में एक वित्त आयोग की स्थापना की जानी थी, लेकिन न तो केन्द्र और न ही राज्य की सरकारों ने इसे गंभीरता से लिया। इस मामले में केरल अव्वल रहा तो पश्चिम बंगाल सबसे खराब। गौरतलब है कि वामदल ने नरेगा (नेशनल रूरल इम्पलॉयमेंट गारंटी एक्ट) को पास कराने में अहम भूमिका निभाई, परंतु आश्चर्यजनक बात यह है कि मात्र १४ फीसदी धन का जो कि रोजगार के लिए आबंटित हुआ था, पुरूलिया के लिए प्रयोग में लाया गया। दिसम्बर २००६ तक केन्द्र द्वारा आबंटित आधे से ज्यादा धन खर्च ही नहीं किया गया और न ही १६ दिन से ज्यादा का रोजगार दिया गया; जबकि नियम के हिसाब से १०० दिन का होना चाहिए था। अगर सरकार ने थोड़ा भी अपना ध्यान या थोड़ी ही इच्छाशक्ति रोजगार देने के वादे पर लगाई होती तो भूमि अधिग्रहण के बजाए यह सही विकास की दिशा में पहला कदम होता।

अंत में सवाल आता है कि इन सब के लिए धन कहाँ से आएगा? उसका सही उपयोग किस तरह होगा? वित्त-संबंधी जिम्मेदारी-बजट व्यवस्था अधिनियम-२००३ ने रोजगार जैसे आवश्यक मामलों में धन खर्च करने के लिए सरकार के हाथ बांधे हुए हैं, इसे खत्म कर देना चाहिए। आर्थिक मदद के नाम पर सरकार अधिनियम की आड़ में निजीकरण को बढ़ा़वा दे रही है और मूलभूत सुविधाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा में खर्च की कटौती कर वित्तीय अनुशासन के नाम पर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ रही है। इससे तो विश्वबैंक, आईएमएफ और बहुरा ट्रीय कम्पनियों का ही भला हो रहा है। वे तो चाहते ही यही हैं कि राज्य इन्हें बनाए नहीं बल्कि केवल लागू करने की भूमिका करें। वामदलों को इसके विरुद्ध कार्य करना चाहिए और आग्रह करना चाहिए कि यह धन प्राथमिक शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य एवं असंगठित मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए। अगर जरूरत पड़े तो कानूनों में बदलाव किया जाना चाहिए। इस नवीन उदारवादी अर्थिक विचारधारा के खिलाफ पहले थोड़ा बहुत हल्ला तो हुआ, परंतु अब सबकी उर्जा इसी बहुरा ट्रीय-औद्योगिकरण पर लग रही है।

स्थानीय संस्थानों की स्वायत्तता बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा उनके बजट को अलग से रा ट्रीय बैंको में भी रखा जा सकता है, जिसमें पंचायतों को भी क्रेडिट लाइन दी जाए। इसका यह फ़ायदा होगा कि कोई फ़र्जी संस्थान नहीं चला पाएगा और व्यवस्था द्वारा इन पर निगाह ही रखी जा सकेगी यानी 'नियंत्रण व संतुलन` की व्यवस्था कायम हो सकेगी कि इन्होंने जिन परियोजनाओं के लिए धन लिया था, उन पर कार्य किया कि नहीं; तभी आगे की परियोजनाओं के लिए धन दिया जाए।

इससे भले ही विकास की गति ८ से १० फीसदी न हो, परंतु समाज के गरीब तबके का ला होगा और वह सबल और सक्षम बन सकेगा, जिससे भारत की लोकतंत्र व्यवस्था मजबूत होगी। हम उम्मीद कर सकते हैं कि कंपनीहीन विकास ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देगा, जो कि मुख्य बिन्दु है, जिससे देश आगे बढ़ेगा।
(पीएनएन)




स्वाहा

  • उद्भ्रांत


ओम्
करुणा, दु:ख, प्रीति
स्वाहा

ओम्
सत्य-न्याय-धर्म
स्वाहा

ओम्
सभी जप-तप-कर्म
स्वाहा

ओम्
विवेक, ईमानदारी
स्वाहा

ओम्
वीर, सदाचारी
स्वाहा

ओम्
लज्जा, क्षमा, दया
स्वाहा

ओम्
तोता, मैना, बया
स्वाहा

ओम्
काव्य, गीत, संगीत
स्वाहा

ओम्
तेंदुआ, चीता, बाघ
स्वाहा

ओम्
जंगल-जंगल आग
स्वाहा

ओम्
मगरमच्छ, व्हेल
स्वाहा

ओम्
खून-पानी खेल
स्वाहा

ओम्
उचित-अनुचित विचार
स्वाहा

ओम्
दो दिलों का प्यार
स्वाहा

ओम्
सब कुछ
स्वाहा
स्वाहा

ओम्
ओमरीका
आहा
आहा

ओम्
शान्ति:
शान्ति:
शान्ति:

ओम्
उत्तर आधुनिक क्रांन्ति:
क्रांन्ति:
क्रांन्ति:!

September 3, 2007

कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी)

जनयुद्ध और दलित-प्रश्‍न-१



सामाजिक सुधार कभी भी मजबूतों की कमजोरियों द्वारा नहीं
बल्कि हमेशा कमजोरों की ताकत द्वारा किये जाते हैं
- मार्क्‍स




मनुष्य सामाजिक प्राणी है। किन्तु आज २१वीं सदी में भी जाति व्यवस्था कायम है जिसमें तथाकथित ऊंची जातियों द्वारा दलितों को अछूत बना दिया गया है। इसलिए, दलितों की स्थिति मनुष्य कौन कहे, जानवरों से भी बदतर है। दलितों पर अत्याचार दक्षिण एशिया की विचित्र परिघटना है। यह पुरातन और घृणित जाति व्यवस्था से रूग्ण हिन्दू समाज की देन है।

ऐतिहासिक रूप से जाति व्यवस्था श्रम विभाजन का उत्पाद है, जिसमें मानसिक श्रम करने वाले ब्राह्मण, युद्ध करनेवाले क्षत्रिय, व्यापार करने वाले वैश्य तथा शारीरिक श्रम करने वाले शूद्र के रूप में वर्गीकृत किये गये। ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के दौरान, ऋगवैदिक काल में, इस तरह के श्रम विभाजन ने न तो कठोर रूप और न ही वर्ग रूप प्राप्त किया था। परिणामत:, हर व्यक्ति को हर समय मनोनुकूल व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता थी। लेकिन वैदिक काल के आने पर, कृषि के विकास ने जड़बद्ध और बंद जाति व्यवस्था को जन्म दिया जिससे लोग अपनी पुश्तैनी जाति को पीढ़ी दर पीढ़ी ग्रहण करने लगे। इससे मानसिक श्रम करने वाले ब्राह्मणों तथा शारीरिक श्रम करने वाले शूद्रों को समाज व्यवस्था में क्रमश: सबसे ऊंचा तथा सबसे नीचा स्थान मिला। समय के साथ शूद्र, जातियों और उप जातियों में बंटते चले गये तथा उनके बीच ऊंच-नीच की व्यवस्था कठोर तथा जड़बद्ध होती गयी। ईसा पूर्व पहली शताब्दी के आस-पास मनु ने वर्णाश्रम व्यवस्था को संहिता में बांधा। आज वही शूद्र दलित कहे जाते हैं।

