September 3, 2007

दिनकर कुमार

गुटीय संघर्ष और शांति वार्ता




ह संतोषजनक बात है कि नगालैंड में कई दशक पुरानी अलगाववाद की समस्या के समाधान की दिशा में गत २९ मार्च को नई दिल्ली में केन्द्र सरकार और नगा विद्रोही संगठन एन एस सी एन-सू-मुइपा गुट के बीच जो शांति वार्ता आयोजित हुई, उसमें दोनों पक्षों की तरफ से कई बिंदुओं पर सहमति हुई। नगा विद्रोही नेताओं ने भी वार्ता के इस चरण को काफी हद तक सफल बताया। मगर भविष्य में भी इसी तरह सकारात्मक माहौल में वार्ता होती रहे और दोनों पक्षों की तरफ से लचीले रूख का परिचय दिया जाए तो निश्चित रूप से द्विपक्षीय समझौते के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या इस तरह के समझौते से लंबे समय से चली आ रही नगा राजनीतिक समस्या का शांतिपूर्ण समाधान ढूंढ़ने का रास्ता निकल पाएगा? यह सवाल भी प्रमुख है कि क्या दूसरे नगा संगठन समझौते को स्वीकार कर पाएंगे या एनएससीएन-खापलोग गुट इस समझौते को मानने के लिए तैयार हो पाएगा, चूंकि वह सू-मुइपा गुट के साथ लगातार खूनी संघर्ष करता रहा है।

इन सवालों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है। नगालैंड में सोलह नगा जनजातियां हैं और प्रत्येक की अपनी-अपनी बोली और भिन्न पहचान है। नगालैंड की सरकारी भाषा अंग्रेजी है और संपर्क भाषा नागामिज हैं जिसे असमिया, पंजाबी एवं हिन्दी का मिश्रण कहा जा सकता है। प्रत्येक नगा जनजाति का भिन्न नाम है। प्रत्येक नगा जनजाति अपनी पहचान के प्रति सजग है। वे अपनी संस्कृति और परंपरा के आधार पर जीवन यापन करती हैं। ईसाई मिशनरियों ने इन जनजातियों को एक साझी नगा पहचान के प्रति आकर्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण अभियान चलाया और विभिन्न नगा जनजातियों को आपस में जोड़ने का काम किया। कई तरह के अन्तर्विरोधों से गुजरते हुए भूमिगत नगा विद्रोही नेताओं ने नगा जातीयता की भावना को लोगों में उभारने का प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और असम के नगा बहुल इलाकों को नगालैंड में मिलाने की मांग शुरू कर दी। इस तरह की राजनीति का सूत्रपात नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) के अध्यक्ष एवं तथाकथित नगालैंड की संघीय सरकार के संस्थापक ए जेड फिजो ने की थी जो लंदन में स्वनिर्वासित जीवन बिता रहे थे। फिजो ने नगालैंड की दूसरी जनजातियों पर लगातार अपना दबदबा बनाए रखा।
शायद यही वजह है कि वर्तमान समय में वृहत नगा समाज अलग-अलग जातीय पहचान की वजह से विभाजित होता नजर आ रहा है। एन एस सी एन-सू-मुइपा और एन एस सीएन-खापलांग के बीच राजनीतिक वर्चस्व के लिए टकराव होता ही रहता है। इसके साथ ही अलग-अलग जनजातीय भूमिगत संगठनों के बीच भी वर्चस्व के लिए खूनी जंग देखी जा सकती है। इससे साफ हो जाता है कि किस तरह विभिन्न नगा जनजातियों के बीच आपसी रंजिश बढ़ती ही जा रही है।

अंगामी जनजाति के होने के नाते फिजो ने कभी भी सेमा जनजाति के नेता होकिशो सेमा के वर्चस्व को स्वीकार नहीं किया था। फिजो ने जहां सेमा का खात्मा करने के लिए अभियन चलाया वहीं राज्य में अराजकता की स्थिति भी तैयार की। वर्ष १९६२ से १९७४ तक नगालैंड के राजनीतिक इतिहास के कालिमायुक्त कालखंड को नगालैंडवासी शायद ही भुला पाएंगे जब फिजो समर्थकों ने राज्य में आतंक का माहौल तैयार करने के साथ-साथ मुख्यमंत्री सेमा सहित सेमा जनजाति के कई नेताओं पर हमले किए।

२२ फरवरी १९६९ को नगालैंड में दूसरा आम चुनाव हुआ था। इस चुनाव में सेमा मुख्यमंत्री बने थे। ७८.७५ प्रतिशत मतदाताओं ने चुनाव में मताधिकार का प्रयोग किया था। तीन साल बाद ९ अगस्त १९७२ को सेमा डिमापुर से कोहिमा वापस लौट रहे थे। सेमा जीप में अपनी सोलह वर्षीय बेटी और अंगरक्षकों के साथ यात्रा कर रहे थे। सेमा की जीप के आगे सुरक्षाकर्मियों की जीप चल रही थी। फिजो के जन्म स्थान खोनोमा से महज ८ कि.मी की दूरी पर एक मोड़ के पास अचानक सड़क के दोनों तरफ से गोलीबारी शुरू हो गई। सेमा की पुत्री की जांघ में गोली लगी। अंगरक्षकों ने भी जवाब में गोलियां चलाई। एक अंगरक्षक, ड्राइवर और एक कांस्टेबल की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई। इसे चमत्कार ही समझा जाएगा कि हमले के दौरान होकिशे सेमा सुरक्षित बच निकले। इससे पहले भी सेमा पर छह बार जानलेवा हमले हो चुके थे। सेमा के पिता अपने समुदाय के मुखिया थे और शांतिपूर्ण नीतियों में विश्वास रखते थे। फिजो समर्थकों ने सेमा के पिता की हत्या कर दी थी।

सेमा पर हमले की घटना के बाद विद्रोहियों ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉन बास्को जोशोकी की उस समय हत्या कर दी थी जब वे अपनी पत्नी के साथ चर्च से वापस लौट रहे थे। इस घटना के बाद राज्य सरकार ने संघर्ष विराम की अवधि नहीं बढ़ाने की घोषणा की। नागालैंड के तत्कालीन राज्यपाल बी के नेहरू ने १ सितम्बर १९७२ को गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम, १९६७ के तहत नगा संघीय सरकार, नगा आर्मी और नगा नेशनल काउंसिल पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। इसके बावजूद स्थितियों में खास बदलाव नहीं आया। लंदन में मौजूद फिजो ने सरकारी प्रतिबंध की निंदा की। विद्रोहियों ने एक शांति समर्थक वृद्ध डाक्टर की हत्या कर दी, जो सेमा जनजाति से ताल्लुक रखते थे। इस घटना के बाद राज्य सरकार ने एस सी जमीर और उनके सहयोगियों की गिरफ्तार कर लिया। जमीर की गिरफ्तारी से क्रुद्ध होकर नगा विद्रोहियों ने सेमा सरकार को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। विद्रोहियों ने हिंसक गतिविधियां तेज कर दीं। इसी दौरान १६ अगस्त १९७२ को जुनहेबोटो में रिवोल्यूशनरी गवर्नमेंट आफ नगालैंड का नेतृत्व कर रहे स्फेटू सू और जनरल जुहेटू ने १५०० विद्रोहियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। ज्यादातर विद्रोहियों को सीमा सुरक्षा बल में नियुक्त कर दिया गया। जुहटू बटालियन कमांडर बनाए गए और स्केटू सू बाद में सांसद बने।

