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September 3, 2007

कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी)

जनयुद्ध और दलित-प्रश्‍न-१



सामाजिक सुधार कभी भी मजबूतों की कमजोरियों द्वारा नहीं
बल्कि हमेशा कमजोरों की ताकत द्वारा किये जाते हैं
- मार्क्‍स




नुष्य सामाजिक प्राणी है। किन्तु आज २१वीं सदी में भी जाति व्यवस्था कायम है जिसमें तथाकथित ऊंची जातियों द्वारा दलितों को अछूत बना दिया गया है। इसलिए, दलितों की स्थिति मनुष्य कौन कहे, जानवरों से भी बदतर है। दलितों पर अत्याचार दक्षिण एशिया की विचित्र परिघटना है। यह पुरातन और घृणित जाति व्यवस्था से रूग्ण हिन्दू समाज की देन है।

ऐतिहासिक रूप से जाति व्यवस्था श्रम विभाजन का उत्पाद है, जिसमें मानसिक श्रम करने वाले ब्राह्मण, युद्ध करनेवाले क्षत्रिय, व्यापार करने वाले वैश्य तथा शारीरिक श्रम करने वाले शूद्र के रूप में वर्गीकृत किये गये। ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी के दौरान, ऋगवैदिक काल में, इस तरह के श्रम विभाजन ने न तो कठोर रूप और न ही वर्ग रूप प्राप्त किया था। परिणामत:, हर व्यक्ति को हर समय मनोनुकूल व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता थी। लेकिन वैदिक काल के आने पर, कृषि के विकास ने जड़बद्ध और बंद जाति व्यवस्था को जन्म दिया जिससे लोग अपनी पुश्तैनी जाति को पीढ़ी दर पीढ़ी ग्रहण करने लगे। इससे मानसिक श्रम करने वाले ब्राह्मणों तथा शारीरिक श्रम करने वाले शूद्रों को समाज व्यवस्था में क्रमश: सबसे ऊंचा तथा सबसे नीचा स्थान मिला। समय के साथ शूद्र, जातियों और उप जातियों में बंटते चले गये तथा उनके बीच ऊंच-नीच की व्यवस्था कठोर तथा जड़बद्ध होती गयी। ईसा पूर्व पहली शताब्दी के आस-पास मनु ने वर्णाश्रम व्यवस्था को संहिता में बांधा। आज वही शूद्र दलित कहे जाते हैं।

इस तरह प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के अंदर दलित पहले वंचित वर्ग थे जो शारीरिक श्रम करते थे लेकिन जिनको अपने श्रम का फल तथा उत्पादन का साधन रखने का अधिकार नहीं था।
एक गैर सरकारी आंकड़े के अनुसार दलित नेपाल की कुल आबादी के बीस प्रतिशत हैं। अस्सी प्रतिशत दलित गरीबी रेखा के नीचे जीते हैं। ज्यादातर भूमिहीन हैं तथा दूसरों की जमीन पर रहते हैं। अत: हमेशा उखाड़े जाने के भय में वे जीते हैं।

आर्यों के नेपाल प्रवेश से पहले मुख्य रूप से यहां मंगोलियन, पहाड़ी क्षेत्र में, तथा आस्ट्रो-द्रविड़ मैदानी तराई क्षेत्र में निवास करते थे। ११वीं सदी ईस्वी सन में मुस्लिम आक्रमण से बचने के लिए उत्तर भारत के हिन्दू नेपाल चले आये तथा साथ में जाति-व्यवस्था भी लेते आये। नेपाल के गैर-हिन्दू समुदायों में भी जात-पांत फैला तथा दलितों को समाज से बहिष्कृत किया गया। भौगोलिक दृष्टि से नेपाल के दलित पहाड़ी तथा तराई या मधेशी दलित में बंटे हुए हैं। राष्ट्रीयता की दृष्टि से नेपाली दलितों के तीन भाग हैं, पहाड़ी, नेवाड़ी (अर्थात काठमांडू घाटी के दलित) तथा मधेशिया दलित, जिनमें नेवाड़ी तथा मधेशिया दलित उत्पीड़ित राष्ट्रीयता में आते हैं। तीनों में मधेशी दलितों की माली हालत सबसे खराब है। मधेशी दलितों में ७० प्रतिशत आबादी भूमिहीन है, उनके बीच जातिभेद भी बहुत हैं जिसके चलते उनमें एकता की भी उतनी ही कमी है। तराई क्षेत्र में मजबूत सामंतवाद के कारण वे समाज से ज्यादा बहिष्कृत हैं। वे राष्ट्रीयता के आधार भी सताये जाते हैं क्योंकि पुरानी राज व्यवस्था में उनमें से ज्यादातर लोगों को नागरिकता प्राप्त नहीं है। पुरानी राजव्यवस्था सभी मधेशियों को भारतीय समझता है।
यह अजीब लगता है कि २१वीं सदी में भी प्राचीन परंपराओं का हिन्दू राजा राजकीय हिन्दू धर्म को बचाने के लिए मध्ययुगीन अत्याचार को स्वीकृति प्रदान करता है। दलित मुद्दा गैर सरकारी संस्थाओं के लिए डॉलर कमाने का एक जरिया है, संशोधनवादी वामंपथ के लिए दलित भावनाओं को दूहकर वोट बैंक की राजनीति करना है तथा क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के लिए यह व्यवहार में परिणत होने का इंतजार करता हुआ एक सिद्धांत बना रहा है।


एनजीओ और दलितप्रश्न

यह उल्लेखनीय है कि दक्षिण एशिया के संदर्भ में जाति प्रथा सामंतवाद का महत्वपूर्ण तत्व है। सामंती तथा साम्राज्यवादी दोनों ताकतें अपने फायदे में जाति व्यवस्था का इस्तेमाल करती हैं। सामंती ताकतें जाति व्यवस्था को धर्मों को आपस में तथा धर्म के भीतर वर्गों को आपस में लड़ाने के लिए इस्तेमाल करती हैं। साम्राज्यवादी ताकतें दलित मुद्दे का इस्तेमाल उत्पीड़ित जनता को विभाजित करने में करती हैं। वे जाति व्यवस्था को अक्षुण्ण रखते हुए इसे पृथक पहचान रूप में रेखांकित करती हैं और आर्थिक उदारीकरण को सभी समस्याओं का हल बताती हैं।

उत्पीड़क शासक वर्ग शोषितों की तुलना में बहुत ज्यादा वर्ग चेतन होते हैं क्योंकि उन्हें एक विशाल आबादी पर शासन करना होता है। ऐसा वे शोषित वर्गों को बांट कर तथा उनमें से कुछ को एनजीओ के माध्यम से रोटी का टुकड़ा फेंककर करते हैं। जो समुदाय जितना ज्यादा गरीब होता है, उनके लिए एनजीओ को उतना ही ज्यादा फंड आवंटित कराया जाता है। इसलिए दलित मुद्दे तथा दलितों के भीतर दलित औरतों के मुद्दे एनजीओ तथा अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ के लिए खूब बिकाऊ होते हैं। इन सभी योजनाओं का उद्देश्य दलितों के वर्गीय चेतना को कुंद करने के लिए क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को उनसे दूर रखना होता है। ऐसा करने के उनके विभिन्न तरीके हैं।
दलितों को ब्राह्मण-विरोधी, मनु-विरोधी तथा ओबीसी-विरोधी के रूप में इतना ज्यादा प्रचारित किया जाता है कि दलित पहचान संकीर्णतावादी चरित्र ग्रहण कर लेता है। ब्राह्मण संस्कृति से लड़ने के नाम पर वह दलित ब्राह्मणवाद व्यवहृत करने लगता है जिसके तहत अपनी पहचान खोने के डर से दलित ी़-पुरूषों को दूसरी जातियों, धर्मों तथा समुदायों में विवाह करने से रोकते हैं। उत्पादन संबंधों एवं दलितों-गैर-दलितों के बीच सांस्कृतिक संबंधों के सामंती चरित्र पर चोट करने की जगह राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ गैर-दलितों के साथ झगड़ों से बचने के नाम पर अलग पानी का नल, मंदिर, समुदायिक भवन आदि बनाकर उनके अलगाव को और ज्यादा बढ़ावा देते हैं। दलितों में एकता मजबूत करने के लिए विभिन्न दलित जातियों का जमात बनाने की जगह वे अलग-अलग दलित जाति का अलग संगठन बनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और फिर ज्यादा-से-ज्यादा फंड पाने के लिए उनमें प्रतियोगिता पैदा करते हैं। इसका परिणाम होता है कि अपेक्षाकृत शिक्षित और उन्नत दलित जातियां ज्यादा फंड पाने में सफल होती हैं, जिससे दलितों के बीच विभाजन होता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मध्यवर्गीय अवसरवादी दलित नेता भी तैयार किये जाते हैं जिनका इस्तेमाल संसदीय राजनीति के तहत वर्गीय शासन को चलायमान रखने के लिए किया जाता है।

कई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ हिन्दू फासिस्टों के साथ मिलकर साम्प्रदायिक दंगे भी भड़काते हैं। भारत में गुजरात के गोधरा में २००२ में हिन्दू-मुसलमानों के बीच जो दंगे हुए वह इसका एक उदाहरण है। ऐसा पाया गया कि कई हिन्दू फासिस्ट एनजीओ दलित पहचान के संकट को उनमें मुसलमानों से भय तथा उनके खिलाफ हिंसा करने के लिए प्रेरित करने में इस्तेमाल करते हैं।

आखिर अंत में अंध कम्युनिस्टों, जो वर्गीय शोषण को इतनी प्रमुखता देते हैं कि उन्हें दलित शोषण दिखायी नहीं पड़ता है, की विफालता को भी ये एनजीओ अपने पक्ष में भंजाते हैं। इन गैर सरकारी संगठनों (एनजीओं)े ने उत्तर आधुनिक विचारधारा के जहर का इस्तेमाल कर संभावित कम्युनिस्ट दलितों को अपने में मिला लिया।
इन तमाम विश्लेषणों का यही निष्कर्ष है कि क्रांतिकारी कम्युनिस्ट दलित उत्पीड़न को दक्षिण एशिया क्षेत्र में क्रांतिकारी आंदोलन के रणनीतिक एवं मूलभूत मुद्दे के रूप में अंगीकार करें।


कम्युनिस्ट और दलित प्रश्न

१९४९ में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के समय से दलित प्रश्न ब्राह्मण और क्षत्री ऊंची जातियों के कम्युनिस्ट कैडरों की परीक्षा लेता रहा है कि वे कहां तक सच्चे कम्युनिस्ट बन पाये हैं। इस परीक्षा को उन्होंने दलितों के घरों में प्रवेश कर तथा उनके साथ दारू पीकर उत्तीर्ण करना चाहा। लेकिन उनका यह भोला सांस्कृतिक विद्रोह शायद ही कभी दलितों से विवाह करने या पार्टी में उन्हें नीति निर्धारक पदों पर बैठाने तक पहुंच पाया।
दलित प्रश्न पर नेपाली कम्युनिस्ट आंदोलन की तीन धारायें हैं। पहली, संशोधनवादी, दूसरी, नव-संशोधनवादी तथा तीसरी क्रांतिकारी धारा। संशोधनवादी दलित प्रश्न को विशुद्ध रूप से आर्थिक-सामाजिक सवाल समझते हैं, जिसका समाधान संसदीय कानूनी प्रक्रिया से क्रमिक सुधार द्वारा होना है। वे इसे एक पृथक मुद्दे के रूप में देखना चाहते हैं। संसदीय रास्ते के राही यूनाइटेड मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी (यूएमएल) इस धारा का प्रतिनिधित्व करता है। नव संशोधनवादी, दलित सवाल को वर्गीय सवाल का दर्जा देकर ज्यादा क्रांतिकारी होने की कोशिश करता है किन्तु अभी समय नहीं आया है के नाम पर वर्ग संघर्ष से दूर भागता है। समय के साथ वे एक नये रूप वाले संशोधनवादी बन जाते हैं। दूसरी संसदीय पार्टी यूनिटी सेंटर मसाल इस धारा की है। क्रांतिकारी धारा दलितो के शोषण को जातिगत शोषण के रूप में लेती है जो वर्गीय शोषण की महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। यह जाति संघर्ष (Caste struggle) को वृहत वर्ग संघर्ष (Caste struggle) के साथ जोड़ता है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) इसी धारा की पार्टी है। यह न केवल अपने दलित मोर्चा को महत्व देता है बल्कि संघर्ष के विशिष्ट स्वरूप को विकसित करने की अनुमति तथा जनता के नये राज्य में विशेष अधिकार भी देता है। यह दलितों के सैन्यीकरण पर बल देकर उनको जन सेना में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित भी करता है।

क्रांतिकारी कम्युनिस्ट दलित प्रश्न को गंभीरता से क्यों लें, इसके कई कारण हैं। सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि उनके जीवन की वस्तुगत परिस्थितियां उन्हें कम्युनिस्ट सिद्धांत का स्वभाविक मित्र बना देती हंै। विश्व के परिवर्तन का सवाल विशेष रूप से क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के लिए महत्वपूर्ण है। माओवादी पार्टी महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति (GPCR) को बहुत महत्व देता है जिसका नारा 'विद्रोह करना सही है` दलितों को विशेष तौर पर आकर्षित करता है।

दलित समाज का सबसे प्रमुख अंतर्विरोध यह है कि वे समाज के लिए बहुत से उपयोगी कार्य जैसे गलियों, नालियों, पखानों की सफाई, कूड़े-कचड़े, मरे जानवरों को इकट्ठा करके जगह पर पहुंचाना, जूतों-बैगों आदि की मरम्मत करना आदि करते हैं किन्तु उसी समाज से बहिष्कृत होते हैं। इसके चलते दलितों में अपने आप से अलगाव (selfalienation) होता है जो उनके तनाव मुक्ति के लिए नशा करने का, दलित औरतों के वेश्यावृति के धंधे में फंसने का कारण बनता है। उनके समाज का दूसरा अंतर्विरोध यह है कि दलित जातियों में आपस में ऊंच-नीच, छुआछूत, पवित्र-अपवित्र की समस्या बनी रहती है जो उन्हें विभाजित तथा कमजोर बनाता है। इस तीखे अलगाव को पुरानी राजसत्ता के खिलाफ, उनको नास्तिक बनाकर, विद्रोह में बदला जा सकता है, उनमें महान सर्वहारा चेतना भरी जा सकती है तथा नये क्रांतिकारी राज्य के प्रति उनको निष्ठावान बनाया जा सकता है।

दलित आंदोलन, राजनीतिक दृष्टि से, सामंतवाद विरोधी होता है तथा इसलिए नये जनवादी आंदोलन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका बनती है। दलितों के ऊपर थोपे गये सभी धार्मिक, कर्मकांडों तथा दासता की बेड़ियों को पूंजीवाद खत्म करता है। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में पूंजीवादी क्रांति जितनी ज्यादा पूर्ण होगी, आगामी सामाजिक क्रांति के लिए उतना ही ज्यादा अनुकुल वातवारण तैयार होगा। क्योंकि नवजनवादी क्रांति का मुख्य काम प्रतिक्रियावादी ताकतों के ऊपर तानाशाही लागू करना तथा शोषितजनों के लिए लोकतंत्र की स्थापना करना होगा, इसलिए सभी शोषितजनों में दलित ही क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के सबसे नजदीकी मित्र होंगे। ऐसा इसलिए है कि प्रतिक्रयावादियों के ऊपर जो अभी भी मध्ययुगीन शोषण के तौर-तरीके अपना रखे हैं तानाशाही शासन प्रणाली की सबसे फौरी जरूरत दलितों को है। पुरानी पतनशील संस्कृति उनकी ऐतिहासिक दासता पर टिकी हुई है इससे छुटकारा पाने के लिए सेल्यूलर, लोकतांत्रिक वातावरण तथा आधुनिक दृष्टिकोण की उन्हें जरूरत है। सामंती ताकतों ने उनके काम को कभी कोई सम्मान नहीं दिया है जिसका इतना ज्यादा सामाजिक महत्व तथा आर्थिक मूल्य है।

दलित आंदोलन का मजबूत साम्राज्यवाद विरोधी चरित्र रहा है जो नव जनवादी आंदोलन को मजबूती प्रदान करेगा। साम्राज्यवाद राष्ट्रीय पूंजीवाद के विकास में रोड़ा है जो न केवल दलितों से उसका मूल पेशा छीन ले रहा है बल्कि अपने हुनर को विकसित करके देश के संगठित उद्योग में शामिल होने से भी रोक रहा है। साम्राज्यवाद उनके प्राकृतिक संसाधनों की भी लूट करता है जिसके माध्यम से उत्पादन करके वे अपनी जीविका चलाते आये हैं।
दलित ऐतिहासिक रूप से मेहनतकश जनता रही है, इसलिए क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को उनमें सर्वहारा दृष्टिकोण भरना चाहिये। नवजनवादी क्रांति सीमित प्राकृतिक अर्थव्यवस्था, जिसमें दलितों का हुनर कैद होकर रहता है, को तोड़ने में मदद देकर उनके शहरीकरण, औद्योगीकरण का रास्ता तैयार कर कालांतर में राजसत्ता का
समाजीकरण करता है। यह समाज में जातिभेद को खत्म करने का आधार तैयार करेगा।