इस तरह प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के अंदर दलित पहले वंचित वर्ग थे जो शारीरिक श्रम करते थे लेकिन जिनको अपने श्रम का फल तथा उत्पादन का साधन रखने का अधिकार नहीं था।
एक गैर सरकारी आंकड़े के अनुसार दलित नेपाल की कुल आबादी के बीस प्रतिशत हैं। अस्सी प्रतिशत दलित गरीबी रेखा के नीचे जीते हैं। ज्यादातर भूमिहीन हैं तथा दूसरों की जमीन पर रहते हैं। अत: हमेशा उखाड़े जाने के भय में वे जीते हैं।

आर्यों के नेपाल प्रवेश से पहले मुख्य रूप से यहां मंगोलियन, पहाड़ी क्षेत्र में, तथा आस्ट्रो-द्रविड़ मैदानी तराई क्षेत्र में निवास करते थे। ११वीं सदी ईस्वी सन में मुस्लिम आक्रमण से बचने के लिए उत्तर भारत के हिन्दू नेपाल चले आये तथा साथ में जाति-व्यवस्था भी लेते आये। नेपाल के गैर-हिन्दू समुदायों में भी जात-पांत फैला तथा दलितों को समाज से बहिष्कृत किया गया। भौगोलिक दृष्टि से नेपाल के दलित पहाड़ी तथा तराई या मधेशी दलित में बंटे हुए हैं। राष्ट्रीयता की दृष्टि से नेपाली दलितों के तीन भाग हैं, पहाड़ी, नेवाड़ी (अर्थात काठमांडू घाटी के दलित) तथा मधेशिया दलित, जिनमें नेवाड़ी तथा मधेशिया दलित उत्पीड़ित राष्ट्रीयता में आते हैं। तीनों में मधेशी दलितों की माली हालत सबसे खराब है। मधेशी दलितों में ७० प्रतिशत आबादी भूमिहीन है, उनके बीच जातिभेद भी बहुत हैं जिसके चलते उनमें एकता की भी उतनी ही कमी है। तराई क्षेत्र में मजबूत सामंतवाद के कारण वे समाज से ज्यादा बहिष्कृत हैं। वे राष्ट्रीयता के आधार भी सताये जाते हैं क्योंकि पुरानी राज व्यवस्था में उनमें से ज्यादातर लोगों को नागरिकता प्राप्त नहीं है। पुरानी राजव्यवस्था सभी मधेशियों को भारतीय समझता है।
यह अजीब लगता है कि २१वीं सदी में भी प्राचीन परंपराओं का हिन्दू राजा राजकीय हिन्दू धर्म को बचाने के लिए मध्ययुगीन अत्याचार को स्वीकृति प्रदान करता है। दलित मुद्दा गैर सरकारी संस्थाओं के लिए डॉलर कमाने का एक जरिया है, संशोधनवादी वामंपथ के लिए दलित भावनाओं को दूहकर वोट बैंक की राजनीति करना है तथा क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के लिए यह व्यवहार में परिणत होने का इंतजार करता हुआ एक सिद्धांत बना रहा है।


एनजीओ और दलितप्रश्न

यह उल्लेखनीय है कि दक्षिण एशिया के संदर्भ में जाति प्रथा सामंतवाद का महत्वपूर्ण तत्व है। सामंती तथा साम्राज्यवादी दोनों ताकतें अपने फायदे में जाति व्यवस्था का इस्तेमाल करती हैं। सामंती ताकतें जाति व्यवस्था को धर्मों को आपस में तथा धर्म के भीतर वर्गों को आपस में लड़ाने के लिए इस्तेमाल करती हैं। साम्राज्यवादी ताकतें दलित मुद्दे का इस्तेमाल उत्पीड़ित जनता को विभाजित करने में करती हैं। वे जाति व्यवस्था को अक्षुण्ण रखते हुए इसे पृथक पहचान रूप में रेखांकित करती हैं और आर्थिक उदारीकरण को सभी समस्याओं का हल बताती हैं।

उत्पीड़क शासक वर्ग शोषितों की तुलना में बहुत ज्यादा वर्ग चेतन होते हैं क्योंकि उन्हें एक विशाल आबादी पर शासन करना होता है। ऐसा वे शोषित वर्गों को बांट कर तथा उनमें से कुछ को एनजीओ के माध्यम से रोटी का टुकड़ा फेंककर करते हैं। जो समुदाय जितना ज्यादा गरीब होता है, उनके लिए एनजीओ को उतना ही ज्यादा फंड आवंटित कराया जाता है। इसलिए दलित मुद्दे तथा दलितों के भीतर दलित औरतों के मुद्दे एनजीओ तथा अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ के लिए खूब बिकाऊ होते हैं। इन सभी योजनाओं का उद्देश्य दलितों के वर्गीय चेतना को कुंद करने के लिए क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को उनसे दूर रखना होता है। ऐसा करने के उनके विभिन्न तरीके हैं।
दलितों को ब्राह्मण-विरोधी, मनु-विरोधी तथा ओबीसी-विरोधी के रूप में इतना ज्यादा प्रचारित किया जाता है कि दलित पहचान संकीर्णतावादी चरित्र ग्रहण कर लेता है। ब्राह्मण संस्कृति से लड़ने के नाम पर वह दलित ब्राह्मणवाद व्यवहृत करने लगता है जिसके तहत अपनी पहचान खोने के डर से दलित ी़-पुरूषों को दूसरी जातियों, धर्मों तथा समुदायों में विवाह करने से रोकते हैं। उत्पादन संबंधों एवं दलितों-गैर-दलितों के बीच सांस्कृतिक संबंधों के सामंती चरित्र पर चोट करने की जगह राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ गैर-दलितों के साथ झगड़ों से बचने के नाम पर अलग पानी का नल, मंदिर, समुदायिक भवन आदि बनाकर उनके अलगाव को और ज्यादा बढ़ावा देते हैं। दलितों में एकता मजबूत करने के लिए विभिन्न दलित जातियों का जमात बनाने की जगह वे अलग-अलग दलित जाति का अलग संगठन बनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और फिर ज्यादा-से-ज्यादा फंड पाने के लिए उनमें प्रतियोगिता पैदा करते हैं। इसका परिणाम होता है कि अपेक्षाकृत शिक्षित और उन्नत दलित जातियां ज्यादा फंड पाने में सफल होती हैं, जिससे दलितों के बीच विभाजन होता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मध्यवर्गीय अवसरवादी दलित नेता भी तैयार किये जाते हैं जिनका इस्तेमाल संसदीय राजनीति के तहत वर्गीय शासन को चलायमान रखने के लिए किया जाता है।

कई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ हिन्दू फासिस्टों के साथ मिलकर साम्प्रदायिक दंगे भी भड़काते हैं। भारत में गुजरात के गोधरा में २००२ में हिन्दू-मुसलमानों के बीच जो दंगे हुए वह इसका एक उदाहरण है। ऐसा पाया गया कि कई हिन्दू फासिस्ट एनजीओ दलित पहचान के संकट को उनमें मुसलमानों से भय तथा उनके खिलाफ हिंसा करने के लिए प्रेरित करने में इस्तेमाल करते हैं।

