July 14, 2007

अनीश अंकुर



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


बोरिस येल्‍तसिन के बहाने



शायद कम ही लोगों को पता होगा कि बोरिस येल्ससिन की मृत्यु हो गयी। रूस के इस विवादस्पद पूर्व राष्ट्रपति का चुपचाप बगैर किसी हंगामे के चले जाने से कईयों को आश्चर्य हुआ होगा। रूस के वर्तमान राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन के पहले एक दशक तक येल्ससिन रूस एवं सोवियत यूनियन की केन्द्रीय शख्सीयत थे। सोवियत यूनियन एवं समाजवाद के ध्वंस में प्रधान भूमिका की वजह से वे साम्राज्यवादी पश्चिमी मीडिया के प्रिय थे। कम्युनिज्म़ को ध्वस्त कर पूंजीवाद को एक तथाकथित लोकतंत्र के रास्ते पर ले जाने के लिए येल्तसिन को गोर्बाचेव के साथ ऐतिहासिक व्यक्ति बताया गया था। पर साम्राज्यवादी मुल्कों द्वारा ऐतिहासिक पुरुष बताए जाने वाले बोरिस येल्तसिन की शोकसभा में मात्र १०० के लगभग लोग इकट्ठे हुए। इन लोगों में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्जबुश (सीनियर) बिल क्लिंटन, सोवियत यूनियन के अंतिम राष्ट्रपति मिसाइल गोर्बाचेव, चंद दिनों पूर्व ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का पद छोड़ने वाले टोनीब्लेयर ने भी शामिल थे।

पिछली सदी के अंतिम दशक में सोवियत यूनियन से साम्यवाद के नाश एवं लोकतंत्र की स्थापना के लिए जिसे लगभग महानायक का दर्जा देने की कोशिश की गयी, उसकी शोकसभा में इतने ताकतवर रहे लोगों की मौजूदगी के बावजूद इतने कम लोग शोक प्रकट करने आयेंगे, इसका अंदाजा तो येल्तसिन के दुश्मनों तक को न होगा।
आइए, बोरिस येल्ससिन के व्यक्तित्व के बहाने थोड़ी पड़ताल विस्मृत होते जा रहे सोवियत यूनियन की कर लें। सोवियत यूनियन से समाजवाद का ध्वंस मात्र येल्तसिन एवं गोर्बाचेव की वजह से नहीं हुआ। स्टालिन की मृत्यु के पश्चात् साठ के दशक से ही सोवियत रूस में ऐसी प्रवृत्तियों का उदय हो गया था जिनमें राजनैतिक व्यवस्था के सुधार, जनवादीकरण, अर्थव्यवस्था (उद्योग, कृषि, शिक्षा, नौकरशाही) आदि में समाजवादी पुननिर्माण (चर्चित नाम पेरेस्‍त्रोइका ) की बातें शामिल थीं। सोवियत सरकार एवं कम्युनिस्ट पार्टी ने इन समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान न दिया।

पार्टी एवं जनता को विचारधारात्मक रूप से सजग बनाने की प्रक्रिया सचेत रूप से खत्म कर दी गयी थी। लोगों के भीतर असंतोष पलता जा रहा था। इन असंतोषों का हल ढूंढने के बजाए दमन शुरू हो गया। ऐसे में बीमार व अक्षम लियोनिद बे्रझनेव को आगे कर दिया गया। १९८२ में बे्रझनेव की मृत्यु के बाद यूरी आंद्रोपोव लाए गए। उन्होंने नौकरशाही व भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाए। आंद्रोपोव की बीमारी एवं १४ महीनों बाद उनकी मृत्यु के पश्चात् चेरेनेन्को आए जिनकी एक वर्ष बाद ही मृत्यु हो गयी। अंतत: मिखाइल गोर्वाचेव पार्टी के मुखिया एवं सरकार के प्रधान बनाए गए।

लंबे वक्त से जड़ जमाए गहरी समस्याओं के समाधान हेतु गोर्वाचेव ग्लासनोस्त (सुलेवन) ले आए। इसके पूर्व सोवियत यूनियन की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर की बहुत सारी दिक्कतों, परेशानियों के बारे में खुले विचार विमर्श नहीं किया गया था। ग्लासनोस्त का मतलब था खुली व लगभग अनियंत्रित सी आलोचना। ग्लासनोस्त आने के बाद पार्टी एवं सरकार में एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए। इन नई परिस्थितियों का फायदा उठा कर ऐसी ताकतें सक्रिय हो उठीं जिसने सोवियत यूनियन के पूरे इतिहास के साथ-साथ समाजवाद को भी कलंकित करना शुरू कर दिया।

कम्युनिस्ट पार्टी के मास्को ईकाई के रसूख वाले सचिव बोरिस येल्तसिन ने खुद ही निरंकुश कदम उठाने शुरू कर दिए। पार्टी भीतर ही भीतर बिखरने लगी, जिसकी अभिव्यक्ति आमलोगों से पार्टी के अलगाव के रूप में दिखने भी लगी। एक ओर नौकरशाही के विरुद्ध सुलगता असंतोष और लंबी प्रक्रिया के दौरान राजनैतिक चेतना में निरंतर ह्उाास के घटित होते चले जाने का फल हुआ कि लोगों ने येल्तसिन द्वारा उठाए जा रहे कदमों का परिणाम सोचे समझे बिना उसे समर्थन देना शुरू किया।

इसकी राज्य, समाज, अर्थव्यवस्था एवं मीडिया सबमें प्रतिक्रिया हुई। राष्ट्रीयता का प्रश्न जो अब तक दबा था फिर से सिर उठाने लगा। राजनैतिक सामाजिक माहौल में आए ढीलेपन, ग्लासनोस्त आदि का समाजवाद के शत्रुओं ने पूरा फायदा उठाया। बोरिस येल्तसिन इन्हीं परिस्थितियों की उपज थे। सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी ने येल्तसिन के खतरनाक सुधारों वाले उन्माद पर अंकुश लगाने की कोशिश की। अपने विरुद्ध प्रतिक्रिया देख येल्तसिन ने पोलित ब्यूरो की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। तत्पश्चात् उसे मास्को ईकाई के सचिव पद से हटा दिया गया। लेकिन गोर्वाचेव ने येल्तसिन को पुननिर्माण की राष्ट्रीय समिति का डिप्टी चेयरमैन बना दिया। परेस्‍त्रोइका और ग्लासनोस्त के उन्मादी रथ को रोकने की फिर कोई कोशिश न की गयी।

वैसे तो सोवियत नेतृत्व मौलिक रूप से लेनिनवाद के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर करता था, लेनिन के उद्धरणों से लेनिनवादी रास्ते पर मजबूती से जमे रहने की घोषणा की जाती पर व्यवहार में ठीक उल्टा किया जाता। सिद्धांत व्यवहार की खाई चौड़ी होती गयी। सैद्धांतिक विचलन का प्रभाव ये था कि गोर्वाचेव और येल्तसिन दोनों की यह आशा थी कि अमेरिका से रिश्ते सुधरने पर विश्व परिस्थितियां भी सुधर जायेंगी। १९८६ में गोर्वाचेव व रीगन के बीच वार्ता हुई। इसी वर्ष नवंबर क्रांति के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में गोर्वाचेव ने अफसोस के साथ कहा कि अमेरिकी पुस्तकों, फिल्मों तथा 'वायस ऑफ अमेरिका` को तो सोवियत यूनियन में काम करने की आाजादी दी गयी जबकि ऐसी ही छूट सोवियत संघ को अमेरिका में नहीं दी गयी।

इस उथल-पुथल भरे वक्त तमाम कम्युनिस्ट विरोधी, मार्क्सवाद लेनिनवाद विरोधी साम्राज्यवादी एजेंटों ने सोवियत यूनियन के भीतर प्रतिक्रिया की ताकतों के साथ मिलकर सात दशकों के सोवियत रूस की महान सफलता पर कालिख पोतने वाला अभियान शुरू कर दिया। सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के पॉलित ब्यूरो की ओर से इस अभियान को काउंटर करने की कोई कोशिश नहीं की गयी। बाद में पॉलित ब्यूरो के एक वरिष्ठ व प्रतिष्ठित नेता लिगाचेव ने इन काली शक्तियों के खिलाफ पहलकदमी न लेने के लिए सीधे गोर्वाचेव को जिम्मेदार ठहराया। लिगाचेव को पार्टी के मुखपत्र 'प्रावदा` में इन आरोपों का जवाब तक देने से रोका गया। सोवियत रूस में गोर्वाचेव, येल्तसिन एवं माकोलेव को छोड़ सभी बड़े सोवियत नेताओं के खिलाफ सरकारी स्तर पर अभियान चलाया गया। इसी दरम्यान राष्ट्रीयता एवं रेस (नस्ल) के मुद्दों पर दंगा लिसुवानिया एवं लातविया से बाहार भी फैलने लगा। विश्वप्रसिद्ध महाविनाशकारी चेर्नोबिल दुर्घटना ने लोगों का गुस्सा और बढ़ा दिया।

