October 30, 2007

प्रतिक्रिया


जन विकल्प के माध्यम से आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। आज इसकी सबसे अधिक जरूरत है। देश को बरबादी से बचाने के लिए ऐसे प्रयत्न आवश्यक हैं। आपने पंजाब के बारे में कुछ लिखने को कहा है। इधर एक हिन्दी तथा दो पंजाबी समाचार पत्रों के लिए लिखकर थक चुका हूं। ऐसा भी लगता है कि लिखने को बाकी रहा ही क्या है?
पंजाब के बारे में दूसरे प्रांतों के लोग जाने क्या सोचते हैं, परन्तु पंजाब बहुत जल्दी ही पूरे देश का पिछड़ा प्रांत बनने जा रहा है। हमारी अर्थिकता पूरी तरह खेती पर आधारित है। साठ प्रतिशत अनाज केंद्र को पंजाब दे रहा है। परंतु किसान बुरी तरह २५ हजार करोड़ के करजे के बोझ तले दब चुका है जिससे छुटकारे की कोई संभावना नहीं।अनेक किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यह मानसिकता (हताशा के कारण) बढ़ती जा रही है। एक परिवार के पास औसत जमीन अढ़ाई एकड़ बच पाई है। पांच लाख से अधिक बी.ए., एम.ए., बी.एड., पास कर चुके युवक बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं (एक लाख साठ हजार बी.एड. इनमें शामिल हैं।)
पंजाब के ७० प्रतिशत पढ़े-लिखे युवक और इससे अधिक अनपढ़ अनेक बुराइयों के शिकार हो चुके हैं। बढ़ती आबादी और बेकारी पंजाब की दो ऐसी समस्याएं हैं, जो शायद अगले पांच साल में बहुत खतरनाक स्थितियां पैदा कर सकती है। जिम्मेवार हमारी राजनीतिक पार्टियां हैं। पांच साल तक 'महाराजा` अमृन्द्र सिंह केवल अकाली दल के मुखिया बाप-बेटों को जेल भिजवाने के प्रयत्न करते रहे। अब वही बाप-बेटा राजा और उसके नजदीकी लोगों के पीछे पड़े हैं। गरीबों को आटा, दाल, चावल तथा बीस रुपये किलो देने के वायदे कैसे पूरे होंगेऱ्यह तो राम जाने! बहुत शोर सुनते रहे कि पंजाब में बड़े उद्योग लगेंगे। परन्तु कुछ नहीं हुआ। यदि ऐसा सपना कभी पूरा भी हुआ
तब भी किसी मूल समस्या का समाधान संभव नहीं। सभी बड़े उद्योग आटोमेशन से चलने लगे हैं यदि कुछ इंजिनीयरों तथा मकैनिकों की आवश्यकता हो भी तो केवल दो-चार हजार को काम मिल जायेगा। बाकी बारहवीं से पी.एच.डी. की तक डिग्री लिये भटकते नौजवान कहां जायेंगे? अढ़ाई एकड़ खेती में भी क्या काम बच पाया है?
कोई स्वरोजगार की तो संभावना है ही नहीं, क्योंकि किसान के पास पैसा न होने से पंजाब के सभी कस्बों, छोटे शहरों के दुकानदार घाटे की चपेट में हैं। और अधिक दुकाने कैसे चलेंगी? सरकार की नीतियां बेकार हैं। शहरों में
नई कालोनियों पर करोड़ों खर्च करने से आर्थिक संकट बढ़ेगा। यदि गंधक और चावल की खेती के चक्र को रोका गया तो, देश के करोड़ो लोग भुखमरी का शिकार हो जायेंगे। जो दूसरी फसलें बोई गइंर् तो (जैसे फल आदि) तो उन्हें खरीदेगा कौन? जब पूरे देश की नीतियां केवल पंद्रह-बीस करोड़ मध्यवर्ग तथा उच्च मध्य वर्ग के लिए ही बन रही हैं तो ९० करोड़ लोगों का क्या होगा? इसे समझने में किसी को मुश्किल नहीं होनी चाहिए। उद्योगपतियों तथा सरकार ने मिलकर पंजाब के किसानों के सिर चार लाख ट्रैक्टर मढ़ दिये। जबकि केवल ८० हजार की जरूरत थी-क्या अब उद्योगपति किसान का भला करेंगे?
-गुरदयाल सिंह, जैतो, पंजाब