आखिर अंत में अंध कम्युनिस्टों, जो वर्गीय शोषण को इतनी प्रमुखता देते हैं कि उन्हें दलित शोषण दिखायी नहीं पड़ता है, की विफालता को भी ये एनजीओ अपने पक्ष में भंजाते हैं। इन गैर सरकारी संगठनों (एनजीओं)े ने उत्तर आधुनिक विचारधारा के जहर का इस्तेमाल कर संभावित कम्युनिस्ट दलितों को अपने में मिला लिया।
इन तमाम विश्लेषणों का यही निष्कर्ष है कि क्रांतिकारी कम्युनिस्ट दलित उत्पीड़न को दक्षिण एशिया क्षेत्र में क्रांतिकारी आंदोलन के रणनीतिक एवं मूलभूत मुद्दे के रूप में अंगीकार करें।


कम्युनिस्ट और दलित प्रश्न

१९४९ में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के समय से दलित प्रश्न ब्राह्मण और क्षत्री ऊंची जातियों के कम्युनिस्ट कैडरों की परीक्षा लेता रहा है कि वे कहां तक सच्चे कम्युनिस्ट बन पाये हैं। इस परीक्षा को उन्होंने दलितों के घरों में प्रवेश कर तथा उनके साथ दारू पीकर उत्तीर्ण करना चाहा। लेकिन उनका यह भोला सांस्कृतिक विद्रोह शायद ही कभी दलितों से विवाह करने या पार्टी में उन्हें नीति निर्धारक पदों पर बैठाने तक पहुंच पाया।
दलित प्रश्न पर नेपाली कम्युनिस्ट आंदोलन की तीन धारायें हैं। पहली, संशोधनवादी, दूसरी, नव-संशोधनवादी तथा तीसरी क्रांतिकारी धारा। संशोधनवादी दलित प्रश्न को विशुद्ध रूप से आर्थिक-सामाजिक सवाल समझते हैं, जिसका समाधान संसदीय कानूनी प्रक्रिया से क्रमिक सुधार द्वारा होना है। वे इसे एक पृथक मुद्दे के रूप में देखना चाहते हैं। संसदीय रास्ते के राही यूनाइटेड मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी (यूएमएल) इस धारा का प्रतिनिधित्व करता है। नव संशोधनवादी, दलित सवाल को वर्गीय सवाल का दर्जा देकर ज्यादा क्रांतिकारी होने की कोशिश करता है किन्तु अभी समय नहीं आया है के नाम पर वर्ग संघर्ष से दूर भागता है। समय के साथ वे एक नये रूप वाले संशोधनवादी बन जाते हैं। दूसरी संसदीय पार्टी यूनिटी सेंटर मसाल इस धारा की है। क्रांतिकारी धारा दलितो के शोषण को जातिगत शोषण के रूप में लेती है जो वर्गीय शोषण की महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। यह जाति संघर्ष (Caste struggle) को वृहत वर्ग संघर्ष (Caste struggle) के साथ जोड़ता है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) इसी धारा की पार्टी है। यह न केवल अपने दलित मोर्चा को महत्व देता है बल्कि संघर्ष के विशिष्ट स्वरूप को विकसित करने की अनुमति तथा जनता के नये राज्य में विशेष अधिकार भी देता है। यह दलितों के सैन्यीकरण पर बल देकर उनको जन सेना में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित भी करता है।

क्रांतिकारी कम्युनिस्ट दलित प्रश्न को गंभीरता से क्यों लें, इसके कई कारण हैं। सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि उनके जीवन की वस्तुगत परिस्थितियां उन्हें कम्युनिस्ट सिद्धांत का स्वभाविक मित्र बना देती हंै। विश्व के परिवर्तन का सवाल विशेष रूप से क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के लिए महत्वपूर्ण है। माओवादी पार्टी महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति (GPCR) को बहुत महत्व देता है जिसका नारा 'विद्रोह करना सही है` दलितों को विशेष तौर पर आकर्षित करता है।

दलित समाज का सबसे प्रमुख अंतर्विरोध यह है कि वे समाज के लिए बहुत से उपयोगी कार्य जैसे गलियों, नालियों, पखानों की सफाई, कूड़े-कचड़े, मरे जानवरों को इकट्ठा करके जगह पर पहुंचाना, जूतों-बैगों आदि की मरम्मत करना आदि करते हैं किन्तु उसी समाज से बहिष्कृत होते हैं। इसके चलते दलितों में अपने आप से अलगाव (selfalienation) होता है जो उनके तनाव मुक्ति के लिए नशा करने का, दलित औरतों के वेश्यावृति के धंधे में फंसने का कारण बनता है। उनके समाज का दूसरा अंतर्विरोध यह है कि दलित जातियों में आपस में ऊंच-नीच, छुआछूत, पवित्र-अपवित्र की समस्या बनी रहती है जो उन्हें विभाजित तथा कमजोर बनाता है। इस तीखे अलगाव को पुरानी राजसत्ता के खिलाफ, उनको नास्तिक बनाकर, विद्रोह में बदला जा सकता है, उनमें महान सर्वहारा चेतना भरी जा सकती है तथा नये क्रांतिकारी राज्य के प्रति उनको निष्ठावान बनाया जा सकता है।

दलित आंदोलन, राजनीतिक दृष्टि से, सामंतवाद विरोधी होता है तथा इसलिए नये जनवादी आंदोलन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका बनती है। दलितों के ऊपर थोपे गये सभी धार्मिक, कर्मकांडों तथा दासता की बेड़ियों को पूंजीवाद खत्म करता है। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में पूंजीवादी क्रांति जितनी ज्यादा पूर्ण होगी, आगामी सामाजिक क्रांति के लिए उतना ही ज्यादा अनुकुल वातवारण तैयार होगा। क्योंकि नवजनवादी क्रांति का मुख्य काम प्रतिक्रियावादी ताकतों के ऊपर तानाशाही लागू करना तथा शोषितजनों के लिए लोकतंत्र की स्थापना करना होगा, इसलिए सभी शोषितजनों में दलित ही क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के सबसे नजदीकी मित्र होंगे। ऐसा इसलिए है कि प्रतिक्रयावादियों के ऊपर जो अभी भी मध्ययुगीन शोषण के तौर-तरीके अपना रखे हैं तानाशाही शासन प्रणाली की सबसे फौरी जरूरत दलितों को है। पुरानी पतनशील संस्कृति उनकी ऐतिहासिक दासता पर टिकी हुई है इससे छुटकारा पाने के लिए सेल्यूलर, लोकतांत्रिक वातावरण तथा आधुनिक दृष्टिकोण की उन्हें जरूरत है। सामंती ताकतों ने उनके काम को कभी कोई सम्मान नहीं दिया है जिसका इतना ज्यादा सामाजिक महत्व तथा आर्थिक मूल्य है।

दलित आंदोलन का मजबूत साम्राज्यवाद विरोधी चरित्र रहा है जो नव जनवादी आंदोलन को मजबूती प्रदान करेगा। साम्राज्यवाद राष्ट्रीय पूंजीवाद के विकास में रोड़ा है जो न केवल दलितों से उसका मूल पेशा छीन ले रहा है बल्कि अपने हुनर को विकसित करके देश के संगठित उद्योग में शामिल होने से भी रोक रहा है। साम्राज्यवाद उनके प्राकृतिक संसाधनों की भी लूट करता है जिसके माध्यम से उत्पादन करके वे अपनी जीविका चलाते आये हैं।
दलित ऐतिहासिक रूप से मेहनतकश जनता रही है, इसलिए क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को उनमें सर्वहारा दृष्टिकोण भरना चाहिये। नवजनवादी क्रांति सीमित प्राकृतिक अर्थव्यवस्था, जिसमें दलितों का हुनर कैद होकर रहता है, को तोड़ने में मदद देकर उनके शहरीकरण, औद्योगीकरण का रास्ता तैयार कर कालांतर में राजसत्ता का
समाजीकरण करता है। यह समाज में जातिभेद को खत्म करने का आधार तैयार करेगा।

