December 24, 2007

बुद्ध, मार्क्स और आज की दुनिया



मई महीने के पूरे चांद का दिन गौतम बुद्ध का जन्म दिन है और ५ मई कार्ल मार्क्स का। इसलिए इस बार जब लिखने बैठा तब इन दोनों का स्मरण स्वाभाविक था। इन दोनों के विचारों ने हमारी पीढ़ी और समय को प्रभावित किया था। पूरी बीसवीं सदी मुख्य तौर से मार्क्सवादी और मार्क्सवाद विरोधी खेमों में बंटी रही। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया को बुद्ध ने भी अपने अंदाज में प्रभावित किया।

कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र जब मैंने पहली दफा पढ़ा था तब हाई स्कूल में था। इस पुस्तिका की अधिकांश बातें हमारे सिर के ऊपर से निकल गयी थीं, फिर भी बहुत कुछ ऐसा था, जिसने सम्मोहित किया था। हमारी पीढ़ी घर में पिता और बाहर में परमपिता से डरने वाली पीढ़ी थी। तमाम नैतिकतायें हमें इनका पालतू होना सिखलाती थीं। इस घोषणा-पत्र के द्वारा हमने वर्ग-संघर्ष, पूंजी, सर्वहारा जैसे कुछ नये शब्द और परिवार, राष्ट्र व आजादी के नये अर्थ पाये थे। 'कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग कांपते हैं तो कांपे! सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है और जीतने के लिए उनके पास सारी दुनिया है` जैसे ओजपूर्ण समापन ने हमारे संस्कारों की चूलें हिला दी थीं। वास्तविक आजादी संस्कारों की आजादी होती है। कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र ने हमें आजादी का नया अर्थ दिया था। गांव में बैठ कर हम दुनिया की आजादी का स्वप्न देखते थे। इस आजादी की तलाश में हम साहित्य, राजनीति, इतिहास और विज्ञान के पृष्ठ-दर-पृष्ठ पलटते थे। कभी गोर्की और चेखब मिलते थे, कभी माओ और फिदेल को । इसी क्रम में जब हमने इतिहास में प्रवेश किया तब गौतम बुद्ध से मुलाकात हुई। बुद्ध और मार्क्स में हमने अद्भुत साम्य पाया।

मार्क्स वाया शॉपेनहावर बुद्ध के नाम से तो परिचित थे,उनकी विचारधारा से नहीं। हालांकि मार्क्स ने जर्मन दर्शनशा में ही अपनी जड़ें तलाशी हैं, और हीगेल के दर्शन को ही पैर के बल खड़ा किया है, लेकिन दर्शनशा का कोई विद्यार्थी कह सकता है कि हीगेल कि अपेक्षा बुद्ध मार्क्स के ज्यादा करीब हैं।

बुद्ध के गुजरे ढ़ाई हजार साल हुए और मार्क्स के गुजरे कोई सवा सौ साल। आज बहुत सी स्थितियां बदली हैं। अनेक आविष्कारों और अर्थशा व राजनीति के क्षेत्र में नये प्रयोगों ने हमें नये तरीके से सोचने के लिए विवश किया है। आज न बुद्ध का जमाना है, न मार्क्स का। इसलिए आज हम यदि बुद्ध और मार्क्स को हू-ब-हू वैसे ही अंगीकार करना चाहें जैसे वे अपने जमाने में थे, तो हम अजायबघर की सामग्री बन जायेंगे। लेकिन उन दोनों के अध्ययन का अभाव हमारी विचार प्रणाली को कमजोर करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

हमारे देश में बुद्ध और मार्क्स से लोग बीसवीं सदी के आरंभ में परिचित हुए। मार्क्स से बीसवीं सदी के आरंभ में परिचित होने की बात तो समझ में आती है क्योंकि उनका निधन १८८३ में हुआ और वे जर्मन थे, किन्तु बुद्ध तो हमारे ही देश के थे और कोई हजार वर्ष तक उनके धर्म की धूम हमारे देश में रही थी। यह अजीब बात है कि वर्णाश्रम धर्म वालों ने बुद्ध का निर्वासन इस तरह किया था कि वे पुन: विदेशियों के द्वारा ही हमारे बीच आ सके। एडविन अर्नाल्ड के काव्य 'लाइट ऑफ एशिया` के द्वारा उन्नीसवीं सदी के आखिर में हमारे भद्रलोक को बुद्ध की जानकारी मिली। बीसवीं सदी के आरंभ में पुरातात्विक खुदाइयों से जब मोहनजोदड़ो, हड़प्पा की खुदाई हुई तो आर्य श्रेष्ठता का दंभ ढीला पड़ा, क्योंकि पता चला कि आर्य संस्कृति से पूर्व ही यहां उससे कहीं श्रेष्ठ सभ्यता-संस्कृति मौजूद थी। कुम्हरार, नालंदा, विक्रमशिला आदि की खुदाई के बाद लोगों को अशोक और बुद्ध के बारे में विस्तार से जानकारी मिली।

कभी-कभी सोचता हूं कि जोतिबा फुले को यदि बुद्ध की जानकारी मिल गयी होती तो क्या होता। फुले भारत के दलितों के लिए इतिहास ढूंढते पौराणिक कथाओं में पहुंचे और बलि राजा को अपना नायक बनाया। भारत के लिपिबद्ध इतिहास में उनके लिए कुछ नहीं था। उन्हें अपने लिए एक गॉड की जरूरत थी, निर्मिक नाम से उन्होंने अपना भगवान गढ़ा। फुले को यदि संपूर्णता के साथ बुद्ध और बौद्ध इतिहास की जानकारी होती तो अपनी वैचारिकी को वे अपेक्षाकृत ज्यादा विवेकपूर्ण बनाते और तब संभवत: आधुनिक भारत के इतिहास का चेहरा जरा भिन्न होता। फुले रेगिस्तान के प्यासे हिरण की तरह बहुत भटकते रहे। वे समानता के आग्रही थे। ब्राह्मणवाद से वे मुक्ति चाहते थे। हिन्दू वर्णधर्म का खात्मा चाहते थे। किसानों और शूद्रों का राज चाहते थे। अपनी चेतना से जितना हो सका उन्होंने किया। अंबेडकर को बुद्ध और मार्क्स दोनों उपलब्ध थे, उन्होंने दोनों का उपयोग भी किया। इसलिए वैचारिक रूप से वे ज्यादा दुरुस्त और संतुलित हैं।

आज यह कहना मुश्किल है कि बुद्ध और मार्क्स हमारे समय को कितना प्रभावित कर रहे हैं। कुछ सामाजिक दार्शनिक विचारहीनता के दौर की बात करते हैं। लेकिन जिसे लोग विचारहीनता कहते हैं, वह भी अपने आप में एक विचार है। पुराने जमाने के चार्वाक की बातों को लें तो कमोबेश ऐसी ही विचारहीनता अथवा सभी मान्य विचारों के निषेध की बात वह भी करते थे।आज कहीं-न-कहीं चार्वाकवाद के प्रभाव में हमारा जमाना आ चुका है। कम से कम ऋण लेकर घी पीने की उनकी सलाह (ऋण संस्कृति) तो हमारे समय का सबसे बड़ा विचार बन गया है। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि चार्वाकवादियों ने वेद और ईश्वर का चाहे जितना निषेध किया हो सामाजिक परिर्वतन के लिए कुछ नहीं किया। वर्ण धर्म पर वे चुप थे। इसीलिए कुछ मुकम्मल मार्क्सवादी मित्र जब भारतीय दर्शन में लोकायत और चार्वाक से अपनी नजदीकी तलाशते हैं तो मुझे एतराज होता है।

मार्क्स ने बहुत सी बातें की हैं लेकिन उनकी बात जो आज भी हमें उत्साहित करती है वह यह कि अब तक के दार्शनिकों ने विभिन्न तरह से विश्व के स्वरूप की व्याख्या की है, लेकिन सवाल यह है कि इसे (विश्व समाज को) बदला कैसे जाय।
बुद्ध और मार्क्स यहां एक साथ नजर आते हैं।
  • प्रेमकुमार मणि

प्रतिक्रिया

पत्रिका का तीसरा अंक मिला। मेरी शुभकामनाएं! मौजूदा समय में जब विचारों और इतिहास के अंत की घोषणाएं धूम-धाम से की जा रही हो, तब 'जन विकल्प` जैसी पत्रिका की जरूरत ज्यादा ही महसूस होती है। आप एक बहुत ही जरूरी काम कर रहे हैं। यह पत्रिका ये बता रही है कि इतिहास का अंत नहीं हुआ है, हुआ सिर्फ यह है कि नया इतिहास नया किरदार लिख रहा है। सामंती युग के हीरो अब इस खेल में नहीं दिख रहे, तो कुछ लोग कम रोशनी का बहाना कर गेम रोकना चाहते हैं। भारतीय संदर्भ में, ब्राह्मणवाद इस समय लोकतंत्र और बाजार के दोहरे हमले से चरमरा रहा है। शहरीकरण और इंटरकास्ट शादियों की वजह से जाति की बुनियाद हिल रही है। समाज में इसकी वजह से तनाव है, पर ये शुभ नहीं है। आपकी पत्रिका इस तनाव को दर्ज कर रही है। आप मौजूदा समय का इतिहास लिख रहे हैं। इतनी बड़ी भूमिका निभाने में आपको कामयाबी मिले।
-दिलीप मंडल, दिल्ली

American detained for Puri temple visit ( 3rd March 2007, TOI), temple administration took a fine of Rs 209 from him even as some shrine priests insisted that the BHOG for the day should be dumped as it had been defiled by the presence of a non Hindu inside the temple.
The religion which teaches you to not to treat people with equal is not a religion. Csateism is backbone of Hinduism & only emancipation is a conversion. These were the people those were talking stupidly over the Racism, without knowing that Casteism is much more dangerous than racism.
A recent study has shown that in India about 63% Hindu temples prohibits Dalits. We do not want to go there as a worshiping Hindu’s fake gods but we demand equal rights over everything.
-Pradeep Atri. Mukerian, Punjab.