इसी बीच राज्य की सरकार भी बदली। तीसरे आम चुनाव में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में आई और बीजोल ने मुख्यमंत्री का पद संभाला। यह सरकार एक साल भी ठीक से नहीं चल पाई। इसके बाद जे बी जेसाफी मुख्यमंत्री बने, जिन्हें ग्यारह दिनों तक अपने पद पर रहने के बाद हटना पड़ा। हालत बिगड़ती गई और २२ मार्च १९७५ को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। राष्ट्रपति शासन की अवधि २४ नवंबर १९७७ तक बढ़ाई गई।
इस अवधि में तत्कालीन राज्यपाल एलपी सिंह ने फिजो के भाई केवियानी से बातचीत जारी रखी, जिसके परिणाम स्वरूप ११ नवंबर १९७५ को शिलांग समझौता हुआ। यह समझौता नगालैंड में अमन-चैन कायम करने में असफल रहा और फिजो के नेतृत्व वाले एनएनसी के कई विद्रोही नेताओं ने इस समझौते पर अपनी नाराजगी जाहिर की। इन नेताओं का कहना था कि समझौते पर एनएनसी के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर नहीं किया था और समझौता करने से पहले दूसरे विद्रोही नेताओं से विचार-विमर्श नहीं किया गया था। इसके अलावा जब समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे तब इसाक सू और मुइवा चीन की सद्भावना यात्रा पर गए हुए थे।

वर्ष १९७८ में एनएनसी की एक बैठक आयोजित हुई जिसमें फिजो के नेतृत्व और नीतियों को खारिज करने का फैसला किया गया। इसके बाद सू.मुइपा और खापलांग ने बगावत कर दी और एनएनसी से अलग होकर एनएससीएन की स्थापना की। २ फरवरी १९८० को 'पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ नगालैंड` का गठन किया गया। सू को इसका अध्यक्ष, खापलांग को उपाध्यक्ष और मुइवा को महासचिव चुना गया। कुछ समय के बाद ही इनके बीच कड़वाहट पैदा हो गई। इस तरह की अफवाह फैली कि सू और मुइपा मिलकर खापलांग का सफाया करना चाहते हैं। इसके बाद १४० मुरपा समर्थक विद्रोही खापलोग गुट और बर्मी सेना के हमले में मारे गए। मारे गए विद्रोही थांगकुल जनजाति के थे। मुइवा समर्थकों की हत्या के बाद एनएससीएन दो गुटों में विभाजित हो गया। एक गुट का नाम पड़ा एनएससीएन-सू-मुइपा और दूसरे गुट का नाम पड़ एनएससीएन-खापलांग। विभाजन के बाद दोनों गुटों के बची हिंसक झड़पों का सिलसिला जारी रहा।

इस पृष्ठभूमि पर गौर करने से स्पष्ट हो जाता है कि अगर केन्द्र सरकार और एनएससीएन-सू-मुइपा गुट के बीच कोई समझौता हो भी जाएगा तो वह तब तक कारगर साबित नहीं होगा जब तक खापलांग गुट भी उसे मानने के लिए तैयार नहीं हो जाता। इससे पहले भी शिलांग समझौते का यही हश्र हो चुका है। नगालैंड में स्थायी शांति की बहाली के लिए सभी विद्रोही गुटों की सहमति पर आधारित कोई समझौता ही कारगर साबित हो पाएगा।

दिनकर कुमार गुवाहाटी से प्रकाशित हिंदी दैनिक सेंटिनल के संपादक हैं।

( जून,2007 अंक में प्रकाशित )

सचिन कुमार जैन

पानी विश्‍वयुद्ध नहीं ग़हयुद्ध का कारण बनेगा



हीं और नहीं मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के पास ही एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है मण्डीदीप। उद्योगों से भरेपूरे इस क्षेत्र में पूंजीपतियों को पालने-पोसने में सरकार ने कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी। पर इन्हीं उद्योगों में काम करने वाले और मण्डीदीप के रहवासियों को पीने का पानी उपलब्ध कराने का मसला आया तो सरकार ने नजरें लगभग फेर लीं। जिस इलाके में १० दिन में एक बार पानी की आपूर्ति की जाती हो वहां लोगों का प्यास बुझाने के लिये भटकना स्वाभाविक है। यहां के १६ ट्यूबवेल में से चार में पानी का स्तर नीचे जा चुका है और बाकी बिजली की कमी से बेजार हैं। मण्डीदीप में ही एक और खतरनाक संकेत छिपा है। वह संकेत है पानी के सामुदायिक हक का। मण्डीदीप के पास से ही बेतवा बैराज से नगरपालिका ने पानी दिये जाने की मांग की थी किन्तु जल संसाधन विभाग ने यह स्प ट कर दिया कि बेतवा बैराज के पानी पर केवल औद्योगिक इकाइयों का हक है। बेतरतीब भूजल दोहन और खराब प्रबंधन के कारण इस इलाके का भूजल स्तर चार मीटर से नीचे जा चुका है पर सरकारी रिकार्ड में यह क्षेत्र जल सुरक्षित क्षेत्र माना जाता है क्योंकि यहंा पीने का पानी आम लोगों को भले ही न मिले पर इलाके में पानी का औसतन व्यय ४० लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन तो हो ही रहा है फिर भले ही उसमे से ३७ लीटर पानी उद्योग ही क्यों न ले रहे हों !