दलितों को यह भी जानना होगा कि तथाकथित सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative actions) सकारात्मक विभेद, पक्षपाती कार्रवाई, भेदभाव विरोधी कानून, आरक्षण आदि विशेष प्रावधान, जो दलितों की स्थिति में सुधार लाने के लिए पुराने राज्य ने बनाये हैं, उनको लागू करने के लिए बल प्रयोग के बिना निरर्थक साबित होंगे। गरीब और भूमिहीन दलितों को जानना होगा कि दलितों के लिए पृथक निर्वाचन, पृथक बस्ती, पृथक पहचान या इस शोषणकारी व्यवस्था में दलितों की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति अंतत: अभिजात मानसिकता के दलित पैदा करेंगे जो शीर्ष वर्गीय राज्य सत्ता में समाहित कर लिये जायेंगे। हिन्दू धर्म के खिलाफ विद्रोह में बौद्ध धर्म, ईसाइयत या अन्य किसी धर्म को स्वीकार करने से दलित न केवल अपनी समस्या के समाधान को लंबित रखेंगे बल्कि अपने आप को धार्मिक राजनीति के झमेले में फंसा देंगे, जो कि प्रतिगामी होगा। इसके अलावा कोई ेभी देख सकता है कि हिन्दुओं के अलावे बाकी सभी धर्म-इसलाम, ईसाई, बौद्ध, सिक्ख आदिकम से कम भारतीय संदर्भ में जाति व्यवस्था को ढो रहे हैं।

वर्ग संघर्ष एकीकृत दलित संघर्ष के साथ जुड़ाव वाले वर्ग संघर्ष एवं विद्रोह करने के अधिकार को संस्थाबद्ध करके ही जाति आधारित समाज व्यवस्था एवं दलित-पिछड़ा के जीवन को बदला जा सकता है।

यदि कम्युनिस्ट दलित प्रश्न को एक स्वतंत्रत एकीकृत मुद्दे के रूप में संबोधित नहीं करते हैं तो दलित समुदाय के भीतर विद्यमान अवसरवादी तत्व दलित मुद्दे को पहचान की राजनीति में घटा कर रख देंगे जिससे साम्प्रदायिक, संकीर्णतावादी राजनीति को ही प्रोत्साहन मिलेगा और दलित अंतत: घुटन भरे जाति शोषण के शिकार तथा साम्राज्यवादी-सामंती ताकतों के हाथ का औजार बनकर रह जायेंगे।
(सीपीएन (एम) के मुख पत्र 'द वर्कर` से साभार। अनुवाद-जन विकल्प टीम)


जून ,2007 अंक में प्रकाशित

विशन टंडन

आपातकाल - एक डायरी



आइएएस अधिकारी विशन नारायण टंडन सात वर्षों (१९६९-७६) तक प्रधानमंत्री के संयुक्त सचिव रहे।
भारतीय जनतंत्र के इतिहास में यह समय कितना महत्वपूर्ण बन गया है यह सर्वविदित है। यहां प्रस्तुत
है इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के निर्णय के दौरान लिखी गई उनकी तीन दिन की डायरी



२५ जून, १९७५

आज सुबह नये गृह सचिव (खुराना) मुझसे मिलने आये। मेरा परिचय उनसे बीस वर्ष पुराना है। राजस्थान के मुख्य सचिव के पद पर काम करते समय भी वे मुझसे हर दस-पन्द्रह दिन में मिला करते थे। आज केवल औपचारिकता के नाते आये थे। उनका सुझाव है कि मैं वर्धन की जगह गृह मंत्रालय मेंं आ जाऊं। मंत्रालय को मुझसे बड़ी सहायता मिलेगी। वे मेरी सहमति चाहते थे।

प्रधानमंत्री आजकल कार्यालय नहीं आ रही है। काम का वातावरण नहीं है। वैसे भी काम कुछ कम है।
सन्ध्या को शिक्षामंत्री प्रो। नूरुल हसन एक मीटिंग के सिलसिले में साउथ ब्लॉक आये थे। मीटिंग समाप्त होने पर मेरे पास आकर घंटा-भर बैठे रहे। उन्होंने आजकल की स्थिति के सन्दर्भ मेंे दो बातें कही। पहली तो यह कि प्रधानमंत्री को निर्वाचन सम्बन्धी विधान में संशोधन करा लेना चाहिए। जब जनता चाहती है (चाहे इसका प्रदर्शन किराये की रैलियों ने किया) तो यह देश के हित में है कि प्रधानमंत्री की अयोग्यता कानूनी तरीके से दूर कर दी जाये। किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। इस विषय पर वे प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे। दूसरी बात उन्होंने कही कि संसद का सत्र अवश्य होना चाहिए। जनता में विश्वास इसी से दृढ़ होगा, पर वे इस विषय पर प्रधानमंत्री से न कुछ कहना चाहते हैं, न लिखना चाहते हैं। क्यांे? उत्तर की आवश्यकता नहीं।

नूरुल हसन के जाने के बाद मैं रुस्तम जी से मिलने चला गया। गृह मंत्रालय के कुछ कागजात मेरे पास दो-चार दिन से पड़े हैं। प्रधानमंत्री को प्रस्तुत करने से पहले उनसे बातचीत करना आवश्यक था। रुस्तम जी से जब बातचीत समाप्त हुई, वहीं देवेन्द्र सेन आ गये। मैं उनके साथ उनके कमरे में चला गया। देवेन्द्र सेन ने बताया कि प्रधानमंत्री निवास पर सब काम संजय के निर्देशन में हो रहा है। उसने स्थिति का पूरा चार्ज ले लिया है। एक-दो दिन पहले निगमेंद्र (देवेन्द्र सेन के छोटे भाई और सी।आर.पी. के महानिदेशक) को प्रधानमंत्री निवास पर बुलाया गया। संजय ने उनसे मुलाकात की और सुप्रीम कोर्ट के फैसले वाले दिन सी.आर.पी. का क्या प्रबन्ध हो, इस पर निर्देश दिये। प्रधानमंत्री ने न निगमेंद्र को बुलवाया था, न वे उनसे मिलीं।

आज की दो बातें मुझे अजीब लग रही हैं। दोपहर को किशन चन्द का फोन आया था। वे कह रहे थे कि बहल और नवीन चावला के घर 'रैक्स` आज ही लग जाने चाहए। सहज भाव से कहा अगर रात में जरूरत पड़े तो क्या होगा? मैंने उनसे बहस नहीं कि और कहा कि खुराना से कह दीजिए। दूसरे जयपुर से भनोट का फोन आया था। वह राजस्थान का कार्यवाहक मुख्य सचिव है। वह चाहता था कि मैं उसे एयरफोर्स का प्लेन दिलवा दूं। प्रधानमंत्री ने आज ही मुख्यमंत्री को दिल्ली पहुंचने को कहा है, पर वे अपने परिवार में एक विवाह के उपलक्ष्य में डूंगरपुर गये हुए हैं। मैंने उससे भी यही कहा कि खुराना से बात करो। पर मुख्यमंत्री को एकदम यहां बुलाने की आवश्यकता क्या हो गयी? एकाध दिन बाद भी आ सकते हैं। मैंने प्रो। खुराना से पूछा पर उन्हें भी कुछ पता नहीं है।