दलितों को यह भी जानना होगा कि तथाकथित सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative actions) सकारात्मक विभेद, पक्षपाती कार्रवाई, भेदभाव विरोधी कानून, आरक्षण आदि विशेष प्रावधान, जो दलितों की स्थिति में सुधार लाने के लिए पुराने राज्य ने बनाये हैं, उनको लागू करने के लिए बल प्रयोग के बिना निरर्थक साबित होंगे। गरीब और भूमिहीन दलितों को जानना होगा कि दलितों के लिए पृथक निर्वाचन, पृथक बस्ती, पृथक पहचान या इस शोषणकारी व्यवस्था में दलितों की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति अंतत: अभिजात मानसिकता के दलित पैदा करेंगे जो शीर्ष वर्गीय राज्य सत्ता में समाहित कर लिये जायेंगे। हिन्दू धर्म के खिलाफ विद्रोह में बौद्ध धर्म, ईसाइयत या अन्य किसी धर्म को स्वीकार करने से दलित न केवल अपनी समस्या के समाधान को लंबित रखेंगे बल्कि अपने आप को धार्मिक राजनीति के झमेले में फंसा देंगे, जो कि प्रतिगामी होगा। इसके अलावा कोई ेभी देख सकता है कि हिन्दुओं के अलावे बाकी सभी धर्म-इसलाम, ईसाई, बौद्ध, सिक्ख आदिकम से कम भारतीय संदर्भ में जाति व्यवस्था को ढो रहे हैं।

वर्ग संघर्ष एकीकृत दलित संघर्ष के साथ जुड़ाव वाले वर्ग संघर्ष एवं विद्रोह करने के अधिकार को संस्थाबद्ध करके ही जाति आधारित समाज व्यवस्था एवं दलित-पिछड़ा के जीवन को बदला जा सकता है।

यदि कम्युनिस्ट दलित प्रश्न को एक स्वतंत्रत एकीकृत मुद्दे के रूप में संबोधित नहीं करते हैं तो दलित समुदाय के भीतर विद्यमान अवसरवादी तत्व दलित मुद्दे को पहचान की राजनीति में घटा कर रख देंगे जिससे साम्प्रदायिक, संकीर्णतावादी राजनीति को ही प्रोत्साहन मिलेगा और दलित अंतत: घुटन भरे जाति शोषण के शिकार तथा साम्राज्यवादी-सामंती ताकतों के हाथ का औजार बनकर रह जायेंगे।
(सीपीएन (एम) के मुख पत्र 'द वर्कर` से साभार। अनुवाद-जन विकल्प टीम)


जून ,2007 अंक में प्रकाशित

विशन टंडन

आपातकाल - एक डायरी



आइएएस अधिकारी विशन नारायण टंडन सात वर्षों (१९६९-७६) तक प्रधानमंत्री के संयुक्त सचिव रहे।
भारतीय जनतंत्र के इतिहास में यह समय कितना महत्वपूर्ण बन गया है यह सर्वविदित है। यहां प्रस्तुत
है इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के निर्णय के दौरान लिखी गई उनकी तीन दिन की डायरी



२५ जून, १९७५

आज सुबह नये गृह सचिव (खुराना) मुझसे मिलने आये। मेरा परिचय उनसे बीस वर्ष पुराना है। राजस्थान के मुख्य सचिव के पद पर काम करते समय भी वे मुझसे हर दस-पन्द्रह दिन में मिला करते थे। आज केवल औपचारिकता के नाते आये थे। उनका सुझाव है कि मैं वर्धन की जगह गृह मंत्रालय मेंं आ जाऊं। मंत्रालय को मुझसे बड़ी सहायता मिलेगी। वे मेरी सहमति चाहते थे।

प्रधानमंत्री आजकल कार्यालय नहीं आ रही है। काम का वातावरण नहीं है। वैसे भी काम कुछ कम है।
सन्ध्या को शिक्षामंत्री प्रो। नूरुल हसन एक मीटिंग के सिलसिले में साउथ ब्लॉक आये थे। मीटिंग समाप्त होने पर मेरे पास आकर घंटा-भर बैठे रहे। उन्होंने आजकल की स्थिति के सन्दर्भ मेंे दो बातें कही। पहली तो यह कि प्रधानमंत्री को निर्वाचन सम्बन्धी विधान में संशोधन करा लेना चाहिए। जब जनता चाहती है (चाहे इसका प्रदर्शन किराये की रैलियों ने किया) तो यह देश के हित में है कि प्रधानमंत्री की अयोग्यता कानूनी तरीके से दूर कर दी जाये। किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। इस विषय पर वे प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे। दूसरी बात उन्होंने कही कि संसद का सत्र अवश्य होना चाहिए। जनता में विश्वास इसी से दृढ़ होगा, पर वे इस विषय पर प्रधानमंत्री से न कुछ कहना चाहते हैं, न लिखना चाहते हैं। क्यांे? उत्तर की आवश्यकता नहीं।

नूरुल हसन के जाने के बाद मैं रुस्तम जी से मिलने चला गया। गृह मंत्रालय के कुछ कागजात मेरे पास दो-चार दिन से पड़े हैं। प्रधानमंत्री को प्रस्तुत करने से पहले उनसे बातचीत करना आवश्यक था। रुस्तम जी से जब बातचीत समाप्त हुई, वहीं देवेन्द्र सेन आ गये। मैं उनके साथ उनके कमरे में चला गया। देवेन्द्र सेन ने बताया कि प्रधानमंत्री निवास पर सब काम संजय के निर्देशन में हो रहा है। उसने स्थिति का पूरा चार्ज ले लिया है। एक-दो दिन पहले निगमेंद्र (देवेन्द्र सेन के छोटे भाई और सी।आर.पी. के महानिदेशक) को प्रधानमंत्री निवास पर बुलाया गया। संजय ने उनसे मुलाकात की और सुप्रीम कोर्ट के फैसले वाले दिन सी.आर.पी. का क्या प्रबन्ध हो, इस पर निर्देश दिये। प्रधानमंत्री ने न निगमेंद्र को बुलवाया था, न वे उनसे मिलीं।

आज की दो बातें मुझे अजीब लग रही हैं। दोपहर को किशन चन्द का फोन आया था। वे कह रहे थे कि बहल और नवीन चावला के घर 'रैक्स` आज ही लग जाने चाहए। सहज भाव से कहा अगर रात में जरूरत पड़े तो क्या होगा? मैंने उनसे बहस नहीं कि और कहा कि खुराना से कह दीजिए। दूसरे जयपुर से भनोट का फोन आया था। वह राजस्थान का कार्यवाहक मुख्य सचिव है। वह चाहता था कि मैं उसे एयरफोर्स का प्लेन दिलवा दूं। प्रधानमंत्री ने आज ही मुख्यमंत्री को दिल्ली पहुंचने को कहा है, पर वे अपने परिवार में एक विवाह के उपलक्ष्य में डूंगरपुर गये हुए हैं। मैंने उससे भी यही कहा कि खुराना से बात करो। पर मुख्यमंत्री को एकदम यहां बुलाने की आवश्यकता क्या हो गयी? एकाध दिन बाद भी आ सकते हैं। मैंने प्रो। खुराना से पूछा पर उन्हें भी कुछ पता नहीं है।

२६ जून, १९७५

कल रात एक बजे के बाद रैक्स पर खुराना का फोन आया। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे कुछ मालूम है कि प्रधानमंत्री ने कुछ निर्देश दिये हैं जिनको आज रात में ही कार्यान्वित करना है। उन्होंने बताया कि दिल्ली के उप-राज्यपाल ने उन्हें फोन किया था और चण्डीगढ़ के मुख्य आयुक्त ने। चण्डीगढ़ के मुख्य आयुक्त को पंजाब के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के कुछ निर्देश दिये हैं। निर्देश यही थे कि विरोधी दलों के नेताओं को गिरफ्तार करना था। मैंने अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। उनके बार-बार पूछने पर यही सलाह दी कि वे गृहमंत्री या ओम मेहता से बात करें। मुझे शेषन की बात याद आयी। उसका कहना ठीक निकल रहा है। आश्चर्य यह कि बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हांेगी, पर गृह सचिव को इसका कुछ पता नहीं। निर्मल मुखर्जी को बताना ठीक नहीं था पर खुराना की नियुक्ति तो तभी की गयी है जब वे विश्वसनीय पाये गये हैं। उन्हें भी नहीं बताया गया।

सुबह जब उठा तो कम्मी ने कहा कि वर्धन का फोन आया था, उनसे बात कर लूं। एक परिचित पत्रकार का फोन भी सुबह आया था कि रात में लगभग १०० विरोधी नेता गिरफ्तार किये गये हैं। अखबर केवल 'स्‍टेटसमैन ` और 'हिन्दुस्तान टाइम्स` आये थे बाकी छपे ही नहीं । इन्हीं पत्रकार ने कम्मी को बताया था कि उनकी बिजली काट दी गयी थी, जिससे छपाई नहीं हुई।

सुबह जब उठा तो कम्मी ने कहा कि वर्धन का फोन आया था, उनसे बात कर लूं। एक परिचित पत्रकार का फोन भी सुबह आया था कि रात में लगभग १०० विरोधी नेता गिरफ्तार किये गये हैं। अखबार केवल 'स्टेट्समैन` और 'हिन्दुस्तान टाइम्स` आये थे। बाकी छपे ही नहीं। इन्हीं पत्रकार ने कम्मी को बताया था कि उनकी बिजली काट दी गयी थी, जिससे छपाई नहीं हुई।

मैं सुबह कभी रेडियो नहीं सुनता, पर आज कम्मी मेरे कमरे में ट्रांजिस्टर ले आयी। उसे पता लगा था कि राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री का सन्देश आने वाला है। वह मैंने सुना। प्रधानमंत्री ने बहुत अटक-अटक कर अपना सन्देश हिन्दी में पढ़ा। बाद में अंग्रेजी में बहुत ठीक से पढ़ा। सन्देश यही था कि राष्ट्रपति ने आपात्काल की घोषणा कर दी है, पर घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। विरोधी दलों के भीषण षड्यंत्र से देश को बचाने के लिए ऐसा करना आवश्यक हो गया था। कुछ तत्व प्रजातंत्र के नाम पर प्रजातंत्र को समाप्त करने में लगे हुए हैं। उन्हें ऐसा करने से रोकना है (मेरे मन में प्रश्न हुआ-कौन है वह?)

कार्यालय के लिए जब घर से निकल रहा था तो शारदा का फोन आया। उसने अंग्रेजी में कहा, 'सब सुन लिया। सब कुछ समाप्त हो गया। (यू मस्ट हैव हर्ड इट इज ऑल ओवर) कार्यालय आओगे तो पूरी बात होगी।` शारदा का स्वर बहुत दबा हुआ था।

कार्यालय में मैं सीधे शारदा के कमरे में ही गया। उसने मुझे विस्तार से, जो कुछ उसे मालूम था, बताया। कल रात दस बजे प्रधानमंत्री ने प्रो। धर और शारदा को अपने निवास-स्थान पर बुलाया। वहां बरुआ और सिद्धार्थ पहले से ही उपस्थित थे। जब प्रो. धर और शारदा पहुंचे तो प्रधानमंत्री ने कहा, 'आई हैव डिसाइडेड टु डिक्लेयर इमर्जेंसी। प्रेजीड़ेण्ट हैज एग्रीड। आई विल इन्फार्म द कैबिनेट टुमौरो।` यह कहते हुए आपात्काल की घोषणा का प्रारूप प्रो. धर के हाथ में रख दिया। प्रो. धर और शारदा आवाक् रह गये, उन दोनों को केवल सूचना देने के लिए बुलाया गया था और उनकी सलाह चाहिए थी प्रचार अभियान के लिए। उन दोनों से प्रधानमंत्री ने 'राष्ट्र के नाम सन्देश` का प्रारूप भी तैयार करने को कहा। वे दोनों लगभग एक बजे तक प्रधानमंत्री निवास पर रहे। सुबह छ: बजे मंत्रिपरिषद् की मीटिंग थी।

सुबह की मीटिंग में जो मंत्री दिल्ली में थे, सभी उपस्थित थे। प्रधानमंत्री ने भूमिका बतायी, पर किसी एक मंत्री ने भी चूं तक नहीं की। किसी प्रकार का विरोध नहीं। केवल सरदार स्वर्ण सिंह ने कुछ प्रशासनिक प्रश्न किये। मंत्रिपरिषद् में रात को की गयी गिरफ्तारियों की बिल्कुल चर्चा नहीं हुई। किसी एक मंत्री ने कहा कि उन्होंने सुना है कि कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं, पर बात टाल के वहीं समाप्त कर दी गयी। प्रो। धर को भी इन गिरफ्तारियों का कुछ पता नहीं था, शारदा ने बताया कि जे.पी., मोरारजी, चरण सिंह आदि सब प्रमुख विरोधी नेता गिरफ्तार कर लिये गये हैं।

शारदा ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री निवास पर पूरा कन्ट्रोल संजय ने ले लिया है। मंत्रिपरिषद् की मीटिंग के बाद उसने गुजराल को बुला कर प्रचार-कार्य के प्रति अप्रसन्नता और असंतोष प्रकट किया। कहा कि आगे से हर समाचार बुलेटिन प्रधानमंत्री-निवास पर भेजा जाये। इस पर गुजराल ने कहा कि कार्य की दृष्टि से अच्छा होगा कि किसी अधिकारी को मनोनीत कर दिया जाये। वह ए.आर. में ही रहे। उसे सब बुलेटिन दिखा दिये जायेंगे। उन्होंने शारदा का नाम सुझाया, पर संजय ने इसे स्वीकार न करके इस काम के लिए बहल की ड्यूटी लगायी।
जब ये सब बातें हो रही थीं वी।आर. भी वहीं आ गया था। शारदा की बात सुनकर उसने कहा कि अब इस देश में भी 'गाइडेड डेमोक्रेसी` ही रहेगी। शारदा ने हल्का-सा 'हां` कहा।

शारदा थका हुआ तो काफी था। १५ जून से हमारे सचिवालय में सबसे अधिक काम उस पर ही पड़ा है क्योंकि प्रधानमंत्री की पूरी स्टे्रटेजी प्रचार-अभियान पर ही आधारित है। पर शारीरिक थकान से अधिक मानसिक क्लेश में था। मैंने शारदा को कभी ऐसा नहीं देखा था। शारदा अवश्य ही सोच रहा होगा कि क्या ऐसी ही स्वतंत्रता के लिए वह १९४२ में जेल गया था। शारदा पत्रकार है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार देश में 'प्री-सेंसरशिप` लागू की गयी है।
शारदा के कमरे से आने पर मुझे सन्देश मिला की पन्त मुझसे एकान्त में बातचीत करना चाहते हैं; मैं कब उनके घर जा सकता हूं? पन्त भी अन्य मंत्रियों की भांति कायर हैं। मैं क्यों इस बीच में पड़ूं? मैंने वासुदेवन को बुलवाया। वह पन्त का विशेष सहायक है। मेरे साथ मेरठ में काम कर चुका है; गा़ज़ियाबद में ज्वाइंट मैजिस्ट्रेट था। उसको बुलाकर मैंने समझाया कि जो कुछ हुआ है मुझे उसकी पूरी जानकारी नहीं है। पन्त से बात करने में इसलिए अभी कोई लाभ नहीं। मैं उनसे दो-चार दिन में मिल लूंगा।

वासुदेवन ने कहा कि पन्त जी में किसी से कुछ कहने की हिम्मत नहीं है। वे मुझसे यही पूछेंगे कि प्रधानमंत्री की क्या मदद की जाये? पर मैं जानता हूं अन्दर-ही-अन्दर प्रधानमंत्री से कितने दु:खी होंगे।
शेषन आज कार्यालय बहुत देर से आया। आते ही मेरे पास आया। कहा कि-'देखिए, मैंने कहा था। पर मेरी समझ में नहीं आता कि आगे क्या होगा? कब तक ऐसे चलेगा? संजय ने पूरा कन्ट्रोल से ले लिया है।`

दिन-भर मन बहुत उदास रहा। मन में बहुत कटुता भी आ गयी थी। क्या प्रजातंत्र का अन्त वास्तव में आ गया? मैं दिन-भर अपने कमरे में ही रहा। प्रो। धर से भी मिलने नहीं गया। क्या करता मिल कर? उनकी व्यथा मैं समझ सकता हूं । मैंने सोचा कि आपात्काल सम्बन्धी सब काम नया होगा। मेरी इच्छा भी यह काम करने की नहीं है। मैंने बहल से बात की कि वह यह काम करे। उसे लाया भी इसलिए गया है कि काम बढ़ेगा और धीरे-धीरे वह मेरा काम भी समझ ले। मैं बार-बार यही सोच रहा था कि आज पण्डित जी की आत्मा पर क्या बीती होगी?