आश्चर्य की बात है कि गर्मी का मौसम शुरू होने से पहले मध्यप्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री ने रतलाम में २४ फरवरी २००७ को यह कहा था कि इस साल चूंकि बारिश अच्छी हुई है इसलिये राज्य में पानी का कोई संकट सामने नहीं आयेगा। इसका मतलब तो यही नजर आता है कि सरकार मानती है कि पानी के प्रबंधन की कोई जरूरत नहीं है, और पानी का संकट केवल बारिश की मात्रा से जुड़ा है। परन्तु यह सरकारी सोच समाज के लिये बहुत घातक है क्योंकि जिस तरह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया गया है और पृथ्वी के गर्म होने के प्रमाण हमारे सामने आये हैं, उसे अच्छे मानसून से भी सुधारा नहीं जा सकता है। जल संरक्षण के नाम पर राज्य में बेतहाशा स्टपडेम बनाये गये हैं और अभी भी बनाये जा रहे हैं किन्तु हरदा नगरपालिका के अध्यक्ष, पार्षदों और स्थानीय लोगों ने मिलकर ४ मई २००७ को अजनाल डेम नदी पर बने हुये बांध को तोड़ दिया क्योंकि इस नदी की झीलों के लगभग मृतप्राय स्थिति में पहुंच जाने के कारण बिरजाखेड़ी पंप हाउस के पास पानी कम हो गया जिससे पीने का पानी लोगों को मिलना बंद हो गया। जंगलों के विनाश, शहरीकरण और पानी के अनियोजन के कारण मध्यप्रदेश की नदियां भी अब सूखने लगी हैं। जिसके फलस्वरूप पानी के लिये भूजल उपयोग पर निर्भरता खूब बढ़ी है। सरकार भी विरोधाभासी स्थिति में काम कर रही है। एक ओर तो ११वीं पंचवयोजना में भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए ९० करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है किन्तु भूजल के दोहन के लिये सरकार १८० करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने वाली है। वर्तमान आर्थिक और औद्योगिकीकरण की नीतियों के तहत उद्योगों को उनकी जरूरत के मुताबिक बिजली और पानी (वह भी रियायत के साथ) उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता सरकार ने प्रदर्शित की है। जहां तक आम आदमी के लिये पीने के पानी के अधिकार का सवाल है उन्हें तो टैंकरों से जलापूर्ति के भरोसे ही रहना होगा। इसी साल सरकार लगभग ९ करोड़ रुपये खर्च करने वाली है जिससे लगभग ३० हजार टैंकर पानी की आपूर्ति होगी परन्तु निजी स्तर पर समुदाय अपनी जरूरत पूरी करने के लिये मध्यप्रदेश में साढ़े तीन करोड़ रुपये खर्च कर चुका है। जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत है पानी, जिसके बिना अस्तित्व बनाये रखना संभव नहीं है। और जीवन की सबसे बड़ी जरूरत होने कारण ही पानी बाजार के लिये एक भारी फायदे की वस्तु बन चुका है। इतना ही नहीं पानी का फायदा उठाने के लिये सरकार ने भी बाजार को खुला छोड़ दिया है। एक ओर औद्योगिक इकाईयां बेतरतीब जलदोहन कर रही हैं वहीं दूसरी ओर बहुरा ट्रीय और अब तो रा ट्रीय कम्पनियां भी एक लीटर शीतल पेय बनाने के लिये ४१ लीटर पानी का उपयोग कर रही हैं। जलाभाव के कारण जिन परिस्थितियों का निर्माण राज्य में हो रहा है वह चिंता पैदा करने वाले है। यह तो कहा ही जा चुका है कि पानी अगले विश्वयुद्ध का कारण बनेगा; परन्तु अब इस वक्तव्य में बदलाव लाने की जरूरत है। पानी विश्वयुद्ध का नहीं बल्कि गृहयुद्ध का कारण बनेगा। वर्ष २००५ में मध्यप्रदेश में पानी के लिये होने वाले टकराव के २२७ मामले दर्ज हुए थे, २००६ के वर्ष में ऐसे ३०३ मामले हुये और व र्ा २००७ में अब तक ५८७ मामले दर्ज हो चुके हैं। इस साल तो शिवपुरी, हरदा और इन्दौर में स्थानीय शासन निकायों के जनप्रतिनिधि भी सरकार के विरोध में सड़कों पर उतर आये। केन्द्रीय भूजल बोर्ड (जल स्थिति का आकलन-विश्लेश्‍ण करने वाली सरकारी एजेंसी) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार राज्य के २२ जिलों में भूजल स्तर दो से चार मीटर तक गिर चुका है। जबकि १४ जिलों में यह गिरावट चार मीटर से ज्यादा दर्ज की गई है। भोपाल अब देश में सबसे ज्यादा गैस्ट्रोएन्टार्टिस से प्रभावित लोगों वाला शहर है। २२ जिलों में पानी में फ्लोरोसिस की मात्रा बढ़ी है। एक अध्ययन के मुताबिक सिवनी में १६ हजार बच्चे और गुना में १२० गांव फ्लोरोसिस की अधिकता से प्रभावित हैं। राज्य के ३०११८ स्कूलों में आज भी पीने का साफ पानी बच्चों को उपलब्ध नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा उपलब्ध कराये गये आंकड़ों के अनुसार प्रदेश की ८१९२ नल और सतही जल प्रदान करने वाली योजनाओं में से १५०७ योजनायें बंद हैं जबकि ९९८८ हैण्डपम्प जल स्तर कम होते जाने के कारण बंद हो चुके हैं। राज्य से अब और क्या अपेक्षायें की जा सकती हैं जबकि मध्यप्रदेश में २४५१७ बसाहटें ऐसी हैं जहंा सरकार पानी की न्यूनतम जरूरत को भी पूरा नहीं कर पाई है। इनमें से ज्यादातर बसाहटें जलस्रोतों से ३ से ५ किलोमीटर दूर हैं। वास्तव में आजीविका और रोजगार का संकट वैसे ही राज्य के तीन करोड़ लोगों को परेशान किये हुये है, अब तो पानी भी उन्हें नसीब नहीं हो रहा है। ऐसे में राज्य को यह जरूर याद करना होगा कि जीवन की बुनियादी जरूरत और बुनियादी अधिकार के दायरे इतने सीमित न होने दिये जायें कि आम आदमी का दम घुटने लगे। पानी की कमी ऐसी कमी नहीं है जिसे लोग नियति मान कर स्वीकार कर लेंगे। इस पर प्रतिक्रिया होगी। आज टुकड़ों-टुकड़ों में संघर्ष हो रहा है, कल निश्चित रूप से संगठित संघर्ष होगा।

सचिन कुमार जैन मीडिया अध्येता हैं।

( जून,2007 में प्रकाशित )

जसपाल सिंह सिद्धु

राजनीति का मोहरा बना धर्म





वास्‍तव में पजाब के भटिंडा जिले के सलबतपुरा गांव में १३ मई, २००७ को डेरा सच्चा सौदा प्रमुख के पास जुटी सभा में सिखों को उकसाने वाला कुछ भी नया नहीं हुआ थायह मीठे पकवान बांटने की गुरु गुरमीत सिंह की एक पुरानी दिनचर्या थी, और इस पाहुल बांटने के साथ ही डेरा प्रमुख ने प्रभु की प्रार्थना में उन्हें कुछ शब्द-नाम भी बांटेहां, उस दिन पहले की दिनचर्या से थोड़ा अंतर थाडेरा आयोजकों ने एक लोकप्रिय पंजाबी दैनिक अजीत में एक विज्ञापन दिया था, जिसमें डेरा प्रमुख को एक विशेष पहनावे में समारोह करते हुए दिखाया गया था और कहा जा रहा है कि डेरा प्रमुख दसवें सिख गुरु गोविंद सिंह की तरह बैठ गये और १६९९ में बैसाखी के दिल खालसापंथ का सृजन करते वक्त सिखों को दीक्षित करने की गुरु की शैली की नकल करने लगेयह भी कहा गया कि सिख गुरु की ही नकल करते हुए डेरा प्रमुख ने गुरु के पंज प्यारों की जगह अपने सात शिष्यों को सात प्यारों के रूप में चुनाअगले दिन, १४ मई, २००७ को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीस), अमृतसर, जो कि एक शीर्ष गुरुद्वारा प्रबंधन संस्था है और जो अभी सत्ताधारी अकाली दल बादल द्वारा नियंत्रित है, के कर्मचारियों को एसजीपीसी के भटिंडा स्थित हाजी रतन गुरुद्वारा में इकट्ठा होने को कहा गयाउनकी इस घोषणा के बाद कि दीक्षा देने के सिख तरीके का उपहास उड़ाने के धर्मविरोधी कार्य लिए वे डेरा प्रमुख का पुतला जलायेंगे, कुछ अन्य अकाली कार्यकर्ता भी उनसे जुड़ गयेकिरपान और दूसरे पारंपरिक हथियारों से लैस सिख युवकों और एसजीपीसी कर्मियों का एक अपेक्षाकृत छोटा-सा समूह भटिंडा जिला न्यायलय की ओर चला जहां डेरा के अनुयायी लाठी और लोहे के सरिये लिये हुए बड़ी संख्या में जमा थेविरोधियों द्वारा डेरा प्रमुख का पुतला जलाये जाने को लेकर डेरा अनुयायी भी उत्तेजित थे, जिन्हें उनमें से कई ईश्वर का अवतार मानते थेपूर्व सूचनाओं के बावजूद जिला प्रशासन ने दोनों समूहों की झड़प को नहीं रोकायह उन्माद की शुरुआत थीलगभग सांप्रदायिक दंगों के तर्ज पर, जिसने पंजाब को निगल लिया और जम्मू कश्मीर, हरियाणा, दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में दंगाई प्रतिक्रिया भड़का दी

ऐसा लगा कि शायद भटिंडा जिला प्रशसान सत्ताधारी अकाली नेताओं द्वारा निर्देशित था कि वह धीरे काम करे और झड़पों को होने दे। क्योंकि बिना अकालियों की सहमति से ऐसा कोई भी जमावड़ा न तो उनके द्वारा नियंत्रित गुरुद्वारा में हो सकता था और न एसजीपीसी कर्मी इन झड़पों में नेतृत्वकारी भूमिका में रहते।

समस्या की असली वजह विशुद्ध रूप से राजनीतिक है। अकालियों के पास डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ तीखी शिकायतें हैं और दरअसल वे डेरा प्रमुख के साथ निपटने की ताक में थे और सलबतपुरा गांव की घटना ने उनके लिए राह आसान कर दी। केवल दो माह पूर्व हालिया पंजाब विस चुनाव में डेरा सच्चा सौदा खुलेआम अकालियों की पुरानी दुश्मन कांग्रेस के पक्ष में रहा जो उन्हें (अकालियों के लिए) महंगा पड़ा। अकालियों के लिए जाने जानेवाले पंजाब के मालवा प्रदेश में कांग्रेस ने ६५ में से ३७ सीटें जीतीं। क्षेत्र के अनेक अकाली दिग्गजों को चुनाव में धूल चाटनी पड़ी। कांग्रेस मालवा बेल्ट में मुख्यमंत्राी प्रकाश सिंह बादल के अकाली दल की लगभग बराबर पर रही। और बादल केवल सहयोगी भाजपा की मदद से ही सरकार बना सकते थे, जिसने विधानसभा की ११७ में से १९ सीटें जीती थी।