अगस्त अंक में 'आज के तुलसीगण` लेख के लिए प्रमोद रंजन को जितनी भी बधाई दी जाये वह कम होगी। कवि, लेखक, साहित्यकार, कलाकार, जैसे लोगों से न्यूनतम अपेक्षा की जाती है कि वे और कुछ करें या न करें कम से
कम समाज में घृणा नहीं फैलायेंगे तथा वंचित तबके के पक्षधर रहेंगे। किंतु कवि अरुण कमल ने वंचित तबकों को 'गली के भूखे कुत्ते` कहकर दुर्भावना का परिचय दिया है। यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि घनघोर जातिवादी
सर्वत्र सम्मानित हैं। हालांकि लेखक ने नंदकिशोर नवल की भी आलोचना की है फिर भी नवल जी को इसका श्रेय तो जाता ही है कि उन्होंने बीसवीं शताब्दी के उस अजूबे की पहचान को डिकोड किया है जो अरुण कमल के शब्दों
में अपने ही खून और पेशाब में डूब कर एक दिन मिटेगा। साहित्यकारों को कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। जब कुछ कथित मूर्ख लोग प्रेमचंद की कृतियों को जला सकते हैं, प्रेमचंद जीवित होते तो उनका पुतला भी जलाते, तो कुछ होशियार लोग ऐसे स्पष्ट घृणित जातिवादी पूर्वाग्रहों का मुखर विरोध क्यों नहीं करते?
-राजेश यादव, पुनाईचक, पटना

अगस्त अंक में आपका लेख 'आज के तुलसीगण` अद्भुत है। राजूरंजन प्रसाद ने भी बढ़िया लिखा है। 'समकाल` स्तंभ इस बार सार्थक लगा। रवीश जी ने भी बेहद जरूरी जानकारी दी है।
-पंकज पराशर, दिल्ली।

जन विकल्प जैसी अच्छी पत्रिका हिंदी में विरल है। आप साहित्य वार्षिकी का प्रकाशन करने जा रहे हैं, यह जानकर अच्छा लगा।
-राजीवकुमार झा, बड़हिया, (बिहार)

जन विकल्प का यह बिगुल देश के कोने-कोने तक फैलाने की जरूरत है। आज के ज्वलंत सवालों से सीधे भिड़ंत कम ही लोग कर पा रहे हैं। हम यहां महाराष्ट्र में 'विद्रोही सांस्कृतिक चलवल` नाम से संस्कृतिकर्मियों का संयुक्त
मोर्चा चला रहे हैं। हम मुंबई के संस्कृतिकर्मियों तक 'जन विकल्प` को पहुंचाना चाहेंगे।
-सुधीर ढवले, मुंबई।

Editorial-'Azaadi..' is the best so far. You should plan whole isue on all points raised in your editorial. I am with you when you say that Britishare not responsible for all evils India have today. No doubt, 1947 hasbeen celebrated beyond proportion. Interview of Sanjay Kak and Amartya Sen are also Valuable.
- Prempal Sharma, Delhi


पत्रिका अच्छी है। सभी लेख, कविताएं सामयिक हैं। अध्ययन कक्ष, धरोहर के अंतर्गत 'गुलामीगीरी` लेख से काफी जानकारी मिलती है। संपादकीय 'सामाजिक न्याय का महायान` तर्कयुक्त है, आपने ओबीसी के प्रति जो चिंता जताई है, वह उचित है।
-छोटेलाल प्रसाद, अमृतनगर, वर्धमान (पं.बंगाल)

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