मार्च अंक में स्वामीनाथन पर आलेख पूरा पढ़ गया। पत्रिका इस दृष्टि से अच्छी है कि इसे पढ़ने में कठिनाई नहीं होती। मैं तकनीकी पहलू की बात कर रहा हूं। यह ठीक है कि इसे यूनीकोड पर यानी मंगल फौंट पर इन्टरनेट पर लगा कर सारी दुनिया के पाठकों के पास पहुंचाना चाहिए।
-विनोद रिंगानिया, गुवाहाटी

साहित्य के लिए किया गया प्रयास समाज के लिए एक वरदान है। 'जन विकल्प` द्वारा किए जा रहे आपके कार्य सराहनीय हैं।
-Devi Nangrani

I am not comfortable with Hindi. But Hindi speaking friends of HETUBADI magazine are appreaciating Jan Vikalp very much. we will be able to organise a good no. of subscribers.
-Ananta Acharya, Kolkatta. asim.ananta@gmail.com

इनके भी संदेश मिले : एसआर हरनोट, शिमला, विजेन्द्र एस विज, दिल्ली, गणेश मिश्र, अम्बिकापुर कपिल, अमरावती, हर्षित पाण्डे, आईआईटी, रूड़की, मृत्युंजय प्रभाकर, दिल्ली, अनन्त आचार्य, कलकत्ता, मनोरंजन मुकेश, दिल्ली, नचिकेत, थाने, विन्नु पहवानी धीरेश सैनी, मुजफ्फरनगर, पूरन मुद्गिल, भोपाल, कमल सिहं चौहान, खंडवा, मप्र, महेश सांख्यधर, बिजनौर, संतकुमार टण्डन 'रसिक`, इलाहाबाद, अजेय, लाहुल स्पिति।

फिर उभरा फासीवादी जिन्न



  • स्वतंत्र मिश्र

सीडी जैसे तमाम प्रकरण भाजपा की रणनीति के औजार हैं । इस घटना से जुड़ी तमाम खबरों के अध्ययन के बाद जाहिर तौर पर यह घटना प्रायोजित मालूम पड़ती है। भाजपा के मातृ संगठन आरएसएस का गठन १९२५ में इसी आधार पर किया गया था।


किसी कारण से मेरे टेलीवीजन के रिमोट ने काम करना बंद कर दिया था। मेरी मजबूरी यह हो गयी कि मैं एक मात्र खबरिया चैनल आईबीएन-७ का दर्शन कर सकूं, जिस पर भाजपा द्वारा प्रचारित जहरीली सीडी का विज्ञापननुमा समाचार अनगिनत ब्रेकों के बाद भी अबाध गति से प्रसारित हो रहा था। खबरों में सीडीमयता के प्रवाह के बारे में अगर कहूं कि चैनल आकंठ 'जहरीली सीडी` में डूब गया था तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन, केशरीनाथ त्रिपाठी, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, रविशंकर प्रसाद, वैंकेया नायडू, लालकृष्ण आडवाणी समेत तमाम लोग सीडी के इस जहरीले प्रकरण पर कभी शर्माते , कभी घबराते हुए, कभी दहाड़ते हुए भीगते-सूखते बारी-बारी से मीडिया के जरिये आम वोटरों से रू-ब-रू होते रहे। अभी तक यूपी में अमिताभी करिश्मा के जरिये समाजवादी पार्टी ने 'यूपी में बड़ा दम है` की तर्ज वाले ढेर सारे प्रचारों के जरिये लाभ लेने की कोशिश की थी ताकि 'मुलायम कायम रहें`। इसके बाद कांग्रेस ने विज्ञापन के जरिये राज्य की खस्ताहाल तस्वीरों को दिखाकर जनता को यह बताने की कोशिश की कि 'इससे तो अच्छी १९ साल पहले कांग्रेस की सरकार` थी। भाजपा इस चुनाव में एक सिरे से गायब मालूम पड़ रही थी। चुनाव प्रचार के अंतिम चरणों में अचानक चैनलों के सौजन्य से एक सीडी को चलाने की कोशिश की गयी। साथ में चैनल के एंकरों द्वारा यह बताया जाता रहा कि वे इसलिए सीडी का प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं क्योंकि इससे दो संप्रदायों के बीच दंगा भड़क जाने का निश्चित खतरा पैदा हो जाएगा। चैनल वालों ने इस सीडी का राज आम दर्शकों के सामने साफ तौर पर बयां नहीं किया इसलिए दंगा नहीं भड़का। हालांकि भाजपा को इस विस्फोट का जो लाभ पाना था, वह उसे चुनाव समीक्षकों के अनुसार मिल जाएगा। जनता के बीच सौहार्द बना रहे चैनल की इस सदिच्छा के लिए उन्‍हें धन्यवाद दिया जाना चाहिए। परंतु उनकी सदिच्छा जनता के हित की कुछ खबर विशेष तक क्यों सिमट कर रह जाती है, इस पर कभी और बात करना ठीक होगा। फिलहाल अभी हिट हो चुकी सीडी की सुनिश्चित और सफल होती योजनाओं के वर्तमान संदर्भों पर चर्चा लाजिमी होगी।

सीडी के जारी होते ही टेलीविजन और समाचार पत्रों में आती दनादन खबरों ने उत्तर प्रदेश चुनाव में हाशिये पर खड़ी भारतीय जनता पार्टी को चुनाव के केंद्र में ला दिया। हालत यह है कि तीसरे चरण का चुनाव संपन्न होने के बाद एनडीटीवी एक्जिट पोल में चुनाव समीक्षकों ने माना कि भाजपा अब तक २०-२४ सीट पर बढ़त बनाते हुए सबसे आगे चल रही है। वैसे कुल मिलाकर इस एक्जिट पोल के अनुसार बसपा इस बार की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आएगी। चुनाव में सबसे ज्यादा घाटा समाजवादी पार्टी का होना तय माना जा रहा है। सीडी प्रकरण से पूर्व टीवी पर आ रहे विज्ञापनों के हिसाब से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच जबरदस्त घमासान की तस्वीर बनती दिख रही थी। परंतु सीडी की नौटंकी के बाद अब समीकरण बदल चुका लगता है। इस प्रकरण से भाजपा को मिलता लाभ देखकर तमाम तरह की क्षुद्रता से कोई भी पार्टी बचना नहीं चाह रही है। इस घटना के बाद राहुल गांधी ने भी विवाद खड़ा करने की मानसिकता से परिवारवादी परिभाषा से रचा बसा हुआ बयान दे डाला।


परिवारवाद कांगेस की राजनीति का मूल आधार रहा है। बहुजन समाज पार्टी पर भाजपा ने यह आरोप लगाया कि पार्टी ने 'बहनजी का संदेश` पुस्तिका जारी की है। इस पुस्तिका में उन्होंने सीधे तौर पर विभिन्न जातियों के लिए आपत्तिजनक बातें कहीं हैं। वास्तव में आज की राजनीति का जो मूल सार है उसके हिसाब से ऐसी बात जायज सी हो गयी लगती है। चुनाव में बाजी मारने के लिए सारी बुर्जुआ पार्टियां नैतिकता आदि राजनीति के मूल सवालों को दरकिनार करके जाति, संप्रदाय, दंगे, मंदिर-मस्जिद, सीडी, साड़ी आदि जैसे कुछ बेहूदा खेल रचकर सत्ता हासिल कर लेना चाहती हैं। बुर्जुआ राजनीति में सत्ता पर काबिज होने की दौड़ में यह हमेशा से एक नियम की तरह लागू रहा है। गांधी इस देश के आज तक के सबसे ताकतवर जन नेता के रूप में उभरे हैं। परंतु इतिहास के पन्नों में आप झांककर देखें तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस से पट्टाभी सीतारमैया की हार पर गांधी जी ने जो बयान दिया था, वह उनकी महानता की सीमाओं को दर्शाता है। सत्ता की लालसा मनुष्य की सीमाओं को उजागर करती है। इसकी पुष्टि के लिए गांधी जी का उद्धरण दे रहा हूं। उस समय की राजनीति में नैतिकता का स्थान था। इसलिए नेताजी ने इस घटना के बाद अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था। वे बापू का सम्मान पूर्ववत् करते रहे। राजनीति में त्याग की भावना का महत्व था। आज की राजनीति और राजनेताओं, नेताओं से स्वार्थ की बू आती है। हो सकता है कि एक-आध लोग इस सामान्यीकरण से परे हो सकते हैं। इसलिए आज के दौर में ऐसी तात्कालिक घटनाओं के संदर्भ में मैं व्यक्तिगत तौर पर विभिन्न पार्टियों द्वारा इस्तेमाल किये जानेवाले ऐसे चुनावी प्रस्तावों को और उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि के आधार पर इन प्रकरणों को समझे जाने की जरूरत महसूस करता हूं। दरअसल इन तमाम बुर्जुआ पार्टियों में से किसी भी पार्टी के लिए ऐसे तमाम प्रतीकों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी पार्टी की ऐसी हरकतें अनायस कहीं आसमान से नहीं टपक पड़ती हंै और न ही पाताल फोड़कर आश्चर्यजनक रूप से सामने आ जाती हंै। यह सब कुछ उनकी विचारधारा के तहत् पनपती और बढ़ती रहती हैं। ऐसे प्रकरण ज्वालामुखी की तरह या बादलों के संधनन प्रक्रिया की तरह मौके की ताक में रहती हैं, मौका पाते ही यह जबरदस्त ढंग से फट पड़ती हैं। इन प्रकरणों के उत्स ढूंढे जाने चाहिए।