मैंने पहले लिखा है कि मंत्रिपरिषद् में किसी मंत्री ने कोई विरोध नहीं किया। यह बड़ी गम्भीर बात है। संविधान की धारा ७७ के अन्तर्गत भारत सरकार के राजकाज के जो नियम बने हैं, उसके अनुसार राष्ट्रपति को आपात्काल की घोषणा करने की सिफारिश करने के लिए मंत्रिपरिषद् की बैठक आवश्यक थी। इन्हीं नियमों में प्रधानमंत्री को अधिकार है कि वह यदि आवश्यक समझे तो बिना मंत्रिपरिषद् की बैठक किये भी कोई निर्णय ले सकते हैं। पर प्रश्न है कि क्या इस विषय पर मंत्रिपरिषद् की बैठक नहीं की जा सकती थी? निर्णय प्रधानमंत्री ने स्वयं लिया। ऐसा क्यों?

दूसरी बात यह है कि राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सलाह इन परिस्थितियों में क्यों मानी? वे संविधान की तनिक भी अवहेलना नहीं करते होते, यदि वे प्रधानमंत्री से कहते कि वे इस प्रस्ताव पर पूरे मंत्रिपरिषद् की राय जानना चाहेंगे। पता नहीं उन्होंने ऐसा कहा या नहीं, पर ये तो साफ है कि ऐसा हुआ नहीं। प्रधानमंत्री जब राष्ट्रपति से मिलने गयी थीं, तो सिद्धार्थ साथ थे। इन दोनों से मिलकर ही राष्ट्रपति को सहमत कराया। मेरी जानकारी में यह पहली बार है जब राष्ट्रपति ने केवल प्रधानमंत्री की राय पर इतना महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया हो।

२७ जून, १९७५

आज भी सुबह कोई समाचारपत्र नहीं आया। कब तक ऐसे चलेगा? कार्यालय आकर मैंने शारदा से पूछा तो उसने कहा कि सभी समाचारपत्रों के प्रेसों की बिजली कटी हुई है, फिर छपाई कैसे हो? यह केवल ढींगाढींगी से किया जा रहा है, किसी कानून के अन्तर्गत नहीं।

शारदा से मिलने के बाद मैं प्रो. धर के पास गया। कल उनसे नहीं मिला था। मैंने उनसे दो बातें कहीं-एक, आपातकाल घोषित करने की राष्ट्रपति की विज्ञप्ति मुझे संवैधानिक दृष्टिकोण से त्रुटिमय लगी। विधि मंत्रालय से परामर्श करना चाहिए। दो, जिन नेताओं को पकड़ा गया है उनको गिरफ्तारी के कारण देने में बड़ी सतर्कता की आवश्यकता होगी। प्रो. धर ने मेरी बात सुनी, संविधान के इससे सम्बन्धित अनुच्छेद भी पढ़े और फिर कहा कि मैं दोनों बातें बहल को समझा दूं। पर जैसे ही मैं उनके कमरे से निकला, मुझे वापस बुला कर कहा कि जब इस सम्बन्ध में मुझसे और आपसे काई राय ली ही नहीं गयी है तो अब हम लोग क्यों बीच में पड़ें। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह सब काम विधि पण्डितों से पूछकर किया गया होगा, हमें इसमें नहीं पड़ना चाहिए। अन्त में कहा कि तुम कितने भागयशाली हो कि जब यह सब हुआ तो एक और अधिकारी इस सचिवालय में आ गया था। सरकारी क्षेत्रों में यही धारणा होगी कि इस काम में नये अधिकरी का हाथ है। लेकिन मेरे लिए लोग क्या सोचेंगे। मुझे तुम्हारे भाग्य से ईर्ष्या होती है। मैं चुपचाप उनके कमरे से चला आया। उनकी पीड़ा ने उनकी आंखों को नम कर दिया था।
आज प्रधानमंत्री ने भारत सरकार के सचिवों की एक मीटिंग की (कुछ अतिरिक्त सचिव भी उस मीटिंग में थे)। उनको सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने जो कुछ भी किया है प्रजातंत्र को बचाने के लिए किया है। प्रजातंत्र के नाम पर प्रतिपक्ष प्रजातंत्र की हत्या करने पर कटिबद्ध था। हमें न तो संसद में कुछ काम करने दिया जाता था न बाहर। निर्वाचित सदस्यों को विधानसभाओं से त्यागपत्र देने को बाध्य किया जा रहा था। अनुशासनहीनता को इससे बढ़ावा मिल रहा था। स्थिति धीरे-धीरे खराब हो रही थी। सरकार कब तक यह बर्दाश्त करती? बहुत से विदेशी नेताओं और राजदूतों ने प्रधानमंत्री से समय-समय पर यह कहा कि सरकार इन गतिविधियों के प्रति इतनी नर्म क्यों है? प्रधानमंत्री ने यह आशा ही व्यक्त नहीं की, बल्कि यह आश्वासन दिया कि सरकार ने जो कदम उठाये हैं, वे अस्थायी हैं और शीघ्र-से-शीघ्र सामान्य स्थिति लाने का प्रयत्न किया जायेगा।
प्रधानमंत्री ने सरकारी कर्मचारीगण की भी प्रतारणा की। राजनीतिज्ञों के प्रति उनका दृष्टिकोण ठीक नहीं है। उसमें सुधार लाना आवश्यक है।पर सबसे गलत बात है वरिष्ठ अधिकारियों का अनाप-शनाप बात करना। कई विदेशी राजदूतों ने प्रधानमंत्री को बताया है कि पार्टियों में भारतीय अधिकारी शराब पीकर इस प्रकार से बोलते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि अनाप-शनाप बात करने की प्रवृत्ति बिल्कुल बन्द होनी चाहिए। इस सन्दर्भ में उन्होंन मंत्रालयों की कार्यक्षमता सुधारने पर बल दिया और कई छोटी-मोटी बातें कहीं।

कुछ अन्य बातें जो प्रधानमंत्री ने कही वे इस प्रकार थीं :

१. प्रतिपक्ष 'नाज़ीवाद` फैला रहा है। नाज़ीवाद केवल सेना और पुलिस के उपयोग से ही नहीं आता है। कोई छोटा समूह जब गल़त प्रचार करके जनता को गुमराह करे, वह भी नाजीवाद का लक्षण है।
२. भारत में दूसरे दलों की सरकारें चाहे बन जायें, पर वे मार्क्सवादी कम्युनिस्टों और जनसंघ की सरकार नहीं बनने देंगी।
३. जयप्रकाश के आन्दोलन के लिए रुपया बाहर से आ रहा है।
४. सी.आई.ए. बहुत सक्रिय है, के.जी.बी. का कुछ पता नहीं, लेकिन उनके कार्य का कोई प्रमाण अभी तक सामने नहीं आया है। (मतलब यह था कि वे कोई गल़त काम नहीं कर रहे हैं।)
५. प्रतिपक्ष का सारा अभियान उनके (प्रधानमंत्री) विरुद्ध था।
६ इसके अतिरिक्त उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति नहीं नजर आता जो इस समय देश के सामने आयी हुई चुनौतियों का सामना कर सके।

मीटिंग के बाद मुझसे वी.आर. ने पूछा कि इस स्पष्टीकरण से किसे सन्तोष हुआ होगा?
प्रधानमंत्री आज कार्यालय कई दिनों के बाद आयी थीं। मैं उनसे मिला। कोई विशेष बात नहीं हुई। कुछ रुटीन बातों पर आदेश देने थे। एक केस के सम्बन्ध में वे जानना चाहती थीं कि यू.पी.ए.सी. ने एक अमुक प्रत्याशी को इण्टरव्यू के लिए क्यों नहीं बुलाया और उसे चुना क्यों नहीं? मैंने कहा कि यू.पी.एस.सी. इसके कारण कभी सरकार को लिखकर नहीं भेजती। कहने लगीं कि मैं किदवई (यू.पी.एस.सी के अध्यक्ष) से मिलकर उनसे पूछूं। प्रधानमंत्री की जानकारी के लिए उन्हें बताने में आपत्ति नहीं करनी चाहिए। जब मैं उनके पास बैठा था किसी का फोन आया (बाद में मालूम पड़ा कि मध्य प्रदेश के राज्यपाल सत्य नारायण सिन्हा का था) कि सरकार को संविधान के अनुच्छेद ३५९ (१) के अन्तर्गत शीघ्र आदेश प्रसारित करने चाहिए। प्रधानमंत्री ने मुझसे यह अनुच्छेद समझाने को कहा। उसमें समय लगा। मैं करीब ३५ मिनट प्रधानमंत्री के पास रहा। मुझे उनकी परेशानी कम नजर नहीं आयी।
सूचना पर नियंत्रण लग गया है। पर आई।बी. की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि स्थिति इतनी सामान्य नहीं है, जितना सरकार चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है। तरह-तरह की अफवाहें फैल रही हैं। एक अफवाह का तो सरकारी प्रवक्ता को खण्डन करना पड़ा। यह अफवाह थी कि जगजीवन राम व चव्हाण अपने घरों में बन्दी बनाये गये हैं। बात बिल्कुल गल़त है, पर इससे यह स्पष्ट है कि पढ़ी-लिखी जनता इन दो नेताओं से क्या अपेक्षा करती थी।

रात में वर्धन ने बताया कि उन्होंने बह्मानन्द से आज दिन में बात की थी। वर्धन को लगता है कि सरकार की कोई 'स्ट्रैटजी` नहीं है। यदि आन्देालन-चाहे कितना हल्का हो-शांतिपूर्ण रहा और अदालतों ने बंदियों को छोड़ना शुरू किया, फिर सरकार क्या करेगी? ब्रह्मानन्द, वर्धन के अनुसार, बिल्कुल अनमने-से हैंं उन्होंने कहा कि मुझसे कब कुछ पूछा गया? पर अब भी उनकी प्रधानमंत्री से बात करने कह हिम्मत नहीं है।
रात में प्रधानमंत्री निवास से फोन आया। प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को दो मंत्रियों के विभागों के परिवर्तन के बारे में पत्र लिखना चाहती हैं। मुझसे उनका प्रारूप मांगा था, वह मैंने फोन पर ही डिक्टेट कर दिया।
पालकीवाला ने प्रधानमंत्री का वकील रहना अब अस्वीकार कर दिया है। नारीमन, एडीशनल सोलीसिटर जनरल, ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है। देश में अभी कुछ लोगों की आत्मा मरी नहीं है। इस अन्धकार में यही एक प्रकाश की रेखा लगती है।

( जून, 2007 अंक में प्रकाशित )

स्‍वतंत्र मिश्र

धर्म का असली धंधा


पिछले दिनों एक निजी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में कई बाबा काले धन को सफेद बनाने के लोभ में फंस गये। इस चक्कर में एक नहीं बल्कि सात-सात बाबा धरे गये हैं। इनके नाम हैं-पायलट बाबा, वेदांती महाराज, किरीट महाराज, स्वामी सूर्यम नंबूदरी, प्रज्ञानंद, आचार्य प्रमोद एवं बाबा अनिल जोशी। इस सिनेमाई घटना में रोमांच भी बहुत था। एक बाबा के बारे में टीवी पर दिखाकर दूसरे बाबा से उस पर प्रतिक्रिया ली जा रही थी। प्रतिक्रिया देने वाले बाबा फंस चुके बाबा के लिए बहुत कुछ बोल रहे थे। ब्रेक के बाद प्रतिक्रिया देने वाले बाबा ने पूरी सांस भी नहीं ली थी तभी उनके भी 'काले-सफेद` धंधे में शामिल होने का प्रमाण प्रसारित किया जाने लगा।

इससे पहले ये लोगों को धर्म और आध्यात्म की कहानियां सुनाते थे 'यह संसार कागज की पुड़िया है, बूंद पड़े घुली जाना है।` मोह और माया के बंधनों से मुक्त होने की सलाह तो हर बाबा, हरेक मिनट में देते ही रहते हैं। काला और सफेद करने के चक्कर में लोगों के सामने यह बात आ गयी कि ये धन कुबेर हैं। संत या फकीर होने का केवल ढोंग रचते हैं। यह ढोंग पूरी दुनिया में अलग-अलग समय में अलग-अलग तरीके से किया जाता रहा है। यूरोप में पोप अपना महल बनवाने के लिए लोगों को बीच स्वर्ग का टिकट बांटते थे। लोग स्वर्ग का टिकट लेने के लिए सुबह से शाम तक पंक्तियों में खड़े रहते थे। इन पंक्तिबद्ध लोगों में अथाह संपत्ति वाले और खाते-पीते लोग ही रहते थे। टिकटों का स्वरूप अलग-अलग था। पैसों के आधार पर स्वर्ग जाने और वहां की सुविधा का इंतजाम कराने का प्रलोभन पोप द्वारा दिया जाता था। स्वर्ग की लालसा भूखों और नंगों के मन में नहीं जगती। वे भूख मिटाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं। भारतीय संदर्भ में धर्म के बाजार में पैसों के खेल के बारे में राजेन्द्र्र यादव ने 'हंस` के मई, २००७ अंक में संपादकीय लिखा है-'विदेश में रह रहे अप्रवासी भारतीयों के मध्य अस्मिता की समस्या उन्हें नए सिरे से हिंदू बनाती है। जैसे-जैसे वहां की जिंदगी उन्हें संपन्न और समर्थ करती जाती है, वैसे-वैसे वे सांस्कृतिक कर्ज चुकाने के नाम पर यहां के मंदिरों-बाबाओं की आर्थिक मदद करते रहते हैं। बाबरी मस्जिद ध्वंस और राम मंदिर निर्माण में इन हिन्दुओं ने सोने की ईटें भिंजवाई थीं और यहां (दिल्ली) जो हजारों करोड़ के 'अक्षरधाम` बन रहे हैं, वे सब भी इन्हीं एनआरई प्रवासियों द्वारा हिंदुत्व के लिए योगदान की कृपा है। न जाने कितने बाबा, संत, भगवान, जादूगर करोड़ों मिलियन डॉलर लूट रहे हैं। धर्म और आध्यात्म इन दिनों सबसे ज्यादा बिकने वाला माल है।`

जनता दल (यू) के अध्यक्ष शरद यादव ने स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े गये बाबाओं को तत्काल गिरफ्तार करने और उनसे कड़ी पूछताछ की सराहनीय मांग की। हालांकि अपनी सदिच्छा के बावजूद उन्हें इस सवाल पर भी गौर करना चाहिए कि आखिर उनके धन कुबेर बनने के इंतजाम में कौन से कारक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं? इसके उलट शरद यादव ने यह तर्क दिया कि 'हवाला के आरोप में देश के नामचीन ६४ राजनेताओं के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर हुई, लोकसभा में प्रश्न पूछने के लिए निर्वाचित सदस्यों को १३ दिन में सदस्यता से वंचित कर दिया गया और कबूतरबाजी के आरोप में फंसे सांसदों को लोकसभा में आने से रोक दिया गया तो अंधविश्वास फैलाने वाले इन भ्रष्ट बाबाओं की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो रही?` अगर भ्रष्ट सांसदों के साथ ऐसा सलूक किया गया है तो इसमें आपत्तिजनक बात क्या है? हां इन सांसदों के अलावे अन्य सांसद भी भ्रष्ट हैं और उनपर उंगली किसी खास कारणों से नहीं उठायी जा रही तो श्री यादव को उस पर भी जरूर हंगामा खड़ा करना चाहिए। उनकी चिंता वाजिब है कि लोगों को धर्म की दुहाई देकर मालामाल होते बाबाओं पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। लेकिन शरद यादव के अखबारों में प्रकाशित बयानों में यह चिंता ज्यादा झलकती है कि बाबा की कमीज सांसदों से ज्यादा मैली होने पर भी उनपर कोई नोटिस क्यों नहीं लिया जा रहा है। आज धर्म बाजार का एक 'माल` बन चुका है। वह जीवन को सुंदर बनाने का स्रोत न रहकर, जीवन को कई स्तरों पर बाधित कर रहा है। सभी जानते हैं कि धर्म के नाम पर हुए लगभग सभी दंगों में पुलिस की सक्रिय भूमिका पायी गयी है।

यहां कुछ सवाल उन चैनल वालों से भी पूछा जाना चाहिए जो बाबाओं की इन करतूतों पर शोर मचा रहे थे। २४ घंटे चलने वाले तमाम खबरिया चैनलों पर धर्म के नाम पर अंधविश्वास की घटनाओं को महिमामंडित करके क्यों बेचा जाता है? बाबाओं और माताओं के माध्यम से चैनल तमाम तरह की अवैज्ञानिक बातों के प्रचार में क्यों जुटे हुए हंै? वे देश और दुनिया में हो रहे आम लोगों की लड़ाई की खबरें क्यों नहीं प्रकाश में लाते हंै? इन चैनलों पर बिहार, मध्यप्रदेश के सूदूर इलाकों में कौन अपने को सांप से कटवा रहा है, इसकी खबरें तो प्रसारित होती है, परंतु दिल्ली, पटना और भोपाल आदि जगहों पर आम जनता के हक की लड़ाई की खबरें क्यों दबा दी जाती हैं? मालूम हो सिर्फ दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रत्येक साल तीन हजार से ज्यादा धरना, प्रदर्शन आदि आयोजित होते हैं। क्या चैनल वाले हिसाब देंगे कि इतनी बड़ी तादाद में हो रहे विरोध कहां गुम करा दिये जाते हैं? इतनी भारी संख्या में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों का कितना प्रतिशत वे आम लोगों के बीच खबर बनाकर ले जाते हैं? दरअसल इन चैनलों का काम बाबा, सेक्स रैकेट, क्रिकेट और बॉलीवुड की खबरों में लोगों को उलझाकर अपने लिए धन उगाहना है। इससे रोज-ब-रोज के रोटी के मुद्दे हाशिये के हाशिये पर आप ही आप चले जाते हैं। साफ सी बात है कि बाबा जीवन-दर्शन और आधात्मय की गठरी खोलने के लिए बड़े भक्तों (अमीरजादों) से खूब सारा माल लेते हैं। साथ ही 'धन, धन को उत्पन्न करता है` के सिद्धान्त पर ये बाबा कई तरह के आयोजन और प्रयोजन करते हैं। अन्यथा क्या बात है कि स्वामी रामदेव के योग-शिविर में टिकट उन्हीं को मिलता है जो २५०-५००० रुपया खर्च करने की शक्ति रखते हैं? पूंजीवादी व्यवस्था माल बनाने की खूली छूट देती है। यह व्यवस्था इसके लिए वातावरण भी तैयार करती है। माल बनाने के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं। देह, गुर्दा, खून, धर्म, ईमान कुछ भी बेचकर आप मालदार हो सकते हैं। दीगर बात है कि पूंजीवादी व्यवस्था में माल बनाने के लिए आपको पूंजीवादी इल्म भी सीखना पड़ेगा। तात्पर्य यह है कि मोटा काटने के लिए आपको शोषण करना सीखना होगा। बाबाओं ने धर्म को बाजार में आसानी से बेचने की कला सीख ली है इसलिए वे मालामाल हो गये। जो पकड़े गये उन्होंने अपनी हुनरमंदी में शायद कुछ लूपहोल अवश्य छोड़ दिये होंगे।