दो कॉशियन गणराज्यों आर्मेनिया एवं अजाबैजान में युद्ध आरंभ हो गया जिसमें हजारों लोग मारे गए। येल्तसिन की सेना के हाथों चेचन्यवासियों को मार डाला गया। रूस के भीतर हमले शुरू हो गए। यूक्रेन में अशांति फैल गयी।
कम्युनिस्ट पार्टी में आंतरिक संघर्ष बढ़ गए थे। पार्टी नेतृत्व में तमाम वैसे लोगों को लाया गया जो ग्लासनोस्त एवं पेरस्‍त्रोइका के प्रति वफादारी जताते थे। इन सबका क्लाइमेक्स जून १९८८ के कॉन्फ्रेंस में घटित हुआ। कान्फ्रेंस में समाजवाद की शानदार सफलताओं को मजबूत करने एवं बिखरती जा रही पार्टी को एकजूट करने संबंधी तनिक भी बातचीत न हुई।

आंतरिक लोकतंत्र से महरूम सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी ने इन भयावह परिणामों वाली गतिविधियों पर आशंका तक प्रकट न की। आम जनता को इन तमाम घटनाओं से परिचित कराने की कोई कोशिश न की गयी। इन सभी गलतियों की चिंता किए बिना गोर्वाचेव ने मजदूर वर्ग की नेतृत्वकारी भूमिका एवं जनवादी केंद्रीयता के सिद्धांतों को ठुकरा दिया। कांफ्रेंस में अचानक येल्तसिन प्रकट हुआ और उसने गोर्वाचेव का खुलेआम समर्थन किया और पार्टी को उच्च नेतृत्व में लिए जाने की बात की। पूरी कांफ्रेंस ने इस कदम का कड़ा प्रतिवाद किया।

पार्टी को अपने अनुकूल सुधारने में निष्फल होने पर गोर्वाचेव ने केन्द्रीय समिति के एक प्लेटफॉर्म का निर्माण किया जिसका लब्बोलुुबाव यह था कि अब पार्टी सरकार पर कोई नियंत्रण स्थापित नहीं करेगी। १९८९ में बोरिस येल्तसिन ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान समाजवाद की निन्दा एवं पूंजीवाद की जमकर प्रशंसा की। येल्तसिन साम्राज्यवादी प्रचार माध्यमों के मुखपृष्ठों पर छाये रहने लगे। सोवियत यूनियन के भीतर गणराज्यों के आपसी संबंध ढीले पड़ने लगे। १९८७ में गोर्वाचेव ने अपनी बर्लिन-प्राग यात्रा में पूर्वी यूरोप के समाजवाद विरोध शक्तियों को प्रोत्साहित किया।

तमाम समाजवादी सिद्धांतों के खिलाफ रहने के बावजूद येल्तसिन सी.पी.एस.यू के भीतर रहा और इसी उलझन भरे अस्तव्यस्त वक्त में रूसी गणराज्य का राष्ट्रपति बनने में सफल हो गया। येल्तसिन ने सत्ता की इस मजबूत स्थिति का सोवियत यूनियन को तोड़ने में इस्तेमाल किया, पूंजीवाद के पक्ष में नारे लगाऐ और तानाशाह की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया।

अमेरिका के राजनैतिक एवं सैन्य प्रमुख येल्तसिन के बेहद नजदीकी सलाहकार हो गए। इन लोगों द्वारा मीडिया में येल्तसिन की खूब तारीफ की जाती। इसी दरम्यान कम्युनिस्ट पार्टी की २८ वीं कांग्रेस में येल्तसिन ने इस बात पर काफी हल्ला मचाया कि रूसी गणराज्य का राष्ट्रपति पार्टी की सुनने के लिए बाध्य नहीं है। अंतत: येल्तसिन ने कांगे्रस से वॉकआउट कर दिया और सोवियत यूनियन को तोड़ने की वकालत करने वाले एक प्रदर्शन में शामिल हो गया।

पार्टी ने जनता को साम्राज्यवादी मंसूबों के खिलाफ समाजवाद के पक्ष में उतारने की इच्छाशक्ति खो दी थी। उसने अपनी वास्तविक दिशा भी खो दी थी। इससे जनता असहाय हो गयी। हालांकि लोगों ने जनमत संग्रह में सोवियत रूस को बरकार रखने के पक्ष में अपना मत दिया। लेकिन लोगों के इस जनादेश पर कोई ध्यान न दिया गया।
इन हंगामों के बीच गोर्वाचेव ने कम्युनिस्ट पार्टी के समाप्त होने की हैरतअंगेज घोषणाा कर दी। बोरिस येल्तसिन रूस का सर्वेसर्वा बन गया। सोवियत यूनियन बिलट गया, साम्राज्यवादी कैंप में अभूतपूर्व अह्लाद था। पूरे रूस को नरक के गड्ढे में धकेल कर येल्तसिन अपने कमान में सब कुछ आगे बढ़ाता चला गया। भ्रष्टाचार और स्कैंडल में येल्तसिन एवं उसके परिवार ने तमाम सीमाएं लांघ डालीं। पूरा देश उसके अवैध आदेशों से चलाया जाने लगा।

लूट, हत्या, हिंसक अपराध वहां की दिनचर्या का हिस्सा बन गया 'लोकतंत्र` की जीत के शोरशराबे में यह सब कुछ दबा दिया गया। संभवत: यही कारण है कि १९९९ में अपनी सत्ता ब्लादीमीर पुतिन को सौंपते वक्त येल्तसिन ने पूर्व शर्त रखी कि उसके अपराधों के विषय में कोई जांच न होगी।

सोवियत यूनियन की समाप्ति के बाद गोर्वाचेव को कभी भी ०.५ प्रतिशत से ज्यादा वोट न मिला। एक सर्वेक्षण में लगभग ७० प्रतिशत रूसियों ने माना कि येल्तसिन ने रूस को बहुत नुकसान पहुंचाया। ५० प्रतिशत लोगों ने कहा कि येल्तसिन को उसके अक्षम्य अपराधों के लिए कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
रूस आज असमाजिक तत्वों का स्वर्ग बना हुआ है। बड़े-बड़े माफिया का राज चलने लगा है। रूस की जनसंख्या ५० लाख कम हो गयी है। काफी लोग वहां से पलायन कर गए हैं।

यह अकारण नहीं कि रूस और सोवियत यूनियन को इस अकल्पनीय दुर्दशा में पहुंचाने वाले व्यक्ति की मौत पर हत्यारे राष्ट्रध्वजों के सिवा आंसू बहाने वाले आम लोग नहीं थे।

(Jan Vikalp, July,2007)

वीरेन नंदा से रेयाज-उल-हक की बातचीत


'खडी बोली का चाणक्' के निर्देशक वीरेन नंदा
से रेयाज-उल-हक की बातचीत




इस फिल्‍म को बनाने की आपको प्रेरणा कैसे मिली?

प्रेरणा मुझे मेरी बेटी से मिली। करीब पांच साल पहले एक प्रश्न उसकी टीचर ने लिखाया था कि चंद्रकांता के रचयिता कौन थे। उसका जवाब भी खुद टीचर ने ही लिखवाया था-अयोध्या प्रसाद खत्री। मैंने उसे कहा कि यह तो गलत है। सही जवाब है-देवकीनंदन खत्री। इसे शुद्ध करो। वह अड़ गयी कि मिस ने लिखाया है तो यह गलत कैसे हो सकता है? तब मुझे लगा कि मुजफ्फरपुर में जिसने इतने वर्षों तक काम किया उसके बारे में इस शहर के लोगों को नहीं पता तो दूसरों को कहां से पता होगा? तब मैंने चीजों को खंगालना शुरू किया। मगर सामग्री बहुत अधिक न थी। नागरी प्रचारिणी सभा की सूची में तो थी, पर किताबें वहां नहीं थीं-लोग ले गये तो उन्होंने लौटाया ही नहीं। फिर भी जो मिला उसे पढ़ा। पढ़ने के क्रम में अयोध्या बाबू का चरित्र उजागर हुआ। पढ़कर किताब लिखने की योजना बनायी। फिर सोचा कि इस पर डाक्यूमेंटरी बनायी जाये। स्क्रिप्ट बनवाया एक दूसरे व्यक्ति से। तो चुनौती बनी कि इसके संवाद क्या रखे जायें। उनके समय में जो आरोप -प्रत्यारोप हुए थे, प्रहार हुए थे उसके डाक्यूमेंट खंगालने पर जो वाक्य निकले उन्हें पात्रों के मुंह में डाला। जो बात लिख कर नहीं पहुंचा सकते-उसे फिल्म के माध्यम से पहुंचा सकते हैं। मेरा कहना तो यह है कि अयोध्या प्रसाद खत्री पर फीचर फिल्म भी बन सकती है।

फिल्म बनाने में क्या कुछ दिक्कतें भी आयीं?