हालांकि सिख धार्मिक प्रबंधकों और डेरा अनुयायियों, जो प्रेमी नाम से जाने जाते हैं के बीच अंदर ही अंदर नफरत व अविश्वास की भावना का लंबा इतिहास है। डेरा, जिसका मुख्यालय हरियाणा के सिरसा में है, कहा जाता है कि लगातार सिख सिद्धांतों और व्यवहारों की नकल करता आ रहा है। इसके अनुयायी गांवों से भी आते हैं जिनमें दलित, सिखों की निचली जातियां, छोटे सिख, किसान शामिल है जो पंजाब, हरियाणा और सटे राजस्थान के जिलों में अकालियों का पारंपरिक गढ़ रहे हैं। दरअसल डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के गुरुसर मोदिया गांव में एक सिख किसान परिवार में जन्मे थे। वे डेरा सच्चा सौदा के तीसरे प्रमुख हैं तथा खुद को सभी प्रमुख धर्मों के प्रति आस्थावान बताते हैं। उन्होंने बाद में १९९० में डेरा प्रमुख बनने के बाद अपने नाम में 'राम रहीम` जोड़ लिया क्योंकि उनके आधे अनुयायी हिंदू (मुख्यत: निचली जातियां) हैं। २.५ करोड़ डेरा अनुयायियों में ७-८ प्रतिशत मुस्लिम और ४० प्रतिशत सिख अधिकतर महजबी सिख कहे जाने वाले खेतिहर मजदूर बताये जाते हैं। वर्तमान डेरा प्रमुख ने अनुयायियों की संख्या कैसे बढ़ायी? वे भक्तगणों को रोज प्रवचन देते हैं जिन की संख्या अब किसी विशेष मौके पर कई लाख हो जाती हैं। डेरा प्रमुख सिख, हिंदू मिथकों, ईसाईयत और इसलाम के आसानी से समझ में आनेवाले धार्मिक सिद्धांतों को उदारता से उधार लेते हैं और तब वे एक धार्मिक कॉकटेल तैयार करते हैं-जिसे वे बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह के नाम से आम आदमी की भाषा में एक ऊंचे, सुसज्जित मंच से पेश करते हैं।

एक भव्य दृश्य, जो वहां जमा भक्तजनों को विस्मय, भव्यता और भक्तिभाव से भर देता है, जो वहां अपने मानसिक त्रास और सामाजिक विसंगतियों, जिन्हें वे प्राय: झेल रहे होते हैं, से राहत पाने के लिए जमा होते हैं।
डेरा प्रमुख ईमानदारीपूर्वक धर्मपरिवर्तन के जटिल मुद्दे से बचते रहे हैं। उनके अनुयायियों को अपना धार्मिक आचरण बनाये रखने की छूट होती है। डेरा आयोजकों का दावा है कि डेरा प्रमुख ने एक समाज सुधार आंदोलन शुरु किया है जिसमें वे लोगों को सामाजिक बुराईयों से बचाते हैं-जैसे उन्हें अनेक प्रकार के नशे से छुटकारा दिलाया जाता है। डेरा का १६ राज्यों में ४५ शाखाओं के साथ ४५० छोटी शाखाओं का एक व्यापक सांगठनिक नेटवर्क है। बड़े पैमाने पर शराब मुक्ति को एक तरफ रख भी दें तो डेरा नाममात्र की लागत पर सामूहिक विवाहों का आयोजन भी करता है और अपने अनुयायियों के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ावा देता है, जो एक दूसरे को संकट में मदद करते हैं और डेरा प्रबंधक की अनेग औद्योगिक परियोजनाओं व अनेक अन्य कार्यों में मुफ्त सेवाएं प्रदान करते हैं।
अकाली भी डेरा के कारण अपना आधार खो रहे हैं यों कि गुरुद्वारा राजनीतिक भूमिपतियों द्वारा नियंत्रित हो रहे हैं और धनी लोग गरीब लोगों को वहां आत्मिक शांति और आराम के लिए आने से रोकते हैं। दूसरी तरफ डेरा प्रमुख अपने अनुयायियों को इस बात तक ले लिए भी निर्देश देते हैं कि चुनाव में किस प्रत्याशी को वोट दें।
डेरा प्रमुख के बढ़ते प्रभाव को कम करने के क्रम में प्रकाश सिंह बादल ने कहा कि डेरा की ओर से माफी से कम कुछ भी पंजाब में शांति नहीं ला सकता।

और शायद पहली बार बादल नियंत्रित सिख धार्मिक नेता, अकाल तख्त ने २२ मई को पंजाब बंद का आह्उाान किया और राज्य के उप-डेरों को बंद करने का अल्टीमेटम दिया।

जबकि, प्रतिक्रिया में सिख उग्रवाद, जो १९७० के सिख-निरंकारी दुश्मनी की तरह उभर रहा है, सिख धार्मिक नेताओं पर दबाव डाल रहा है कि वे डेरों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाएं। दूसरी तरफ डेरा ने दवाब में आकर खेद जताने के बावजूद कड़ा रवैया अपनाया है और उसने डेरों को बंद करने की मांग ठुकरा दी है। पंजाब में इस तरह की उत्तेजना का बढ़ना राज्य सरकार में अकालियों की सहयोगी भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। और भाजपा ने खुद को अकालियों की डेरा सच्चा सौदा को सबक सिखाने के फैसले से अलग कर लिया है।

भाजपा और अकालियों की अपनी राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से हालत काबू में आ सकते हैं, लेकिन पंजाब इसी तरह उबलता रह सकता है क्योंकि अतिवादी सिख अकाली दल बादल से अपने झगड़े सलटाने के लिए निकल आये हैं, जिन पर (अकालियों पर) भाजपा से गंठबंधन बना कर सिखों की अलग पहचान को मिटाने का आरोप है।

पंजाबी कथाकार जसपाल सिंह सिद्धू समाचार ऐजेंसी यूएनआई के वरिष्ठ संवाददाता हैं।

कंवल भारती

ब्राह्मण -जाल में माया

निस्‍संदेह , उत्तर प्रदेश में मायावती की जीत ने राजनीति के विश्लेषकों को आश्चर्य में डाल दिया है। उत्तर प्रदेश में सोलह साल बाद किसी पार्टी का बहुमत में आना, और वह भी एक दलित नेतृत्व की पार्टी का, सचमुच एक महत्वपूर्ण घटना है। इससे हम समझ सकते हैं कि लोकतंत्र में चीजें बदलती हैं और वर्चस्ववाद अन्तत: टूटता ही है। दलित कवि मलखान सिंह के शब्दों को उधार लेकर कहूं तो अन्धड़ भरे दिनों से जूझते हुए मौसम को जूता दिखा लोगों ने चीख कर कहा था कि धरती बदलती है, बदलते हैं आकाश, हवाओं के रूख, चिड़ियों के पंख। मायावती को गांव की कीच भरी गलियों में मौसम के खिलाफ उठती हुई आवाजें साफ सुनायी दे रही थीं। पर, ये आवाजें बदलाव की थीं-व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन की। इन आवाजों ने मायावती को सत्ता तो सौंप दी-एक इतिहास रच दिया। पर, सवाल यह है कि क्या यह सत्ता मौसम को भी बदलेगी या मौसम के साथ चलेगी?
यही वह मुख्य प्रश्न और प्रस्थान बिन्दु है, जहां से मायावती की राजनीति (दलित राजनीति नहीं) पर विचार किये जाने की जरूरत है। लेकिन, पहले हम यह देख लें कि राजनैतिक, विश्लेषकों ने इस घटना पर क्या टिप्पणी की है? टिप्पणियां बहुत सी हैं और आपस में भिन्नता लिये हुए हैं। किसी ने इसे राजनैतिक क्रांति का नाम दिया है और किसी का मत है कि उत्तर प्रदेश का तमिलनाडूकरण हो गया है। ऐसे चिन्तक भी हैं , जो इस घटना को दलित राजनीति के ब्राह्मणीकरण की दृष्टि से देख रहे हैं और कुछ इस विचार के हैं कि यह सत्ता के लिए गठजोड़ है और यह कोई क्रांति-व्रांति नहीं है।