( जून,2007 अंक में )

दिनकर कुमार

गुटीय संघर्ष और शांति वार्ता




ह संतोषजनक बात है कि नगालैंड में कई दशक पुरानी अलगाववाद की समस्या के समाधान की दिशा में गत २९ मार्च को नई दिल्ली में केन्द्र सरकार और नगा विद्रोही संगठन एन एस सी एन-सू-मुइपा गुट के बीच जो शांति वार्ता आयोजित हुई, उसमें दोनों पक्षों की तरफ से कई बिंदुओं पर सहमति हुई। नगा विद्रोही नेताओं ने भी वार्ता के इस चरण को काफी हद तक सफल बताया। मगर भविष्य में भी इसी तरह सकारात्मक माहौल में वार्ता होती रहे और दोनों पक्षों की तरफ से लचीले रूख का परिचय दिया जाए तो निश्चित रूप से द्विपक्षीय समझौते के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी पैदा होता है कि क्या इस तरह के समझौते से लंबे समय से चली आ रही नगा राजनीतिक समस्या का शांतिपूर्ण समाधान ढूंढ़ने का रास्ता निकल पाएगा? यह सवाल भी प्रमुख है कि क्या दूसरे नगा संगठन समझौते को स्वीकार कर पाएंगे या एनएससीएन-खापलोग गुट इस समझौते को मानने के लिए तैयार हो पाएगा, चूंकि वह सू-मुइपा गुट के साथ लगातार खूनी संघर्ष करता रहा है।

इन सवालों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है। नगालैंड में सोलह नगा जनजातियां हैं और प्रत्येक की अपनी-अपनी बोली और भिन्न पहचान है। नगालैंड की सरकारी भाषा अंग्रेजी है और संपर्क भाषा नागामिज हैं जिसे असमिया, पंजाबी एवं हिन्दी का मिश्रण कहा जा सकता है। प्रत्येक नगा जनजाति का भिन्न नाम है। प्रत्येक नगा जनजाति अपनी पहचान के प्रति सजग है। वे अपनी संस्कृति और परंपरा के आधार पर जीवन यापन करती हैं। ईसाई मिशनरियों ने इन जनजातियों को एक साझी नगा पहचान के प्रति आकर्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण अभियान चलाया और विभिन्न नगा जनजातियों को आपस में जोड़ने का काम किया। कई तरह के अन्तर्विरोधों से गुजरते हुए भूमिगत नगा विद्रोही नेताओं ने नगा जातीयता की भावना को लोगों में उभारने का प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और असम के नगा बहुल इलाकों को नगालैंड में मिलाने की मांग शुरू कर दी। इस तरह की राजनीति का सूत्रपात नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) के अध्यक्ष एवं तथाकथित नगालैंड की संघीय सरकार के संस्थापक ए जेड फिजो ने की थी जो लंदन में स्वनिर्वासित जीवन बिता रहे थे। फिजो ने नगालैंड की दूसरी जनजातियों पर लगातार अपना दबदबा बनाए रखा।
शायद यही वजह है कि वर्तमान समय में वृहत नगा समाज अलग-अलग जातीय पहचान की वजह से विभाजित होता नजर आ रहा है। एन एस सी एन-सू-मुइपा और एन एस सीएन-खापलांग के बीच राजनीतिक वर्चस्व के लिए टकराव होता ही रहता है। इसके साथ ही अलग-अलग जनजातीय भूमिगत संगठनों के बीच भी वर्चस्व के लिए खूनी जंग देखी जा सकती है। इससे साफ हो जाता है कि किस तरह विभिन्न नगा जनजातियों के बीच आपसी रंजिश बढ़ती ही जा रही है।

अंगामी जनजाति के होने के नाते फिजो ने कभी भी सेमा जनजाति के नेता होकिशो सेमा के वर्चस्व को स्वीकार नहीं किया था। फिजो ने जहां सेमा का खात्मा करने के लिए अभियन चलाया वहीं राज्य में अराजकता की स्थिति भी तैयार की। वर्ष १९६२ से १९७४ तक नगालैंड के राजनीतिक इतिहास के कालिमायुक्त कालखंड को नगालैंडवासी शायद ही भुला पाएंगे जब फिजो समर्थकों ने राज्य में आतंक का माहौल तैयार करने के साथ-साथ मुख्यमंत्री सेमा सहित सेमा जनजाति के कई नेताओं पर हमले किए।

२२ फरवरी १९६९ को नगालैंड में दूसरा आम चुनाव हुआ था। इस चुनाव में सेमा मुख्यमंत्री बने थे। ७८.७५ प्रतिशत मतदाताओं ने चुनाव में मताधिकार का प्रयोग किया था। तीन साल बाद ९ अगस्त १९७२ को सेमा डिमापुर से कोहिमा वापस लौट रहे थे। सेमा जीप में अपनी सोलह वर्षीय बेटी और अंगरक्षकों के साथ यात्रा कर रहे थे। सेमा की जीप के आगे सुरक्षाकर्मियों की जीप चल रही थी। फिजो के जन्म स्थान खोनोमा से महज ८ कि.मी की दूरी पर एक मोड़ के पास अचानक सड़क के दोनों तरफ से गोलीबारी शुरू हो गई। सेमा की पुत्री की जांघ में गोली लगी। अंगरक्षकों ने भी जवाब में गोलियां चलाई। एक अंगरक्षक, ड्राइवर और एक कांस्टेबल की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई। इसे चमत्कार ही समझा जाएगा कि हमले के दौरान होकिशे सेमा सुरक्षित बच निकले। इससे पहले भी सेमा पर छह बार जानलेवा हमले हो चुके थे। सेमा के पिता अपने समुदाय के मुखिया थे और शांतिपूर्ण नीतियों में विश्वास रखते थे। फिजो समर्थकों ने सेमा के पिता की हत्या कर दी थी।

सेमा पर हमले की घटना के बाद विद्रोहियों ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉन बास्को जोशोकी की उस समय हत्या कर दी थी जब वे अपनी पत्नी के साथ चर्च से वापस लौट रहे थे। इस घटना के बाद राज्य सरकार ने संघर्ष विराम की अवधि नहीं बढ़ाने की घोषणा की। नागालैंड के तत्कालीन राज्यपाल बी के नेहरू ने १ सितम्बर १९७२ को गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम, १९६७ के तहत नगा संघीय सरकार, नगा आर्मी और नगा नेशनल काउंसिल पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। इसके बावजूद स्थितियों में खास बदलाव नहीं आया। लंदन में मौजूद फिजो ने सरकारी प्रतिबंध की निंदा की। विद्रोहियों ने एक शांति समर्थक वृद्ध डाक्टर की हत्या कर दी, जो सेमा जनजाति से ताल्लुक रखते थे। इस घटना के बाद राज्य सरकार ने एस सी जमीर और उनके सहयोगियों की गिरफ्तार कर लिया। जमीर की गिरफ्तारी से क्रुद्ध होकर नगा विद्रोहियों ने सेमा सरकार को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। विद्रोहियों ने हिंसक गतिविधियां तेज कर दीं। इसी दौरान १६ अगस्त १९७२ को जुनहेबोटो में रिवोल्यूशनरी गवर्नमेंट आफ नगालैंड का नेतृत्व कर रहे स्फेटू सू और जनरल जुहेटू ने १५०० विद्रोहियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। ज्यादातर विद्रोहियों को सीमा सुरक्षा बल में नियुक्त कर दिया गया। जुहटू बटालियन कमांडर बनाए गए और स्केटू सू बाद में सांसद बने।

इसी बीच राज्य की सरकार भी बदली। तीसरे आम चुनाव में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में आई और बीजोल ने मुख्यमंत्री का पद संभाला। यह सरकार एक साल भी ठीक से नहीं चल पाई। इसके बाद जे बी जेसाफी मुख्यमंत्री बने, जिन्हें ग्यारह दिनों तक अपने पद पर रहने के बाद हटना पड़ा। हालत बिगड़ती गई और २२ मार्च १९७५ को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। राष्ट्रपति शासन की अवधि २४ नवंबर १९७७ तक बढ़ाई गई।
इस अवधि में तत्कालीन राज्यपाल एलपी सिंह ने फिजो के भाई केवियानी से बातचीत जारी रखी, जिसके परिणाम स्वरूप ११ नवंबर १९७५ को शिलांग समझौता हुआ। यह समझौता नगालैंड में अमन-चैन कायम करने में असफल रहा और फिजो के नेतृत्व वाले एनएनसी के कई विद्रोही नेताओं ने इस समझौते पर अपनी नाराजगी जाहिर की। इन नेताओं का कहना था कि समझौते पर एनएनसी के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर नहीं किया था और समझौता करने से पहले दूसरे विद्रोही नेताओं से विचार-विमर्श नहीं किया गया था। इसके अलावा जब समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे तब इसाक सू और मुइवा चीन की सद्भावना यात्रा पर गए हुए थे।

वर्ष १९७८ में एनएनसी की एक बैठक आयोजित हुई जिसमें फिजो के नेतृत्व और नीतियों को खारिज करने का फैसला किया गया। इसके बाद सू.मुइपा और खापलांग ने बगावत कर दी और एनएनसी से अलग होकर एनएससीएन की स्थापना की। २ फरवरी १९८० को 'पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ नगालैंड` का गठन किया गया। सू को इसका अध्यक्ष, खापलांग को उपाध्यक्ष और मुइवा को महासचिव चुना गया। कुछ समय के बाद ही इनके बीच कड़वाहट पैदा हो गई। इस तरह की अफवाह फैली कि सू और मुइपा मिलकर खापलांग का सफाया करना चाहते हैं। इसके बाद १४० मुरपा समर्थक विद्रोही खापलोग गुट और बर्मी सेना के हमले में मारे गए। मारे गए विद्रोही थांगकुल जनजाति के थे। मुइवा समर्थकों की हत्या के बाद एनएससीएन दो गुटों में विभाजित हो गया। एक गुट का नाम पड़ा एनएससीएन-सू-मुइपा और दूसरे गुट का नाम पड़ एनएससीएन-खापलांग। विभाजन के बाद दोनों गुटों के बची हिंसक झड़पों का सिलसिला जारी रहा।

इस पृष्ठभूमि पर गौर करने से स्पष्ट हो जाता है कि अगर केन्द्र सरकार और एनएससीएन-सू-मुइपा गुट के बीच कोई समझौता हो भी जाएगा तो वह तब तक कारगर साबित नहीं होगा जब तक खापलांग गुट भी उसे मानने के लिए तैयार नहीं हो जाता। इससे पहले भी शिलांग समझौते का यही हश्र हो चुका है। नगालैंड में स्थायी शांति की बहाली के लिए सभी विद्रोही गुटों की सहमति पर आधारित कोई समझौता ही कारगर साबित हो पाएगा।

दिनकर कुमार गुवाहाटी से प्रकाशित हिंदी दैनिक सेंटिनल के संपादक हैं।

( जून,2007 अंक में प्रकाशित )

सचिन कुमार जैन

पानी विश्‍वयुद्ध नहीं ग़हयुद्ध का कारण बनेगा



हीं और नहीं मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के पास ही एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है मण्डीदीप। उद्योगों से भरेपूरे इस क्षेत्र में पूंजीपतियों को पालने-पोसने में सरकार ने कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी। पर इन्हीं उद्योगों में काम करने वाले और मण्डीदीप के रहवासियों को पीने का पानी उपलब्ध कराने का मसला आया तो सरकार ने नजरें लगभग फेर लीं। जिस इलाके में १० दिन में एक बार पानी की आपूर्ति की जाती हो वहां लोगों का प्यास बुझाने के लिये भटकना स्वाभाविक है। यहां के १६ ट्यूबवेल में से चार में पानी का स्तर नीचे जा चुका है और बाकी बिजली की कमी से बेजार हैं। मण्डीदीप में ही एक और खतरनाक संकेत छिपा है। वह संकेत है पानी के सामुदायिक हक का। मण्डीदीप के पास से ही बेतवा बैराज से नगरपालिका ने पानी दिये जाने की मांग की थी किन्तु जल संसाधन विभाग ने यह स्प ट कर दिया कि बेतवा बैराज के पानी पर केवल औद्योगिक इकाइयों का हक है। बेतरतीब भूजल दोहन और खराब प्रबंधन के कारण इस इलाके का भूजल स्तर चार मीटर से नीचे जा चुका है पर सरकारी रिकार्ड में यह क्षेत्र जल सुरक्षित क्षेत्र माना जाता है क्योंकि यहंा पीने का पानी आम लोगों को भले ही न मिले पर इलाके में पानी का औसतन व्यय ४० लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन तो हो ही रहा है फिर भले ही उसमे से ३७ लीटर पानी उद्योग ही क्यों न ले रहे हों !