आर्थिक दिक्कतें थीं। तीन वर्ष लग गये। एक बार फिल्म शूट कर ली, फिर म्यूजिक रिकार्ड, फिर एडिटिंग...। अयोध्या प्रसाद खत्री जी की भूमिका भी मैंने स्वयं की।

खर्च कहां से जुटा? क्या सिर्फ व्यक्तिगत?

व्यक्तिगत भी, कर्ज भी। फिल्म बनाने के उद्देश्य से ही पैसा जमा करना शुरू किया था।
इन आर्थिक दिक्कतों के अलावा किसी तरह की दिक्कत आयी?

मैं परिहास का कारण भी बना कि क्या सब्जेक्ट लेकर चल रहा है। मगर ऐसा हुआ कि पढ़ने के बाद खत्री जी जैसे मेरे भीतर समा गये। खत्री जी की बातों का विरोध उर्दू को लेकर था। पांच तरह की शैलियां उन्होंने बतायीं थीं, जिनमें कविता की जा रही थी। वे मुंशी शैली की वकालत कर रहे थे, उनका मानना था कि यही आम जन की भाषा है। खत्री जी ठीक इसी बोलचाल की भाषा का समर्थन कर रहे थे। लोगों का खत्री जी से विरोध इस कारण से भी था कि उन्हें लगता था कि इससे खड़ी बोली से ब्रजभाषा का प्रभाव खत्म हो जायेगा। सब लोग भारतेंदु की दुहाई देते थे कि उनसे न बनी तो खत्री का यत्न कैसे सफल होगा? इसी से खत्री जी क्रुद्ध हो गये। 'अगरवाले के मत पर एक खत्री का समालोचना` शीर्षक से भारतेंदु का खंडन करते हुए उन्होंने कहा कि भारतेंदु को शब्दशा (फिजोलाजी) का कोई ज्ञान नहीं था, वरना वे खड़ी बोली में कविता नहीं हो सकती, ऐसा नहीं कहते।

फिल्म का रेस्पांस कैसा रहा? आगामी योजनाएं क्या हैं?

अच्छा लगा। कई बाधाएं आईं । लेकिन लोग फिल्म पसंद कर रहे है। खत्री जी पर चुप्पी टूटी है। तमाम नामवर, नामचीन लोग खत्री जी पर बात करने से कतराते हैं, क्योंकि इसके लिए भारतेंदु जी का खंडन करना होगा।
सहयोग मिला तो एक फिल्म गोपाल सिंह नेपाली पर बनाना चाहता हूं। उनकी भी उपेक्षा की गई। जाने क्यों बिहारियों को ही इतनी उपेक्षा सहनी पड़ती है। नेपाली जी का जब भागलपुर रेलवे स्टेशन पर निधन हुआ तो सिर्फ चार लोग उनकी चिता के पास मौजूद थे।


(Jan Vikalp, July,2007)

राजीवरंजन गिरि


व्याख्यान

और खडी बोली का आंदोलन



(5-६ जुलाई, २००७ को पटना में खड़ी बोली के प्रथम आंदोलनकर्ता अयोध्या प्रसाद खत्री की १५०वीं जयंती आयोजित की गई। इस अवसर पर कवि वीरेन नंदा द्वारा निर्देशित फिल्म 'खड़ी बोली का चाणक्य` का प्रदर्शन भी किया गया। यहां हम जयंती समारोह में राजीवरंजन गिरि द्वारा दिया गया व्याख्यान, वीरेन नंदा का साक्षात्कार तथा समारोह की रपट प्रकाशित कर रहे हैं-सं०)



मौजूदा दौर में हिन्दी-साहित्य का सामान्य विद्यार्थी अयोध्या प्रसाद खत्री को लगभग भूल चुका हैआखिर इसकी वजह क्या है? क्या अयोध्या प्रसाद खत्री का अवदान इतना कम है कि वह साहित्य के विद्यार्थियों के सामान्य-बोध का अंग बन सकेंअथवा यह हिन्दी-साहित्य के इतिहासकारों और आलोचकों के दृष्टिकोण की खामी है या अध्ययन की किसी खास रणनीति का नतीजा?



भारतेंदु्युग से हिन्दी-साहित्य में आधुनिकता की शुरूआत हुई। उस दौर के रचनाकारों को आधुनिकता की शुरूआत करने का श्रेय दिया जाता है, जो वाजिब है। इसी दौर में बड़े पैमाने पर भाषा और विषय-वस्तु में बदलाव आया। खड़ीबोली हिन्दी गद्य की भाषा बनी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित सभी इतिहासकार-आलोचकों ने विषय-वस्तु के साथ-साथ भाषा के रूप में खड़ी बोली हिन्दी के चलन को आधुनिकता का नियामक माना है। गौरतलब है कि इतिहास के उस कालखंड में, जिसे हम भारतेंदुयुग के नाम से जानते हैं, खड़ीबोली हिन्दी गद्य की भाषा बन गई लेकिन पद्य की भाषा के रूप में ब्रजभाषा का बोलबाला कायम रहा। इतना ही नहीं, कविताओं का विषय भक्ति और रीतिकालीन रहा। इस लिहाज से, कविता मध्यकालीन भाव-बोध तक सीमित रही।
अयोध्या प्रसाद खत्री ने गद्य और पद्य की भाषा के अलगाव को गलत मानते हुए इसकी एकरूपता पर जोर दिया। पहली बार इन्होंने साहित्य जगत का ध्यान इस मुद्दे की तरफ खींचा। साथ ही इसे आंदोलन का रूप दिया। इसी क्रम में खत्री जी ने 'खड़ी-बोली का पद्य` दो खंडों में छपवाया। इन दोनों किताबों को तत्कालीन साहित्य-रसिकों के बीच नि:शुल्क बंटवाया। काबिलेगौर है कि इस किताब के छपने के बाद काव्य-भाषा का सवाल एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उभरा। हिन्दी-साहित्य के इतिहास में 'खड़ी बोली का पद्य` ऐसी पहली और अकेली किताब है, जिसकी वजह से इतना अधिक वाद-विवाद हुआ। इस किताब ने काव्य-भाषा के संबंध में जो विचार प्रस्तावित किया, उस पर करीब तीन दशकों तक बहसें होती रहीं। इस किताब के जरिए एक साहित्यिक आंदोलन की शुरूआत हुई। हिन्दी कविता की भाषा क्या हो, ब्रजभाषा अथवा खड़ीबोली हिन्दी? इसके संपादक ने खड़ीबोली हिन्दी का पक्ष लेते हुए ब्रजभाषा को खारिज किया। लिहाजा, इस आंदोलन की वजह से परिस्थितियां ऐसी बदलीं कि ब्रजभाषा जैसी साहित्यिक भाषा बोली बन गयी और खड़ी बोली जैसी बोली साहित्यिक भाषा के तौर पर स्थापित हो गई। 'खड़ी बोली का पद्य` के पहले भाग की भूमिका में खत्री जी ने खड़ी बोली को पांच भागों में बांटा-ठेठ हिन्दी, पंडित जी की हिन्दी, मुंशी जी की हिन्दी, मौलवी साहब की हिन्दी और यूरेशियन हिन्दी। उन्होंने मुंशी-हिन्दी को आदर्श हिन्दी माना। ऐसी हिन्दी जिसमें कठिन संस्कृतनिष्ठ शब्द न हों। साथ ही अरबी-फारसी के कठिन शब्द भी नहीं हों। लेकिन आमफहम शब्द चाहे किसी भाषा के हों, उससे परहेज न किया गया हो। प्रसंगवश, इसी मुंशी हिन्दी को महात्मा गांधी सहित कई लोगों ने हिन्दोस्तानी कहा है।


'खड़ी बोली का पद्य` और अयोध्या प्रसाद खत्री के आंदोलन से पहले खड़ी बोली में कविताएं लिखी जाती थीं। ये कविताएं कभी-कभार छपती भी थीं। 'खड़ी बोली का पद्य` में अयोध्या प्रसाद खत्री ने जिन कविताओं को शामिल किया, सारी पहले छप चुकी थीं। गौरतलब है कि 'खड़ीबोली-पद्य-आंदोलन` का जिन लोगों ने प्रखर विरोध किया, इनमें से ज्यादातर लोग इस आंदोलन से पहले खड़ीबोली में कविता लिख चुके थे अथवा खड़ीबोली में कविता लिखने के लिए कवियों को प्रेरित कर रहे थे।


काव्य-भाषा के तौर पर खड़ीबोली हिन्दी का सबसे मुखर विरोध राधाचरण गोस्वामी, प्रताप नारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट कर रहे थे। जबकि ये तीनों रचनाकार खड़ीबोली हिन्दी में कुछ कविताएं लिख चुके थे। साथ ही अपने-अपने पत्र में खड़ीबोली में कविताएं प्रकाशित कर चुके थे। 'दूसरे भारतेंदु` के नाम से चर्चित प्रताप नारायण मिश्र की खड़ीबोली हिन्दी में लिखी कविता 'चाहो गाना समझो, चाहो रोना समझो` १५ जून १८८४ ई. को 'ब्राह्मण` में छपी है। इस कविता के साथ नागरी में कविता लिखने के लिए प्र.ना. मिश्र की एक अपील भी छपी है :
'आर्य कवियों से हम सानुरोध प्रार्थना करते हैं नागरी भाषा की कविता का भी ढंग डालें। जिस भाषा के लिए इतनी हाय करते हैं उसमें कविता की चाल न हो प्रिय वर्ग हमें सहायता दो।`