सीडी जैसे तमाम प्रकरण भाजपा की रणनीति का एक औजार हैं। इस घटना से जुड़ी तमाम खबरों के अध्ययन के बाद जाहिर तौर पर यह घटना प्रायोजित मालूम पड़ती है। भाजपा के मातृ पार्टी आरएसएस का गठन १९२५ में इस बिना पर ही किया गया था। वे मुगल शासन में हुए हिंदुओं पर अत्याचार के नाम पर सांस्कृतिक तौर पर हिंदुओं के मन में विष भर देना चाहती थीं। लेकिन लंबे समय की कार्यवाही के नतीजों के तौर पर और खासकर गांधी की हत्या के बाद आरएसएस का दमन बड़े स्तर पर हुआ। आरएसएस कलंकित होकर हाशिये पर चली गयी थी। इस घटना के बाद सबक के तौर पर आरएसएस को लगा कि केवल सांस्कृतिक स्तर पर कार्यकर्ता तैयार करने से काम नहीं चलने वाला है। उसने राजनीतिक कार्यकर्ता तैयार करने के लिए संघ (फैक्ट्री) का निर्माण किया जिसने आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में 'राष्ट्रीय` पार्टी का आकार ले लिया। गांधी की हत्या से कलंकित आरएसएस को राजनीतिक स्वीकृति जेपी आंदोलन में जयप्रकाश नारायण के जीवन की सबसे बड़ी भूल के तौर मिल पायी। गांधी के मृत्यु के समय राजनीति का मतलब चरित्र की ऊंचाईयों से लगाया जाता था। यही कारण है कि गांधी की हत्या आरएसएस को बहुत लंबे समय तक महंगी साबित होती रही। आज राजनीति का मतलब अपनी सारी इच्छाओं के पूरित होने या सबकुछ गटक लेने से लगाया जाता है। इन हालातों में जहरीली सीडी, अयोध्या, गोधरा, नांदेड़ आदि जैसे षड्यंत्र हों या फिर लालजी टंडन द्वारा पिछले लोकसभा चुनाव में साड़ी बांटने के दौरान मची अफरा-तफरी से कई लोगों की मृत्यु का मामला हो कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। एक बात और है कि राजनीति में ऐसी शक्तियों को चुनौती देने के लिए किसी जन-संगठन ने अपना जनाधार इस रूप में नहीं फैलाया जिससे इन शक्तियों को सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर पराजित किया जा सके। समाज को सही दिशा में गतिमान किया जा सके यह जन-संगठनों के लिए एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी होगी। जन-संगठनों को गोलबंद होकर इन फासीवादी ताकतों द्वारा रोजी, रोटी के मसलों को पीछे धकेलकर सीडी जैसे खेल खेलने से रोकना होगा। अन्यथा रोजी, रोटी और बुनियादी सवालों की लड़ाई को अपमानित होने से नहीं रोका जा सकेगा।

सुशासन : टोटकातंत्र युग का नया फंडा

समकाल


  • राजकुमार राकेश


सच के सम्प्रेषण के लिए दो व्यक्तियों की जरुरत रहती है
एक बोलने वाला और दूसरा सुनने वाला। -हैनरी डेविड थौरु


संयुक्‍त राष्ट्र संघ के आर्थिक एवं सामाजिक मामले विभाग की एक प्रशाखा द्वारा लोकप्रशासन एवं विकास प्रबंधन प्रभाग ने संयुक्त राष्ट्र लोकसेवा सरकारों के चयन के लिए, ३ नवम्बर, २००६ को एक परिचय पत्र जारी किया है, जिसकी सूचना भारतीय नागरिकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सैन्टर फौर गुड गवर्नेंस, हैदराबाद को सौंपी गई है। यह सैन्टर संयुक्त राष्ट्र संघ ऑन लाईन नेटवर्क-जनप्रशासन एवं वित्त (यू.एन.पी.ए.एफ) का सदस्य है। यह परिपत्र भारतीय नागरिकों को खम ठोककर सुचित करता है कि वर्ष २००७ के लिए संयुक्त राष्ट्र जनसेवा पुरस्कार निम्नलिखित श्रेणियों में वितरित किए जाएंगे :

  • जनसेवा में पारदर्शिता, जवाबदेही एवं उत्तरदायित्व को प्रोन्नत करने हेतु।
  • सेवाओं के निष्पादन की प्रोन्नति के लिए।
  • आविष्कारक विधियों के सौजन्य से नीति-निर्माण के फैसलों में सहभागिता बढ़ाने हेतु, मसलन सहभागिता पूर्ण बजट निर्माण, सामाजिक ऑडिट एवं मॉनिटरिंग इत्यादि।
इतनी व्यापक व महत्वूपर्ण दिखने वाली शब्दावली निश्चय ही पहली नजर में महान प्रतीत होती है। सचमुच जैसे बहुत सी रूढ़ व्यवस्थाएं टूट रही हैं, ढह रही हैं। जैसे इस धरती पर बहुत कुछ या लगभग समूूचा ही बदलता चल रहा है या बदल जाने को है। आप को विश्वास दिलवाया जा रहा है कि आप सिर्फ महसूस कीजिए कि आपके जीवन में कितना कुछ बदल चुका है। जब जीवन ही बदल रहा हो तो भला फिर उसके मंतव्य और उन मंतव्यों की परिभाषाएं क्यों नहीं बदलंेगी। लेकिन हमारे जैसे, कुछ मूढ़मति किस्म के लोग हैं जो इन बदलावों के नकारात्मक प्रभावों को पकड़ने से बच नहीं पाते। गलत और ठीक के बीच की जिस झीनी रेखा को लगातार समाप्त करने की कोशिशें की जा रही हैं, उन्हीं के बीच कहीं यह प्रभाव भी दफनाए जाने की प्रक्रियाएं जारी है। दुनिया के पूंजीवादी अलम्बरदार चमत्कृत कर डालने वाली ऐसी नई शब्दावलियां एवं सामर्थ्यपूर्ण आर्थिक परिभाषाएं गढ़ते हुए संसार को, उस पूंजी के सागर में डुबो देने में जुटे हैं जो सबल और समर्थ की पक्षधर मात्र है। संसार के अधिकांश समाज की त्रासदी यह है कि उसे सागर की सतह से नीचे उतराने का मौका मिलने की कोई संभावना बचती ही नहीं। विश्वास दिलवाया जा रहा है कि आज अमानवीयता की हदों तक भी जो कुछ बदलता चल रहा है वही जरूरी है। उसका कोई विकल्प तक नहीं। इस पर सोचने, विचारने या गौर करने की जरूरत नहीं है बल्कि अगर कोई जरूरत है तो उसे स्वीकार करने और आत्मसात करने भर की है। पूंजीवादी-सामरिक भूमंडलीकरण की खासियत यही है कि वह एक ऐसी अनुकूलित (कंडीशन्ड) मानसिक प्रक्रिया का निर्माण करता चलता है जो हमें अपने स्तर पर अच्छे या बुरे का फैसला करने का मौका दिए बगैर केवल यह प्रतिपादित करता चलता है कि जो कुछ भी बदलता चल रहा है वह तांत्रिकों के टोटकों की तरह अच्छा ही अच्छा है। इन्हीं पूंजीवादी टोटकों में अनवरत वृद्धि करने के लिए आज का संयुक्त राष्ट्र अपना भरपूर और सक्रिय योगदान दे रहा है। उसके उक्त परिपत्र की भावना का उन्मेष इसी अनुकूलित भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से हो रहा है जो संसार को सामरिक नवपूंजी के बल पर दबाए रखकर अपना गुलाम बनाती है। जो इसके विरोध में तनिक सा भी सिर उठाए उसे आधुनिकतम हथियारों से रौंद दिया जाता है। या अंतत: सद्दाम हुसैन की नियति तक पहुंचा दिया जाता है।

इस भूमंडलीकरण के अभिप्रेत और अनुयायी पिछले कुछ वर्षों से खूब प्रचारित कर रहे हैं कि पूंजीवादी आकार पाने को आतुर हर व्यवस्था में अब 'अच्छे शासन` की जरूरत है। बल्कि इसका निहितार्थ तो यह है कि पूंजीवादी शासन ही अच्छा शासन है। इसलिए इसकी उत्पत्ति, परिभाषीकरण और कार्यान्वयन व्यापक पैमाने पर तीसरी दुनिया के देशों को निर्यात किया व करवाया जा रहा है। 'सुशासन` मेरा अनुवाद है जो सही नहीं है। इसका मूल अंग्रेजी शब्द 'गुड गवर्नेंस` है जो टी.वी समाचार चैनलों में उस 'एक्सक्लूसिव` समाचार की तरह है जिसे जानते सभी हैं फिर भी उसका कॉपीराईट 'एक्सक्लूसिव` कहकर हर कोई अपने नाम लिख लेना चाहता है। इस 'गुड गवर्नेंस` की प्रतिध्वनि ऐसी कमजिन है जो वस्तुत: अपना कोई हिन्दी समानार्थक सम्भव ही नहीं छोड़ती। इसलिए सुशासन कहने की बजाए 'गुड गवर्नेंस` कहना ही उचित होगा। वैसे भी 'सुशासन-अच्छा शासन` की हुंकारें लगाने का मतलब होगा कि आज के हमारे इन बुरे शासकों में, सुधार की हर गुंजाइश के बावजूद, इनके पूर्वजों ने हमें बुरे शासन में सांस लेते रहने को मजबूर कर रखा था। असल में आज के शासन की अमानवीयताएं पिछले किसी भी समय की तुलना में चरम पर हैं और अनवरत विकृतियों की ओर भी बढ़ती चल रही हैं। इन सब के बीच ही 'गुड गवर्नेंस` का फंडा है। इसलिए हमें इस तथ्य से शुरू करना होगा कि यह 'गुड गवर्नेंस` असल में शासन के राजनैतिक या प्रशासनिक अर्थों में अच्छा शासन नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उस पूंजीवादी-निजीकरण वाली आर्थिक नीति से है जो संसार को, खास तौर पर तीसरी दुनिया के देशों को भूमंडलीकरण के नाम पर अमेरिका का उपनिवेश बनाती है जिसमें केवल पूंजी और पूंजी स्वामियों का अस्तित्व और वर्चस्व होगा। बाकी बचे दो जून की रोटी के लिए हाड़ तोड़ते लोग उसमें सिर्फ दास होंगे। उनका जीवित अस्तित्व इस धरती पर उत्तर-आधुनिक गुलामों से ज्यादा कुछ नहीं होगा। वे सिर्फ वोट डालने वाले बटन की तरह संचालित होंगे।
इस भूमंडलीकरण ने पिछले देढ़ दशक के अपने भारतीय सफर में कल्पनातीत और अबाध वेग से आर्थिक बाजारीकरण को ऐसी दिशा में मोड़ दिया है जिसके हर शिखर और हर खाई में केवल कार्पोरेट उपभोक्तावाद की चकाचौंध स्थापित हो चुकी है या होने वाली है। वहां यह पूरी तरह स्थापित हो चुका है कि इस राष्ट्र-राज्य की अपनी निजी अर्थनीति का कोई अर्थ मौजूद नहीं है। भले ही सत्तासीन शासक अपने पिछलग्गू अर्थशाय़िों की पीठ पर सवार होकर नई शब्दाबलियां गढ़ रहे हों, लेकिन अपने हर अस्तित्व में वे अब महज बाजार की उत्पत्ति, उसकी उन्नति और उसके विकास के सेवक मात्र हैं। इस देश की जनता के नहीं जो वोट देकर उन्हें सत्ता के एयर-कंडीशन्ड गलियारों तक पहुंचाती है। इनकी सार्वजनिक गर्जनाओं का असल में इस देश की व्यापक जनता और उसके हित से रत्तीभर भी लेना-देना नहीं है, क्योंकि यह सारी आवाजें उसके लिए नहीं बल्कि सुदूर सात समंदर पार बैठे अपने वैश्विक आकाओं को सम्बोधित है। यह जनता जो उन पर घोर विश्वास किए बैठी है वह पूरी तरह भ्रमित है। इस भ्रमित यथार्थ का संदेश उनके लिए सिर्फ यही है कि उदारीकरण, खुले बाजारों की चका-चौंध, निजीकरण की आंधियां, लाभ कमाने की असीमित इच्छाएं एवं उपभोक्तावादी दर्शन की दमक अब भारतीय समाज के जीवन में इस कदर प्रवेश कर चुकी है जिससे आने वाली कई शताब्दियों तक मुक्ति का कोई मार्ग बचता ही नहीं। अमेरिकाई आका क्या यही संदेश भारत सहित संसार की पूरी मानवता को नहीं देना चाहते?