२६ जून, १९७५

कल रात एक बजे के बाद रैक्स पर खुराना का फोन आया। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे कुछ मालूम है कि प्रधानमंत्री ने कुछ निर्देश दिये हैं जिनको आज रात में ही कार्यान्वित करना है। उन्होंने बताया कि दिल्ली के उप-राज्यपाल ने उन्हें फोन किया था और चण्डीगढ़ के मुख्य आयुक्त ने। चण्डीगढ़ के मुख्य आयुक्त को पंजाब के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के कुछ निर्देश दिये हैं। निर्देश यही थे कि विरोधी दलों के नेताओं को गिरफ्तार करना था। मैंने अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। उनके बार-बार पूछने पर यही सलाह दी कि वे गृहमंत्री या ओम मेहता से बात करें। मुझे शेषन की बात याद आयी। उसका कहना ठीक निकल रहा है। आश्चर्य यह कि बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हांेगी, पर गृह सचिव को इसका कुछ पता नहीं। निर्मल मुखर्जी को बताना ठीक नहीं था पर खुराना की नियुक्ति तो तभी की गयी है जब वे विश्वसनीय पाये गये हैं। उन्हें भी नहीं बताया गया।

सुबह जब उठा तो कम्मी ने कहा कि वर्धन का फोन आया था, उनसे बात कर लूं। एक परिचित पत्रकार का फोन भी सुबह आया था कि रात में लगभग १०० विरोधी नेता गिरफ्तार किये गये हैं। अखबर केवल 'स्‍टेटसमैन ` और 'हिन्दुस्तान टाइम्स` आये थे बाकी छपे ही नहीं । इन्हीं पत्रकार ने कम्मी को बताया था कि उनकी बिजली काट दी गयी थी, जिससे छपाई नहीं हुई।

सुबह जब उठा तो कम्मी ने कहा कि वर्धन का फोन आया था, उनसे बात कर लूं। एक परिचित पत्रकार का फोन भी सुबह आया था कि रात में लगभग १०० विरोधी नेता गिरफ्तार किये गये हैं। अखबार केवल 'स्टेट्समैन` और 'हिन्दुस्तान टाइम्स` आये थे। बाकी छपे ही नहीं। इन्हीं पत्रकार ने कम्मी को बताया था कि उनकी बिजली काट दी गयी थी, जिससे छपाई नहीं हुई।

मैं सुबह कभी रेडियो नहीं सुनता, पर आज कम्मी मेरे कमरे में ट्रांजिस्टर ले आयी। उसे पता लगा था कि राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री का सन्देश आने वाला है। वह मैंने सुना। प्रधानमंत्री ने बहुत अटक-अटक कर अपना सन्देश हिन्दी में पढ़ा। बाद में अंग्रेजी में बहुत ठीक से पढ़ा। सन्देश यही था कि राष्ट्रपति ने आपात्काल की घोषणा कर दी है, पर घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। विरोधी दलों के भीषण षड्यंत्र से देश को बचाने के लिए ऐसा करना आवश्यक हो गया था। कुछ तत्व प्रजातंत्र के नाम पर प्रजातंत्र को समाप्त करने में लगे हुए हैं। उन्हें ऐसा करने से रोकना है (मेरे मन में प्रश्न हुआ-कौन है वह?)

कार्यालय के लिए जब घर से निकल रहा था तो शारदा का फोन आया। उसने अंग्रेजी में कहा, 'सब सुन लिया। सब कुछ समाप्त हो गया। (यू मस्ट हैव हर्ड इट इज ऑल ओवर) कार्यालय आओगे तो पूरी बात होगी।` शारदा का स्वर बहुत दबा हुआ था।

कार्यालय में मैं सीधे शारदा के कमरे में ही गया। उसने मुझे विस्तार से, जो कुछ उसे मालूम था, बताया। कल रात दस बजे प्रधानमंत्री ने प्रो। धर और शारदा को अपने निवास-स्थान पर बुलाया। वहां बरुआ और सिद्धार्थ पहले से ही उपस्थित थे। जब प्रो. धर और शारदा पहुंचे तो प्रधानमंत्री ने कहा, 'आई हैव डिसाइडेड टु डिक्लेयर इमर्जेंसी। प्रेजीड़ेण्ट हैज एग्रीड। आई विल इन्फार्म द कैबिनेट टुमौरो।` यह कहते हुए आपात्काल की घोषणा का प्रारूप प्रो. धर के हाथ में रख दिया। प्रो. धर और शारदा आवाक् रह गये, उन दोनों को केवल सूचना देने के लिए बुलाया गया था और उनकी सलाह चाहिए थी प्रचार अभियान के लिए। उन दोनों से प्रधानमंत्री ने 'राष्ट्र के नाम सन्देश` का प्रारूप भी तैयार करने को कहा। वे दोनों लगभग एक बजे तक प्रधानमंत्री निवास पर रहे। सुबह छ: बजे मंत्रिपरिषद् की मीटिंग थी।

सुबह की मीटिंग में जो मंत्री दिल्ली में थे, सभी उपस्थित थे। प्रधानमंत्री ने भूमिका बतायी, पर किसी एक मंत्री ने भी चूं तक नहीं की। किसी प्रकार का विरोध नहीं। केवल सरदार स्वर्ण सिंह ने कुछ प्रशासनिक प्रश्न किये। मंत्रिपरिषद् में रात को की गयी गिरफ्तारियों की बिल्कुल चर्चा नहीं हुई। किसी एक मंत्री ने कहा कि उन्होंने सुना है कि कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं, पर बात टाल के वहीं समाप्त कर दी गयी। प्रो। धर को भी इन गिरफ्तारियों का कुछ पता नहीं था, शारदा ने बताया कि जे.पी., मोरारजी, चरण सिंह आदि सब प्रमुख विरोधी नेता गिरफ्तार कर लिये गये हैं।

शारदा ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री निवास पर पूरा कन्ट्रोल संजय ने ले लिया है। मंत्रिपरिषद् की मीटिंग के बाद उसने गुजराल को बुला कर प्रचार-कार्य के प्रति अप्रसन्नता और असंतोष प्रकट किया। कहा कि आगे से हर समाचार बुलेटिन प्रधानमंत्री-निवास पर भेजा जाये। इस पर गुजराल ने कहा कि कार्य की दृष्टि से अच्छा होगा कि किसी अधिकारी को मनोनीत कर दिया जाये। वह ए.आर. में ही रहे। उसे सब बुलेटिन दिखा दिये जायेंगे। उन्होंने शारदा का नाम सुझाया, पर संजय ने इसे स्वीकार न करके इस काम के लिए बहल की ड्यूटी लगायी।
जब ये सब बातें हो रही थीं वी।आर. भी वहीं आ गया था। शारदा की बात सुनकर उसने कहा कि अब इस देश में भी 'गाइडेड डेमोक्रेसी` ही रहेगी। शारदा ने हल्का-सा 'हां` कहा।