आश्चर्य की बात है कि गर्मी का मौसम शुरू होने से पहले मध्यप्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री ने रतलाम में २४ फरवरी २००७ को यह कहा था कि इस साल चूंकि बारिश अच्छी हुई है इसलिये राज्य में पानी का कोई संकट सामने नहीं आयेगा। इसका मतलब तो यही नजर आता है कि सरकार मानती है कि पानी के प्रबंधन की कोई जरूरत नहीं है, और पानी का संकट केवल बारिश की मात्रा से जुड़ा है। परन्तु यह सरकारी सोच समाज के लिये बहुत घातक है क्योंकि जिस तरह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया गया है और पृथ्वी के गर्म होने के प्रमाण हमारे सामने आये हैं, उसे अच्छे मानसून से भी सुधारा नहीं जा सकता है। जल संरक्षण के नाम पर राज्य में बेतहाशा स्टपडेम बनाये गये हैं और अभी भी बनाये जा रहे हैं किन्तु हरदा नगरपालिका के अध्यक्ष, पार्षदों और स्थानीय लोगों ने मिलकर ४ मई २००७ को अजनाल डेम नदी पर बने हुये बांध को तोड़ दिया क्योंकि इस नदी की झीलों के लगभग मृतप्राय स्थिति में पहुंच जाने के कारण बिरजाखेड़ी पंप हाउस के पास पानी कम हो गया जिससे पीने का पानी लोगों को मिलना बंद हो गया। जंगलों के विनाश, शहरीकरण और पानी के अनियोजन के कारण मध्यप्रदेश की नदियां भी अब सूखने लगी हैं। जिसके फलस्वरूप पानी के लिये भूजल उपयोग पर निर्भरता खूब बढ़ी है। सरकार भी विरोधाभासी स्थिति में काम कर रही है। एक ओर तो ११वीं पंचवयोजना में भूजल स्तर को बढ़ाने के लिए ९० करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है किन्तु भूजल के दोहन के लिये सरकार १८० करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने वाली है। वर्तमान आर्थिक और औद्योगिकीकरण की नीतियों के तहत उद्योगों को उनकी जरूरत के मुताबिक बिजली और पानी (वह भी रियायत के साथ) उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता सरकार ने प्रदर्शित की है। जहां तक आम आदमी के लिये पीने के पानी के अधिकार का सवाल है उन्हें तो टैंकरों से जलापूर्ति के भरोसे ही रहना होगा। इसी साल सरकार लगभग ९ करोड़ रुपये खर्च करने वाली है जिससे लगभग ३० हजार टैंकर पानी की आपूर्ति होगी परन्तु निजी स्तर पर समुदाय अपनी जरूरत पूरी करने के लिये मध्यप्रदेश में साढ़े तीन करोड़ रुपये खर्च कर चुका है। जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत है पानी, जिसके बिना अस्तित्व बनाये रखना संभव नहीं है। और जीवन की सबसे बड़ी जरूरत होने कारण ही पानी बाजार के लिये एक भारी फायदे की वस्तु बन चुका है। इतना ही नहीं पानी का फायदा उठाने के लिये सरकार ने भी बाजार को खुला छोड़ दिया है। एक ओर औद्योगिक इकाईयां बेतरतीब जलदोहन कर रही हैं वहीं दूसरी ओर बहुरा ट्रीय और अब तो रा ट्रीय कम्पनियां भी एक लीटर शीतल पेय बनाने के लिये ४१ लीटर पानी का उपयोग कर रही हैं। जलाभाव के कारण जिन परिस्थितियों का निर्माण राज्य में हो रहा है वह चिंता पैदा करने वाले है। यह तो कहा ही जा चुका है कि पानी अगले विश्वयुद्ध का कारण बनेगा; परन्तु अब इस वक्तव्य में बदलाव लाने की जरूरत है। पानी विश्वयुद्ध का नहीं बल्कि गृहयुद्ध का कारण बनेगा। वर्ष २००५ में मध्यप्रदेश में पानी के लिये होने वाले टकराव के २२७ मामले दर्ज हुए थे, २००६ के वर्ष में ऐसे ३०३ मामले हुये और व र्ा २००७ में अब तक ५८७ मामले दर्ज हो चुके हैं। इस साल तो शिवपुरी, हरदा और इन्दौर में स्थानीय शासन निकायों के जनप्रतिनिधि भी सरकार के विरोध में सड़कों पर उतर आये। केन्द्रीय भूजल बोर्ड (जल स्थिति का आकलन-विश्लेश्‍ण करने वाली सरकारी एजेंसी) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार राज्य के २२ जिलों में भूजल स्तर दो से चार मीटर तक गिर चुका है। जबकि १४ जिलों में यह गिरावट चार मीटर से ज्यादा दर्ज की गई है। भोपाल अब देश में सबसे ज्यादा गैस्ट्रोएन्टार्टिस से प्रभावित लोगों वाला शहर है। २२ जिलों में पानी में फ्लोरोसिस की मात्रा बढ़ी है। एक अध्ययन के मुताबिक सिवनी में १६ हजार बच्चे और गुना में १२० गांव फ्लोरोसिस की अधिकता से प्रभावित हैं। राज्य के ३०११८ स्कूलों में आज भी पीने का साफ पानी बच्चों को उपलब्ध नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा उपलब्ध कराये गये आंकड़ों के अनुसार प्रदेश की ८१९२ नल और सतही जल प्रदान करने वाली योजनाओं में से १५०७ योजनायें बंद हैं जबकि ९९८८ हैण्डपम्प जल स्तर कम होते जाने के कारण बंद हो चुके हैं। राज्य से अब और क्या अपेक्षायें की जा सकती हैं जबकि मध्यप्रदेश में २४५१७ बसाहटें ऐसी हैं जहंा सरकार पानी की न्यूनतम जरूरत को भी पूरा नहीं कर पाई है। इनमें से ज्यादातर बसाहटें जलस्रोतों से ३ से ५ किलोमीटर दूर हैं। वास्तव में आजीविका और रोजगार का संकट वैसे ही राज्य के तीन करोड़ लोगों को परेशान किये हुये है, अब तो पानी भी उन्हें नसीब नहीं हो रहा है। ऐसे में राज्य को यह जरूर याद करना होगा कि जीवन की बुनियादी जरूरत और बुनियादी अधिकार के दायरे इतने सीमित न होने दिये जायें कि आम आदमी का दम घुटने लगे। पानी की कमी ऐसी कमी नहीं है जिसे लोग नियति मान कर स्वीकार कर लेंगे। इस पर प्रतिक्रिया होगी। आज टुकड़ों-टुकड़ों में संघर्ष हो रहा है, कल निश्चित रूप से संगठित संघर्ष होगा।

सचिन कुमार जैन मीडिया अध्येता हैं।

( जून,2007 में प्रकाशित )

जसपाल सिंह सिद्धु

राजनीति का मोहरा बना धर्म





वास्‍तव में पजाब के भटिंडा जिले के सलबतपुरा गांव में १३ मई, २००७ को डेरा सच्चा सौदा प्रमुख के पास जुटी सभा में सिखों को उकसाने वाला कुछ भी नया नहीं हुआ थायह मीठे पकवान बांटने की गुरु गुरमीत सिंह की एक पुरानी दिनचर्या थी, और इस पाहुल बांटने के साथ ही डेरा प्रमुख ने प्रभु की प्रार्थना में उन्हें कुछ शब्द-नाम भी बांटेहां, उस दिन पहले की दिनचर्या से थोड़ा अंतर थाडेरा आयोजकों ने एक लोकप्रिय पंजाबी दैनिक अजीत में एक विज्ञापन दिया था, जिसमें डेरा प्रमुख को एक विशेष पहनावे में समारोह करते हुए दिखाया गया था और कहा जा रहा है कि डेरा प्रमुख दसवें सिख गुरु गोविंद सिंह की तरह बैठ गये और १६९९ में बैसाखी के दिल खालसापंथ का सृजन करते वक्त सिखों को दीक्षित करने की गुरु की शैली की नकल करने लगेयह भी कहा गया कि सिख गुरु की ही नकल करते हुए डेरा प्रमुख ने गुरु के पंज प्यारों की जगह अपने सात शिष्यों को सात प्यारों के रूप में चुनाअगले दिन, १४ मई, २००७ को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीस), अमृतसर, जो कि एक शीर्ष गुरुद्वारा प्रबंधन संस्था है और जो अभी सत्ताधारी अकाली दल बादल द्वारा नियंत्रित है, के कर्मचारियों को एसजीपीसी के भटिंडा स्थित हाजी रतन गुरुद्वारा में इकट्ठा होने को कहा गयाउनकी इस घोषणा के बाद कि दीक्षा देने के सिख तरीके का उपहास उड़ाने के धर्मविरोधी कार्य लिए वे डेरा प्रमुख का पुतला जलायेंगे, कुछ अन्य अकाली कार्यकर्ता भी उनसे जुड़ गयेकिरपान और दूसरे पारंपरिक हथियारों से लैस सिख युवकों और एसजीपीसी कर्मियों का एक अपेक्षाकृत छोटा-सा समूह भटिंडा जिला न्यायलय की ओर चला जहां डेरा के अनुयायी लाठी और लोहे के सरिये लिये हुए बड़ी संख्या में जमा थेविरोधियों द्वारा डेरा प्रमुख का पुतला जलाये जाने को लेकर डेरा अनुयायी भी उत्तेजित थे, जिन्हें उनमें से कई ईश्वर का अवतार मानते थेपूर्व सूचनाओं के बावजूद जिला प्रशासन ने दोनों समूहों की झड़प को नहीं रोकायह उन्माद की शुरुआत थीलगभग सांप्रदायिक दंगों के तर्ज पर, जिसने पंजाब को निगल लिया और जम्मू कश्मीर, हरियाणा, दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में दंगाई प्रतिक्रिया भड़का दी

ऐसा लगा कि शायद भटिंडा जिला प्रशसान सत्ताधारी अकाली नेताओं द्वारा निर्देशित था कि वह धीरे काम करे और झड़पों को होने दे। क्योंकि बिना अकालियों की सहमति से ऐसा कोई भी जमावड़ा न तो उनके द्वारा नियंत्रित गुरुद्वारा में हो सकता था और न एसजीपीसी कर्मी इन झड़पों में नेतृत्वकारी भूमिका में रहते।

समस्या की असली वजह विशुद्ध रूप से राजनीतिक है। अकालियों के पास डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ तीखी शिकायतें हैं और दरअसल वे डेरा प्रमुख के साथ निपटने की ताक में थे और सलबतपुरा गांव की घटना ने उनके लिए राह आसान कर दी। केवल दो माह पूर्व हालिया पंजाब विस चुनाव में डेरा सच्चा सौदा खुलेआम अकालियों की पुरानी दुश्मन कांग्रेस के पक्ष में रहा जो उन्हें (अकालियों के लिए) महंगा पड़ा। अकालियों के लिए जाने जानेवाले पंजाब के मालवा प्रदेश में कांग्रेस ने ६५ में से ३७ सीटें जीतीं। क्षेत्र के अनेक अकाली दिग्गजों को चुनाव में धूल चाटनी पड़ी। कांग्रेस मालवा बेल्ट में मुख्यमंत्राी प्रकाश सिंह बादल के अकाली दल की लगभग बराबर पर रही। और बादल केवल सहयोगी भाजपा की मदद से ही सरकार बना सकते थे, जिसने विधानसभा की ११७ में से १९ सीटें जीती थी।

हालांकि सिख धार्मिक प्रबंधकों और डेरा अनुयायियों, जो प्रेमी नाम से जाने जाते हैं के बीच अंदर ही अंदर नफरत व अविश्वास की भावना का लंबा इतिहास है। डेरा, जिसका मुख्यालय हरियाणा के सिरसा में है, कहा जाता है कि लगातार सिख सिद्धांतों और व्यवहारों की नकल करता आ रहा है। इसके अनुयायी गांवों से भी आते हैं जिनमें दलित, सिखों की निचली जातियां, छोटे सिख, किसान शामिल है जो पंजाब, हरियाणा और सटे राजस्थान के जिलों में अकालियों का पारंपरिक गढ़ रहे हैं। दरअसल डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के गुरुसर मोदिया गांव में एक सिख किसान परिवार में जन्मे थे। वे डेरा सच्चा सौदा के तीसरे प्रमुख हैं तथा खुद को सभी प्रमुख धर्मों के प्रति आस्थावान बताते हैं। उन्होंने बाद में १९९० में डेरा प्रमुख बनने के बाद अपने नाम में 'राम रहीम` जोड़ लिया क्योंकि उनके आधे अनुयायी हिंदू (मुख्यत: निचली जातियां) हैं। २.५ करोड़ डेरा अनुयायियों में ७-८ प्रतिशत मुस्लिम और ४० प्रतिशत सिख अधिकतर महजबी सिख कहे जाने वाले खेतिहर मजदूर बताये जाते हैं। वर्तमान डेरा प्रमुख ने अनुयायियों की संख्या कैसे बढ़ायी? वे भक्तगणों को रोज प्रवचन देते हैं जिन की संख्या अब किसी विशेष मौके पर कई लाख हो जाती हैं। डेरा प्रमुख सिख, हिंदू मिथकों, ईसाईयत और इसलाम के आसानी से समझ में आनेवाले धार्मिक सिद्धांतों को उदारता से उधार लेते हैं और तब वे एक धार्मिक कॉकटेल तैयार करते हैं-जिसे वे बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह के नाम से आम आदमी की भाषा में एक ऊंचे, सुसज्जित मंच से पेश करते हैं।

एक भव्य दृश्य, जो वहां जमा भक्तजनों को विस्मय, भव्यता और भक्तिभाव से भर देता है, जो वहां अपने मानसिक त्रास और सामाजिक विसंगतियों, जिन्हें वे प्राय: झेल रहे होते हैं, से राहत पाने के लिए जमा होते हैं।
डेरा प्रमुख ईमानदारीपूर्वक धर्मपरिवर्तन के जटिल मुद्दे से बचते रहे हैं। उनके अनुयायियों को अपना धार्मिक आचरण बनाये रखने की छूट होती है। डेरा आयोजकों का दावा है कि डेरा प्रमुख ने एक समाज सुधार आंदोलन शुरु किया है जिसमें वे लोगों को सामाजिक बुराईयों से बचाते हैं-जैसे उन्हें अनेक प्रकार के नशे से छुटकारा दिलाया जाता है। डेरा का १६ राज्यों में ४५ शाखाओं के साथ ४५० छोटी शाखाओं का एक व्यापक सांगठनिक नेटवर्क है। बड़े पैमाने पर शराब मुक्ति को एक तरफ रख भी दें तो डेरा नाममात्र की लागत पर सामूहिक विवाहों का आयोजन भी करता है और अपने अनुयायियों के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ावा देता है, जो एक दूसरे को संकट में मदद करते हैं और डेरा प्रबंधक की अनेग औद्योगिक परियोजनाओं व अनेक अन्य कार्यों में मुफ्त सेवाएं प्रदान करते हैं।
अकाली भी डेरा के कारण अपना आधार खो रहे हैं यों कि गुरुद्वारा राजनीतिक भूमिपतियों द्वारा नियंत्रित हो रहे हैं और धनी लोग गरीब लोगों को वहां आत्मिक शांति और आराम के लिए आने से रोकते हैं। दूसरी तरफ डेरा प्रमुख अपने अनुयायियों को इस बात तक ले लिए भी निर्देश देते हैं कि चुनाव में किस प्रत्याशी को वोट दें।
डेरा प्रमुख के बढ़ते प्रभाव को कम करने के क्रम में प्रकाश सिंह बादल ने कहा कि डेरा की ओर से माफी से कम कुछ भी पंजाब में शांति नहीं ला सकता।

और शायद पहली बार बादल नियंत्रित सिख धार्मिक नेता, अकाल तख्त ने २२ मई को पंजाब बंद का आह्उाान किया और राज्य के उप-डेरों को बंद करने का अल्टीमेटम दिया।

जबकि, प्रतिक्रिया में सिख उग्रवाद, जो १९७० के सिख-निरंकारी दुश्मनी की तरह उभर रहा है, सिख धार्मिक नेताओं पर दबाव डाल रहा है कि वे डेरों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाएं। दूसरी तरफ डेरा ने दवाब में आकर खेद जताने के बावजूद कड़ा रवैया अपनाया है और उसने डेरों को बंद करने की मांग ठुकरा दी है। पंजाब में इस तरह की उत्तेजना का बढ़ना राज्य सरकार में अकालियों की सहयोगी भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। और भाजपा ने खुद को अकालियों की डेरा सच्चा सौदा को सबक सिखाने के फैसले से अलग कर लिया है।

भाजपा और अकालियों की अपनी राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से हालत काबू में आ सकते हैं, लेकिन पंजाब इसी तरह उबलता रह सकता है क्योंकि अतिवादी सिख अकाली दल बादल से अपने झगड़े सलटाने के लिए निकल आये हैं, जिन पर (अकालियों पर) भाजपा से गंठबंधन बना कर सिखों की अलग पहचान को मिटाने का आरोप है।

पंजाबी कथाकार जसपाल सिंह सिद्धू समाचार ऐजेंसी यूएनआई के वरिष्ठ संवाददाता हैं।

कंवल भारती

ब्राह्मण -जाल में माया

निस्‍संदेह , उत्तर प्रदेश में मायावती की जीत ने राजनीति के विश्लेषकों को आश्चर्य में डाल दिया है। उत्तर प्रदेश में सोलह साल बाद किसी पार्टी का बहुमत में आना, और वह भी एक दलित नेतृत्व की पार्टी का, सचमुच एक महत्वपूर्ण घटना है। इससे हम समझ सकते हैं कि लोकतंत्र में चीजें बदलती हैं और वर्चस्ववाद अन्तत: टूटता ही है। दलित कवि मलखान सिंह के शब्दों को उधार लेकर कहूं तो अन्धड़ भरे दिनों से जूझते हुए मौसम को जूता दिखा लोगों ने चीख कर कहा था कि धरती बदलती है, बदलते हैं आकाश, हवाओं के रूख, चिड़ियों के पंख। मायावती को गांव की कीच भरी गलियों में मौसम के खिलाफ उठती हुई आवाजें साफ सुनायी दे रही थीं। पर, ये आवाजें बदलाव की थीं-व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन की। इन आवाजों ने मायावती को सत्ता तो सौंप दी-एक इतिहास रच दिया। पर, सवाल यह है कि क्या यह सत्ता मौसम को भी बदलेगी या मौसम के साथ चलेगी?
यही वह मुख्य प्रश्न और प्रस्थान बिन्दु है, जहां से मायावती की राजनीति (दलित राजनीति नहीं) पर विचार किये जाने की जरूरत है। लेकिन, पहले हम यह देख लें कि राजनैतिक, विश्लेषकों ने इस घटना पर क्या टिप्पणी की है? टिप्पणियां बहुत सी हैं और आपस में भिन्नता लिये हुए हैं। किसी ने इसे राजनैतिक क्रांति का नाम दिया है और किसी का मत है कि उत्तर प्रदेश का तमिलनाडूकरण हो गया है। ऐसे चिन्तक भी हैं , जो इस घटना को दलित राजनीति के ब्राह्मणीकरण की दृष्टि से देख रहे हैं और कुछ इस विचार के हैं कि यह सत्ता के लिए गठजोड़ है और यह कोई क्रांति-व्रांति नहीं है।