इन बदलावों ने एक ओर जहां भारतीय समाज के आर्थिक रूप से उन्नत हो चुके या हो रहे तबकों एवं उसके पीछे लालसाओं की खाली झोलियां उठाए दौड़ते विशाल मध्यमवर्ग के लिए जहां सुखवाद की बयार बहा दी है, वहीं दूसरी ओर जीवन की बुनियादी जरुरतों के लिए जूझती अधिकांश जनता को अधिकाधिक वंचित करते चलने की प्रक्रिया को तेजी दी है। उन्नत वर्गों का एकमात्र उद्देश्य अधिकाधिक लाभ कमाना और उसे अनवरत बढ़ाते चलना है इसे वे अपनी लागत पूंजी एवं जैसा कि वे अपने लिए कहते है-'एन्टरप्रिन्यूरशिप` पर आने वाले रिस्क फैक्टर की लुभावनी शब्दावलियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यही रिस्क फैक्टर सुखवाद की बयार का मूल आधार बन आता है, जो शेष समाज को विज्ञापनों और तथाकथित उपभोक्ता कानूनों के माध्यम से उपभोक्तावाद के गहरे गर्त में धकेलने की सफल साजिशें रचता है। इस लक्ष्य में पहला निशाना नौकरीपेशा मध्यवर्ग है। वस्तुत: यही मध्यवर्ग उपभोक्तामंडी की प्रथम कर्मभूमि है। यह उधार की इच्छाओं से प्रेरित प्रतिस्पर्धात्मक एवं विज्ञापनी खरीद से शुरु कर के अंतत: उस मंडी का सम्पूर्ण हिस्सा हो जाता है। उन्हें भ्रम होने लगता है कि वे सम्पन्नता का हिस्सा होते चल रहे हैं तथा शिखर पर बैठे उन्नत वर्ग तक उनकी पहुंच अब ज्यादा दूर नहीं है। जनता के वोट से चुनी हुई सरकारें जो वस्तुत: उस उन्नत वर्ग की हित रक्षक और प्रतिनिधि हैं वे भी इस मध्यवर्ग को लगातार उपभोक्ता मंडी की चकाचौंध में शामिल होने का निमंत्रण देती रहती हैं। व्यापक पैमाने पर यह मध्यवर्ग इन सरकारों की फिजूल खर्चियों को पूरा करने के लिए टैक्स का ढांचा उपलब्ध करवाता है। (बहुधा तो इन सरकारों के पास शराब का बिक्री-टैक्स मात्र ही उनके उड़नखटोलों को उड़ाए रखने का इंतजाम करता है) धर्म और जाति की राजनीति ने मध्यवर्ग को पक्के वोट बैंकों के रूप में स्थापित करवा ही डाला है इसलिए आर्थिक नीतियां उनके जीवन से क्या खिलवाड़ कर रही हैं इस पर उनका ध्यान पल भर के लिए भी नहीं जाता। महंगाई पर जो मनोरंजक चर्चाएं होती और सुनी जाती हैं उनका महत्व भी धर्म और जाति की राजनीति तक ही सीमित है।

इस सामाजिक स्थिति की व्युत्पत्ति के साथ नेहरू युग में स्थापित सामाजिक कानूनों के नकारा हो जाने का ढोल अब खूब पीटा जा रहा है क्योंकि इनकी मूलभावना वंचित तबकों को न्याय दिलवाने की रही है जबकि आज का भ्रमित राजनैतिक यथार्थ और उसकी नवबाजारवादी अर्थनीतियां भूख, गरीबी, वंचना, बेरोजगारी और साधनहीनता के आस्तित्व को स्वीकार करने से ही इन्कार करती हैं। उनके लिए बेहतर साधन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और इस प्रकार भविष्य के जीवन की कोई गारंटी नहीं है। व्यक्तिगत और सामाजिक तौर पर उनके होने तक के सारे अर्थ छीन लिए गए हैं। यह तीसरी दुनिया के भीतर एक और तीसरी दुनिया है, जो असल में छठी दुनिया का निर्माण करती है। यह मानवीय दशा असल में राष्ट्रराज्य से सुशासन चाहती है किंतु वर्तमान व्यवस्थाएं जिसे 'गुड गवर्नेंस` कहती हैं, उसकी तो शुरुआत ही सोच के उस बिन्दु से होती है जहां से यह छठी दुनिया दिखती ही नहीं। अच्छा शासन कौन नहीं चाहता। यह तो आदिम मानवीय इच्छा रही होगी कि हर व्यक्ति ऐसी व्यवस्था में जिए जहां वह स्वतंत्र हो, आर्थिक रूप से मुक्त, अपना मनपसंद जीवन जीने के योग्य बने। जब से सामूहिक और सामाजिक जीवनवृत्तियों का उद्भव हुआ है मनुष्यमात्र यही चाहता रहा होगा। लेकिन आज के इस 'गुड गवर्नेंस` की अर्थ ध्वनि अनिवार्यत: सामूहिक क्रियाओं के ऐसे संगठनात्मक कामों के रूप में सुनी जा रही है जिसमें समाज के सामान्य उद्यमों का प्रबंधन निजी हाथों में पूरी तरह सौंप दिया गया हो। यूं कहने को यह सार्वजनिक और निजी, संस्थाओं और व्यक्तियों, राजनीति और अर्थनीति, सामाजिक लक्ष्यों और सर्वमान्य आदर्शों के बीच की संयुक्त सहकारिता है। इन सुंदर शब्दों के पार यह भली भांति महसूस किया जा सकता है कि आज की इस भूमंडलीकृत उत्तर आधुनिक दुनिया के पोल में इस क्रिया-कलाप को भले ही इन अनवरत प्रयासों के रुप में देखे जाने का आग्रह हो, लेकिन यह सारे भ्रमपूर्ण माध्यम समाज के विभिन्न वर्गों के परस्पर विरोधी आर्थिक व सामाजिक हितों को एकीकृत नहीं कर सकते, चाहे वे ऐसे लाखों-लाख दावे ही क्यों न करते चलें। कहा जाता है कि इस राष्ट्र-राज्य की तमाम आधुनिक व्यवस्थाएं ऐसे अनिवार्य संस्थागत उपाय कर रही हैं जो बहुत से अनिवार्य क्रियाकलाप अनुमोदित और निर्देशित करेंगी तथा अन्य का विरोध भी करेंगी जिनके माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों के झगड़े और विवाद निपटाए जा सकेंगे। इन भ्रमपूर्ण वक्तव्यों का वही अर्थ निकलता प्रतीत होता है जो समतामूलक समाज स्थापित करने में जुटी ताकतों का हो सकता है। किन्तु यह बहुत सतही यथार्थ है। गवर्नेंस की पूरी प्रक्रिया कानूनी-साधनत्व के माध्यम से अधिकार और कर्त्तव्यों का निर्धारण करती है लेकिन आज की यह 'गुड गवर्नेंस` असल में उसी कानूनी साधनत्व को नष्ट-भ्रष्ट कर रही है ताकि वंचित तबकों को इतना कंडीशंड कर दिया जाए कि उन्हें जीने के न्यूनतम साधनों की दरकार ही महसूस न हो। उन्हें लगे कि वे जिस भी हालत में हैं वह उनके कर्मों और भाग्य का फल है। इस प्रकार के निहित उद्देश्यों के लिए 'गुड गवर्नेंस` की शब्दाबलियां गढ़ी जानी हैं। पहली नजर में मनमोहक दिखने वाले इन शब्दों की व्याख्या के लिए जो अन्य उपकरण परोसे जाते हैं वे अपने इस मूल से भी ज्यादा मनमोहक हैं। जैसेे-सेवा की अपेक्षा जनसशक्तिकरण की ओर; नाव की तरह खेने की बजाए मार्ग दिखलाए जाने की ओर, इलाज की बजाए परहेज की ओर, खर्च की अपेक्षा आय की ओर.... कहा जा रहा है कि शासन की प्रक्रिया में दक्षता लानी होगी, खर्च कम करना होगा, समय का उपयोग करना होगा, जवाबदेही लानी होगी, जिम्मेदारी और पारदर्शिता स्थापित करनी होगी। इस नवउदारवाद की स्थापित मान्यता है कि इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सरकारों के संचालन में बाजारवादी प्रक्रियाओं का प्रवेश करवाना होगा। तो इस तमाम सौंदर्यपूर्ण शब्दाबली का अंतिम लक्ष्य 'बाजारवादी प्रक्रियाएं` हैं। अब राष्ट्र-राज्य की तमाम सरकारें उपभोक्तावादी हितों से परिचालित होंगी, बाजारोन्मुख होंगी और यह नया जनप्रशासन इन्हें प्रबंधकर्त्ता के रूप में स्थापित करेगा। आय का श्रोत बाजार होगा तो यह प्रबंधन उसी के हित से संचालित होगा। जो भूखे-नंगे बाजार से बाहर होंगे, उनके लिए 'गुड गवर्नेंस` के दायरों में प्रवेश की अनुमति का सवाल फिर उठेगा ही कहां से? वे बेचारे न तो उपभोक्ता हैं, न लाभांश अर्जित और अधिकाधिक बढ़ाने वाले, न टैक्स दे सकने वाले... उनके पास है क्या जो राष्ट्र-राज्य उनके बारे में सोचे। राष्ट्र-राज्य तो 'गुड गवर्नेंस` देने में जुटी संगठित शक्ति है। उसकी इस शक्ति पर भला कौन उंगली उठाएगा।
उसके पीछे संयुक्त राष्ट्र यानी संयुक्त राज्य की भौंहें तनी हुई हैं। उसके बाहर यह क्या कर पाएगा। इसलिए पुरस्कारों की होड़ में शामिल हो जाइए। संयुक्त राष्ट्र का परिपत्र आप-हम सबको ललकार रहा है।