इन टिप्पणियों में एक बात समान रूप से कही जा रही है कि इस जीत का कारण ब्राह्मणों के वोट हैं, जो इस बार मायावती की पार्टी को मिले हैं। स्वयं मायावती भी इसका श्रेय ब्राह्मणों को ही दे रही हैं। वे पिछले तीन साल से दलित-ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलन आयोजित कर रही थीं और ब्राह्मणों के भगवान परशुराम के आगे नतमस्तक हो रही थीं। 'जय भीम` के साथ 'जय परशुराम` भी उनके अभिवादन में शामिल हो गया था और यह नारा आम हो गया था कि 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है।` कहा जा रहा है कि यह भाईचारा कामयाब हुआ और बसपा की जीत ब्राह्मण मतदाताओं के कारण हुई? इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता और जो ऐसा सोच रहा है, वह बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकर है। यदि जातिवाद वोटों की बात करें, तो इस चुनाव में बसपा को ब्राह्मण वोट सिर्फ १० प्रतिशत मिले हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी को ४८ प्रतिशत ब्राह्मण वोट प्राप्त हुए हैं। इस दृष्टि से उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण आज भी भाजपा के साथ हैं। सिर्फ १० प्रतिशत वोटों के आधार पर यह कैसे माना जा सकता है कि बसपा को ब्राह्मण वोटों ने बहुमत दिलाया है? यह १० प्रतिशत ब्राह्मण वोट भी बसपा को इसलिये मिला, क्योंकि वह ब्राह्मण-प्रत्याशियों का अपना खुद का समर्थक वोट था। दरअसल, ब्राह्मण प्रत्याशियों की जीत दलित वोटों के बल पर हुई है, जो मायावती के नाम पर अखण्ड रूप में पड़ता है, भले ही प्रत्याशी कोई भी हो। मायावती भली भांति जानती हैं कि उत्तर प्रदेश में दलित उनके साथ समर्पित भाव से जुड़ा है, उनमें अंधी श्रद्धा रखता है और किसी भी स्थिति में उनके खिलाफ नहीं जाता है। यही दलित जन मायावती की सबसे बड़ी राजनैतिक शक्ति हैं और इसी शक्ति के बल पर वे ब्राह्मणों और अन्य वर्गों के साथ सौदेबाजी करती हैं । अर्थात् वे अपनी दलित शक्ति की पूरी कीमत वसूलती हैं।


लेकिन चुनाव-परिणामों के बाद मायावती ने अपनी इसी दलित शक्ति का यह कह कर अपमान किया है कि उन्हें ब्राह्मणों ने बहुमत दिलाया है और अब वे 'बहुजन` की नहीं, 'सर्वजन` की बात करेंगी। इस के बाद दलित उनके एजेण्डे से रातों-रात गायब हो गया। एक अंग्रजी पत्रिका (फ्रन्टलाईन १ जून, २००७) में उनका साक्षात्कार छपा है। प्रश्नकर्त्ता पत्रकार वेंकटेश रामाकृष्णन के यह पूछने पर कि कांशीराम अपने समय में कृषि, व्यापार और उद्योग, राजनीति और सरकार-इन चार क्षेत्रों में दलित समाज या बहुजन समाज के विकास की बात करते थे, तो प्रश्न पूरा हुए बिना ही मायावती ने यह जवाब दिया- 'अब हम बहुजन समज का एजेन्डा लागू नहीं कर रहे हैं। अब हमारा मुख्य ध्यान सर्वसमाज के कल्याण पर होगा।` इससे सहज ही समझा जा सकता है कि दलित समाज को मायावती कोई श्रेय देना नहीं चाहती हैं। मायावती ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद ही सर्वजन के अपने एजेन्डे को लागू भी कर दिया। उन्होंने लखनऊ में जनपदों के आला अफसरों की बैठक में साफ-साफ दो बातें कहीं। एक यह कि दलित एक्ट का दुरूपयोग न किया जाय, और दूसरी यह कि थानों में ७० प्रतिशत थानेदार सवर्ण और ३० प्रतिशत अवर्ण हों। ये दोनों निर्देश सर्वजन, खास तौर से ब्राह्मणों को ही ध्यान में रखकर दिये गये थे। 'दलित एक्ट का कड़ाई से पालन किया जाय`, यह कहने के बजाय उन्होंने आला अफसरों को यह संकेत दिया कि उसका पालन न किया जाय। इसी तरह पुलिस थानों में भी दलितों की भागीदारी कम कर दी गयी। यानी, यदि किसी थाने में १० थानेदारों का स्टाफ स्वीकृत है, तो वहां दलित थानेदार ३ और सवर्ण ७ रखने के आदेश दिये गये हैं। यह परिवर्तन नहीं है, बल्कि यथास्थिति बनाये रखने की नीति है, जो हमेशा दलित के विरूद्ध और सवर्ण के हित में होती है। दूसरे शब्दों में, मायावती का एजेन्डा अब मौसम के साथ चलने का है, मौसम बदलने का नहीं है।
जो चिन्तक बसपा के उभार को राजनैतिक क्रांति कह रहे हैं, उनका विश्लेषण सिर्फ यहीं तक सीमित है कि भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों को पछाड़ कर बसपा को पूर्ण बहुमत मिलना एक क्रांतिकारी घटना है। उनका यहां तक मानना है कि प्रदेश की जनता ने भाजपा के हिन्दुत्व और कांग्रेस के धर्मनिरपेक्षतावाद को नकार दिया है। इसमें कुछ चिन्तक यह भी जोड़ रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की जनता धर्म और जाति से ऊपर उठ गयी है, जिसने दलित नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है।


यदि क्रांति का अर्थ, व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन है, तो यह क्रांति नहीं है। क्योंकि, इससे कोई व्यवस्था बदलने नहीं जा रही है-न जाति प्रथा, न पूंजीवाद और न शोषण पर आधारित आर्थिक उदारवाद; कुछ भी बदलने नहीं जा रहा है। यह सोच भी गलत है कि उत्तर प्रदेश की जनता ने धर्म और जाति से ऊपर उठकर दलित नेतृत्व को स्वीकार किया है। वस्तुस्थिति यह है कि धर्म और जाति के हित में ही प्रदेश की जनता ने मायावती को समर्थन दिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती और उनके ब्राह्मण महासचिव सतीशचन्द्र मिश्रा पिछले तीन वर्षों से ब्राह्मण सम्मेलनों में ब्राह्मणों को यही पाठ पढ़ा रहे थे कि ब्राह्मणों का हित बसपा में ही सुरक्षित है, भाजपा में नहीं, जिसके नेताओं के मुलायम सिंह यादव से अन्दर खाने सम्बन्ध हंै। अन्य पिछड़ी जातियों के लोग भी अपने जातीय विकास का उद्देश्य लेकर ही बसपा से जुड़े हैं और दलित मायावती में अपना जातीय स्वाभिमान देखते ही हैं। यदि धर्म और जाति के मोह नहीं होते, तो कोई बताये कि बसपा ने अलग-अलग जातियों के सम्मेलन क्यों आयोजित किये थे? दरअसल, ब्राह्मणों ने दलित-नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया, बल्कि ब्राह्मण नेताओं ने, बसपा में शामिल होकर सत्ता की मलाई खाने का जुगाड़ किया है। वे जानते थे कि समाजवादी पार्टी का राज आने वाला नहीं है और भाजपा सत्ता में आ नहीं सकती- कांग्रेस का तो सवाल ही नहीं, क्योंकि वह सत्ता की दौड़ में ही नहीं थी। ऐसे में, एक बसपा ही थी, जो ब्राह्मण शासक वर्ग को सत्ता में ला सकती थी, क्योंकि उसके साथ दलितों का ठोस वोट जुड़ा था, जो उसे बसपा में जाने पर आसानी से मिल सकता था। इसलिये यह पूर्ण स्वार्थ का मामला है- न ब्राह्मणों को बसपा की जरूरत थी और बसपा को ब्राह्मणों की जरूरत थी।