इन टिप्पणियों में एक बात समान रूप से कही जा रही है कि इस जीत का कारण ब्राह्मणों के वोट हैं, जो इस बार मायावती की पार्टी को मिले हैं। स्वयं मायावती भी इसका श्रेय ब्राह्मणों को ही दे रही हैं। वे पिछले तीन साल से दलित-ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलन आयोजित कर रही थीं और ब्राह्मणों के भगवान परशुराम के आगे नतमस्तक हो रही थीं। 'जय भीम` के साथ 'जय परशुराम` भी उनके अभिवादन में शामिल हो गया था और यह नारा आम हो गया था कि 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है।` कहा जा रहा है कि यह भाईचारा कामयाब हुआ और बसपा की जीत ब्राह्मण मतदाताओं के कारण हुई? इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता और जो ऐसा सोच रहा है, वह बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकर है। यदि जातिवाद वोटों की बात करें, तो इस चुनाव में बसपा को ब्राह्मण वोट सिर्फ १० प्रतिशत मिले हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी को ४८ प्रतिशत ब्राह्मण वोट प्राप्त हुए हैं। इस दृष्टि से उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण आज भी भाजपा के साथ हैं। सिर्फ १० प्रतिशत वोटों के आधार पर यह कैसे माना जा सकता है कि बसपा को ब्राह्मण वोटों ने बहुमत दिलाया है? यह १० प्रतिशत ब्राह्मण वोट भी बसपा को इसलिये मिला, क्योंकि वह ब्राह्मण-प्रत्याशियों का अपना खुद का समर्थक वोट था। दरअसल, ब्राह्मण प्रत्याशियों की जीत दलित वोटों के बल पर हुई है, जो मायावती के नाम पर अखण्ड रूप में पड़ता है, भले ही प्रत्याशी कोई भी हो। मायावती भली भांति जानती हैं कि उत्तर प्रदेश में दलित उनके साथ समर्पित भाव से जुड़ा है, उनमें अंधी श्रद्धा रखता है और किसी भी स्थिति में उनके खिलाफ नहीं जाता है। यही दलित जन मायावती की सबसे बड़ी राजनैतिक शक्ति हैं और इसी शक्ति के बल पर वे ब्राह्मणों और अन्य वर्गों के साथ सौदेबाजी करती हैं । अर्थात् वे अपनी दलित शक्ति की पूरी कीमत वसूलती हैं।


लेकिन चुनाव-परिणामों के बाद मायावती ने अपनी इसी दलित शक्ति का यह कह कर अपमान किया है कि उन्हें ब्राह्मणों ने बहुमत दिलाया है और अब वे 'बहुजन` की नहीं, 'सर्वजन` की बात करेंगी। इस के बाद दलित उनके एजेण्डे से रातों-रात गायब हो गया। एक अंग्रजी पत्रिका (फ्रन्टलाईन १ जून, २००७) में उनका साक्षात्कार छपा है। प्रश्नकर्त्ता पत्रकार वेंकटेश रामाकृष्णन के यह पूछने पर कि कांशीराम अपने समय में कृषि, व्यापार और उद्योग, राजनीति और सरकार-इन चार क्षेत्रों में दलित समाज या बहुजन समाज के विकास की बात करते थे, तो प्रश्न पूरा हुए बिना ही मायावती ने यह जवाब दिया- 'अब हम बहुजन समज का एजेन्डा लागू नहीं कर रहे हैं। अब हमारा मुख्य ध्यान सर्वसमाज के कल्याण पर होगा।` इससे सहज ही समझा जा सकता है कि दलित समाज को मायावती कोई श्रेय देना नहीं चाहती हैं। मायावती ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद ही सर्वजन के अपने एजेन्डे को लागू भी कर दिया। उन्होंने लखनऊ में जनपदों के आला अफसरों की बैठक में साफ-साफ दो बातें कहीं। एक यह कि दलित एक्ट का दुरूपयोग न किया जाय, और दूसरी यह कि थानों में ७० प्रतिशत थानेदार सवर्ण और ३० प्रतिशत अवर्ण हों। ये दोनों निर्देश सर्वजन, खास तौर से ब्राह्मणों को ही ध्यान में रखकर दिये गये थे। 'दलित एक्ट का कड़ाई से पालन किया जाय`, यह कहने के बजाय उन्होंने आला अफसरों को यह संकेत दिया कि उसका पालन न किया जाय। इसी तरह पुलिस थानों में भी दलितों की भागीदारी कम कर दी गयी। यानी, यदि किसी थाने में १० थानेदारों का स्टाफ स्वीकृत है, तो वहां दलित थानेदार ३ और सवर्ण ७ रखने के आदेश दिये गये हैं। यह परिवर्तन नहीं है, बल्कि यथास्थिति बनाये रखने की नीति है, जो हमेशा दलित के विरूद्ध और सवर्ण के हित में होती है। दूसरे शब्दों में, मायावती का एजेन्डा अब मौसम के साथ चलने का है, मौसम बदलने का नहीं है।
जो चिन्तक बसपा के उभार को राजनैतिक क्रांति कह रहे हैं, उनका विश्लेषण सिर्फ यहीं तक सीमित है कि भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों को पछाड़ कर बसपा को पूर्ण बहुमत मिलना एक क्रांतिकारी घटना है। उनका यहां तक मानना है कि प्रदेश की जनता ने भाजपा के हिन्दुत्व और कांग्रेस के धर्मनिरपेक्षतावाद को नकार दिया है। इसमें कुछ चिन्तक यह भी जोड़ रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की जनता धर्म और जाति से ऊपर उठ गयी है, जिसने दलित नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है।


यदि क्रांति का अर्थ, व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन है, तो यह क्रांति नहीं है। क्योंकि, इससे कोई व्यवस्था बदलने नहीं जा रही है-न जाति प्रथा, न पूंजीवाद और न शोषण पर आधारित आर्थिक उदारवाद; कुछ भी बदलने नहीं जा रहा है। यह सोच भी गलत है कि उत्तर प्रदेश की जनता ने धर्म और जाति से ऊपर उठकर दलित नेतृत्व को स्वीकार किया है। वस्तुस्थिति यह है कि धर्म और जाति के हित में ही प्रदेश की जनता ने मायावती को समर्थन दिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती और उनके ब्राह्मण महासचिव सतीशचन्द्र मिश्रा पिछले तीन वर्षों से ब्राह्मण सम्मेलनों में ब्राह्मणों को यही पाठ पढ़ा रहे थे कि ब्राह्मणों का हित बसपा में ही सुरक्षित है, भाजपा में नहीं, जिसके नेताओं के मुलायम सिंह यादव से अन्दर खाने सम्बन्ध हंै। अन्य पिछड़ी जातियों के लोग भी अपने जातीय विकास का उद्देश्य लेकर ही बसपा से जुड़े हैं और दलित मायावती में अपना जातीय स्वाभिमान देखते ही हैं। यदि धर्म और जाति के मोह नहीं होते, तो कोई बताये कि बसपा ने अलग-अलग जातियों के सम्मेलन क्यों आयोजित किये थे? दरअसल, ब्राह्मणों ने दलित-नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया, बल्कि ब्राह्मण नेताओं ने, बसपा में शामिल होकर सत्ता की मलाई खाने का जुगाड़ किया है। वे जानते थे कि समाजवादी पार्टी का राज आने वाला नहीं है और भाजपा सत्ता में आ नहीं सकती- कांग्रेस का तो सवाल ही नहीं, क्योंकि वह सत्ता की दौड़ में ही नहीं थी। ऐसे में, एक बसपा ही थी, जो ब्राह्मण शासक वर्ग को सत्ता में ला सकती थी, क्योंकि उसके साथ दलितों का ठोस वोट जुड़ा था, जो उसे बसपा में जाने पर आसानी से मिल सकता था। इसलिये यह पूर्ण स्वार्थ का मामला है- न ब्राह्मणों को बसपा की जरूरत थी और बसपा को ब्राह्मणों की जरूरत थी।


कुछ विचारकों ने मत व्यक्त किया है कि उत्तर प्रदेश का तमिलनाडूकरण हो गया है। अर्थात्, जिस तरह, तमिलनाडू में दलित-पिछड़ी जातियां एक बड़ी राजनैतिक शक्ति हैं, उसी प्रकार उत्तर प्रदेश में भी दलित-पिछड़ों का उभार एक बड़ी शक्ति बन गया है। इस मत में सच्चाई है। उत्तर प्रदेश में अब ब्राह्मण नेतृत्व के दिन समाप्त हो गये हैं और शायद ही लौट कर आयें। कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, राजद, आदि किसी भी पार्टी में अब ब्राह्मण नेतृत्व प्रभावी नहीं है। भाजपा ने पिछड़ी जाति के कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा के तहत चुनाव लड़ा था। सपा यादव आधारित पार्टी मानी ही जाती है। यहां यह आकलन करना गलत होगा कि यह दलित-पिछड़ा या गैर ब्राह्मणवाद का उभार इसी एक-दो वर्ष की घटना है। इसका उभार अस्सी के दशक में ही शुरू हो गया था, जब कांशीराम ने बामसेफ (दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों का संघ) और डी.एस.फोर (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) बनाकर दलित-पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यक समुदाय के दलितों में सामाजिक चेतना पैदा करने का काम किया था। पिछड़ी जातियों के लिये मण्डल आयोग की सिफारिशों के आधार पर २७ प्रतिशत आरक्षण की लड़ाई भी कांशीराम ने लड़ी थी। इसके लिये उन्होंने व्यापक आन्दोलन चलाया था। इसी राजनैतिक दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने (१९९०) मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं। ठीक इसी समय भाजपा और हिन्दू संगठनों ने मन्दिर आन्दोलन खड़ा कर दिया और हिन्दुत्व का उन्माद भड़का कर पिछड़ी जातियों के आरक्षण के खिलाफ छात्रों को उत्तेजित कर दिया। परिणामत: पूरे देश में दलित-सवर्ण-संघर्ष शुरू हो गया। तोड़फोड़ और आगजनी के साथ-साथ अनेक छात्र-छात्राओं ने आरक्षण के विरोध में आत्मदाह के प्रयास किये। उत्तर प्रदेश में दलित-पिछड़ी जातियों के लोग मण्डल के पक्ष में लामबन्द हो गये थे-और इसी के गर्भ से पिछड़ी जातियों की राजनैतिक शक्ति पैदा हुई।


इस राजनैतिक शक्ति को सत्ता का माध्यम बनाने के लिये कांशीराम और मुलायम सिंह यादव एक मंच पर आ गये और दोनों ने मिल कर १९९३ के विधान सभायी चुनावों में पूर्ण बहुमत से शानदार जीत हासिल की। दुर्भाग्य से यह गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चला। दोनों शीघ्र ही अलग-अलग हो गये और अनेक प्रमुख पिछड़ी जातियां भले ही अलग हो गयीं, पर उनकी राजनैतिक शक्ति बनी रही और उत्तर प्रदेश के सपा और बसपा की दो ध्रुवीय राजनीति का आधार भी यही शक्ति बन गयी। इसलिये, उत्तर प्रदेश अस्सी के दशक से ही तमिलनाडू के रास्ते पर चल पड़ा था और जो सफलता मायावती को वर्ष २००७ में प्राप्त हुई है, वह १९९३ में ही सपा-बसपा गठबन्धन को प्राप्त हो चुकी थी। ब्राह्मणवाद की प्रतिक्रांति उसके वर्चस्ववाद को भी खत्म कर रही थी। अब उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को दलित-पिछड़े-नेतृत्व को ही स्वीकार करने के लिये विवश होना पड़ेगा, क्योंकि अब शायद ही उनका राजनैतिक वर्चस्ववाद पुनर्जीवित हो। लेकिन, इसमें संदेह नहीं कि समाजवादी दृष्टिकोण से उत्तर प्रदेश की राजनीति जातिवादी होने के कारण चिन्ताजनक है। पर, इस बिन्दु पर वाम शक्तियों का कार्य भी प्रदेश में घोर निराशा पैदा करता है।


अब कुछ चर्चा मायावती के सर्वजन एजेन्डे पर जिसे उन्होंने प्राथमिकता से लागू करने की घोषणा की है। यहां यह उल्लेखनीय है कि जिस सर्वजन के कल्याण की मायावती बात कर रही है, उनका सिर्फ १० प्रतिशत वोट उनकी पार्टी को मिला है, दलित का २३ प्रतिशत, पिछड़ी जातियों का ५० प्रतिशत और मुस्लिम (दलित मुस्लिम) का १७ प्रतिशत वोट मायावती की पार्टी को मिला है, यह सब मिला कर ९० प्रतिशत होता है ऐसी स्थिति में ९० प्रतिशत जनता को छोड़ कर १० प्रतिशत सवर्णों के कल्याण में ही यदि मायावती को रूचि रहेगी, तो उनके लिये उस समय बहुत ही कठिन स्थिति पैदा हो जायगी, जब दलित वर्गों का पिछड़ापन सवर्णों के आर्थिक आधार से टकरायेगा। दलित वर्गों और सवर्ण जातियों की सामाजिक और आर्थिक स्थितियों में भारी अन्तर है-दोनों के बीच गहरी खाईयां हैं। आंकड़े बताते हैं कि सवर्णों में ६५ प्रतिशत भू-स्वामी हैं, जबकि दलितों में ८ प्रतिशत के पास ही जमीन है। दलित वर्ग में ५५ प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्रों में मजदूर है, ३२ प्रतिशत कृषि मजदूर हैं ३३ प्रतिशत अशिक्षित हैं और १२ प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जिन्होंने दसवीं तक ही शिक्षा हासिल की है। इसके विपरीत, सवर्णों में सिर्फ १० प्रतिशत अशिक्षित हैं और दसवीं तक शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग ५० प्रतिशत हैं । स्पष्ट है कि असमानता की यह स्थिति बेहद गंभीर है और इसे सर्वजन के एजेन्डे से दूर नहीं किया जा सकता। यदि इस ऐजेन्डे में सवर्ण प्राथमिकता में रहेंगे, तो यह खाई और बढ़ सकती है।


एक पत्रिका ने लिखा है कि 'ब्राह्मणों ने विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि के योग्य नहीं समझा और शिवाजी का राजतिलक नहीं होने दिया था। पर, आज हमने देखा कि हजारों ब्राह्मणों की मौजूदगी में एक दलित, और वह भी एक का राजतिलक किया गया।` लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्राह्मणों ने अपनी धर्म-व्यवस्था से विद्रोह कर दिया है। दरअसल, यह भारत के लोकतंत्र की देन है कि राजा-महाराजा खत्म हो गये और जनता अपनी सरकार स्वयं बनाती है। यह लोकतंत्र की व्यवस्था है कि एक दलित का राजतिलक हुआ, पर धर्म की व्यवस्था में अभी भी निर्णय ब्राह्मणों का चलता है-वरना क्या गुरू वायूर के श्रीकृष्ण मन्दिर में प्रसिद्ध गायक यसुदास के प्रवेश पर रोक लगती?



( जून,2007 अंक में )

रवीन्‍द्र स्‍वप्‍निल प्रजापति






जनता में बदलता देश




मेरा देश ४७ में जनता की तरह पैदा हुआ था
जिसे मैं प्यार नहीं करता था
दया दिखाता था या फिर गोली मार देता था
मैं इतना गतिशील था उस समय
कि हर चेहरा मेरा ही चेहरा हो जाता था


जब भी कुछ बदलने की कोशिश करता-तब
मैं गांधी हो जाता और देश हरिजन
मैं नेहरु हो जाता और देश जनता
पिछले पचास साल से मैं राजनीति होता रहा
और देश पब्लिक
समाज सेवक होता तो देश एनजीओ
लेखक बना तो देश प्रेमचन्द का होरी और गोबर
मेरे कवि के लिए देश-विमर्श और सरोकार बनता रहा


पिछले पचास सालों से सब मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हैं
वे नारे लगाते हुए मेरे पास से निकल जाते हैं
ठीक मेरी बालकनी के नीचे से
या कभी-कभी पांच फुट चौड़ी गली में
एक सिपाही को खड़ा करके निकल जाते हैं


उनके दूर निकल जाने के बाद
जब सायरनों की आवाजें गुम हो जाती हैं
मैं देखता हूं सन्नाटे को चीरता हुआ
कहीं यह मैं ही तो नहीं था-अन्दर महीन तार सा कांपता है
मेरा ही कोई रूप भगम-भाग में छिटका हुआ


मैं एक नागरिक की हैसियत से भी नहीं कहता
मुझे अपने देश से प्यार है
और मैं नहीं कहता पूंजीपतियों को गोली मार दूंगा
मैं नहीं कहता कि वामपंथियों की दलाली
और दोहरी मानसिकता का भंडाफोड़ कर दूंगा
आज मेरे दावे ओजोन में छेदों की तरह खतरनाक हो गए हैं
आने वाले समय में मेरे लिये देश भक्त होना
दकियानूस होने का दूसरा नाम भी हो सकता है
क्योंकि मैंने आधी सदी अपने गांव की सड़कों के गड्डे
ठीक करने में निकाल दी
और इस दौरान देश
दुनिया के लिए बाजार में बदल गया
जहां मैं अपनी ही चीजों को देश की जगह मार्केट का हिस्सा समझने लगा


मुझे नहीं मालूम था कि ऐसी कल्पना करनी होगी
कि देश से साबुन की तरह
एक ही रेस्टहाउस में
समाजवादी भी नहायेगा और पूंजीवादी भी


मैं कहना चाहता हूं देश का कुछ भी बेचो
खरीदो और किसी से भी व्यापार करो
जब पेड़ पौधों जंगलों पर्वतों में संपदा को अनुमान की आंखों में भरो
तब जंगल के पास और पहाड़ की तलहटी में जो छोटा शहर है
उसे सिर्फ जनता मत समझना
वहां देश के लोग रहते हैं
मेरे देश के लोग जिसे मैं प्यार नहीं करता।