हाशिये के लोग और पंचायती राज अधिनियम

समकाल


  • लालचंद ढिस्सा

सत्‍ता , शक्ति और प्रबन्धन के विकेन्द्रीकरण और जैव विविधता का सीधा सम्बन्ध होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक हाशिये के आदमी के शोषण की सम्भावना बनी रहेगी। क्योंकि १९५० यानी कि संविधान के लागू होने तक विद्यमान सत्ता, शक्ति और प्रबन्धन के विकेन्द्रीकरण का ही परिणाम है, देश की चौथाई से अधिक जनसंख्या का मानवेत्तर सामाजिक स्तरीकरण, प्रस्थिति तथा शोषण। आज देश की जनसंख्या के एक महत्वपूर्ण हिस्से की दशा में बहुत सुधार हुआ है तो उसका कारण है सत्ता, शक्ति और प्रबंधन का तथाकथित केन्द्रीकरण। यह देश विविधताओं से भरा है, कई रंग, कई रूप, तरह-तरह के लोग, तरह-तरह की भाषा बोलियां, तरह-तरह का स्वाद, तरह-तरह की खूशबू और न जाने क्या-क्या है? इसलिए विकेन्द्रीकरण की जब भी बात होगी, विविधता का प्रश्न अवश्य उठेगा। यह ध्यान रखना होगा कि विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया में कहीं शक्तिहीन, अल्पसंख्यक, कमजोर और हाशिये की जाति-प्रजातियों के साथ अन्याय तो नहीं हो रहा है। विशेषकर उन समूहों या समुदायों के अस्तित्व और हित का ध्यान रखा जाना अनिवार्य होगा जो आज भी हाशिये पर हैं । क्योंकि यह देखा गया है कि अनेक बार जाने-अनजाने ऐसे बहुत से कार्य हो जाते हैं जिसके परिणाम कुछ लोगों के लिए अनर्थकारी हो जाते हैं। एक अच्छे और नेक उद्देश्य को लेकर किया गया कार्य कैसे कुछ समुदायों या समूहों के लिए अभिशाप बन जाता है, इसका उदाहरण है जनजातियों के अस्तित्व और हितों को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया केन्द्रीय (संसद) विधान-पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम १९९६ ।

उपरोक्त विधान ने अनुसूचित जनजातिय समाजों (गैर आदिम) के अन्दर बहुत बड़े प्रश्न खड़े किये हैं। इसके परिणामस्वरूप गैर आदिम जनजातिय समाजों के लिए बहुत बड़े हिस्से को उनके प्रजातांत्रिक एवं संवैधानिक अधिकारों से भी वंचित होना पड़ा है। आदिम जनजातिय समुदायों के संदर्भ में तो ये वैधानिक प्रावधान सही और उचित हो सकते हैं लेकिन गैर आदिम जनजातिय समाजों के लिए यह अधिनियम अभिशाप बन गया है। इस अधिनियम के साथ जुड़े हुए व्यक्तियों एवं अभिकरणों ने इस बात की कल्पना तक नहीं की होगी कि उनका यह कदम एक विशेष वर्ग के लिए इतना अनर्थकारी प्रमाणित होगा। उन गैर आदिम जनजातिय समाजों में जहां पर हिन्दू धर्म के तर्ज पर सामाजिक स्तरीकरण विद्यमान है, के दलितों को पूर्ण रूप से प्रभुवर्ग के शोषण के लिए उपलब्ध करवा दिया गया है। भारत के अनुसूचित जनजातिय समाजों के एक करोड़ से भी अधिक दलितों को, जो आज भी हाशिये पर हैं, इस अधिनियम के चलते पंचायतों में प्रतिनिधित्व तक प्राप्त नहीं है। केंद्रीय (संसद) विधान पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम १९९६ को हिमाचल प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों के संदर्भ में १९९७ में हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने समाविष्ट कर लिया। परिणामस्वरूप अनुसूचित क्षेत्र जिला किन्नौर के २८ प्रतिशत दलित (१९९१ की जनगणना के अनुसार) के लिए अनुसूचित जाति का आरक्षण वर्ष २००० के पंचायत चुनावों से समाप्त कर दिया गया। फलस्वरूप २००१ की जनगणना में उनकी जनसंख्या में भारी कमी दर्ज की गई और जो १९९१ में १९१५३ थी वह २००१ में ७६२५ रह गई। इसी प्रकार अन्य क्षेत्रों का भी हाल इससे अच्छा नहीं है। ज्ञातव्य है कि अनुसूचित क्षेत्र लहौल के संदर्भ में पंचायत प्रधानों के पदों में आरक्षण नहीं रखने संबंधित अधिसूचना को हि०प्र० उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है, और न्यायलय के निर्णय की प्रतीक्षा की जा रही है। इसलिए इस मामले में अधिक कहना उचित नहीं होगा क्योंकि मामला न्यायालय के विचाराधीन है।


यह सब क्यों हुआ? इसके दो करण हैं : पहला कारण यह है कि इस देश के हर आदमी, विशेषकर तथाकथित शिक्षित और अगड़ों को लगता है कि वे हर तरह से पूर्ण हैं, ज्ञान-विज्ञान आदि से। दूसरा सदियों से चली आ रही षड़यंत्र की आदत, जिससे आज भी निजात नहीं पाई जा सकी है। जिसके चलते तथाकथित बुद्धिजीवियों, विद्वानों, नेताओं, नौकरशाहों, प्रभूवर्ग एवं निहित स्वार्थों ने ऐसा माहौल बनाया जिससे कि जनजातिय, आदिवासी, कवायली, गिरिजन, वनवासी, अनुसूचित जनजाति आदि (न जाने कितने नाम दिये जा चुके हैं) के बारे में आम आदमी के दिमाग में एक भयंकर और कौतूहलपूर्ण विचार आ जाता है। जनजातिय व्यक्ति के रूप में दिमाग में ऐसे जानवर की तस्वीर बन जाती है जिसे 'शोकेस` में डालकर रखा जा सकता हो। पंचायती राज अधिनियम विशेषकर पंचायत उपबन्ध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम १९९६ के लागू होने से इस प्रकार की विसंगतियां क्यों पैदा हुइंर्? इसका कारण है बुद्धिजीवियों, नीतिनिर्धारकों, व्यवस्थापकों द्वारा समस्त अनुसूचित जनजातिय समाज या समूहों को समजातीय ( Homogeneous) और निहित स्वार्थों तथा इन समाजों एवं समूहों के प्रभु जातियों एवं शोषकों के द्वारा अनुसूचित जनजातिय समाजों एवं समूहों को समजातीय ( Homogeneous) एवं एकाश्मी (Monolithik) प्रस्तुत करना, जो आदिम जनजातियों के संदर्भ में तो उचित हो सकता है, लेकिन गैर आदिम जनजातियों के संदर्भ में इस प्रयोग से अनर्थ हो रहा है। इन गैर आदिम जनजातियों में हिन्दू समाज की तरह ही जाति प्रथा प्रचलित है और छुआ-छूत, असमानता और शोषण भी उसी तरह रहा है। लेकिन संविधान के लागू होने के बाद जहां हिन्दू, बौद्ध तथा सिख समाज के दलितों को सामाजिक न्याय के नाम पर कुछ संवैधानिक सुरक्षाएं तथा सुविधाएं मिलीं वहीं जनजातिय दलितों या अछूतों को समाज के प्रभू वर्गों के समकक्ष बनाकर उनके साथ सामाजिक अन्याय किया गया। इसी कारण आज उनकी दशा तुलनात्मक दृष्टि से पहले से बदतर हो गई है।

अनुसूचित जनजातियों, आदिवासियों, बनवासियों, गिरिजनों आदि के नामों से जाने जाने वाले समूहों, समुदायों और समाजों के बारे में जन साधारण के अन्दर कई भ्रान्तियां हैं। मैदानी ईलाकों का आदमी इन सबको एक ही समझने की गलती कर बैठता है। यहां तक कि बुद्धिजीवी वर्ग भी इनके अंतरों को गहराई से समझने की कोशिश ही नहीं करते। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि इनमें एक या सभी समूह, समुदाय या समाज अनुसूचित जनजाति के तो हो सकते हैं, लेकिन सभी एक ही जनजाति के नहीं हो सकते। संविधान की पांचवीं या छठी अनुसूचि में सम्मिलित जो भी समूह, समुदाय या समाज हैं, वे सबके सब अनुसूचित जनजाति में तो आते है परन्तु सब के सब आदिवासी या आदिम जनजाति के नहीं है। जनजातियों के प्रति साधारणतया तथाकथित सम्य समाज का दृष्टिकोण और कार्यपद्धति संदेहपूर्ण रही है। ऐतिहासिक काल से ही तथाकथित सभ्य लोगों ने जनजाति के लोगों को ठग कर या डरा-धमकाकर अपने स्वार्थ हल किये हैं। इनको चिड़ियाघर के जानवरों की तरह प्रदर्शन की वस्तु बना कर पेश किया जाता रहा है, जो आज भी इनमें से ही कुछ की मदद से लगातार चल रहा है। स्वतंत्र भारत के संविधान के बनने, लागू होने और उसमें किए गए इन जनजातियों के हित रक्षा के प्रावधानों के रहते, तथाकथित सभ्य समाज के ठेकेदारों, स्वस्थापित विद्वानों, समाजसुधारकों, राजनेताओं, प्रशासकों तथा विशेषज्ञों ने इन अनुसूचित जनजातियों के प्रस्तुतिकरण में अपने-अपने स्वार्थों का ध्यान रखा है। इसी के कारण आज इन अनुसूचित जनजातियों के अन्दर भी अनेक समस्याएं और अन्तर्विरोध पैदा हुए हैं। इसी को सामने रखते हुए अनुसूचित जनजातियों के स्थापित मानकों, विधानों, अवधारणा तथा प्रस्थिति के ऊपर यह लेख लिखा गया है।


यहां जनजाति ( Tribe) अनुसूचित जनजाति ( Scheduled Tribe ) के बारे में जानना आवश्यक है। जनजाति (Tribe) एक नृवैज्ञानिक अवधारणा है, जबकि अनुसूचित जनजाति ( Scheduled Tribe ) एक संवैधानिक नामावली है। आदिम या आदिवासी अवधारणा को अंग्रेजी के एबोर्जिन ( Aborgin) या ट्राईब ( Tribe) नामावली के हिन्दू रूपांतर के तौर पर अधिक निकट माना जा सकता है, जबकि अनुसूचित जनजाति एक संवैधानिक नामावली है जो उन सभी समूहों, समुदायों तथा समाजों के लिए प्रयुक्त होती है जो भारत के संविधान के पांचवीं और छठी अनुसूचि में सम्मिलित हैं । जैसा कि हमने ऊपर लिखा है अनुसूचित जनजाति, एक 'सिंगल` समुदाय या समाज नहीं है। इस में समूह, समुदाय और समाज तीनों शामिल हैं। यहां पर इस बात को समझना आवश्यक है कि अनुसूचित जनजातियों का संवैधानिक तथा नृवैज्ञानिक वर्गीकरण क्या है?