प्रताप नारायण मिश्र की अपील में ही वे बुनियादी कारण मौजूद हैं, जिसकी वजह से वे बाद में खत्री जी के 'खड़ी बोली का पद्य` आंदोलन के विरोधी हो गये। मिश्र जी ने अपील में जिसे नागरी भाषा कहा है, वह खड़ीबोली हिन्दी ही है। लेकिन इस अपील में एक बात महत्वपूर्ण है। यह अपील सिर्फ 'आर्य कवियों` से की गयी है। दरअसल हंटर कमीशन (१८८२) में सैकड़ों मेमोरेण्डम देने के बावजूद हिन्दी के पक्ष में निर्णय न होने के कारण प्रताप नारायण मिश्र सरीखे हिन्दी-आंदोलनकारी क्षुब्ध थे। इसी दौर में जोरदार तरीके से भाषा की धार्मिक पहचान गढ़ी जा रही थी। लिहाजा, पश्चिमोत्तर प्रांत के हिन्दी-आंदोलनकारियों के लिए खड़ीबोली हिन्दी हिन्दुओं की भाषा हो गयी। इसी का नतीजा है कि प्रताप नारायण मिश्र सिर्फ 'आर्य कवियों` से 'सानुरोध प्रार्थना` करते हैं। इस अपील में 'हंटर कमीशन` के दौर में हुई गहमागहमी की छाया स्पष्ट रूप से दिखती है। अपील में इन्होंने कहा है कि 'जिस भाषा के लिए इतनी हाय करते हैं।` हंटर कमीशन के दौरान फारसी लिपि (उर्दू) को हटाकर नागरी लिपि (हिन्दी) को लागू करने के लिए हिन्दी-आंदोलनकारियों ने काफी 'हाय` मचायी थी।


प्रतापनारायण मिश्र के इस 'सानुरोध प्रार्थना` से पहले चम्पारण के एक गांव रतनमाल, (बगहां) के पंडित चंद्रशेखर मिश्र की १८८३ ई. में 'पीयूष प्रवाह` मासिक में एक कविता छपी। इस कविता में मिश्र जी ने खड़ी बोली हिन्दी में पद्य रचने के लिए वकालत की है :


'गद्य की भाषा विशुद्ध विराजित पद्य की भाषा वही मथुरा की।
आधी रहे मुरगी की छटा फिर आधी बटैर की राजै छटा की।।
ऐसी कड़ी द्विविधा में पड़ी-पड़ी यों बिगड़ी कविता छवि बांकी।
हिन्दी विशुद्ध में गद्य सुपद्य कै उन्नति कीजिए यों कविता की।।


गौरतलब है कि प्रतापनारायण मिश्र से चंद्रशेखरधर मिश्र की अपील में फर्क है। प्रतापनारायण मिश्र ने खड़ी बोली हिन्दी में कविता रचने के लिए सिर्फ 'आर्य कवियों से सानुरोध प्रार्थना` की है जबकि चंद्रशेखरधर मिश्र ने ऐसा नहीं किया है। एक बात जरूर काबिलेगौर है कि चंद्रशेखरधर मिश्र की इस छोटी कविता में उर्दू-फारसी का एक भी शब्द नहीं आ पाया है। क्या यह महज संयोग है? अथवा लल्लू जी लाल रवि की तरह जानबूझकर हटाया गया है। बहरहाल, चंद्रशेखरधर मिश्र 'हिन्दी विशुद्ध में गद्य सुपद्य के उन्नति कीजिए यों कविता की` में किस हिन्दी में पद्य-रचना कराना चाहते थे, इसका सहज पता चलता है। चंद्रशेखरधर मिश्र की इसी सोच का नतीजा है कि 'हिन्दी उर्दू की लड़ाई` नामक नाटक लिखनेवाले सोहन प्रसाद मुदर्रिस के मामले में उन्होंने हिन्दी-भाषा का हिन्दू धर्म से रिश्ता जोड़कर भाषायी साम्प्रदायिकता फैलानेवालों के साथ बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। इस प्रकार, शुरूआत में प्रतापनारायण मिश्र और चंद्रशेखरधर मिश्र की काव्य-भाषा संबंधी चिंता समान है। दोनों की भाषा एक जैसी है। फर्क है तो सिर्फ पाठ में, जिसको लक्ष्य कर दोनों अपील कर रहे थे।


'खड़ीबोली का पद्य` का पहला मुखर विरोध राधाचरण गोस्वामी ने किया। इन्होंने 'हिदोस्थान` में इसकी समीक्षा लिखते हुए इस किताब को 'अयोध्या प्रसाद खत्री लिखित` कहा। जबकि इस किताब में खत्री जी की लिखी सिर्फ छोटी भूमिका है। इसी समीक्षा में कहा कि इस भाषा में कवित, सवैया आदि छंदों का निर्वाह नहीं हो सकता और यदि किया भी जाता है तो बहुत भद्दा मालूम पड़ता है। राधाचरण गोस्वामी को एक आपत्ति यह भी थी कि खड़ी बोली हिन्दी में कविता लिखने पर भाषा यानी जनभाषा के प्रसिद्ध छंद छोड़कर उर्दू के बैत, शेर, गजल आदि का अनुकरण करना पड़ता है। इनका मानना था कि चंद से हरिश्चंद्र तक सारी कविता ब्रज भाषा में हुई है और सब पंडितों ने संस्कृत के अनंतर 'भाषा` शब्द से इसी का व्यवहार किया। हमारी कविता की भाषा अभी मरी नहीं है तब फिर इसमें क्यों न कविता की जाए? गोस्वामी जी का मानना था कि संस्कृत नाटकों में साहित्य के लालित्य के लिए संस्कृत, प्राकृत, पैशाची कई भाषा व्यवहार की गयी है तो यदि हम हिन्दी साहित्य में दो भाषा व्यवहार करें तो क्या चोरी है? इस समय में हमारे परम आतुर आर्य समाजी और मिशनरी आदिकों ने भाषा साहित्य की रीति और अलंकार आदि बिना जाने कविता लिखने का आरंभ करके अपने हास्य के सिवाय काव्य की भी उलटे हुए छुरे से खूब हजामत की है और इस पिशाची कविता से अपने समाज का भी खूब मुख नीचा किया है। बस यह खड़ी बोली की कविता भी पिशाची नहीं तो डाकिनी अवश्य कवित-समाज में मानी जाएगी।


अव्वल तो यह कि गोस्वामी जी की चिंता उर्दू के बैत, शेर और गजल से बचने की है। सवाल उठता है कि गोस्वामी जी सरीखे विद्वान उर्दू से बचने की इतनी कोशिश क्यों करते हैं? इसका जवाब गोस्वामी जी के ही एक कथन में मिलता है-'मैं जिस कुल में उत्पन्न हुआ उसमें अंग्रेजी पढ़ना तो दूर है, यदि कोई फारसी, अंग्रेजी का शब्द भूल से भी मुख से निकल जाए तो बहुत पश्चाताप करना पड़े।` बावजूद इसके गोस्वामी जी ने अंग्रेजी पढ़ी। फिर उर्दू-फारसी से इतना वैर क्यों? इसकी वजह भाषा के आधार पर हो रही तत्कालीन साम्प्रदायिक राजनीति थी। यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि गोस्वामी जी ने संस्कृत नाटकों में प्राकृत, पैशाची आदि कई भाषाओं के प्रयोग को 'साहित्य का लालित्य` माना है। गौरतलब है कि यह कथन संस्कृत नाटकों के युग की नाट्यभाषा में छिपी वर्चस्ववादी विचारधारा को नहीं समझने का नतीजा है। संस्कृत नाटकों में द्विज पुरुष पात्र संस्कृत में संवाद बोलता है जबकि दास और शूद्र पात्र प्राकृत, पैशाची आदि लोक भाषाओं में। इसे साहित्यिक लालित्य समझना तत्कालीन भाषायी विभेदकारी शोषणमूलक संरचना को नहीं समझने का परिणाम है अथवा-साहित्यिक लालित्य के नाम पर उस विचारधारा को छिपाने की कोशिश।