नागार्जुन

इस महीने (ज्येष्ठ पूर्णिमा) बाबा नागार्जुन का जन्म दिन है।
''...वह १० जुलाई, १९९७ की शाम थी। शहर दरभंगा। खाजासराय वाले मकान (पंडासराय और रायसाहब पोखर के बाद इसी मोहल्ले में बाबा के बड़े बेटे शोभाकांत जी ने किराये पर घर लिया था) में बाबा बरामदे में बैठे थे। गया, तो दो-चार बातें हुइंर्। रुक-रुक कर बात करते थे उन दिनों बातों का सिरा भी बीच-बीच से गायब हो जाता था। लेकिन दिमाग की बेचैनी इन टूटे हुए सिरों से भी अर्थपूर्ण ढंग से निकलती थी। आखिरी दिनों में शायद ज्यादा आत्मविश्वास आ जाता है। उस दिन उन्होंने कहा कि एक कविता आयी है, लिखो। कागज़ और कलम सामने ही था। जिस लय में बाबा ने इसे लिखवाया, वह लय मैं अपनी जिंदगी में अब भी ढूंढ़ता हूं। बाबा की इस कविता में (मुझे लगता है) दृश्य जैसे उनके मन में आये होंगे, उन्होंने वैसे ही उसे कागज पर उतारने का मन बनाया होगा। बीमारी और जिन्दगी के वे आखिरी दिन बाबा के ...और उन आखिरी दिनों में मन में आने वाले चित्रों-छायाओं को शब्द देने के उनके उल्लास का मैं चश्मदीद ..एतद् द्वारा ऐलान करता हूं कि यह कविता हिंदी के जन कवि नागार्जुन की आखिरी कविता है।``
-अविनाश, (बाबा नागार्जुन के स्नेहपात्र रहे कवि अविनाश इन दिनों एनडीटीवी इंडिया में कार्यरत हैं


मायावती मायावती गुरु गुन मायावती

मायावती-मायावती
दलितेंद्र की छायावती
मायावती-मायावती
जय-जय हे दलितेंद्र
प्रभु, आपकी चाल-ढाल से
दहशत में हैं केंद्र
जय-जय हे दलितेंद्र

जय-जय हे दलितेंद्र
आपसे दहशत खाये केंद्र
अगल-बगल हैं पंडित सुखराम
जिनक मुख में राम
सोने की इंर्टों पर बैठे हैं नरसिंह राव
राजा होंगे आगे चल कर
उनके पुत्र प्रभाकर राव

मायावती-मायावती
दलितेंद्र की शिष्या
छायावती-छायावती

दलितेंद्र कांशीराम
भाषण देते धुरझार
सब रहते हैं दंग
बज रहे दलितों के मृदंग
जय-जय हे दलितेंद्र
आपसे दहशत खाता केंद्र
मायावती/आपकी शिष्या
करे चढ़ाई
बाबा विश्वनाथ पर
प्रभो, आपसे शंकित है केंद्र
जय जय हे दलितेंद्र

मायावती-मायावती
गुरु गुन मायावती
मायावती-मायावती
गुरु गुन मायावती
मायावती-मायावती ॥



( जून,2007 अंक में प्रकाशित )

रेयाज-उल-हक


प्रवास और अर्थव्यवस्था का संकट




सा
की शुरुआत बिहारियों पर हमलों से हुई, जब असम में ४९ बिहारी मजदूर और छोटे व्यवसायी मार दिये गये। मगर सिर्फ असम में ही नहीं, दूसरे राज्यों में भी बिहारियों पर हमले होते रहे हैं। बहुत दिन नहीं हुए जब राज ठाकरे के समर्थकों ने महाराष्ट्र में बिहारी दुकानदारों पर हमले किये। इसके अलावा कई अन्य राज्यों में बिहार से गये मजदूरों, परीक्षार्थियों पर लगातार हमले हो रहे हैं या उन्हें धमकियां मिल रही हैं।

बिहारियों पर हमले का मामला प्रवासी मजदूरों से जुड़ा हुआ है और मजदूरों के प्रवास का मामला अर्थिक प्रक्रिया और वर्तमान आर्थिक प्रगति से। जिस तरह देश की अर्थव्यवस्था में रोजगारविहीन विकास हो रहा है उससे संकट और बढ़ेगा। जिस गति से बेराजगारों की संख्या बढ़ रही है उस गति से रोजगार नहीं पैदा हो रहे हैं, उल्टे सरकारों द्वारा अपनायी जा रही नीतियों से रोजगार खत्म हो रहे हैं। कहना न होगा कि यह वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किये गये आर्थिक उदारीकरण का नतीजा है। तथाकथित उदारीकण के शुरूआती दौर में (१९९३-९४) बेरोजगारी ६ प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी। १९९९-२००० में यह दर बढ़ कर ७.३ प्रतिशत हो गयी। इसने दो करोड़ ७० लाख अतिरिक्त बेरोजगार पैदा किए। इससे भी बदतर बात यह है कि इनमें से ७४ प्रतिशत लोग गांवों में रहते हैं और उनमें से ६० प्रतिशत लोग शिक्षित हैं।

जहां तक बिहार की बात है, यहां सभी क्षेत्रों में विकास की हालत काफी बदतर है। नये रोजगार का सृजन नहीं हो रहा है। हाल ही में राज्य के बारे में प्रस्तुत एक सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक बिहार में लगभग चार करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। सरकार ने अपनी सर्वेक्षण रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि उडीस़ा को छोड़ दिया जाये तो देश में सर्वाधिक बुरी हालत बिहार की है। यहां प्रति व्यक्ति आय में काफी अंतर है। राजधानी पटना में प्रति व्यक्ति आय ६,९५८ है तो शिवहर में यह मात्र २,२१९ रु है। बिहार में लगभग ९० प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्राथमिक पोषक के बतौर कृषि आज भी लोगों का मुख्य आधार बनी हुई है। लेकिन इसकी उत्पादकता कम है। बिहार में कृषि मानसून पर बुरी तरह निर्भर है। हालांकि सकल कृषि क्षेत्र का ५७ प्रतिशत भाग सिंचित है। लेकिन यहां की सिंचाई खुद भी मानसून के सतही जल पर ही निर्भर है। राज्य के कुछ भौगौलिक क्षेत्रफल का ७३.०६ भाग बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र है जो पूरे देश के बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र का १७.२ प्रतिशत है। इसके अलावा यहां की औद्योगिक इकाईयों में से ३५ बीआइएफ आर द्वारा बीमार घोषित कर दी गयी हैं। बिहार में उद्योगों के इस तरह बंद होने का सबसे बड़ा कारण अधिसंरचनात्मक सुविधाओं की अपर्याप्तता है। कार्यशील पूंजी की कमी, कच्चे मालों की अनुपलब्धता, सड़कों तथा संचार सुविधाओं का अभाव, ऊर्जा की विपन्न व अनिश्चित स्थिति तथा अनुसंधानों का कमजोर सहयोग ही वे कारक हैं, जिनके कारण बिहार की औद्योगिक स्थिति इतनी बुरी अवस्था में पहुंच गयी। इसका सीधा असर राज्य के रोजगार की संभावनाओं पर पड़ा है।


मगर समस्या केवल बिहार तक ही सीमित नहीं है। देश भर में लगभग सभी बड़े उत्पादक क्षेत्रों में रोजगार के लचीलेपन (इंप्लायमेंट इलास्टिसिटी) में भारी कमी आयी है। कृषि में तो यह शून्य तक पहुंच गयी है। इससे एक तरफ तो देश की अर्थव्यवस्था अबाध गति से वृद्धि कर रही है मगर दूसरी ओर जनता की परेशानियों में भी इजाफा हो रहा है। रोजगार खत्म हो रहे हैं, मंहगाई बढ़ रही है। बाजार में स्पर्धा के नाम पर रही-सही नौकरियां भी खत्म की जा रही हैं। यह ऐसा विकास है जो जनता के लिए न होकर अर्थशाय़ों और पूंजीपतियों के लिए है।


देश के विभिन्न राज्यों के बीच मौजूद असमान विकास या क्षेत्रीय असंतुलन के साथ मिल कर बढ़ती हुई बेरोजगारी बड़े पैमाने पर मजदूरों के प्रवास को बढ़ावा देती है। यह पलायन या प्रवास तब होता है जब पैतृक स्थान पर व्यक्ति या समाज की आवश्यक जरूरतें पूरी न हो रही हों । भारत में राज्यों के बीच इतना असंतुलित विकास हुआ है कि सबसे विकसित और सबसे गरीब राज्य के बीच की खाई को पाटना अब दुरूह प्रतीत होने लगा है।
हमारे देश में कृषि अब भी वर्षा पर आधारित है और इसमें काफी निम्न वृद्धि दर के कारण लगातार रोजगार का क्षय हुआ है। देश भर में बेराजगारी में वृद्धि का एक बड़ा कारण यह भी है। भारत की अर्थव्यवस्था को देखें तो राज्यों के बीच में मजदूरों का प्रवास इसकी बड़ी विशेषता है। यह प्रवास सबसे गरीब और सबसे अविकसित राज्य से होता है। एक अध्ययन के मुताबिक बिहार की एक चौथाई आबादी प्रवास कर गयी है।


ऐसा नहीं है कि पहले बिहार से प्रवास नहीं होता था। मगर तब लोगों के लिए अस्तित्व का संघर्ष इतना तीव्र न था, रोजगार का इतना गहरा संकट न था। तब कलकत्ता या दिल्ली जाने का मतलब यह नहीं होता था कि प्रवासी वहां के लोगों का रोजगार छीन रहे हैं। मगर उदारीकरण के बाद से प्रवास करने का मतलब यह होने लगा है। हाल के वर्षों में बिहारी मजदूर भारी संख्या में विभिन्न राज्यों में गये हैं। लगातार दूसरी तरफ उन राज्यों में भी आम मजदूरों और बेराजगारों के लिए संकट बढ़ा है। प्रवासी बिहारियों के वहां होने का सीधा मतलब यह होता है कि वे उन राज्यों के स्थाई निवासियों के लिए रोजगारों के मौके को कम कर देते हैं। बिहार से गये मजदूर काफी कम मजदूरी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं, जिसका अर्थ यह होता है कि वे स्थानीय मजदूरों की बारगेनिंग क्षमता घटा देते हैं।

बिहार से दो तरह के मजदूरों का पलायन होता है। एक तो वे लोग प्रवास करते हैं जो हाई स्क्ल्डि होते हैं। ये अधिक वेतनमान श्रेणी में आते हैं। इनका रहन-सहन का स्तर भी ऊंचा होता है। मगर इनके प्रवास से अंतर्विरोध कम पैदा होता है क्योंकि इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत मांग कम है। दूसरे तरह के मजदूरों में वे होते हैं जो कम वेतनमान के लिए प्रवास करते हैं । इसमें कम कार्यकुशलता की जरूरत होती है, इसलिए इनकी संख्या ज्यादा होती है इसलिए इस क्षेत्र मे अंतर्विरोध भी अधिक है।

इसके अलावा प्रवासी मजदूरों पर बढ़ते हमलों का एक कारण है हरेक स्तर पर आर्थिक संकट का बढ़ना। जब आर्थिक संकट बढ़ता है तो वह राजनीतिक संकट को भी बढ़ाता है और राजनीतिज्ञ इन संकटों का समाधान बड़े सतही ढंग से करते हैं-वे लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं। वे उनकी सहानुभूति हासिल करने के लिए सारा दोष प्रवासी मजदूरों पर मढ़ देते हैं। इसके बाद वहां से बिहारियों को भगाने का एक जनमत तैयार होने लगता है। यह खतरनाक प्रवृति है, क्योंकि यह बिहारियों के संकट को और बढ़ा देती है।

तो ऐसे में इसका हल क्या हो सकता है? इसके लिए कई स्तरों पर एक साथ काम करना होगा। पहला यह कि सरकार स्थानीय तौर पर रोजगार देने की पूरी जिम्मेदारी ले। दूसरे यह कि दूसरे राज्यों के स्थानीय लोगों को समझाया जाये कि वे मिल कर काम करें। फिर बिहारी मजदूरों को यह कहा जाये कि वे कम दरों पर काम करने के लिए राजी न हों, और फिर वे अपने राज्य में ही संगठित होकर काम के लिए राज्य सरकार पर दबाव डालें, संघर्ष करें।

देश जिस दिशा में ले जाया जा रहा है, उसमें इसकी संभावना कम दिखती है कि सरकारें अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी लेंगी। वे समस्याओं के समाधान में नहीं, तात्कालिक राहतों में भरोसा रखती हैं। यह बिहारियों के लिए कहीं से भी राहत दिलानेवाली बात नहीं है।


जन विकल्‍प के जून ,2007 अंक में प्रकाशित

August 10, 2007

अजय कुमार सिंह











जातिवाद का घिनौना खेल



यह आपबीती 1982 में जन्‍में उत्‍तर प्रदेश के टा जिले के दलित छात्र अजय कुमार सिंह की है जिन्‍होंने सन्‍ 2002 में अखिल भारतीय अयुर्विज्ञान संस्‍थान (एम्‍स) में एमबीबीएस कोर्स में दाखिला लिया सम्‍प्रति वे एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्र हैं।


मैं आठवीं का छात्र था तो 'एम्स` का नाम सुना था। मेरी मां एक नर्स थी और जिस डॉक्टर के साथ वह एटा में काम करती थी, उनका एक भतीजा एम्स का छात्र था। एक बार वह एटा आया। मेरी मां की हार्दिक इच्छा थी कि मैं उससे मिलूं। उसने मुझसे कहा कि एम्स में दाखिला लेने के लिए बहुत पढ़ाई करनी होगी। उसी समय मैंने अपने आप से कहा कि एक दिन मैं जरूर एम्स का छात्र बनूंगा।


टेम्पो चालक पिता मुझे कोचिंग करने के लिए दिल्ली नहीं भेज सकते थे, यदि मेरे भौतिकी के शिक्षक की मदद से फीस में कटौती नहीं हुई होती। एम्स प्रवेश परीक्षा में मुझे ६६.१६ प्रतिशत अंक प्राप्त हुआ जो सामान्य कोटा के न्यूनतम अंक से ज्यादा ही था। मेरे पिता, निरपत सिंह और मां, मुन्नी देवी, को मुझ पर नाज था तथा मेरे आस-पड़ोस, सगे-संबंधियों, मित्रों, शिक्षकों के लिए मेरा एम्स में दाखिला एक बड़ी बात थी।


हॉस्टल में मुझे छोड़कर जैसे ही मेरे माता-पिता वापस लौटे कि मेरा एक सीनियर जो बगल के कमरे में रहता था, ने मुझे अपने कमरे में बुलाकर मेरा परिचय पूछा। जैसे ही उसे मेरी दलित पहचान के बारे में जानकारी हुई उसने मुझे इतनी जोर से धक्का मारकर कमरे से बाहर निकाला कि मैं जमीन पर गिर पड़ा। यह एम्स में मेरा पहला दिन था। दूसरी बार जब उसने मेरा अपमान करना चाहा तो मैंने शिकायत करने की चेतावनी दी। उसके बाद जब तक वह कैम्पस में रहा, उसने मुझसे कोई बात नहीं की और उसके दोस्तों ने मेरा बहिष्कार किया।



तब से लेकर आज तक पल-प्रतिफल मुझे नीच जाति में जन्म लेने की याद दिलायी गयी है। होस्टल के जिस विंग में मैं रहता था वहां 'कैटगरी` छात्र केवल मैं ही था। एक दिन मेरे कमरे के दरवाजे पर कागज पर लिखकर चिपकाया हुआ था, 'तुम्हारा रहना यहां किसी को अच्छा नहीं लगता है।` इसके बाद गंदी गाली लिखी हुई थी। एक और दिन कागज पर लिखकर चिपकाया गया, 'रूम नं.-४५ छोड़कर हर कोई कैरम बोर्ड का इस्तेमाल कर सकता है।` जब न तब मेरे कमरे के दरवाजे को जोर-जोर से पीटा जाता था। जब मैं दरवाजा खोलता था तो वहां कोई नहीं मिलता था। उन्होंने मुझे वहां से भगाने की पूरी कोशिश की, लेकिन मैंने भी प्रण कर लिया कि चाहे जो हो मैं यहां से नहीं जाऊंगा। मैंने धीरे-धीरे अपने को उन लोगों से काट लिया और केवल 'कैटगरी` छात्रों से मिलने जुलने लगा।
मैंने नवोदय विद्यालय में पढ़ाई की थी। वहां मैंने जातिवाद का जो अनुभव किया था वह एम्स के जातिवाद की तुलना में कुछ नहीं था। नवोदय विद्यालय में पढ़ते हुए मैंने सोचा था कि बड़े संस्थानों में पढ़ने से यह समस्या नहीं आयेगी। लेकिन अब मैं देश के सबसे बड़े संस्थान में था और बड़े संस्थानों के बारे में मेरी अच्छी राय निरर्थक साबित हो चुकी थी। कम से कम नवोदय विद्यालय में हमलोग साथ मिलकर खाते तो थे।