क) संवैधानिक

Constitutional आधार पर अनुसूचित जनजाति के तीन वर्ग हैं :

१. अनुसूचित (क्षेत्र) जनजातियां।
२. अधिसूचित जनजातियां।
३. यायावर जनजातियां।


१. अनुसूचित (क्षेत्र) जनजातियां ( Scheduled (Area) Tribe ) : इस वर्ग में वे समूह, समुदाय और समाज आते हैं जो क्षेत्र विशेष से सम्बन्ध रखते हैं, जिन्हें भौगोलिक तथा विशिष्ट सांस्कृतिक आधार पर अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया हो। हिमाचल प्रदेश में इसके उदाहरण हैं लाहौल-स्पिति, किन्नौर, पांगी, भरमौर क्षेत्र और स्वंगला, बौध, किन्नौरा, पंगवाला, गद्दी (चम्बा जिला के भरमौर जनजातिय क्षेत्र के गद्दी समाज) आदि।

२.) अधिसूचित जनजातियां .(Denotified Tribes) : इस वर्ग में वे समूह, समुदाय और समाज आते हैं जिन्हें उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान तथा पिछड़ेपन के कारण अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया हो।
उदाहरण-हिमाचल प्रदेश में खम्पा, गद्दी (भरमौर के बाहर, जिला चम्बा तथा कांगड़ा आदि के गद्दी समाज) आदि।

३.) यायावर जनजातियां .(Nomadic Tribes) : इस वर्ग में वे समूह, समुदाय और समाज आते हैं जिन्हें उनके पिछड़ेपन, सांस्कृतिक विशिष्टता तथा यायावरी के कारण, जनजाति घोषित किया गया हो। इसका उदाहरण हिमाचल प्रदेश के गुज्जर आदि हैं।


ख. नृवैज्ञानिक

(Anthropological) आधार पर अनुसूचित जनजातियों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है-

१. आदिम जनजातियां।

२. गैर आदिम जनजातियां।



१. आदिम जनजातियां : Primitive Tribes : इस वर्ग में वे अनुसूचित जनजातियां आती हैं जो समाजशा के समुदाय की परिभाषा में आती हैं । सभी आदिम जनजातियां परम्परा से प्रकृति पूजक होती हैं। जिसका अर्थ यह है कि उनमें हिन्दू समाज की तरह जन्म पर आधारित सामाजिक स्तरीकरण या जातिप्रथा (ऊंच-नीच) प्रचलित या मान्य नहीं है अपितु उनकी अपनी एक अलग धार्मिक पहचान तथा सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था है। भारत सरकार के जनजातिय मामलों के मंत्रालय के अनुसार भारत में सिर्फ ७५ आदिम जनजातियां दर्ज हैं।

२. गैर आदिम जनजातियां Non Primitive Tribes : गैर आदिम जनजातियों में वे सब जनजातियां शामिल हैं जो समाजशा के समाज और समूह की परिभाषा की परिधि में आती हैं । अर्थ यह है कि इस प्रकार की अनुसूचित जनजातियों में हिन्दू या अन्य धर्म की समस्त विशेषताएं मौजूद हैं। इसमें हिन्दू धर्म की जाति प्रथा (छुआछूत) भी शामिल है। भारत सरकार की अधिसूचना के अनुसार इस वर्ग में लगभग ७०० अनुसूचित जनजातियां हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि वे सभी "अनुसूचित जनजाति" की तो हैं लेकिन "जनजाति" की नहीं। इसका एक उदाहरण है हिमाचल प्रदेश जहां पर अनुसूचित जनजातियों की संख्या १० है परन्तु इसमें से कोई भी आदिम जनजाति के वर्ग में नहीं आती है। इस विषय में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आज तक अनुसूचित जनजातिय (गैर आदिम) के प्रभुवर्ग के लोग और तथाकथित बुद्धिजीवी आदि निहित स्वार्थी लोग, ईसाई और इस्लाम के ठेकेदारों की तरह यही प्रचारित करते रहे हैं कि अनुसूचित जनजातियों में जातिप्रथा (ऊंच-नीच) विद्यमान नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि गैर आदिम जनजातियों में से अधिकतर हिन्दू धर्म को मानने वाले समाज हैं । यदि हिन्दू धर्म को मानने वाला समाज है तो इनमें हिन्दू धर्म की समस्त विशेषताएं तो विद्यमान होंगी ही और हिन्दू धर्म की पहली और सबसे बड़ी विशेषता है, इसकी जातिप्रथा (छुआछूत)।

जनजातिय दलित देशवासियों से निवेदन करना चाहते हैं कि वे इस संदर्भ में अपने भ्रमों को दूर कर सच्चाई को समझें। हम जनजातिय दलित भी इस देश को अपना समझते हैं, इसके लिए कुछ करना चाहते हैं। क्या आजादी के ६० वर्षों के बाद भी हमें इस देश को अपना समझने का हक नहीं मिलेगा?

लालचंद ढिस्सा जनजातीय दलित संघ के अध्यक्ष हैं।

बांग्लादेश में सैनिक सत्ता

समकाल
  • पंकज पराशर

पाकिस्‍तानी कवयित्री फहमीदा रियाज की नज्म़ है 'तुम भी हम जैसे निकले`। यह नज्म़ उन्होंने भारत को लक्षित करके दिल्ली में सुनाई थी लेकिन करिश्मा देखिये कि यह भारत पर तो नहीं, अलबत्ता पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश पर बिल्कुल फिट बैठ रही है। पाकिस्तान के सैनिक हुक्मरान परवेज मुशर्रफ ने जिस चालाकी से तख्त़ा पलट किया उसी चालाकी से उन्होंने इस रणनीति को भी कामयाबी से अंजाम दिया कि बेनजीर भुट्टो लंदन में निर्वासित जीवन जीने को मजबूर हैं और मियां नवाज शरीफ पूरे परिवार सहित सउदी अरब में अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की तरह 'दो गज जमीं भी न मिली कूए यार में` रट रहे हैं। इधर मुशर्रफ साहब अमेरिका और आई.एस.आई दोनों को साध करके सत्ता पर काबिज हैं और न्यायपालिका से भी दो-दो हाथ करने से गुरेज नहीं करते। नाटक की पटकथा वही है लेकिन बांग्लादेश के पात्र और हालात थोड़े अलग हैं। वहां की अंतरिम सरकार के निर्देश पर पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर ही रोक दिया गया। जनवरी में जब अंतरिम सरकार ने देश में आपात काल की घोषणा की तो शेख हसीना देश छोड़कर ब्रिटेन चली गइंर् थीं और अब बेगम खालिदा जिया को भी परिवार सहित देश छोड़कर जाने को मजबूर किया जा रहा है। ताजा खबरों के मुताबिक खालिदा जिया देश छोड़कर जाने को तैयार हो गई हैं। पिछले महीने बेगम खालिदा जिया के बड़े बेटे तारीक रहमान को गिरफ्तार किया गया था और उसके बाद अभी कुछ ही दिनों पूर्र्व खालिदा जिया के दूसरे बेटे अराफात रहमान को भी उनके ढाका स्थित घर से गिरफ्तार कर लिया गया है।

११ जनवरी, २००७ को बांग्लादेश में आपातकाल लागू किया गया था और इस वक्त वहां भ्रष्टाचार विरोधी अभियान तेजी से चल रहा है, जिसके तहत वहां की अंतरिम सरकार ने अब तक ३० पूर्व मंत्रियों, राजनीतिक सलाहकारों, व्यापारियों और नौकरशाहों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है और उनके बैंक खाते सील कर दिए हैं। हिरासत में लिए गए लोगों में पूर्व मंत्री और दोनों प्रमुख दलों-बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी और अवामी लीग के नेता शामिल हैं। गिरफ्तार लोगों में पूर्व मंत्री नजमुल हुदा, सलाहउद्दीन चौधरी, अमानुल्लाह अमान, रुहुल कुद्दुस तालुकदार, मीर नसीरउद्दीन और इकबाल हसन मसूद शामिल हैं। हालांकि इन लोगों को हिरासत में लेने की कोई वजह नहीं बताई गई है। यहां यह याद रहे कि जनवरी में आपातकाल लागू होने के बाद पहली बार नेताओं को गिरफ्तार किया गया है। इन गिरफ्तारियों के बाद की स्थिति यह है कि बांग्लादेश की जनता अंतरिम सरकार की इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का खुला समर्थन कर रही है और ऐसा लगता है कि अंतरिम सरकार के इस कदम से वहां की आम जनता राहत ही महसूस कर रही है।

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने अक्तूबर, २००६ में अंतरिम सरकार को सत्ता सौंपी थी और इस अंतरिम सरकार को पहले राष्ट्रपति इफिताखार चौधरी संभाल रहे थे लेकिन अंतरिम सरकार के कई विवादास्पद फैसलों की वजह से वहां तीव्र विरोध प्रदर्शन हुए जिसके बाद इफिताखार चौधरी ने अपने पद से त्यागपत्र देकर फखरुद्दीन अहमद की अंतरिम सरकार के नये मुखिया के रूप में शपथ दिलवा दी थी। बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त एम.ए.अजीज ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया था क्योंकि अंतरिम सरकार ने चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सभी विवादास्पद अधिकारियों को इस्तीफा देने के लिए कहा था। नये चुनाव आयुक्त ए.टी.एम.शम्सुल हुदा ने कहा है कि देश में चुनाव करवाने से पहले नए निर्वाचन कानून और नई मतदाता सूची बनाने की जरूरत है इसलिए चुनाव करवाने में कम-से-कम १८ महीनों का वक्त लग सकता है।

तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच दिलचस्प यह है कि बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष ने कहा है कि देश को चुनावी लोकतंत्र की दिशा में वापस नहीं जाना चाहिए। लोकतंत्र की वजह से भ्रष्टाचार, मानवाधिकार हनन और अपराधीकरण बढ़ा है जिसने देश के वजूद के लिए खतरा पैदा कर दिया है। सेनाध्यक्ष के इस बयान के बाद इस आशंका की पुष्टि होती दिखाई दे रही है कि बांग्लादेश में सैनिक शासन की योजना तो नहीं बनाई जा रही? जनरल ने यह खुलासा नहीं किया कि आखिरकार वे कैसी व्यवस्था चाहते हैं? गौरतलब है कि इस वक्त बांग्लादेश में जो अंतरिम सरकार कायम है उसे पूरी तरह सेना का समर्थन हासिल है। इसी कड़ी में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के कहने पर पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर ढाका जानेवाले विमान पर नहीं चढ़ने दिया गया। सरकार ने पहले ही कह दिया था कि अगर शेख हसीना देश पहंुचती हंै तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। सरकार ने पिछले साल अक्तूबर में चार प्रदर्शनकारियों की हत्या के मामले में उनके ऊपर मामला दर्ज किया है और उन पर हत्या की कथित साजिश रचने का आरोप लगाया है। अंतरिम सरकार की इस कार्रवाई पर शेख हसीना ने कड़ा एतराज जताया है और हुंकार भरते हुए कहा है कि 'स्वदेश लौटने से रोकना मेरे नागरिक अधिकारों का हनन है। मैं अपने देश लौटना चाहती हूं।` उनके इस बयान के एक दिन बाद ही बांग्लादेश की एक अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की गिरफ्तारी के लिए जारी वारंट स्थगित कर दिया है। सरकारी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि वे अगले साल के अंत तक चुनाव कराना चाहेंगे और सेना के एक प्रवक्ता के हवाले से कहा गया है कि शेख हसीना और बेगम खालीदा जिया दोनों बेगमों ने पिछले पंद्रह सालों में देश को बर्बाद कर दिया है। इसलिए किसी भी सूरत में इन दोनों को बांग्लादेश की सत्ता में दोबारा लौटने नहीं देंगे।

बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान के चमत्कारी व्यक्तित्व की जिनको याद हो वे आज के बांग्लादेश को देखकर उसी तरह निराश होंगे जिस तरह पाकिस्तान बनने के बाद खुद जिन्ना को बेहद निराशा हुई थी। भाषा और जनतंत्र के मुद्दे पर पाकिस्तान से अलग हुआ देश बांग्ला देश कट्टरपंथियों की शरणस्थली बन गया है। जिस तरह सैनिक जनरलों के बूटों के तले पाकिस्तान की अवाम के हुकूक को रौंदा जा रहा है उसी तरह अब बांग्लादेश की सेना नहीं चाहती कि देश में दोबारा लोकतांत्रिक शासन लौटे। जिस तरह धर्म एक होने के बावजूद भारत से गये मुसलामानों को आज भी वहां 'मुहाजिर` कहा जाता है। ठीक उसी तरह एक धर्म होने के बाद भी बांग्लादेश में बिहार से गये मुसलमानों का 'बिहारी मुसलमान` कहकर उपहास उड़ाया जाता है, उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक भी नहीं माना जाता। सैनिक शासन की वापसी के बाद बांग्लादेश की स्थिति कैसी होगी और उस पर भारत की क्या प्रतिक्रिया होगी, इसके बारे में अभी कुछ भी कहना शायद जल्दबाजी होगी। हालांकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक दोनों पूर्व प्रधानमंत्रियों को थोड़ी राहत मिली है। लेकिन यह अंतराष्ट्रीय बदाब के कारण है, इसे हमें नहीं भूलना चाहिए।

उपभोक्तावाद और परिवार

समकाल

  • प्रमोद रंजन


उपभोक्तावाद परिवार की सामंती संरचना पर मर्मांतक प्रहार कर रहा है। बेशक, यह ऐतिहासिक कार्य है। लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को अपवाद मानकर उपेक्षित कर देना या इतिहास को घटते हुए महज देखते रहना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में कानूनों के माध्यम से इसके दु प्रभावों को नियंत्रित किए जाने की कोशिश की जानी चाहिए।



एक भारतीय मां ने संपत्ति के लिए जवान पुत़्र की हत्या कर दी !! पिछले दिनों पटना से निकली इस खबर को तर्कसंगत बनाने के लिए मीडिया को मां के अवैध प्रेम संबंध की तलाश करनी होगी या फिर पुत्र के दुश्चरित्र होने की उपकथा ढूंढनी होगी। ऐसा संभव न हो सका तो अखबार और टीवी चैनल संपत्ति विवाद की इस कथा को ज्यादा नहीं बेच पाएंगे। कारण? भारत में यौन शुचिता और चरित्र समानार्थी हैं। यहां किसी को बेईमान होने, धूसखोर होने, जातिवादी होने, ब्लैकमार्केटियर होने, असमानता का व्यवहार करने से या फिर हत्या करने पर भी दु चरित्र नहीं कहा जाता। अगर हत्यारी माता 'सचरित्र` पाई जाती है तो भारतीय मीडिया के पास भी इसे अपवाद मान कर मौन हो जाने के अलावा कोई चारा नहीं। लेकिन क्या यह वास्तव में अपवाद मात्र है?

भारतीय समाज मौजूदा दशक में तेजी से बदल रहा है। हालांकि यह प्रक्रिया इससे काफी पहल आरंभ हो गई थी, लेकिन सुविधा के लिए इसे १९९० के आसपास से माना जाता है। यह बदलाव प्राथमिक रूप से आर्थिक रहे हैं। आर्थिक उछाल और शिक्षा दर की बढ़ोत्तरी ने एक ऐसे तबके को निम्नमध्यवर्ग और मध्यवर्ग में ला दिया जिनके लिए इंदिरा गांधी के समय चलाए गए बड़े नोटों को देखना भी सपना रहा था। लेकिन सामंतवाद से पूंजीवाद की ओर बढ़े कदमों ने भारतीय समाज की संलिष्‍ट संरचना में बाहरी तौर पर ही हस्तक्षेप किया। जातिगत वर्चस्व के समीकरण बदले, वंचित तबकों की जुबान पर भी सत्ता-स्वाद की कुछ बूंदें टपकीं। किन्तु इससे समाजिक संरचना की मूल ईकाई परिवार अप्रभावित ही रहा। पूंजीवाद जैसे बाहरी उपकरण के लिए यहां तक पहुंच पाना संभव भी नहीं था। (पूंजीवाद की ही तरह कम्यूनिज्म़ भी समाज की आंतरिक संरचना को प्रभावित करने में विफल रहता है, रूस के कम्यूनिस्ट काल में चर्च की लोकप्रियता इसका उदाहरण है) वास्तव में भारतीय संदर्भ में जिस १९९० को हम विभाजक रेखा मानते हैं वह पूंजीवाद के आगमन का नहीं बल्कि भूमंडलीकरण के कारण पूंजीवाद के तेज होने तथा उपभोक्तावाद के आगमन का काल है। यही उपभोक्तावाद अब भारतीय परिवारों के सामंती दरवाजों पर अपने जूतों से ठोकर मार रहा है। मूल्य दरक रहे हैं और अजीबो-गरीब लगने वाली घटनाएं घट रही हैं। 'सचरित्र` हत्यारिन मां या 'दु चरित्र` मटुकनाथों की अपवाद लगने वाली घटनाएं इस विध्वंस के आरंभिक संकेत हैं। उपभोक्तावाद परिवार की सामंती संरचना पर मर्मांतक प्रहार कर रहा है। बेशक, यह ऐतिहासिक कार्य है। लेकिन इसके नकारात्मक प्रभावों को अपवाद मानकर उपेक्षित कर देना या इतिहास को घटते हुए महज देखते रहना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में कानूनों के माध्यम से इसके दु प्रभावों को नियंत्रित किए जाने की कोशिश की जानी चाहिए।


मध्यवर्ग में माता-पिता और संतान के पारंपरिक संबंध त्रासद स्थिति में पहुंचने लगे हैं। शहरों का तो निम्नमध्यवर्ग भी इससे अछूता नहीं रहा है। पूंजीवाद के आगमन के कारण सामंती जकड़न से आजाद हुई जातियों की पहली पीढ़ी के लोग भी बड़ी संख्या में इस विध्वंस के शिकार हुए हैं। बल्कि थोड़ी सी समृद्ध की पहली बरसात के साथ-साथ टेलीविजन के पर्दे से आती उद्दाम लालसाओं की आंधियों को रोक पाने की अक्षमता ने उनके साथ ही ज्यादा तोड़-फोड़ की है। एक स्थूल उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी के एकलौते बेटे ने लगभग दो वर्षों पहले अपने दाहिने हाथ पर किरोसीन छिड़क कर आग लगा ली थी। जब मैं उससे मिला तो उसने बताया कि उसकी मां ने उस पर पीटने का आरोप लगाया था। मामला कुछ इस तरह था कि उस लड़के ने मां से पच्चास रुपए मांगे थे। नहीं देने पर माता से उसकी झड़प हुई। लेकिन उसका कहना था कि उसने मां पर हाथ नहीं उठाया। कि वह ऐसा सोच भी नहीं सकता। हां, इतना जरूर था कि वह मां को उस पैसे के खर्च का हिसाब नहीं बताना चाहता था। इस पर उसका बाप अपना सिर मुंडा कर मुहल्ले (पटना सिटी) भर में यह कहता घूमता रहा कि मेरा बेटा मर गया। लड़के ने क्षोभ से भर कर उस हाथ को ही पूरी तरह नष्‍ट कर देना चाहा था जिस हाथ पर माता को पीटने का आरोप था। उसने बताया था कि उसे पैसे पत्नी के अंत:वस्‍त्रों व और गर्भनिरोधक उपायों के लिए चाहिए थे। मां को कैसे बताता? मैंने कहा, तुम खुद कुछ करते क्यों नहीं? तो उसने बताया था कि दहेज से बचे ३० हजार रुपयों से मुर्गी पालन का धंघा अपने आधा कट्ठा के मकान की छत पर आरंभ किया था। लेकिन चल नहीं सका। दहेज वाले पैसे भी पिता ने बहुत हुज्जत करने पर दिए थे। अब वे कुछ भी न देंगे। कोई पैतृक संपत्ति है नहीं। पटना शहर में बना दो कमरों का वह मकान मां के नाम है। नौकरी मिलती नहीं। मजदूरी मैं कर नहीं सकता।