शारदा थका हुआ तो काफी था। १५ जून से हमारे सचिवालय में सबसे अधिक काम उस पर ही पड़ा है क्योंकि प्रधानमंत्री की पूरी स्टे्रटेजी प्रचार-अभियान पर ही आधारित है। पर शारीरिक थकान से अधिक मानसिक क्लेश में था। मैंने शारदा को कभी ऐसा नहीं देखा था। शारदा अवश्य ही सोच रहा होगा कि क्या ऐसी ही स्वतंत्रता के लिए वह १९४२ में जेल गया था। शारदा पत्रकार है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार देश में 'प्री-सेंसरशिप` लागू की गयी है।
शारदा के कमरे से आने पर मुझे सन्देश मिला की पन्त मुझसे एकान्त में बातचीत करना चाहते हैं; मैं कब उनके घर जा सकता हूं? पन्त भी अन्य मंत्रियों की भांति कायर हैं। मैं क्यों इस बीच में पड़ूं? मैंने वासुदेवन को बुलवाया। वह पन्त का विशेष सहायक है। मेरे साथ मेरठ में काम कर चुका है; गा़ज़ियाबद में ज्वाइंट मैजिस्ट्रेट था। उसको बुलाकर मैंने समझाया कि जो कुछ हुआ है मुझे उसकी पूरी जानकारी नहीं है। पन्त से बात करने में इसलिए अभी कोई लाभ नहीं। मैं उनसे दो-चार दिन में मिल लूंगा।

वासुदेवन ने कहा कि पन्त जी में किसी से कुछ कहने की हिम्मत नहीं है। वे मुझसे यही पूछेंगे कि प्रधानमंत्री की क्या मदद की जाये? पर मैं जानता हूं अन्दर-ही-अन्दर प्रधानमंत्री से कितने दु:खी होंगे।
शेषन आज कार्यालय बहुत देर से आया। आते ही मेरे पास आया। कहा कि-'देखिए, मैंने कहा था। पर मेरी समझ में नहीं आता कि आगे क्या होगा? कब तक ऐसे चलेगा? संजय ने पूरा कन्ट्रोल से ले लिया है।`

दिन-भर मन बहुत उदास रहा। मन में बहुत कटुता भी आ गयी थी। क्या प्रजातंत्र का अन्त वास्तव में आ गया? मैं दिन-भर अपने कमरे में ही रहा। प्रो। धर से भी मिलने नहीं गया। क्या करता मिल कर? उनकी व्यथा मैं समझ सकता हूं । मैंने सोचा कि आपात्काल सम्बन्धी सब काम नया होगा। मेरी इच्छा भी यह काम करने की नहीं है। मैंने बहल से बात की कि वह यह काम करे। उसे लाया भी इसलिए गया है कि काम बढ़ेगा और धीरे-धीरे वह मेरा काम भी समझ ले। मैं बार-बार यही सोच रहा था कि आज पण्डित जी की आत्मा पर क्या बीती होगी?

मैंने पहले लिखा है कि मंत्रिपरिषद् में किसी मंत्री ने कोई विरोध नहीं किया। यह बड़ी गम्भीर बात है। संविधान की धारा ७७ के अन्तर्गत भारत सरकार के राजकाज के जो नियम बने हैं, उसके अनुसार राष्ट्रपति को आपात्काल की घोषणा करने की सिफारिश करने के लिए मंत्रिपरिषद् की बैठक आवश्यक थी। इन्हीं नियमों में प्रधानमंत्री को अधिकार है कि वह यदि आवश्यक समझे तो बिना मंत्रिपरिषद् की बैठक किये भी कोई निर्णय ले सकते हैं। पर प्रश्न है कि क्या इस विषय पर मंत्रिपरिषद् की बैठक नहीं की जा सकती थी? निर्णय प्रधानमंत्री ने स्वयं लिया। ऐसा क्यों?

दूसरी बात यह है कि राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सलाह इन परिस्थितियों में क्यों मानी? वे संविधान की तनिक भी अवहेलना नहीं करते होते, यदि वे प्रधानमंत्री से कहते कि वे इस प्रस्ताव पर पूरे मंत्रिपरिषद् की राय जानना चाहेंगे। पता नहीं उन्होंने ऐसा कहा या नहीं, पर ये तो साफ है कि ऐसा हुआ नहीं। प्रधानमंत्री जब राष्ट्रपति से मिलने गयी थीं, तो सिद्धार्थ साथ थे। इन दोनों से मिलकर ही राष्ट्रपति को सहमत कराया। मेरी जानकारी में यह पहली बार है जब राष्ट्रपति ने केवल प्रधानमंत्री की राय पर इतना महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया हो।

२७ जून, १९७५

आज भी सुबह कोई समाचारपत्र नहीं आया। कब तक ऐसे चलेगा? कार्यालय आकर मैंने शारदा से पूछा तो उसने कहा कि सभी समाचारपत्रों के प्रेसों की बिजली कटी हुई है, फिर छपाई कैसे हो? यह केवल ढींगाढींगी से किया जा रहा है, किसी कानून के अन्तर्गत नहीं।

शारदा से मिलने के बाद मैं प्रो. धर के पास गया। कल उनसे नहीं मिला था। मैंने उनसे दो बातें कहीं-एक, आपातकाल घोषित करने की राष्ट्रपति की विज्ञप्ति मुझे संवैधानिक दृष्टिकोण से त्रुटिमय लगी। विधि मंत्रालय से परामर्श करना चाहिए। दो, जिन नेताओं को पकड़ा गया है उनको गिरफ्तारी के कारण देने में बड़ी सतर्कता की आवश्यकता होगी। प्रो. धर ने मेरी बात सुनी, संविधान के इससे सम्बन्धित अनुच्छेद भी पढ़े और फिर कहा कि मैं दोनों बातें बहल को समझा दूं। पर जैसे ही मैं उनके कमरे से निकला, मुझे वापस बुला कर कहा कि जब इस सम्बन्ध में मुझसे और आपसे काई राय ली ही नहीं गयी है तो अब हम लोग क्यों बीच में पड़ें। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह सब काम विधि पण्डितों से पूछकर किया गया होगा, हमें इसमें नहीं पड़ना चाहिए। अन्त में कहा कि तुम कितने भागयशाली हो कि जब यह सब हुआ तो एक और अधिकारी इस सचिवालय में आ गया था। सरकारी क्षेत्रों में यही धारणा होगी कि इस काम में नये अधिकरी का हाथ है। लेकिन मेरे लिए लोग क्या सोचेंगे। मुझे तुम्हारे भाग्य से ईर्ष्या होती है। मैं चुपचाप उनके कमरे से चला आया। उनकी पीड़ा ने उनकी आंखों को नम कर दिया था।
आज प्रधानमंत्री ने भारत सरकार के सचिवों की एक मीटिंग की (कुछ अतिरिक्त सचिव भी उस मीटिंग में थे)। उनको सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने जो कुछ भी किया है प्रजातंत्र को बचाने के लिए किया है। प्रजातंत्र के नाम पर प्रतिपक्ष प्रजातंत्र की हत्या करने पर कटिबद्ध था। हमें न तो संसद में कुछ काम करने दिया जाता था न बाहर। निर्वाचित सदस्यों को विधानसभाओं से त्यागपत्र देने को बाध्य किया जा रहा था। अनुशासनहीनता को इससे बढ़ावा मिल रहा था। स्थिति धीरे-धीरे खराब हो रही थी। सरकार कब तक यह बर्दाश्त करती? बहुत से विदेशी नेताओं और राजदूतों ने प्रधानमंत्री से समय-समय पर यह कहा कि सरकार इन गतिविधियों के प्रति इतनी नर्म क्यों है? प्रधानमंत्री ने यह आशा ही व्यक्त नहीं की, बल्कि यह आश्वासन दिया कि सरकार ने जो कदम उठाये हैं, वे अस्थायी हैं और शीघ्र-से-शीघ्र सामान्य स्थिति लाने का प्रयत्न किया जायेगा।
प्रधानमंत्री ने सरकारी कर्मचारीगण की भी प्रतारणा की। राजनीतिज्ञों के प्रति उनका दृष्टिकोण ठीक नहीं है। उसमें सुधार लाना आवश्यक है।पर सबसे गलत बात है वरिष्ठ अधिकारियों का अनाप-शनाप बात करना। कई विदेशी राजदूतों ने प्रधानमंत्री को बताया है कि पार्टियों में भारतीय अधिकारी शराब पीकर इस प्रकार से बोलते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि अनाप-शनाप बात करने की प्रवृत्ति बिल्कुल बन्द होनी चाहिए। इस सन्दर्भ में उन्होंन मंत्रालयों की कार्यक्षमता सुधारने पर बल दिया और कई छोटी-मोटी बातें कहीं।