राधाचरण गोस्वामी के सवालों का जवाब उसी अखबार में श्रीधर पाठक ने दिया। इसके बाद इस मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष में लेख छपने लगे। गोस्वामी जी ने फिर से अपनी पुरानी मान्यताओं पर अडिग रहते हुए-जिसमें इन्होंने हिन्दी को पिशाचिनी, डाकिनी कहा था-दूसरा सवाल पूछा कि खड़ीबोली के पक्षधर किस कविता को लेकर हिन्दी काव्य-रचना करेंगे? उन्होंने शंका जतायी कि खड़ी बोली की कविता की चेष्टा की जाए तो फिर खड़ी बोली के स्थान में थोड़े दिनों में खाली उर्दू कविता का प्रचार हो जाएगा। उनको लगता था कि 'गद्य में सरकारी पुस्तकों में फारसी शब्द घुस ही पड़े, उधर पद्य में फारसी भरी गई तो सहज ही झगड़ा विदा।` राधाचरण गोस्वामी के इस सवाल-खड़ी बोली के पक्षधर किस कविता को लेकर हिन्दी काव्य-रचना करेंगे, का जवाब देते हुए श्रीधर पाठक ने लिखा 'हमलोग ब्रजभाषा और खड़ी बोली भाषा दोनों की कविता से अपनी अराध्य हिन्दी को द्विगुणित, चतरगुणित आभूषण पहनाकर और विधि रीति से उसके 'अटल` भंडार को बढ़ाकर उसके असीम वैभव के सदा अभिमानी होंगे और दोनों का आधार साधार रखेंगे।` राधाचरण गोस्वामी की शंका थी कि खड़ी बोली में काव्य-रचना करने पर थोड़े दिनों में सिर्फ उर्दू कविता का प्रचार हो जाएगा, को वक्त ने निराधार साबित कर दिया है। इनकी एक चिंता कि कविता में फारसी घुस जाएगी का जवाब देते हुए पाठक जी ने लिखा-'खड़ी हिन्दी की कविता में उर्दू नहीं घुसने पावेगी। जब हम हिन्दी की प्रतिष्ठा के परीक्षण में सदा सचेत रहेंगे तो उर्दू की ताव क्या जो चौखट के भीतर पांव रख सके।` 'कविता में फारसी घुस जाएगी`-दरअसल खड़ी बोली काव्य भाषा के विरोध का सबसे बड़ा कारण था। काबिलेगौर है कि इस मुद्दे पर 'खड़ीबोली का पद्य` के विरोधी राधारचण गोस्वामी और समर्थक श्रीधर पाठक की भाषा-नीति समान है। फर्क इतना है कि गोस्वमी जी को डर है कि खड़ी बोली में कविता रचने पर कविता में फारसी घुस जाएगी। जबकि श्रीधर पाठक को इसका डर नहीं है। वे उर्दू-फारसी से अपनी हिन्दी कविता को चाक-चौबंद रखने का विश्वास प्रकट करते हैं कि वे सरकार की नीति का अनुयायी बने बगैर हिन्दी कविता की रक्षा करेंगे।
स्कूली-हिन्दी में फारसी शब्दों के प्रयोग से गोस्वामी जी का डर बढ़ गया था। प्रसंगवश उस दौर में स्कूलों में पढ़ायी जाने वाली पुस्तकों को राजा शिवप्रसाद 'सितारै हिन्द` ने तैयार किया था। किताबों में आमफहम उर्दू-फारसी शब्दांे से परहेज नहीं किया गया था। राजा शिव प्रसाद की इस नीति में हिन्दी-उर्दू करीब थी। यह बिल्कुल स्वाभाविक था। हिन्दी-उर्दू को करीब लाना ऐतिहासिक जरूरत भी थी। समूचे हिन्दी-उर्दू इलाके को एक सूत्र में बांधने के लिए यह जरूरी कदम था। यह ऐतिहासिक विडंबना है कि ब्रजभाषा कविता के पक्षधर राधाचरण गोस्वामी और खड़ीबोली कविता के पक्षधर श्रीधर पाठक इस सवाल पर एक साथ खड़े थे। आखिर इसके पीछे क्या वजह थी? लल्लूजी लाल कवि 'प्रेमसागर` में प्रचलित एवं आमफहम 'यावनी` शब्दों का प्रयोग क्यों नहीं कर रहे थे? जिस प्रकार 'यवन` के कदम रखने मात्र से कृष्ण मंदिर या भक्त का घर अपवित्र हो जाता था, उसी प्रकार कृष्णभक्ति से जुड़ी रचनाएं भी 'यावनी` शब्दों के प्रयोग से अपवित्र जो हो जातीं! यही वजह थी कि 'यावनी` शब्दों से हिन्दी को बचाने की जद्दोजहद चल रही थी। 'यावनी` शब्द से हिन्दी को बचाने की कोशिश में कृत्रिम और अस्वाभाविक हिन्दी गढ़ना इन लोगों को गवारा था। अपनी इसी मानसिकता के कारण तत्कालीन लेखकों का एक तबका खड़ी बोली हिन्दी गद्य से उर्दू-फारसी शब्दों को छांटकर संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग करता था। गोया कि इसके जरिए 'पवित्र` भाषा गढ़ी जा रही थी। खड़ी बोली के एक साहित्यिक रूप उर्दू में ज्यादातर मुस्लिम रचानाकार रचनाएं कर रहे थे। इसमें फारसी शब्दों का खुलकर प्रयोग भी हो रहा था। यही वजह थी कि श्रीधर पाठक, राधचरण गोस्वामी जैसे रचनाकार इस भाषा से दूरी कायम कर रहे थे।


प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट जैसे लेखकों को भी इसी का भय सता रहा था। भट्ट जी की चिंता थी कि 'हम अपनी पद्यमयी सरस्वती को किसी दूसरे ढंग पर उतारकर मैली और कलुषित नहीं करना चाहते। पद्य या कविता उसी का नाम है जिस मार्ग भूषण, मतिराम, पद्माकर तथा सूर, तुलसी, बिहारी प्रभृति महोदय गण चल चुके हैं।` यहां भट्ट जी यह भूल जाते हैं कि इनकी 'पद्यमयी सरस्वती` कई नये ढंग पर उतरने के बाद ही भूषण मतिराम आदि कवियों तक पहुंची है। यहां एक सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि जब कभी-कभार बालकृष्णभट्ट स्वयं खड़ी बोली में रचना करते थे तब क्या 'पद्यमयी सरस्वती कलुषित` नहीं होती थी। राधाचरण गोस्वामी की सुधार-चेतना ऐसी थी कि वह कुछ कदम आगे बढ़ाकर फिर कई कदम पीछे मुड़ गए थे। बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनाराण मिश्र और राधाचरण गोस्वामी भी खड़ी बोली में कविता रचने के मुद्दे पर दो कदम आगे बढ़ाकर अपने धार्मिक हठ की वजह से फिर पीछे चले गए थे।