जाहिर है उद्दाम लालसाओं की गिरफ्त दोनों ओर थी। कम साधन के बावजूद अधिकाधिक उपभोग की प्रवृत्ति माता-पिता में थी तो पुत्र भी अपनी आर्थिक वास्तविकता को समझने को तैयार न था। पिछले सप्ताह वह सुदर्शन युवक मुझे विक्षिप्तावस्था में मिला।

यदि किसी में शहरी बेरोजगार लड़कों से मिलने का माद्दा हो तो उसे अधिकांश जगह कमोबेश ऐसी ही कहानियां मिलेंगी। मेरी जानकारी में कम-ज्यादा ऐसी पच्चासों घटनाएं हैं। और मुझे नहीं लगता कि राजनीति, साहित्य अथवा किसी अन्य प्रकार की अकादमिक दुनिया के प्रतिभाशाली युवाओं के रूझानों के आधार पर समाज की मति-गति का आकलन करना किसी भी दृष्टि से उचित नि क र्ा की ओर ले जाएगा। अपवाद वे प्रतिभाशाली युवा हैं, बहुसंख्या इन सामान्य लोगों की है, इन्हें ही सामाजिक प्रवृति के रूप में समझा जा सकता है। इस बहुसंख्या में अर्ध-रोजगार भी शामिल हैं। तकनीक ने श्रम को बेहद सस्ता कर दिया है। महंगे से महंगे शहरों में भी १ हजार से ३ हजार तक की नौकरी करने वाले युवा हर जगह अंटे पड़े हैं। कंम्प्यूटर आपरेटर, रिसेप्निस्ट, नर्सें, सेल्स मैन, कूरियर पहुंचाने वाले, सूपरवाइजर नुमा लोग और अन्य नई सेवाओं में लगे इन युवाओं को भवि य में भी अच्छा वेतन मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। सेवा प्रदाता क्षेत्रों में श्रम लगातार और सस्ता होता जा रहा है। मीडिया में काम करते हुए मैंने देखा कि शिमला जैसे मंहगे शहर में ७० फीसदी पत्रकार १ से १.५ हजार रूपए वेतन पा रहे थे। लगभग २० फीसदी जो उत्तरांचल, बिहार और उत्तरप्रदेश से पलायन कर वहां पहुंचे थे, हाड़-तोड़ मेहनत कर ३ से ४ हजार तक पाते हुए सपरिवार गुजारा कर रहे थे। हिन्दी के जिस 'इंडियाज नं वन डेली` में मैं काम कर रहा था उसमें अनुसेवक को वर्ष २००१ में २५०० हजार रुपया वेतन दिया जाता था। उस अनुसेवक ने काम छोड़ा तो नए को १८०० पर रखा गया। २००५ आते-आते दो और अनुसेवक बदले। जब मैं वहां पहुंचा तो नया अनुसेवक ८०० रुपए पर बहाल हुआ था, वह भी 'इंटरव्यू` के बाद। शायद विश्वास न आए पर हिन्दी समाचार पत्रों में तो ऐसी स्थिति हो गई है कि मुफ्त काम करने वाले पत्रकारों को भी 'बर्खास्त` किया जाता है। यानी श्रम का मूल्य तो दूर, काम करने का अवसर देना भी अब एक अनुकंपा है। प्राय: सभी संस्थानों में ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनसे काम सीखने के नाम पर २-२ वर्ष तक मुफ्त काम करवाया जाता है। कथित रूप से काम सीखने तक टिके रहे तो वही ८००-१००० रुपए मासिक वेतन।

इस तरह के अर्ध-रोजगार लोग भी पैतृक संपत्ति पर निर्भर रहने के लिए अभिशप्त हैं। लेकिन पहली बार समृद्धि का स्वाद चखने वाले परिवारों में पैतिर्क संपत्ति नाम की कोई चीज प्राय: नहीं होती। वंचित समुदायों से आनेवाले इन लोगों ने अपनी शिक्षा से कुछ हासिल कर शहरों में एकल परिवार बसाया होता है। उत्तराधिकार कानूनों (भारतीय उत्तदाधिकार अधिनियम तथा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम) के तहत उनकी संतानों को महज खेती योग्य भूमि में हिस्सा मिल सकता है। जबकि इनके पास देहात में जो थोड़ी बहुत जमीन होती है, वह अक्सर पहले ही बिक चुकी होती है। अगर कुछ बची भी रह गई तो शहर के नगदी जीवन के सामने उनका कोई मोल नहीं। अगर जायज-नाजायज कुछ कमाया-बचाया भी तो उपभोग की असीम इच्छाओं के सामने खेती योग्य जमीन जोड़ने की फिक्र किसे? यह भी एक कारण है कि जहां शहरों में जमीन के भाव आसमान छू रहे हैं वहीं गांवों में आज खेत मिट्टी के भाव बिक रहे हैं । भारतीय गांवों से पैसों का शहरों की ओर आना अनवरत जारी है, शहरों से गांवों की ओर यह प्रवाह ठप है। उपभोक्तावाद ने बाहरी चमक-दमक के साथ-साथ देह और स्वास्थ तक को उपभोग के दायरे में ला दिया है। आखिर उपभोग तो इस नश्वर देह को ही करना है। और यह तभी संभव हो सकता है जब आप अधिकाधिक स्वस्थ, चिर युवा रहें। ब्यूटी पार्लर, जिम से लेकर बाबा रामदेव जैसों के धंधे इसी कारण फल-फूल रहे हैं। इन नव स्वास्थ केंद्रों में जाने वाला शायद ही कोई यह सोचता हो कि, स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्ति क का वास होता है। विज्ञापनी दुनिया उन्हें लगातार बताती रहती है कि 'स्वस्थ शरीर में मंहगे वस्‍त्राभूषण फबते हैं।` बहरहाल, अनेक कारणों से भारतीयों की औसत आयु, उनका यौवन काल बढ़ा है। निश्चित रूप से इस औसत के बढ़ने में नव मध्यम वर्ग के ही बेहतर होते स्वास्थ का योगदान रहा है। अच्छे स्वास्थ ने उनकी लालसाओं की अवधि को लंबा कर दिया है। उपभोग के उत्‍कर्ष को छूते हुए उन्हें बुढ़ापा कभी न आने वाले दु:स्वप्न की तरह लगता है, तो आश्चर्य नहीं। बुढ़ापे का पारंपरिक सहारा मानी जाती रही संतान भी उन्हें अपने तात्कालिक सुखों में कटौती करती प्रतीत होती है। भारतीय उत्तराधिकार विधान भी उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित करता है कि उनकी पूरी संपत्ति (स्वयं द्वारा अर्जित तथा संयुक्त परिवार से मिला हिस्सा भी) सिर्फ उनके उपभोग के लिए है। अपनी संतान (पुत्री अथवा पूत्र) के प्रति उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं है।

भूमंडलीकरण की तरह उपभोक्तावाद भी एक यथार्थ है। इसे किसी धार्मिक नैतिकता या भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर रोका नहीं जा सकता। न इसे अफगानिस्तान, इराक, पाकिस्तान आदि में इस्लामिक तालिबान रोक पाए न ही भारत के हिन्दू तालिबानों में यह कुव्वत है। अक्सर मुगालते में रहने वाले कम्यूनिस्ट मित्र चाहें तो चीन घूम कर आ सकते हैं। वहां के शहरों में महज कुछ वर्ष में यूरोपिय शहरों से कहीं अधिक आलीशान मॉल, शापिंग काम्पलेक्सों ने आकार ले लिया है। जैसे समाजवाद के पूर्व पूंजीवाद का आना प्रक्रिया का हिस्सा है उसी तरह उपभोक्तावाद परिवार के आंतरिक सामंतवाद की समाप्ति में अपना ऐतिहासिक अवदान देने को उद्धत है। वस्तुत: यह कुछ और नहीं परिवार का आंतरिक 'पूंजीवाद` ही है। इसलिए जनतांत्रिक परिवार (अथवा कहें समतामूलक) के बड़े स्वप्न के संदर्भ में उपभोक्तावाद पर बात करते हुए यह आवश्यक है कि हम सिर्फ इसकी लानत-मानत करने की बजाय इसके गुण-दोषों को तटस्थता से समझें। इसके दु प्रभावों को कम करने के लिए देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जो भी कानून संभव हो बनाएं। यह किसी नैतिकता के रोके नहीं रूकने वाला। इसके जिम्मे एक नया समाजशा गढ़ने की जिम्मेवारी है। इसने जहां नए मध्यवर्ग में अभिभावक और संतान के संबंधों को कटूतापूर्ण बना दिया है वहीं इस तबके की महिलाओं के लिए आर्थिक मुक्ति के द्वार भी खोले हैं। यह छोटी उपलब्धि नहीं है। यौन शुचिता संबंधी दुराग्रहों की समाप्ति की राह भी आने वाले समय में यहां से निकलेगी। दूसरी ओर, यह भी देखने की बात है कि अभिजात तबके में इसका असर कुछ अलग तरह का है। वहां इसने अभिभावक-संतान के संबंधों को मित्रतापूर्ण बनाया है। कौमार्य के बंधनों को ढीला किया है। तात्कालिक उदाहरण के तौर पर अमिताभ-जया और अभि षेक बच्चन के संबंधों तथा सलमान, विवेक ओबराय और ऐश्वर्या राय के त्रिकोणात्मक प्रेम संबधों के बाद अभि षेक बच्चन से उसकी शादी को समझा जा सकता है। पूंजीपति परिवारों के बदलावों को पेज थ्री पार्टियों का निरंतर अध्ययन करते हुए भी देखा जा सकता है। वे अब तोंदियल सेठ-सेठानियां नहीं रहे हैं। अंधानुकरण की नकारात्मक प्रवृति पर पलने वाला उपभोक्तावाद भूल वश ही सही, अनेक सकारात्मक प्रवृतियों को भी मध्यमवर्ग तक पहुंचा रहा है, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।