कुछ अन्य बातें जो प्रधानमंत्री ने कही वे इस प्रकार थीं :

१. प्रतिपक्ष 'नाज़ीवाद` फैला रहा है। नाज़ीवाद केवल सेना और पुलिस के उपयोग से ही नहीं आता है। कोई छोटा समूह जब गल़त प्रचार करके जनता को गुमराह करे, वह भी नाजीवाद का लक्षण है।
२. भारत में दूसरे दलों की सरकारें चाहे बन जायें, पर वे मार्क्सवादी कम्युनिस्टों और जनसंघ की सरकार नहीं बनने देंगी।
३. जयप्रकाश के आन्दोलन के लिए रुपया बाहर से आ रहा है।
४. सी.आई.ए. बहुत सक्रिय है, के.जी.बी. का कुछ पता नहीं, लेकिन उनके कार्य का कोई प्रमाण अभी तक सामने नहीं आया है। (मतलब यह था कि वे कोई गल़त काम नहीं कर रहे हैं।)
५. प्रतिपक्ष का सारा अभियान उनके (प्रधानमंत्री) विरुद्ध था।
६ इसके अतिरिक्त उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति नहीं नजर आता जो इस समय देश के सामने आयी हुई चुनौतियों का सामना कर सके।

मीटिंग के बाद मुझसे वी.आर. ने पूछा कि इस स्पष्टीकरण से किसे सन्तोष हुआ होगा?
प्रधानमंत्री आज कार्यालय कई दिनों के बाद आयी थीं। मैं उनसे मिला। कोई विशेष बात नहीं हुई। कुछ रुटीन बातों पर आदेश देने थे। एक केस के सम्बन्ध में वे जानना चाहती थीं कि यू.पी.ए.सी. ने एक अमुक प्रत्याशी को इण्टरव्यू के लिए क्यों नहीं बुलाया और उसे चुना क्यों नहीं? मैंने कहा कि यू.पी.एस.सी. इसके कारण कभी सरकार को लिखकर नहीं भेजती। कहने लगीं कि मैं किदवई (यू.पी.एस.सी के अध्यक्ष) से मिलकर उनसे पूछूं। प्रधानमंत्री की जानकारी के लिए उन्हें बताने में आपत्ति नहीं करनी चाहिए। जब मैं उनके पास बैठा था किसी का फोन आया (बाद में मालूम पड़ा कि मध्य प्रदेश के राज्यपाल सत्य नारायण सिन्हा का था) कि सरकार को संविधान के अनुच्छेद ३५९ (१) के अन्तर्गत शीघ्र आदेश प्रसारित करने चाहिए। प्रधानमंत्री ने मुझसे यह अनुच्छेद समझाने को कहा। उसमें समय लगा। मैं करीब ३५ मिनट प्रधानमंत्री के पास रहा। मुझे उनकी परेशानी कम नजर नहीं आयी।
सूचना पर नियंत्रण लग गया है। पर आई।बी. की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि स्थिति इतनी सामान्य नहीं है, जितना सरकार चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है। तरह-तरह की अफवाहें फैल रही हैं। एक अफवाह का तो सरकारी प्रवक्ता को खण्डन करना पड़ा। यह अफवाह थी कि जगजीवन राम व चव्हाण अपने घरों में बन्दी बनाये गये हैं। बात बिल्कुल गल़त है, पर इससे यह स्पष्ट है कि पढ़ी-लिखी जनता इन दो नेताओं से क्या अपेक्षा करती थी।

रात में वर्धन ने बताया कि उन्होंने बह्मानन्द से आज दिन में बात की थी। वर्धन को लगता है कि सरकार की कोई 'स्ट्रैटजी` नहीं है। यदि आन्देालन-चाहे कितना हल्का हो-शांतिपूर्ण रहा और अदालतों ने बंदियों को छोड़ना शुरू किया, फिर सरकार क्या करेगी? ब्रह्मानन्द, वर्धन के अनुसार, बिल्कुल अनमने-से हैंं उन्होंने कहा कि मुझसे कब कुछ पूछा गया? पर अब भी उनकी प्रधानमंत्री से बात करने कह हिम्मत नहीं है।
रात में प्रधानमंत्री निवास से फोन आया। प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को दो मंत्रियों के विभागों के परिवर्तन के बारे में पत्र लिखना चाहती हैं। मुझसे उनका प्रारूप मांगा था, वह मैंने फोन पर ही डिक्टेट कर दिया।
पालकीवाला ने प्रधानमंत्री का वकील रहना अब अस्वीकार कर दिया है। नारीमन, एडीशनल सोलीसिटर जनरल, ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है। देश में अभी कुछ लोगों की आत्मा मरी नहीं है। इस अन्धकार में यही एक प्रकाश की रेखा लगती है।

( जून, 2007 अंक में प्रकाशित )

स्‍वतंत्र मिश्र

धर्म का असली धंधा


पिछले दिनों एक निजी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में कई बाबा काले धन को सफेद बनाने के लोभ में फंस गये। इस चक्कर में एक नहीं बल्कि सात-सात बाबा धरे गये हैं। इनके नाम हैं-पायलट बाबा, वेदांती महाराज, किरीट महाराज, स्वामी सूर्यम नंबूदरी, प्रज्ञानंद, आचार्य प्रमोद एवं बाबा अनिल जोशी। इस सिनेमाई घटना में रोमांच भी बहुत था। एक बाबा के बारे में टीवी पर दिखाकर दूसरे बाबा से उस पर प्रतिक्रिया ली जा रही थी। प्रतिक्रिया देने वाले बाबा फंस चुके बाबा के लिए बहुत कुछ बोल रहे थे। ब्रेक के बाद प्रतिक्रिया देने वाले बाबा ने पूरी सांस भी नहीं ली थी तभी उनके भी 'काले-सफेद` धंधे में शामिल होने का प्रमाण प्रसारित किया जाने लगा।