इसे अलावा इन तीनों रचनाकरों के अलावा डा. ग्रियर्सन भी खड़ी बोली की कविता को असंभव करार दे रहे थे। इन चारों लेखकों ने अपनी इस धारणा का आधार भारतेंदु हरिश्चंद्र के कथन को बनाया था। इनका मानना था कि जब भारतेंदु ही खड़ीबोली में कविता नहीं रच सके तो फिर दूसरे रचनाकरों की क्या औकात? भारतेंदु हरिश्चंद्र 'रसा` उपनाम से गज़ल लिखते थे। इसके साथ ही उनकेे खड़ीबोली में कविता लिखने का जिक्र दो बार मिलता है। १८८१ ई. में कलकत्ता से छोटूलाल मित्र के संपादन में प्रकाशित 'भारत मिश्र` के लिए खड़ीबोली हिन्दी में लिखे दोहे के साथ एक खत भेजा था-'प्रचलित साधुभाषा में कुछ कविता भेजी है। देखिएगा कि इसमें क्या कसर है और किस उपाय अवलम्ब करने इस भाषा में काव्य सुंदर बना सकता है। इस कविता में सर्वसाधारण की अनुमति ज्ञात होने पर आगे से वैसा परिश्रम किया जाएगा। तीन-भिन्न छंदो यह अनुभव ही करने के लिए कि किस छंद में इस भाषा का काव्य अच्छा होगा, कविता लिखी है। मेरा चित्त इससे संतुष्ट न हुआ और न जाने क्यों ब्रजभाषा से इसके लिखने में दूना परिश्रम किया कि खड़ीबोली में कविता बनाऊं पर वह मेरे चित्तानुसार नहीं बनी। इससे निश्चय होता है कि ब्रजभाषा ही में कविता करना उत्तम होता है और इसी से सब कविता ब्रजभाषा में ही उत्तम होती है।` अव्वल तो यह कि भारतेंदु के चित्तानुसार कविता नहीं बनी तो उन्होंने नतीजा निकाल लिया कि ब्रजभाषा में कविता करना उत्तम होता है। खुद से जो काम नहीं हो सका, उसके बारे में नतीजा निकालना अपने आप पर टिप्पणी है।
गौरतलब है कि इन्हीं पंक्तियों के आधार पर भारतेंदु के प्रति अंधभक्ति रखने वाले तत्कालीन लेखक खड़ीबोली में पद्य-रचना को असंभव करार दे रहे थे। अंधसमर्थकों द्वारा किसी भी विचारक, गुरू या नेता की बातों का ऐसा ही हश्र होता है। अव्वल तो यह कि अंधभक्त अपने 'आराध्य` की बात को आलोचनात्मक दृष्टि से नहीं देखते। बदलती ऐतिहासिक पिस्थितरायों के संदर्भ में उन विचारों का विकास भी नहीं कर पाते हैं। भारतेंदु की बातों का भारतेंदु-मंडल के सदस्यों के लिए कितना महत्व था, राधाचरण गोस्वामी के इस बयान से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। 'उनके (भारतेंदु) के लेख ग्रंथ हमको वेद वाक्यवत्, प्रमाण और मान्य थे। उनको मानो ईश्वर का एकादश अवतार मानते थे। हमारे सब कामों में वह आदर्श थे, उनकी एक-एक बात हमारे लिए उदाहरण थीं।` इस बयान से भारतेंदु का व्यक्तित्व और गोस्वामीजी सरीखे लेखकों की अंधभक्ति का पता चलता है। वेद के वाक्यों पर आर्यसमाजी हिन्दुओं द्वारा सवाल उठाना, जिस प्रकार पाप माना जाता था उसी प्रकार इन लोगों द्वारा भारतेंदु की बात का प्रतिवाद करना तो दूर उस पर शंका करना भी मानो पाप जैसा था। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि इतिहास के जिस दौर में बुद्धिवाद, आलोचनात्मक वृत्ति का विकास हो रहा था, उस दौर में हिन्दी के बड़े लेखकों में ऐसा भाव कायम था। भारतेंदु के प्रति इनकी अंधभक्ति का आलम यह था कि वे उनकी बात को भी ठीक से नहीं समझ पा रहे थे। ऐसे ही अंधसमर्थकों से आजीज आकर अयोध्या प्रसाद खत्री ने 'एक अगरवाले के मत पर खत्री की समालोचना` शीर्षक पैम्फलेट छपवाकर बंटवाया। खत्री जी ने लिखा कि 'बाबू भारतेंदु हरिशचंद्र ईश्वर नहीं थे। उनको शब्दशा का ;चीपसवसवहलद्ध कुछ भी बोध नहीं था। यदि चीपसवसवहल का ज्ञान होता तो खड़ी बोली पद्य में रचना नहीं हो सकती है, ऐसा नहीं कहते।` इतिहास के इस दौर में जब भारतेंदु-मंडल के लेखकों की तूती बोलती थी, उस समय भारतेंदु के बारे में ऐसी टिप्पणी काबिल-ए-बर्दाशत नहीं थी। हालांकि खत्री जी की बात तार्किक थी।
उन्नसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के दौर में बिहार में उर्दू भाषा के विरोध में हिन्दी-आंदोलन नहीं चल रहा था। बिहार का हिन्दी-आंदोलन उर्दू और हिन्दी को साथ लेकर चल रहा था। जबकि तत्कालीन पश्चिमोत्तर प्रांत का हिन्दी आंदोलन उर्दू और मुसलमानों का प्रखर विरोध कर रहा था। अयोध्या प्रसाद खत्री उर्दू विरोधी हिन्दी-आंदोलन का मुखर विरोध करते थे। हिन्दी और उर्दू की एकता की बात तत्कालीन साहित्यकारों को मंजूर नहीं थी। भाषा को धर्म के आधार पर बांटने की रणनीति में इससे दरार पड़ती थी। इन्हीं सब वजहों से अयोध्या प्रसाद खत्री और उनकी भाषा-नीति का लगातार विरोध होता रहा।


(युवा आलोचक राजीवरंजन गिरि ने जेनेवि से 'खड़ी बोली पद्य का आंदोलन और अयोध्या प्रसाद खत्री` विषय पर शोध किया है।)



(Jan Vikalp, July,2007)

July 13, 2007

प्रमोद रंजन




ताअजीम के मेआंर परखने होंगे


प्रतिष्‍ठत साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदय के युवा पीढ़ी विशेषांक से संबंधित विवाद के दोनों पक्ष इसी तरह के हैं । गैरऱ्यथार्थपरक, और अंतत: कलावादी। यह विवाद उतना ही व्यक्तिवादी भी है जितना कि कोई ऐसी बहस हो सकती है जो सामाजिक यथार्थ से इतर आभासी दुनिया में चले। अंक में रचनाकारों के परिचय जिस रूचि से दिए गए हैं, वह भी कला, कला के लिए का ही संकेतक है। बावजूद इसके नया ज्ञानोदय के इस विशेषांक की ऐतिहासिक सार्थकता है कि इसने भूमंडलीकृत समय की नई रचनाशीलता को विमर्श के केंद्र में ला दिया।


विवाद की शुरूआत नया ज्ञानोदय के मई, २००७ विशेषांक में प्रकाशित विजय कुमार के लेख से हुई। उन्होंने 'तरुण` कवियों में नयापन न होने की शिकायत करते हुए कहा कि उनमें स्थापित होने की हड़बडी है, 'चारों तरफ केवल उत्सवधर्मिता, अफरा-तफरी और धमाचौकड़ी मची है। इतना नॉन-सीरियस, झूठा और प्रदर्शनकारी वातारवरण हिन्दी में पहले कभी नहीं रहा।` उसी अंक में पत्रिका के संपादक रवीन्द्र् कालिया ने विजय कुमार के लेख को घोर आपत्तिजनक मानते हुए टिप्पणी की कि 'विजय कुमार जी की चेतना पर प्रकारान्तर से कोई दूसरी ही पीढ़ी हावी है.. अपनी चर्चा की उतावली पिछली पीढ़ी में देखी जा रही थी, युवा पीढ़ी के रचनाकार इसके प्रति एकदम निरपेक्ष हैं।` इस वैचारिक असहमति के बाद कालिया जी ने व्यक्तिगत आरोप जड़े 'पिछलग्गुओं की शिनाख्त़ करनी हो तो हाल ही में वाराणसी में (कवि ज्ञानेंद्रपति को पहल सम्मान के उपलक्ष्य में) आयोजित उस कार्यक्रम का अध्ययन किया जा सकता है, जिसके विजय कुमार खुद चश्मदीद गवाह थे । नतीजा यह हुआ कि विजय कुमार की खरी-खरी बातों से कुछ तरूणऱ्युवा कवि भड़क गए और रवीन्द्र कालिया का आरोप पहल सम्मान में उपस्थित वरिष्ठ साहित्यजीवियों को नागवार गुजरा। साहित्यिक हलके में आरोप प्रत्यारोपों का सिलसिला चल पड़ा। इन हड़बोंग मचाने वाले आरोप-प्रत्यारोपों में अधिकांश हास्य उत्पन्न करने वाली रोचकता लिए हैं।

किन्तु इन सबके बीच एक ऐसा सवाल है, जिसे कोई छूना नहीं चाहता। बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

मई अंक में प्रकाशित विजय कुमार का लेख 'कवित्त ही कवित्त है` सदाशयतापूर्वक लिखी गई अलोचना है। उतनी ही सुरूचिपूर्ण भी, जितनी कि कलावाद को प्रश्रय देने वाली कोई आलोचना हो सकती है। ध्यातव्य है कि कलावाद सिर्फ मार्क्सवाद का विरोध नहीं, बल्कि वस्तुत: सामाजिक यथार्थ से पलायन की कवायद होती है। चुंकि विवाद के केंद्र में विजय कुमार का लेख है। सो बड़े परिपे्रक्ष्य के बावजूद यहां कुछ बातें उसी के ईद-गिर्द।


मई अंक में प्रकाशित लेख में विजय कुमार को नई पीढ़ी से मुख्यत: दो शिकायतें हैं। पहली, तरुण कवियों में नयापन नहीं है; वह उनसे सवाल करते हैं-'तुम्हारा देशकाल, तुम्हारा सौंदर्य बोध, तुम्हारी भाषा , तुम्हारा शिल्प, तुम्हारा रूप-रचाव वह सब कहां पूर्ववर्ती से अलग हुआ जा रहा है?` उनके लेख में नए कवियों में अपने समय का 'यथार्थ बोध` न होने की चिंता कहीं नहीं है। 'देशकाल` के जिक्र के बावजूद जोर,'सौंदर्य, शिल्प और रूप-रचाव` पर है। उन्हें दूसरी शिकायत है कि तरुण कवि नैतिक स्खलन का शिकार होकर मठाधीशों की चापलूसी में संलिप्त हैं । वह लिखते हैं: 'साम्यवादी व्यवस्था के ढहने के बाद एक खास तरह का लुम्पैननेस और तदर्थवाद आज हम अपनी साहित्यिक-संस्कृति में देख रहे हैं। एक फास्ट फूड कल्चर ने सबकुछ लील लिया है।` स्पष्‍ट है विजय कुमार सभी किस्म के पतन का कारण सोवियत की कम्युनिस्ट व्यवस्था के पतन में देखते हैं। यानी इन 'पतनों` की शुरूआत १९९० के बाद हुई, जब सोवियत संघ विघटित हुआ और बाजार ने भारत में पैर पसारना शुरू किया। दरअसल, यह एकांगी दृष्टि है जो वास्तविकता से पलायन करने को मजबूर करती है। इस एकांगी दृष्टि के शिकार हमारे समय के अधिकांश आलोचक हैं। यही दृष्टि ट शिल्प और भाषा -सौ ठव के आग्रही कवि विजय जी को कलावाद की ओर भी ले जाती है। इस एकांगी दृष्टि को ठीक करने के लिए १९९० के आसपास की, बल्कि उससे कुछ और पहले की, अन्य घटनाओं को भी देखना होगा। वह कंप्यूटर जनित विभिन्न तकनीकों, विशेषकर संचार में उछाल का समय है, अर्थव्यवस्था में प्रवाह की सुगबुगाहट का समय है तथा सबसे महत्वपूर्ण, हिन्दी क्षेत्रों में जाति विमर्श के मुखर होने का काल है। और इनमें से किसी भी घटना के जन्म के लिए सोवियत रूस के विघटन को जिम्मेवार नहीं माना जा सकता।