कुछ विचारकों ने मत व्यक्त किया है कि उत्तर प्रदेश का तमिलनाडूकरण हो गया है। अर्थात्, जिस तरह, तमिलनाडू में दलित-पिछड़ी जातियां एक बड़ी राजनैतिक शक्ति हैं, उसी प्रकार उत्तर प्रदेश में भी दलित-पिछड़ों का उभार एक बड़ी शक्ति बन गया है। इस मत में सच्चाई है। उत्तर प्रदेश में अब ब्राह्मण नेतृत्व के दिन समाप्त हो गये हैं और शायद ही लौट कर आयें। कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, राजद, आदि किसी भी पार्टी में अब ब्राह्मण नेतृत्व प्रभावी नहीं है। भाजपा ने पिछड़ी जाति के कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा के तहत चुनाव लड़ा था। सपा यादव आधारित पार्टी मानी ही जाती है। यहां यह आकलन करना गलत होगा कि यह दलित-पिछड़ा या गैर ब्राह्मणवाद का उभार इसी एक-दो वर्ष की घटना है। इसका उभार अस्सी के दशक में ही शुरू हो गया था, जब कांशीराम ने बामसेफ (दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों का संघ) और डी.एस.फोर (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) बनाकर दलित-पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यक समुदाय के दलितों में सामाजिक चेतना पैदा करने का काम किया था। पिछड़ी जातियों के लिये मण्डल आयोग की सिफारिशों के आधार पर २७ प्रतिशत आरक्षण की लड़ाई भी कांशीराम ने लड़ी थी। इसके लिये उन्होंने व्यापक आन्दोलन चलाया था। इसी राजनैतिक दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने (१९९०) मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं। ठीक इसी समय भाजपा और हिन्दू संगठनों ने मन्दिर आन्दोलन खड़ा कर दिया और हिन्दुत्व का उन्माद भड़का कर पिछड़ी जातियों के आरक्षण के खिलाफ छात्रों को उत्तेजित कर दिया। परिणामत: पूरे देश में दलित-सवर्ण-संघर्ष शुरू हो गया। तोड़फोड़ और आगजनी के साथ-साथ अनेक छात्र-छात्राओं ने आरक्षण के विरोध में आत्मदाह के प्रयास किये। उत्तर प्रदेश में दलित-पिछड़ी जातियों के लोग मण्डल के पक्ष में लामबन्द हो गये थे-और इसी के गर्भ से पिछड़ी जातियों की राजनैतिक शक्ति पैदा हुई।


इस राजनैतिक शक्ति को सत्ता का माध्यम बनाने के लिये कांशीराम और मुलायम सिंह यादव एक मंच पर आ गये और दोनों ने मिल कर १९९३ के विधान सभायी चुनावों में पूर्ण बहुमत से शानदार जीत हासिल की। दुर्भाग्य से यह गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चला। दोनों शीघ्र ही अलग-अलग हो गये और अनेक प्रमुख पिछड़ी जातियां भले ही अलग हो गयीं, पर उनकी राजनैतिक शक्ति बनी रही और उत्तर प्रदेश के सपा और बसपा की दो ध्रुवीय राजनीति का आधार भी यही शक्ति बन गयी। इसलिये, उत्तर प्रदेश अस्सी के दशक से ही तमिलनाडू के रास्ते पर चल पड़ा था और जो सफलता मायावती को वर्ष २००७ में प्राप्त हुई है, वह १९९३ में ही सपा-बसपा गठबन्धन को प्राप्त हो चुकी थी। ब्राह्मणवाद की प्रतिक्रांति उसके वर्चस्ववाद को भी खत्म कर रही थी। अब उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को दलित-पिछड़े-नेतृत्व को ही स्वीकार करने के लिये विवश होना पड़ेगा, क्योंकि अब शायद ही उनका राजनैतिक वर्चस्ववाद पुनर्जीवित हो। लेकिन, इसमें संदेह नहीं कि समाजवादी दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश की राजनीति जातिवादी होने के कारण चिन्ताजनक है। पर, इस बिन्दु पर वाम शक्तियों का कार्य भी प्रदेश में घोर निराशा पैदा करता है।


अब कुछ चर्चा मायावती के सर्वजन एजेन्डे पर जिसे उन्होंने प्राथमिकता से लागू करने की घोषणा की है। यहां यह उल्लेखनीय है कि जिस सर्वजन के कल्याण की मायावती बात कर रही है, उनका सिर्फ १० प्रतिशत वोट उनकी पार्टी को मिला है, दलित का २३ प्रतिशत, पिछड़ी जातियों का ५० प्रतिशत और मुस्लिम (दलित मुस्लिम) का १७ प्रतिशत वोट मायावती की पार्टी को मिला है, यह सब मिला कर ९० प्रतिशत होता है ऐसी स्थिति में ९० प्रतिशत जनता को छोड़ कर १० प्रतिशत सवर्णों के कल्याण में ही यदि मायावती को रूचि रहेगी, तो उनके लिये उस समय बहुत ही कठिन स्थिति पैदा हो जायगी, जब दलित वर्गों का पिछड़ापन सवर्णों के आर्थिक आधार से टकरायेगा। दलित वर्गों और सवर्ण जातियों की सामाजिक और आर्थिक स्थितियों में भारी अन्तर है-दोनों के बीच गहरी खाईयां हैं। आंकड़े बताते हैं कि सवर्णों में ६५ प्रतिशत भू-स्वामी हैं, जबकि दलितों में ८ प्रतिशत के पास ही जमीन है। दलित वर्ग में ५५ प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्रों में मजदूर है, ३२ प्रतिशत कृषि मजदूर हैं ३३ प्रतिशत अशिक्षित हैं और १२ प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जिन्होंने दसवीं तक ही शिक्षा हासिल की है। इसके विपरीत, सवर्णों में सिर्फ १० प्रतिशत अशिक्षित हैं और दसवीं तक शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग ५० प्रतिशत हैं । स्पष्ट है कि असमानता की यह स्थिति बेहद गंभीर है और इसे सर्वजन के एजेन्डे से दूर नहीं किया जा सकता। यदि इस ऐजेन्डे में सवर्ण प्राथमिकता में रहेंगे, तो यह खाई और बढ़ सकती है।


एक पत्रिका ने लिखा है कि 'ब्राह्मणों ने विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि के योग्य नहीं समझा और शिवाजी का राजतिलक नहीं होने दिया था। पर, आज हमने देखा कि हजारों ब्राह्मणों की मौजूदगी में एक दलित, और वह भी एक का राजतिलक किया गया।` लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्राह्मणों ने अपनी धर्म-व्यवस्था से विद्रोह कर दिया है। दरअसल, यह भारत के लोकतंत्र की देन है कि राजा-महाराजा खत्म हो गये और जनता अपनी सरकार स्वयं बनाती है। यह लोकतंत्र की व्यवस्था है कि एक दलित का राजतिलक हुआ, पर धर्म की व्यवस्था में अभी भी निर्णय ब्राह्मणों का चलता है-वरना क्या गुरू वायूर के श्रीकृष्ण मन्दिर में प्रसिद्ध गायक यसुदास के प्रवेश पर रोक लगती?