इससे पहले ये लोगों को धर्म और आध्यात्म की कहानियां सुनाते थे 'यह संसार कागज की पुड़िया है, बूंद पड़े घुली जाना है।` मोह और माया के बंधनों से मुक्त होने की सलाह तो हर बाबा, हरेक मिनट में देते ही रहते हैं। काला और सफेद करने के चक्कर में लोगों के सामने यह बात आ गयी कि ये धन कुबेर हैं। संत या फकीर होने का केवल ढोंग रचते हैं। यह ढोंग पूरी दुनिया में अलग-अलग समय में अलग-अलग तरीके से किया जाता रहा है। यूरोप में पोप अपना महल बनवाने के लिए लोगों को बीच स्वर्ग का टिकट बांटते थे। लोग स्वर्ग का टिकट लेने के लिए सुबह से शाम तक पंक्तियों में खड़े रहते थे। इन पंक्तिबद्ध लोगों में अथाह संपत्ति वाले और खाते-पीते लोग ही रहते थे। टिकटों का स्वरूप अलग-अलग था। पैसों के आधार पर स्वर्ग जाने और वहां की सुविधा का इंतजाम कराने का प्रलोभन पोप द्वारा दिया जाता था। स्वर्ग की लालसा भूखों और नंगों के मन में नहीं जगती। वे भूख मिटाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। भारतीय संदर्भ में धर्म के बाजार में पैसों के खेल के बारे में राजेन्द्र्र यादव ने 'हंस` के मई, २००७ अंक में संपादकीय लिखा है-'विदेश में रह रहे अप्रवासी भारतीयों के मध्य अस्मिता की समस्या उन्हें नए सिरे से हिंदू बनाती है। जैसे-जैसे वहां की जिंदगी उन्हें संपन्न और समर्थ करती जाती है, वैसे-वैसे वे सांस्कृतिक कर्ज चुकाने के नाम पर यहां के मंदिरों-बाबाओं की आर्थिक मदद करते रहते हैं। बाबरी मस्जिद ध्वंस और राम मंदिर निर्माण में इन हिन्दुओं ने सोने की ईटें भिंजवाई थीं और यहां (दिल्ली) जो हजारों करोड़ के 'अक्षरधाम` बन रहे हैं, वे सब भी इन्हीं एनआरई प्रवासियों द्वारा हिंदुत्व के लिए योगदान की कृपा है। न जाने कितने बाबा, संत, भगवान, जादूगर करोड़ों मिलियन डॉलर लूट रहे हैं। धर्म और आध्यात्म इन दिनों सबसे ज्यादा बिकने वाला माल है।`

जनता दल (यू) के अध्यक्ष शरद यादव ने स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े गये बाबाओं को तत्काल गिरफ्तार करने और उनसे कड़ी पूछताछ की सराहनीय मांग की। हालांकि अपनी सदिच्छा के बावजूद उन्हें इस सवाल पर भी गौर करना चाहिए कि आखिर उनके धन कुबेर बनने के इंतजाम में कौन से कारक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं? इसके उलट शरद यादव ने यह तर्क दिया कि 'हवाला के आरोप में देश के नामचीन ६४ राजनेताओं के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर हुई, लोकसभा में प्रश्न पूछने के लिए निर्वाचित सदस्यों को १३ दिन में सदस्यता से वंचित कर दिया गया और कबूतरबाजी के आरोप में फंसे सांसदों को लोकसभा में आने से रोक दिया गया तो अंधविश्वास फैलाने वाले इन भ्रष्ट बाबाओं की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो रही?` अगर भ्रष्ट सांसदों के साथ ऐसा सलूक किया गया है तो इसमें आपत्तिजनक बात क्या है? हां इन सांसदों के अलावे अन्य सांसद भी भ्रष्ट हैं और उनपर उंगली किसी खास कारणों से नहीं उठायी जा रही तो श्री यादव को उस पर भी जरूर हंगामा खड़ा करना चाहिए। उनकी चिंता वाजिब है कि लोगों को धर्म की दुहाई देकर मालामाल होते बाबाओं पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। लेकिन शरद यादव के अखबारों में प्रकाशित बयानों में यह चिंता ज्यादा झलकती है कि बाबा की कमीज सांसदों से ज्यादा मैली होने पर भी उनपर कोई नोटिस क्यों नहीं लिया जा रहा है। आज धर्म बाजार का एक 'माल` बन चुका है। वह जीवन को सुंदर बनाने का स्रोत न रहकर, जीवन को कई स्तरों पर बाधित कर रहा है। सभी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हुए लगभग सभी दंगों में पुलिस की सक्रिय भूमिका पायी गयी है।

यहां कुछ सवाल उन चैनल वालों से भी पूछा जाना चाहिए जो बाबाओं की इन करतूतों पर शोर मचा रहे थे। २४ घंटे चलने वाले तमाम खबरिया चैनलों पर धर्म के नाम पर अंधविश्वास की घटनाओं को महिमामंडित करके क्यों बेचा जाता है? बाबाओं और माताओं के माध्यम से चैनल तमाम तरह की अवैज्ञानिक बातों के प्रचार में क्यों जुटे हुए हंै? वे देश और दुनिया में हो रहे आम लोगों की लड़ाई की खबरें क्यों नहीं प्रकाश में लाते हंै? इन चैनलों पर बिहार, मध्यप्रदेश के सूदूर इलाकों में कौन अपने को सांप से कटवा रहा है, इसकी खबरें तो प्रसारित होती है, परंतु दिल्ली, पटना और भोपाल आदि जगहों पर आम जनता के हक की लड़ाई की खबरें क्यों दबा दी जाती हैं? मालूम हो सिर्फ दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रत्येक साल तीन हजार से ज्यादा धरना, प्रदर्शन आदि आयोजित होते हैं। क्या चैनल वाले हिसाब देंगे कि इतनी बड़ी तादाद में हो रहे विरोध कहां गुम करा दिये जाते हैं? इतनी भारी संख्या में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों का कितना प्रतिशत वे आम लोगों के बीच खबर बनाकर ले जाते हैं? दरअसल इन चैनलों का काम बाबा, सेक्स रैकेट, क्रिकेट और बॉलीवुड की खबरों में लोगों को उलझाकर अपने लिए धन उगाहना है। इससे रोज-ब-रोज के रोटी के मुद्दे हाशिये के हाशिये पर आप ही आप चले जाते हैं। साफ सी बात है कि बाबा जीवन-दर्शन और आधात्मय की गठरी खोलने के लिए बड़े भक्तों (अमीरजादों) से खूब सारा माल लेते हैं। साथ ही 'धन, धन को उत्पन्न करता है` के सिद्धान्त पर ये बाबा कई तरह के आयोजन और प्रयोजन करते हैं। अन्यथा क्या बात है कि स्वामी रामदेव के योग-शिविर में टिकट उन्हीं को मिलता है जो २५०-५००० रुपया खर्च करने की शक्ति रखते हैं? पूंजीवादी व्यवस्था माल बनाने की खूली छूट देती है। यह व्यवस्था इसके लिए वातावरण भी तैयार करती है। माल बनाने के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं। देह, गुर्दा, खून, धर्म, ईमान कुछ भी बेचकर आप मालदार हो सकते हैं। दीगर बात है कि पूंजीवादी व्यवस्था में माल बनाने के लिए आपको पूंजीवादी इल्म भी सीखना पड़ेगा। तात्पर्य यह है कि मोटा काटने के लिए आपको शोषण करना सीखना होगा। बाबाओं ने धर्म को बाजार में आसानी से बेचने की कला सीख ली है इसलिए वे मालामाल हो गये। जो पकड़े गये उन्होंने अपनी हुनरमंदी में शायद कुछ लूपहोल अवश्य छोड़ दिये होंगे।

( जून,2007 अंक में )