इसे भी ध्यान समझने की जरूरत है कि जीवन शैली को तकनीक ने बदला है, बाजार के विस्तार ने नहीं। बाजार का विस्तार तो परवर्ती घटना है। १९९० के आसपास ही हिन्दी पट्टी की राजनीति में प्रभावशाली हुए जाति विमर्श ने अर्थव्यवस्था के प्रवाह की कुछ धाराएं पिछड़े सामाजिक समूहों की ओर मोड़ीं। आर्थिकी में इस परिवर्तन ने नई पीढ़ी की अभिरुचियों को स्थानांतरित किया। इसने अभिरुचियों को बदला नहीं है, सिर्फ स्थानांतरित किया है। नया ज्ञानोदय के युवा पीढ़ी पर केंद्रित अंक-२ (जून, २००७) में एक युवा कवि अपनी प्रतिक्रिया में कहता है :'बाजार आज से नहीं सदैव से एक ताकत रहा है। राजनीति और बाजार एक-दूसरे को सहयोग करते रहे हैं। क्या (विजय कुमार जैसे लोगों ने) बाजार का सुख उठा रहे किसी युवा से पूछा है?..आज का युवा और कम से कम मैं अपने समय में उपस्थित बाजार को प्यार करता हूं। उसका यथोचित सम्मान करता हूं।` क्या संयोग मात्र है कि यह युवा कवि एक पिछड़े सामाजिक समूह से आता है? जबकि दूसरी ओर उच्च सामाजिक समूहों से आने वाले आलोचक, कवि, संपादक, सभी बाजार के विस्तार पर हाय-तौबा कर रहे हैं।


क्या यह भी संयोग मात्र है कि पिछड़े सामाजिक समूह से आने वाला एक और युवा कवि दिल्ली के साहित्यिक गलियारों में चलने वाली आपसी बहसों में उपहास का खतरा उठाते हुए पूरी जिद के साथ बाजार के समर्थन में खड़ा दिखता है। वह तो दमित सामाजिक समूहों से भक्तिकाल में श्रेष्‍ ठ कवियों के आने की घटना को भी बाजार से जोड़कर स्थापित करता है कि 'मुगलों के आगमन के कारण समाज में वस्तुओं की खरीद-फरोख्त बढ़ी, जिस कारण दस्तकार जातियों को किंचित आर्थिक स्वतंत्रता मिली। इसी के बूते भक्तिकाल में इन सामाजिक समूहों ने कई महान कवियों को जन्म दिया।` इन तरुणऱ्युवा कवियों के तर्कों में कबीराना सच्चाई है, इसे स्वीकारे बिना आप बच नहीं सकते।


यह पूछना शायद निरर्थक होगा कि नया ज्ञानोदय में छपे लेख को लिखते हुए विजय कुमार जी की दृष्टि फलक में क्या किसी तरुण दलित कवि की भी कविता थी? क्या उन्होंने 'जातिवादी` कविताएं लिखने वाले कवियों पर 'अलग से` विचार करने की जरूरत भर भी महसूस की है? क्या उन्होंने कभी इस प्रश्न पर विचार किया है कि हिन्दी में जारी स्त्री विमर्श में संलग्न महिलाओं के सामाजिक सरोकार क्या हैं? इसका सीधा उत्तर है-नहीं। क्योंकि वह मानते हैं कि साहित्य में 'रियायतों, उदारताओं और आरक्षण कोटे से किसी का भला नहीं होता।` विजय जी की आलोचना की चर्चित किताब 'कविता की संगत` १९९५ में आई थी, उस समय वह तरुण पीढ़ी परिदृश्य में नहीं थी, जिसे वह 'चापलूस और पावर स्ट्रक्चर के खेल में शामिल ` मानते हैं। उस बेहतरीन आलोचना-पुस्तक में मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, कुंवर नारायण, विष्‍णु खरे, लीलाधर जगूड़ी, चंद्रकांत देवताले, सोमदत्त, मलय, ऋतुराज, आलोकधन्वा, मंगलेश डबराल, असद जैदी, वीरेन डंगवाल, राजेश जोशी और विष्‍णु नागर जी पर सुचिंतित लेख हैं। उसी किताब की भूमिका में उन्होंने बताया था कि 'पुस्तक में शमशेर , नागार्जुन, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, विनोद कुमार शुक्ल् , ज्ञानेंद्रपति, अरुण कमल और देवी प्रसाद मिश्र आदि की कविताओं पर भी टिप्पणियां लिखनी जरूरी थीं।` जिनके न लिख पाने के कारण 'अधुरेपन का एहसास` उन्हें कचोटता रहा है। क्या यह भी एक सवाल बन सकता है कि 'कविता की संगत` में हिन्दी के जो महत्वपूर्ण कवि हैं और वे, जिन पर विजय उस समय तक नहीं लिख सके-उनमें से कितने प्रतिशत निम्न सामाजिक समूहों से आते हैं? और यह कि इस प्रश्न का उत्तर क्यों हिंदी के किसी बुद्धिजीवी को 'अधूरेपन का अहसास' नहीं दिलाता? बात सिर्फ विजय कुमार की मानसिक संरचना की नहीं है। यह सवाल हिन्दी के सभी आलोचकों, संपादकों से पूछा जा सकता है कि क्या सचमुच अलग-अलग सामाजिक पृष्‍ ठभूमि से आने वाले रचनाकारों की अनुभूति-अभिव्यक्ति में भिन्नता नहीं होती, उनका दृष्टिकोण अलग-अलग नहीं होता? क्या सचमुच उच्च सामाजिक समूहों से आने वालों ने परानुभूति को स्वानुभूति की तरह साध लिया है? क्या ऐसी सर्वांगता संभव है?


इन सवालों के उत्तर में आपको संत सुलभ चुप्पियां मिलेंगी। लेकिन यह सीधा सवाल तो कुफ्र ही करार दिया जाएगा कि नई पीढ़ी पर केंद्रित नया ज्ञानोदय के दो अंकों की पौने चार सौ पृष्‍ठों की सामग्री में श्रे ठता के बल पर चयनित जिन ४५-४६ तरुण युवा रचनाकारों को प्रकाशित किया गया है, उनमें निम्न सामाजिक समूहों से आने वालों की उपस्थिति का प्रतिशत क्या है? जाहिर है इस सवाल के बिना अनुपस्थिति के कारणों पर विमर्श नहीं हो सकता। और उनकी उपस्थिति के बिना हिन्दी के रचनात्मक लेखन में वह सौंदर्यमूलक विविधता असंभव है जो यथार्थ को प्रतिबिंबित करे।


इस जमीनी विमर्श के लिए जरूरी है कि हम आभासी बहसों से बाहर निकल ताअज़ीम के कलावादी मेआरों को परखें; साहिर की नज्म़ का नए संदर्भ में पाठ करें :

'लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे..