( जून,2007 अंक में )

रवीन्‍द्र स्‍वप्‍निल प्रजापति






जनता में बदलता देश




मेरा देश ४७ में जनता की तरह पैदा हुआ था
जिसे मैं प्यार नहीं करता था
दया दिखाता था या फिर गोली मार देता था
मैं इतना गतिशील था उस समय
कि हर चेहरा मेरा ही चेहरा हो जाता था


जब भी कुछ बदलने की कोशिश करता-तब
मैं गांधी हो जाता और देश हरिजन
मैं नेहरु हो जाता और देश जनता
पिछले पचास साल से मैं राजनीति होता रहा
और देश पब्लिक
समाज सेवक होता तो देश एनजीओ
लेखक बना तो देश प्रेमचन्द का होरी और गोबर
मेरे कवि के लिए देश-विमर्श और सरोकार बनता रहा


पिछले पचास सालों से सब मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हैं
वे नारे लगाते हुए मेरे पास से निकल जाते हैं
ठीक मेरी बालकनी के नीचे से
या कभी-कभी पांच फुट चौड़ी गली में
एक सिपाही को खड़ा करके निकल जाते हैं


उनके दूर निकल जाने के बाद
जब सायरनों की आवाजें गुम हो जाती हैं
मैं देखता हूं सन्नाटे को चीरता हुआ
कहीं यह मैं ही तो नहीं था-अन्दर महीन तार सा कांपता है
मेरा ही कोई रूप भगम-भाग में छिटका हुआ


मैं एक नागरिक की हैसियत से भी नहीं कहता
मुझे अपने देश से प्यार है
और मैं नहीं कहता पूंजीपतियों को गोली मार दूंगा
मैं नहीं कहता कि वामपंथियों की दलाली
और दोहरी मानसिकता का भंडाफोड़ कर दूंगा
आज मेरे दावे ओजोन में छेदों की तरह खतरनाक हो गए हैं
आने वाले समय में मेरे लिये देश भक्त होना
दकियानूस होने का दूसरा नाम भी हो सकता है
क्योंकि मैंने आधी सदी अपने गांव की सड़कों के गड्डे
ठीक करने में निकाल दी
और इस दौरान देश
दुनिया के लिए बाजार में बदल गया
जहां मैं अपनी ही चीजों को देश की जगह मार्केट का हिस्सा समझने लगा


मुझे नहीं मालूम था कि ऐसी कल्पना करनी होगी
कि देश से साबुन की तरह
एक ही रेस्टहाउस में
समाजवादी भी नहायेगा और पूंजीवादी भी


मैं कहना चाहता हूं देश का कुछ भी बेचो
खरीदो और किसी से भी व्यापार करो
जब पेड़ पौधों जंगलों पर्वतों में संपदा को अनुमान की आंखों में भरो
तब जंगल के पास और पहाड़ की तलहटी में जो छोटा शहर है
उसे सिर्फ जनता मत समझना
वहां देश के लोग रहते हैं
मेरे देश के लोग जिसे मैं प्यार नहीं करता।

नागार्जुन

इस महीने (ज्येष्ठ पूर्णिमा) बाबा नागार्जुन का जन्म दिन है।
''...वह १० जुलाई, १९९७ की शाम थी। शहर दरभंगा। खाजासराय वाले मकान (पंडासराय और रायसाहब पोखर के बाद इसी मोहल्ले में बाबा के बड़े बेटे शोभाकांत जी ने किराये पर घर लिया था) में बाबा बरामदे में बैठे थे। गया, तो दो-चार बातें हुइंर्। रुक-रुक कर बात करते थे उन दिनों बातों का सिरा भी बीच-बीच से गायब हो जाता था। लेकिन दिमाग की बेचैनी इन टूटे हुए सिरों से भी अर्थपूर्ण ढंग से निकलती थी। आखिरी दिनों में शायद ज्यादा आत्मविश्वास आ जाता है। उस दिन उन्होंने कहा कि एक कविता आयी है, लिखो। कागज़ और कलम सामने ही था। जिस लय में बाबा ने इसे लिखवाया, वह लय मैं अपनी जिंदगी में अब भी ढूंढ़ता हूं। बाबा की इस कविता में (मुझे लगता है) दृश्य जैसे उनके मन में आये होंगे, उन्होंने वैसे ही उसे कागज पर उतारने का मन बनाया होगा। बीमारी और जिन्दगी के वे आखिरी दिन बाबा के ...और उन आखिरी दिनों में मन में आने वाले चित्रों-छायाओं को शब्द देने के उनके उल्लास का मैं चश्मदीद ..एतद् द्वारा ऐलान करता हूं कि यह कविता हिंदी के जन कवि नागार्जुन की आखिरी कविता है।``
-अविनाश, (बाबा नागार्जुन के स्नेहपात्र रहे कवि अविनाश इन दिनों एनडीटीवी इंडिया में कार्यरत हैं


मायावती मायावती गुरु गुन मायावती

मायावती-मायावती
दलितेंद्र की छायावती
मायावती-मायावती
जय-जय हे दलितेंद्र
प्रभु, आपकी चाल-ढाल से
दहशत में हैं केंद्र
जय-जय हे दलितेंद्र

जय-जय हे दलितेंद्र
आपसे दहशत खाये केंद्र
अगल-बगल हैं पंडित सुखराम
जिनक मुख में राम
सोने की इंर्टों पर बैठे हैं नरसिंह राव
राजा होंगे आगे चल कर
उनके पुत्र प्रभाकर राव

मायावती-मायावती
दलितेंद्र की शिष्या
छायावती-छायावती

दलितेंद्र कांशीराम
भाषण देते धुरझार
सब रहते हैं दंग
बज रहे दलितों के मृदंग
जय-जय हे दलितेंद्र
आपसे दहशत खाता केंद्र
मायावती/आपकी शिष्या
करे चढ़ाई
बाबा विश्वनाथ पर
प्रभो, आपसे शंकित है केंद्र
जय जय हे दलितेंद्र

मायावती-मायावती
गुरु गुन मायावती
मायावती-मायावती
गुरु गुन मायावती
मायावती-मायावती ॥



( जून,2007 अंक में प्रकाशित )

रेयाज-उल-हक


प्रवास और अर्थव्यवस्था का संकट




सा
की शुरुआत बिहारियों पर हमलों से हुई, जब असम में ४९ बिहारी मजदूर और छोटे व्यवसायी मार दिये गये। मगर सिर्फ असम में ही नहीं, दूसरे राज्यों में भी बिहारियों पर हमले होते रहे हैं। बहुत दिन नहीं हुए जब राज ठाकरे के समर्थकों ने महाराष्ट्र में बिहारी दुकानदारों पर हमले किये। इसके अलावा कई अन्य राज्यों में बिहार से गये मजदूरों, परीक्षार्थियों पर लगातार हमले हो रहे हैं या उन्हें धमकियां मिल रही हैं।

बिहारियों पर हमले का मामला प्रवासी मजदूरों से जुड़ा हुआ है और मजदूरों के प्रवास का मामला अर्थिक प्रक्रिया और वर्तमान आर्थिक प्रगति से। जिस तरह देश की अर्थव्यवस्था में रोजगारविहीन विकास हो रहा है उससे संकट और बढ़ेगा। जिस गति से बेराजगारों की संख्या बढ़ रही है उस गति से रोजगार नहीं पैदा हो रहे हैं, उल्टे सरकारों द्वारा अपनायी जा रही नीतियों से रोजगार खत्म हो रहे हैं। कहना न होगा कि यह वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किये गये आर्थिक उदारीकरण का नतीजा है। तथाकथित उदारीकण के शुरूआती दौर में (१९९३-९४) बेरोजगारी ६ प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी। १९९९-२००० में यह दर बढ़ कर ७.३ प्रतिशत हो गयी। इसने दो करोड़ ७० लाख अतिरिक्त बेरोजगार पैदा किए। इससे भी बदतर बात यह है कि इनमें से ७४ प्रतिशत लोग गांवों में रहते हैं और उनमें से ६० प्रतिशत लोग शिक्षित हैं।