यह सही है कि सामान्य वर्ग के सभी छात्र जातिवादी नहीं होते हैं लेकिन जाति एम्स की तमाम चीजों में घुसी है। वे हमसे बात नहीं करते थे। छात्र संघ में हमारा कोई आदमी नहीं है। वे हमें क्रिकेट नहीं खेलने देते थे, बॉस्केटबाल के खेल में हमलोगों को एक बार भी पास नहीं देते थे। जातिगत घृणा वर्ष २००३ के वार्षिकोत्सव में भी खुलकर सामने आई। एम्स के वार्षिकोत्सव को पल्स कहते हैं। उन्होंने एक दलित छात्र को इतनी निर्दयता से पीटा कि उसका जिंदा बच जाना एक चमत्कार ही था। हम शिकायत लेकर गये। लेकिन प्रशासन दोनों (अर्थात् जिसने मारा और जिसने मार खाई!) को ही बर्खास्त करना चाहता था। मार खाने के बाद बर्खास्तगी, इसलिए उसने अपनी शिकायत वापस ले ली। २००६ के 'आरक्षण विरोधी आंदोलन` के समय में हमारे साथ उनकी बदसलूकी की हद हो गयी। उन दिनों कैम्पस में एक हजार से ज्यादा बाहरी लोग आकर रूके हुए थे। वे हमारे होस्टल में सोते थे तथा खाना खाते थे। 'ये चमार लोग क्या करेंगे` जैसे अपमानजनक जुमले हमारे ऊपर फेंके जाते थे। हमारी पिटाई करने के लिए वे हमेशा कोई न कोई झगड़ा करने के लिए तैयार रहते थे। उन्होंने कुछ रेसिडेंट डाक्टरों की पिटायी करने की योजना भी बनायी। शिकायत करना बेमानी था। कोई हमारी शिकायत सुनने के लिए तैयार नहीं था। मीडिया ने घटनाओं की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की मानो एसटी-एससी-ओबीसी सभी आरक्षण का विरोध कर रहे थे। 'कैटगरी` के नये छात्रों को रैगिग में घसीटकर आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए मजबूर किया जाता था। इनमें से कईयों को पुलिस की लाठियां भी पड़ी। उस नये छात्र को ट्रॉमा में जाते हुए मैं देखता रहा। मैंने निदेशक से कहा कि समय सीमा की समाप्ति के बाद भी रैगिंग को लंबा खींचा जा रहा है। निदेशक ने कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने जिमखाना के सचिव, जो कि एक कैटगरी छात्र था, की भी पिटायी की। इससे हमलोग भयभीत हो गये। कोई रास्ता नहीं देखकर हमलोगों ने ज्ञापन देने का फैसला लिया। निदेशक डा. वेणुगोपाल ने चौबीस घंटों के अन्दर कार्रवाई करने का वादा किया-उन्होंने अपने वायदे को पूरा किया। ज्ञापन में जिन लोगों के खिलाफ हमने शिकायत की थी उन्हें सावधान कर दिया गया! वे हम सभी शिकायतकर्ता के पास एक-एक करके पहुंचे और शिकायत वापस लेने के लिए दबाव डाला और शिकायत वापस नहीं लेने की स्थिति में बुरे परिणामों को भुगतने की धमकी दी। हमलोगों ने शिकायत वापस नहीं ली। हमलोगों ने इस बार एम्स के अध्यक्ष को शिकायत भेजी। कोई जवाब नहीं आया। हम फिर मीडिया में पहुंचे। हमलोगों पर पल्स, २००६ में बाधा पहुंचाने का आरोप लगाया गया। जिससे हमारी बदनामी हो सके तथा आम छात्रों की भावनाओं को हमारे खिलाफ किया जा सके। अपनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए हमने पोस्टर चिपकाये कि हम पल्स के खिलाफ नहीं हैं तथा हम केवल इतना ही चाहते हैं कि हमारा उत्पीड़न नहीं हो। पल्स के दौरान एक सीडी का वितरण किया गया जिसमें डॉ भीमराव अम्बेदकर द्वारा लिखी किताबों को जलाते हुए दिखाया गया था। हमने सीडी के खिलाफ प्रेस सम्मेलन बुलाया। मुझे ज्यादा समर्थन नहीं मिला। एक जांच समिति गठित की गयी। उल्टा मुझसे ही सवाल किया गया कि मैं एम्स की छवि क्यों बिगाड़ना चाहता हूं। मैंने जवाब दिया कि जब हमारी मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था तो ऐसा करने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। कभी किसी 'कैटगरी` छात्र ने इस तरह अपनी आवाज नहीं उठायी थी।


उन्होंने मुझे सबक सिखाने के लिए तथा बाकी 'कैटगरी` छात्रों में डर पैदा करने के लिए मुझे दिसम्बर में आयोजित फाइनल प्रोफेशनल परीक्षा में फेल कर दिया। तीन बार फेल करने पर मैं मेडिकल की पढ़ाई से बाहर कर दिया जाऊंगा। मेरी दोबारा परीक्षा ली गयी जिसका विडियो रिकार्डिंग कराया गया। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। यदि उन्होंने पहले से मुझे सूचित किया होता तो विडियो रिकार्डिंग के तहत परीक्षा देने में मुझे समस्या नहीं होती। मैंने निदेशक को एक और पत्र लिखा जिसमें गैर-कानूनी ढंग से विडियो रिकार्डिंग कराये जाने के खिलाफ शिकायत की। परीक्षा परिणाम आने के एक दिन पहले मेरा परीक्षा परिणाम लीक कर दिया गया। पूरे कैम्पस में पोस्टर साट दिया गया कि जिस छात्र ने प्रेस सम्मेलन बुलाया था तथा शिकायत की थी वह फेल कर गया है। मैंने पुलिस में शिकायत दर्ज करवायी। हमलोगों ने कई प्रतिरोध दर्ज किये जिसके परिणामस्वरूप केन्द्र सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष सुखदेव थोराट की अध्यक्षता में मामले की जांच के लिए एक कमिटी गठित की। एम्स के निदेशक ने कमिटी को काम करने के लिए एक कमरा तक नहीं उपलब्ध कराया तथा सुनवाई कैम्पस से बाहर हुई। मैंने सभी को इकट्ठा किया तथा समूह में कमिटी के सामने हम उपस्थित हुए।


मैं जानता था कि मैं फिर फेल करूंगा क्योंकि जो एकमात्र सवाल साक्षात्कार में मुझसे किया गया वह था कि 'थोराट रिपोर्ट के संदर्भ में आपकी संलिप्तता कितनी है?` छ:-सात छात्रों को आंतरिक मूल्यांकन में मुझसे कम अंक प्राप्त हुए थे, किन्तु वे सभी पास हो गये, जबकि मैं फेल कर गया। डेढ़ नंबर से मैं मेडिसिन में फेल कर दिया गया। मुझे बाद में पता चला कि फैकल्टी ऐसोशियेसन ने साक्षात्कार से दो दिन पूर्व प्रस्ताव पारित किया था कि कोई भी मेरा दुबारा साक्षात्कार नहीं लेगा। निदेशक ने गवर्निंग निकाय के इस आदेश को अब तक नहीं माना है कि नये परीक्षकों द्वारा दोबारा मेरी परीक्षा ली जाये।


यह सब मेरे जूनियरर्स को हड़काने के लिए किया जा रहा है। मैं फाइनल वर्ष में हूं। कॉलेज से मेरे निकलने के बाद मेरा उदाहरण मेरे जूनियरों को आतंकित करने के काम आयेगा।


पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय, संयुक्त राज्य अमेरिका में मुझे इंटर्नशिप करने का मौका मिला। एम्स इस बारे में कुछ कर नहीं सकता था। लिहाजा उन्होंने वहां अपने सीनियर्स से सम्पर्क साधा। मैंने सुना है कि उन्होंने उनको आश्वस्त किया है कि 'उसे ठीक कर दिया जाएगा।`


यदि मेरे भाग्य में डाक्टर बनना नहीं लिखा है तो मैं डाक्टर नहीं बन पाऊंगा। मैं भले कभी डॉक्टर न बन पाऊं किन्तु मुझे अन्याय एवं उत्पीड़न के खिलाफ खड़े होने का संतोष है। इसके पहले एम्स में आवाज नहीं उठी थी। लेकिन लोग अब विरोध में बाहर निकल रहे हैं। एम्स में फिलहाल ४५ 'कैटगरी` छात्र हैं और जब भी विरोध आयोजित किया जाता है। कम-से-कम चालीस जरूर उपस्थित होते हैं।


मेरे पिता टेम्पो चालक हैं किन्तु मेरे गृहशहर में उनकी बहुत इज्जत है। मेरे माता-पिता ने मुझे अपनी गरिमा को बचाए रखने की शिक्षा दी है, इसके लिए चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े। और मैं अभी वही कर रहा हूं। यद्यपि यह इतना आसान नहीं है किन्तु असंभव भी नहीं है।

(प्रवीण धोंथी से बातचीत पर आधारित अंग्रेजी साप्ताहिक 'तहलका` के २ जून, ०७ के अंक में प्रकाशित, अनुवाद : ज.वि.टी.)
जन विकल्‍प के जून,2007 अंक में प्रकाशित

July 23, 2007

पंकज पराशर


अमेरिकी हित बैंक



पने तानाशाही रवैये और कई तरह के आरोपों के कारण विश्व बैंक के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के समय से ही पॉल वुल्फोवित्ज विवादों में रहे हैं। अपनी कार्यशैली की वजह से बैंक अधिकारियों से भी उनकी कभी नहीं बनी। आरोपों को उन्होंने जैसे अलंकार की तरह धारण कर लिया था और प्रशासन चलाने का उनका अंदाज किसी देश के तानाशाह-शासक की तरह था। वुल्फोवित्ज ने विश्व बैंक में कार्यरत अपनी प्रेमिका शाहा रिजा का न केवल मनमाने ढंग से वेतन बढ़ा दिया था बल्कि प्रोन्नति के मामले में भी सारे नियम-कानून और परंपराओं को ताक पर रख दिया था। हद तो यह है कि इस्तीफे की घोषणा के बाद उन्होंने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि रिजा की वेतन वृद्धि के मामले में उनसे कुछ गलतियां हुई हैं लेकिन जो कुछ उन्होंने किया था वह अच्छी भावना से ही किया था। इसके पीछे उनकी कोई चालबाजी नहीं थी। अपना इस्तीफा देेने का कारण भी उन्होंने विश्व बैंक के हित को बताया न कि यह कि उनके कार्यकाल में विश्व बैंक दरअसल 'अमेरिकी हित बैंक` बनकर रह गया था-भ्रष्टाचार के इतने आरोपों के अलावा।

वुल्फोवित्ज की २००५ में विश्व बैंक में नियुक्ति के समय ही यूरोपीय संघ के कुछ वित्त मंत्रियों ने इस नियुक्ति पर गंभीर चिंता जाहिर की थी लेकिन अमेरिका समर्थक मीडिया ने यूरोपीय संघ के वित्त मंत्रियों की चिंता को खबर के लायक नहीं माना। नतीजा आज सामने है और इस नतीजे को देखकर आज जो पूंजी समर्थित मीडिया इसमें गर्मा-गर्म खबर की तलाश कर रहा है उसने ही उस वक्त उन वित्त मंत्रियों के इस आग्रह को अपना समर्थन नहीं दिया था कि वे वुल्फोवित्ज की नियुक्ति से पहले उनसे एक बार मुलाकात करना चाहेंगे। ब्रिटेन के विकास मामलों के मंत्री हिलेरी बैन ने इस पूरे घटनाचक्र पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि इस घटना ने बैंक को काफी नुकसान पहुंचाया है। जर्मनी के विकास मंत्री हाइडमारी विजोरेक जील ने भी कहा कि पॉल वुल्फोवित्ज को स्वयं से ही यह पूछना चाहिए कि उन्होंने अपने अड़ियल रवैये के कारण बैंक को कितना नुकसान पहुंचाया है। इराक के युद्ध के प्रबल पैरोकार पॉल वुल्फोवित्ज व्हाइट हाउस के वफादार नेताओं में से रहे हैं और वे अमेरिका के रक्षा उपमंत्री भी रह चुके हैं। विश्व बैंक में नियुक्ति से पहले वुल्फोवित्ज की छवि एक आक्रामक और स्वामीभक्त की रही है और उनकी नियुक्ति भी अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के द्वारा नामांकन करने के बाद हुई थी। गौरतलब है कि विश्व बैंक का अध्यक्ष सामान्य तौर पर अमेरिका का उम्मीदवार ही होता आया है और इस बैंक में 'वर्ल्ड` केवल संज्ञा भर है।
वर्ल्ड बैंक के (अ) भूतपूर्व अध्यक्ष वुल्फोवित्ज के कारनामे से विश्व बैंक की छवि इतनी खराब हो गई थी कि जो विश्व बैंक दुनिया भर में भ्रष्टाचार से निबटने की बातें करता था वह खुद इसमें आकंठ संलिप्त था। जब वे अध्यक्ष बने थे तो अपनी कड़क और तानाशाही छवि को स्थापित करने के लिए उन्होंने कई देशों को दी जाने वाली सहायता राशि रोक दी। मगर शाहा रिजा के वेतन के मामलेे में नियमों के खिलाफ जाकर उन्होंने फैसला लिया और हालत यह हो गई कि शाहा रिजा का वेतन अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइज से भी अधिक हो गया। हालांकि हितों के टकराव को ध्यान में रखकर रिजा का तबादला विदेश मंत्रालय में कर दिया गया था लेकिन वह इस तबादले से कतई खुश नहीं थी और तरह-तरह से तिकड़म भिड़ा रही थी। इसके बाद वर्ल्ड बैंक स्टाफ एसोसिएशन की प्रतिनिधि एलिस केव ने अध्यक्ष पॉल वुल्फोवित्ज के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उनके खिलाफ माहौल लगातार गर्म होता चला गया। स्टाफ एसोसिएशन के कड़े रूख के बाद उनकी सभी रणनीतियां असफल होने लगीं तब उनके पास अपने पद को छोड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा।

गौरतलब है कि विश्व बैंक के सदस्य १८० से अधिक देश हैं। यूरोप के कई नेताओं ने भी वुल्फोवित्ज के तुरंत इस्तीफे की मांग की थी। इस्तीफे की वजह से वुल्फोवित्ज से अधिक परेशानी अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को थी। क्योंकि बुश के प्रति इतना स्वामीभक्त विश्व बैंक में शायद ही कोई और आए। १९८९ से १९९३ तक वर्तमान राष्ट्रपति जार्ज बुश के पिता के कार्यकाल में भी वे रक्षा मामलों के अंडर सेक्रेटरी थे। वे आज के उपराष्ट्रपति डिक चेनी के साथ भी काम कर चुके हैं। वरिष्ठ बुश के प्रति वफादार वुल्फोवित्ज ने जूनियर बुश के प्रति भी अपनी वफादारी दिखाई है और बुश प्रशासन के सबसे अधिक आक्रामक नेताओं में से एक उन्हें माना जाता है। इराक युद्ध के बाद वैसे भी बुश की लोकप्रियता का ग्राफ विश्व में जितनी तेजी से गिरा है और अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाने वाले चरमपंथी गुटों की गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ी हैं वह भी उनकी चिंताओं का एक कारण है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि व्हाइट हाउस ने पहले वुल्फोवित्ज का भारी समर्थन किया था, लेकिन जब विश्व बैंक सहित पूरी दुनिया में उनके खिलाफ रोष दिखा तो राष्ट्रपति बुश को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कहना पड़ा कि उन्हें इस बात का बहुत अफसोस है कि विश्व बैंक में ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई।

ताजा मिली एक खबर के मुताबिक विश्व बैंक के निवर्तमान अध्यक्ष पॉल वुल्फोवित्ज के स्थान पर अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश ने विश्व बैंक के अगले अध्यक्ष पद के लिए रोंबर्ट जोएलकि का चयन कर लिया है जिसकी औपचारिक घोषणा वे जल्दी ही कर देंगे। वुल्फोवित्ज हालांकि जून माह के अंत तक अध्यक्ष पद पर बने रहेंगे। रॉबर्ट जोएलिक का परिचय यह है कि वे अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रतिनिधि और उप विदेश मंत्री रह चुके हैं और विश्व व्यापार संगठन की दोहा दौर की वार्ता को आगे बढ़ाने में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई थी। इसके साथ ही सूडान में विद्रोही नेताओं के साथ समझौता कराने में भी मध्यस्थता के लिए उन्हें याद किया जाता है। उनके संबंध में यह जान लेना शायद सबसे जरूरी है कि जोएलिक इराक युद्ध की योजना बनाने वालों में से नहीं रहे हैं और बुल्फोवित्ज की तरह वे किसी विवाद में भी नहीं रहे हैं।

यह आरोप नया नहीं है कि विश्व बैंक ने धनी देशों के दवाब में या कहें खास तौर से अमेरिका के दवाब में न सिर्फ वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया है बल्कि गरीब देशों को ऋण के एवज में धनी देशों के उत्पाद के लिए अपने बाजारों को खोलने के लिए तरह-तरह से दवाब भी बनाया है। कहना न होगा कि वर्ल्ड बैंक की इस कार्यशैली के कारण बार-बार उस पर ऊंगली उठाई जाती है। वुल्फोवित्ज ने जिस तरह से एक साथ अपनी तानाशाही और प्रेम दोनों को एक साथ साधना चाहा वह तो उनसे सध नहीं पाया, अलबत्ता इतना जरूर हुआ कि सम्राट अष्टम एडवर्ड की तरह उनकी कुर्सी भी गई और प्रेमिका भी नाराज हो गई।