( जन विकल्‍प, जुलाई,2007)

July 12, 2007

दिनकर कुमार


दुनिया की सबसे हसीन औरत


दुनिया की सबसे हसीन औरत
गरीबी की रेखा पर चढ़कर
मुस्कुराती है
ठंडे चूल्हे की तरह सर्द हैं
उसके होंठ
असमय ही वृद्धा बन जाने वाली
बच्ची से मिलती हैं
उसकी आंखें

दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमें बताएगी
भूख लगने पर रोटी नहीं मिले
तो केक खा लेना
प्यास लगने पर
शुद्ध पेयजल नहीं मिले
तो कोल्ड ड्रिंक पी लेना

दुनिया की सबसे हसीन औरत
हमारी नींद की गुफा में
समा जाती है
हमारे सबसे हसीन सपनों को
बटोरती है
और गायब हो जाती है

दिनकर कुमार



जहानाबाद


जो चूल्हे कभी ठीक से सुलगे नहीं
उन चूल्हों ने चखा
बारूद का स्वाद

पंचायत की पथराई आंखें
पढ़ती नहीं
भारतीय दंड संहिता की
पहेलियां

लक्ष्मणपुर बाथे हो या
शंकरबीघा
गिद्धों का झुंड
उमड़ता है
हरेक दिशा से

वे भूखे पेट ही लोरी सुनकर
सोनेवाले बच्चे थे
अनपढ़ स्त्रियां थीं
आजादी की साजिश के शिकार
पुरूष थे
जिन्हें प्रभुओं की सेना ने
मार डाला

जहानाबाद आपके मानचित्र पर
एक काला धब्बा है
और भूखे नंगे लोगों की
आंखों में
आग का गोला



( जन विकल्‍प, जुलाई,2007)

राम पुनियानी





ईसाइयों के विरूद्ध हिंसा



गत ६ मई को मध्यप्रदेश में बजरंग दल और विहिप के कार्यकर्ताओं ने दो ईसाई धर्म-प्रचारकों की पिटाई कर दी। उसी दिन बेंगलोर के निकट नरसापुर के मराथोमा चर्च से प्रार्थना करके लौट रहे कुछ ईसाइयों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) कार्यकर्ताओं ने मारपीट की और उन्हें अगले दस दिनों के भीतर चर्च में ताला लगवा देने की धमकी दी।
इसके पहले, ३ मई को, छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में करीब २० ईसाइयों का एक समूह, जो कि एक घर में इकट्ठा हुए थे, की जमकर पिटाई की गई। पिटने वालों में से कुछ को फ्रेक्चर हो गए परंतु पुलिस ने उनकी एफ.आई.आर. तक दर्ज करने से इंकार कर दिया। इसी माह की पहली तारीख को आगरा के सिंकदरा इलाके में बजरंग दल के कुछ युवकों ने एक ईसाई स्कूल पर उस समय हमला किया जब वहां के शासी निकाय की बैठक चल रही थी।
पिछले एक माह में हुई ईसाई विरोधी हिंसा के ये मात्र कुछ उदाहरण हैं। पिछले लगभग एक दशक से देश में ईसाई विरोधी हिंसा जारी है। इस श्रृखला की कुछ घटनाएं तो बहुत भयावह थीं, जैसे २२ जनवरी १९९८ को ग्राहम स्टेन्स व उनके दो बच्चों को जिंदा जला दिया जाना और गुजरात में चर्चों पर हमले और बाइबिल जलाए जाने की घटनाएं। ईसाई विरोधी हिंसा बहुत योजनाबद्ध तरीके से की जा रही है और यह प्रचार लगातार किया जा रहा है कि ईसाई मिशनरियां ताकत और धोखे के बल पर धर्म परिवर्तन करा रही हैं।
ग्राहम स्टेन्स की हत्या के बाद मीडिया का एक हिस्सा भी धर्म परिवर्तन की बात करने लगा था परंतु उसकी बोलती तब बंद हुई जब तत्कालीन एन.डी.ए. सरकार द्वारा नियुक्त वाधवा जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि स्टेन्स धर्म परिवर्तन के काम से नहीं जुड़े थे और जिस इलाके में वह काम करते थे उस इलाके में ईसाई आबादी में कोई वृद्धि नहीं हुई थी। एक दिलचस्प तथ्य यह है कि जहां एक ओर संघ वनवासी कल्याण आश्रम, विहिप और बजरंग दल के जरिए लगातार यह कुप्रचार कर रहा है कि ईसाई मिशनरियां बल प्रयोग और धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन करा रही हैं, वहीं जनगणना के आंकड़े यह बताते हैं कि पिछले चार दशकों से भारत की आबादी में ईसाइयों का प्रतिशत लगातार कम हो रहा है। १९७१ में वे आबादी का २.६० प्रतिशत थे, १९८१ में २.४४ प्रतिशत, १९९१ में २.३४ प्रतिशत और २००१ में ईसाई भारत की आबादी का मात्र २.३० प्रतिशत थे। ऐसा होने का एक कारण यह है कि ईसाइयों में शिक्षा का अधिक प्रसार हो रहा है और वे परिवार नियोजन अपना रहे हैं ।
भारत में ईसाई धर्म का इतिहास अमरीका और कई अन्य ईसाई-बहुल देशों से अधिक पुराना है। मलाबार तट पर सेंट थामस ने ५२ ई० में चर्च की स्थापना की थी। तभी से ईसाई मिशनरियां भारत के सामाजिक परिदृश्य का हिस्सा बनी हुई हैं । अनेक सुदूर क्षेत्रों में और कई बड़े शहरों में भी स्कूलों और अस्पतालों की स्थापना का श्रेय उन्हें ही जाता है। यह सचमुच बिडंबनापूर्ण है कि जहां सुदूर क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों पर हमले हो रहे हैं वहीं मिशनरियों द्वारा शहरों में चलाए जा रहे स्कूल और अस्पताल उच्च मध्यम वर्ग की पहली पसंद हैं और वे लोग जो दिन रात ईसाई मिशनरियों के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं तब भी अपने बच्चों को मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में पढ़ाने के लिए ललायित रहते हैं।
यद्यपि भारत में ईसाईयत का इतिहास बहुत पुराना है तदापि मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन कराने का मुद्दा अभी हाल ही में सामने आया है। पहली बार इसकी चर्चा सन् १९५० के दशक के उत्तरार्ध में हुई परंतु यह मुद्दा परवान चढ़ा ८० के दशक के मध्य से, जब पहचान की राजनीति और आरएसएस द्वारा वनवासी कल्याण आश्रम की गतिविधियों का प्रसार हुआ। इस दौरान कई बाबाओं और आचार्यों ने आदिवासी इलाकों में अपने आश्रमों की स्थापना कर डाली और आदिवासियों के 'हिन्दुत्वीकरण` की प्रक्रिया शुरू कर दी। घर-वापसी अभियान इसी हिन्दुत्वीकरण की प्रक्रिया का अंग था। इससे भाजपा को चुनाव में आदिवासियों का समर्थन पाने की आशा थी और उसकी यह आशा पूरी भी हुई। बाद में कुछ राज्यों में धर्म परिवर्तन को निषेध करने वाले कानून बनाए गए। इन कानूनों के पीछे भी राजनीति थी, यह इस तथ्य से और साफ हो गया था कि तमिलनाडु की जयललिता सरकार ने ऐसा कानून बनाया परंतु लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद इस कानून को वापस ले लिया गया।
ईसाइयों के विरुद्ध हिंसा और मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा में कई मूलभूत फर्क हैं। मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा उन इलाकों से शुरू होती है जहां मुसलमान और हिंदू व्यापारियों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा हो। राजनैतिक चालबाजियों और बाबरी मस्जिद और गोधरा जैसी घटनाओं के कारण मुस्लिम विरोधी हिंसा में भारी वृद्धि हुई है। ईसाई विरोधी हिंसा में इतना खून खराबा नहीं होता। यह हिंसा मुख्यत: आदिवासी इलाकों में होती है। यद्यपि इसे गुजरात जैसे राज्यों, जहां आदिवासियों का आबादी में प्रतिशत आधे से भी कम है, में भी इसे राजनैतिक मुद्दा बना लिया जाता है।
आदिवासी इलाकों में इस समस्या के कुछ और पहलू भी हैं। आदिवासी इलाकों में हनुमान और शबरी को लोकप्रिय बनाने के प्रयास हो रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में राम और दुर्गा का सहारा लिया जा रहा है। इसमें आदिवासियों की हिंदू राष्ट्र में क्या जगह होगी, उसका संदेश भी निहित है। जब से आदिवासियों ने बढ़ती शिक्षा के चलते अपने भू-अधिकार मांगना शुरू कर दिए हैं तब से उनके फक्कड़पन को महिमामंडित करने का अभियान चलाया जा रहा है। यही कारण है कि पहचान की राजनीति करने वालों को ईसाई मिशनरियों द्वारा इन इलाकों में किए जा रहा शिक्षा का प्रसार बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। विहिप-बजरंग दल का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को जाहिल बनाए रखना है और इसलिए वे ईसाई मिश्नरियों को इन इलाकों से खदेड़ रहे हैं। उन्हीं ईसाई मिशनरियों के शहरों में शिक्षा के क्षेत्र में काम करने से बजरंग दल को कोई आपत्ति नहीं है।
दूरदराज के इलाकों में काम कर रही ईसाई मिशनरियों पर हो रहे हमले इन हमलों के पीछे की राजनैतिक शक्तियों की प्रकृति व प्रवृत्ति पर रोशनी डालते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि ये शक्तियां ईसाईयों और मुसलमानों को देश के लिए आंतरिक खतरा मानती हैं और ऐसा खतरनाक राजनैतिक खेल खेल रही हैं जिसके लिए किसी सभ्य और प्रजातांत्रिक समाज में कोई जगह नहीं है।
सांप्रदायिकता विरोधी कार्यकर्ता राम पुनियानी आईआईटी, मुंबई में प्राध्यापक रहे हैं।


( जन विकल्‍प, जुलाई, 2007 )