जहां तक बिहार की बात है, यहां सभी क्षेत्रों में विकास की हालत काफी बदतर है। नये रोजगार का सृजन नहीं हो रहा है। हाल ही में राज्य के बारे में प्रस्तुत एक सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक बिहार में लगभग चार करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। सरकार ने अपनी सर्वेक्षण रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि उडीस़ा को छोड़ दिया जाये तो देश में सर्वाधिक बुरी हालत बिहार की है। यहां प्रति व्यक्ति आय में काफी अंतर है। राजधानी पटना में प्रति व्यक्ति आय ६,९५८ है तो शिवहर में यह मात्र २,२१९ रु है। बिहार में लगभग ९० प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्राथमिक पोषक के बतौर कृषि आज भी लोगों का मुख्य आधार बनी हुई है। लेकिन इसकी उत्पादकता कम है। बिहार में कृषि मानसून पर बुरी तरह निर्भर है। हालांकि सकल कृषि क्षेत्र का ५७ प्रतिशत भाग सिंचित है। लेकिन यहां की सिंचाई खुद भी मानसून के सतही जल पर ही निर्भर है। राज्य के कुछ भौगौलिक क्षेत्रफल का ७३.०६ भाग बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र है जो पूरे देश के बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र का १७.२ प्रतिशत है। इसके अलावा यहां की औद्योगिक इकाईयों में से ३५ बीआइएफ आर द्वारा बीमार घोषित कर दी गयी हैं। बिहार में उद्योगों के इस तरह बंद होने का सबसे बड़ा कारण अधिसंरचनात्मक सुविधाओं की अपर्याप्तता है। कार्यशील पूंजी की कमी, कच्चे मालों की अनुपलब्धता, सड़कों तथा संचार सुविधाओं का अभाव, ऊर्जा की विपन्न व अनिश्चित स्थिति तथा अनुसंधानों का कमजोर सहयोग ही वे कारक हैं, जिनके कारण बिहार की औद्योगिक स्थिति इतनी बुरी अवस्था में पहुंच गयी। इसका सीधा असर राज्य के रोजगार की संभावनाओं पर पड़ा है।


मगर समस्या केवल बिहार तक ही सीमित नहीं है। देश भर में लगभग सभी बड़े उत्पादक क्षेत्रों में रोजगार के लचीलेपन (इंप्लायमेंट इलास्टिसिटी) में भारी कमी आयी है। कृषि में तो यह शून्य तक पहुंच गयी है। इससे एक तरफ तो देश की अर्थव्यवस्था अबाध गति से वृद्धि कर रही है मगर दूसरी ओर जनता की परेशानियों में भी इजाफा हो रहा है। रोजगार खत्म हो रहे हैं, मंहगाई बढ़ रही है। बाजार में स्पर्धा के नाम पर रही-सही नौकरियां भी खत्म की जा रही हैं। यह ऐसा विकास है जो जनता के लिए न होकर अर्थशाय़ों और पूंजीपतियों के लिए है।


देश के विभिन्न राज्यों के बीच मौजूद असमान विकास या क्षेत्रीय असंतुलन के साथ मिल कर बढ़ती हुई बेरोजगारी बड़े पैमाने पर मजदूरों के प्रवास को बढ़ावा देती है। यह पलायन या प्रवास तब होता है जब पैतृक स्थान पर व्यक्ति या समाज की आवश्यक जरूरतें पूरी न हो रही हों । भारत में राज्यों के बीच इतना असंतुलित विकास हुआ है कि सबसे विकसित और सबसे गरीब राज्य के बीच की खाई को पाटना अब दुरूह प्रतीत होने लगा है।
हमारे देश में कृषि अब भी वर्षा पर आधारित है और इसमें काफी निम्न वृद्धि दर के कारण लगातार रोजगार का क्षय हुआ है। देश भर में बेराजगारी में वृद्धि का एक बड़ा कारण यह भी है। भारत की अर्थव्यवस्था को देखें तो राज्यों के बीच में मजदूरों का प्रवास इसकी बड़ी विशेषता है। यह प्रवास सबसे गरीब और सबसे अविकसित राज्य से होता है। एक अध्ययन के मुताबिक बिहार की एक चौथाई आबादी प्रवास कर गयी है।


ऐसा नहीं है कि पहले बिहार से प्रवास नहीं होता था। मगर तब लोगों के लिए अस्तित्व का संघर्ष इतना तीव्र न था, रोजगार का इतना गहरा संकट न था। तब कलकत्ता या दिल्ली जाने का मतलब यह नहीं होता था कि प्रवासी वहां के लोगों का रोजगार छीन रहे हैं। मगर उदारीकरण के बाद से प्रवास करने का मतलब यह होने लगा है। हाल के वर्षों में बिहारी मजदूर भारी संख्या में विभिन्न राज्यों में गये हैं। लगातार दूसरी तरफ उन राज्यों में भी आम मजदूरों और बेराजगारों के लिए संकट बढ़ा है। प्रवासी बिहारियों के वहां होने का सीधा मतलब यह होता है कि वे उन राज्यों के स्थाई निवासियों के लिए रोजगारों के मौके को कम कर देते हैं। बिहार से गये मजदूर काफी कम मजदूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं, जिसका अर्थ यह होता है कि वे स्थानीय मजदूरों की बारगेनिंग क्षमता घटा देते हैं।

बिहार से दो तरह के मजदूरों का पलायन होता है। एक तो वे लोग प्रवास करते हैं जो हाई स्क्ल्डि होते हैं। ये अधिक वेतनमान श्रेणी में आते हैं। इनका रहन-सहन का स्तर भी ऊंचा होता है। मगर इनके प्रवास से अंतर्विरोध कम पैदा होता है क्योंकि इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत मांग कम है। दूसरे तरह के मजदूरों में वे होते हैं जो कम वेतनमान के लिए प्रवास करते हैं । इसमें कम कार्यकुशलता की जरूरत होती है, इसलिए इनकी संख्या ज्यादा होती है इसलिए इस क्षेत्र मे अंतर्विरोध भी अधिक है।

इसके अलावा प्रवासी मजदूरों पर बढ़ते हमलों का एक कारण है हरेक स्तर पर आर्थिक संकट का बढ़ना। जब आर्थिक संकट बढ़ता है तो वह राजनीतिक संकट को भी बढ़ाता है और राजनीतिज्ञ इन संकटों का समाधान बड़े सतही ढंग से करते हैं-वे लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं। वे उनकी सहानुभूति हासिल करने के लिए सारा दोष प्रवासी मजदूरों पर मढ़ देते हैं। इसके बाद वहां से बिहारियों को भगाने का एक जनमत तैयार होने लगता है। यह खतरनाक प्रवृति है, क्योंकि यह बिहारियों के संकट को और बढ़ा देती है।

तो ऐसे में इसका हल क्या हो सकता है? इसके लिए कई स्तरों पर एक साथ काम करना होगा। पहला यह कि सरकार स्थानीय तौर पर रोजगार देने की पूरी जिम्मेदारी ले। दूसरे यह कि दूसरे राज्यों के स्थानीय लोगों को समझाया जाये कि वे मिल कर काम करें। फिर बिहारी मजदूरों को यह कहा जाये कि वे कम दरों पर काम करने के लिए राजी न हों, और फिर वे अपने राज्य में ही संगठित होकर काम के लिए राज्य सरकार पर दबाव डालें, संघर्ष करें।

देश जिस दिशा में ले जाया जा रहा है, उसमें इसकी संभावना कम दिखती है कि सरकारें अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी लेंगी। वे समस्याओं के समाधान में नहीं, तात्कालिक राहतों में भरोसा रखती हैं। यह बिहारियों के लिए कहीं से भी राहत दिलानेवाली बात नहीं है।


जन विकल्‍प के जून ,2007 अंक में प्रकाशित