August 18, 2010

अपने गिरेबां में..




पंकज शर्मा
देश की पहली पेड न्यूज पर आधारित प्रकाशित पुस्तिका में छपा आलेख – 13कैसे थमे खबरों का कारोबार 
अच्छा हुआ कि मई 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान ज्यादातर मीडिया–समूहों ने नंगाई की सारी हदें पार कर दीं। अगर ऐसा न होता तो अंधेरे कोनों में पेड न्यूज का बिस्तर अभी पता नहीं कितने अरसे इतनी ही बेशर्मी से गर्म होता रहता? लेकिन क्या यह धंधा इसी चुनाव से शुरू हुआ था और क्या पेड न्यूज की कारस्तानी सिर्फ राजनीतिक दुनिया तक ही सीमित है? क्या सिर्फ यह हल्ला मचा लेना ही काफी है कि पेड न्यूज के काले धंधे को बंद किया जाए? आखिर वह मट्ठा कौन–सी हांडी में रखा है, जिससे इस धंधे की जड़ें चौपट हो सकती है?

खबरों को प्रभावित करने की कोशिशें जमाने से होती रही है। इसमें कुछ भी नया नहीं है। मुझे नहीं लगता कि कभी ऐसा जमाना रहा होगा, जब यारी–दोस्ती के नाम पर, खाने–पीने के नाम पर होली–दीवाली के नाम पर, खबरों में तोड़–मरोड़ नहीं होती रही होगी। तीस साल पहले जब मेरे जैसे लोग पत्रकारिता में आए थे तो पैसे के लेन–देन की बातें सुनने को नहीं मिलती थी। उस जमाने के राजनीतिक अखबारनवीसों से अपने संबंध बनाए रखने के लिए अगर ज्यादा से ज्यादा कुछ करते थे रात्रि–भोज और रस–पान का थोड़ा–बहुत पत्रकारों को तब शायद थोड़ी ज्यादा सहूलियतें मिल जाया करती थी। पत्रकारिता में लिफाफा संस्कृति की शुरूआत अगर कहीं से हुई तो फिल्म पत्रकारिता से और फिर व्यापार–पत्रकारिता से। मुझे याद है कि किस तरह ऐन वक्त तक लिफाफा नहीं मिलने पर एक नामी फिल्म समीक्षक ने उस जमाने में आई रेखा कि हिट फिल्म ‘खूबसूरत’ की अपने अखबार में रेड पीट दी थी। इस दौर में व्यापार – पत्रकारिता करने वाले संवाददाताओं में से ज्यादातर ने अपने गुट बना रखे थे और उन्हें प्रेस कान्फ्रेंस में लिफाफे मिलने शुरू हो गए थे।

लेकिन दुनिया तेजी से बदलने लगी थी। 1985–86 आते–आते प्राथमिकता के आधार पर बड़ी–बड़ी कंपनियों के शेयर नामी संपादकों और संवाददाताओं को मिलने की बातें होने लगीं, जिनके दर्शन कर मुझ जैसे कस्बाई बालक अपने को दिल्ली–मुंबई में धन्य समझते थे, उनके बारे में ऐसी–ऐसी बातें सुनने को मिलने लगीं कि मानने को मन नहीं करता था। अस्सी–नब्बे के दशक में तेजी से अपना विस्तार कर रही निजी कंपनियों ने अपने झोले से शेयर निकाल–निकाल कर मीडिया–जगत में बांटने शुरू कर दिए और जिन्हें शेयर–कारोबार की समझ थी, उनमें से शायद ही किसी ने तब बहती गंगा में हाथ धोने से गुरेज किया होगा। उस दौर में जीन्स पहनकर पत्रकारिता में नई आचार संहिता की शुरूआत करने वाले दिग्गज तो खैर कई कंपनियों के शेयर–धारक हो ही गए थे, मगर इंदिरा गांधी से अपने करीबी को लेकर इतराने वाले और बाद में भारतीय जनता पार्टी का भगवा थाम कर प्राण दे देने वाले एक परंपरावादी बुजुर्ग संपादक भी अपने सामने नाचते शेयर पत्र देखकर ऐसे स्खलित हुए कि बड़े–बड़े हकबका गए।

अब कैसे मान लिया जाए कि तब के धन्ना सेठों की कंपनियों को अपने हाथ–पैर पसारने में मीडिया जगत की तत्कालीन हस्तियों से मदद नहीं मिली होगी? और, आजादी के बाद देश का मीडिया कब इतना आजाद था कि अपने मालिक के इशारे पर खबरों में जोड़–घटाव का काम नहीं करता होगा? बावजूद इसके कि संपादकों और पत्रकारों की आंखों का पानी काफी बाकी था, क्या ऐसे संपादकों की कोई कमी थी जो हर सुबह मालिक या उसके रिश्तेदारों के पैर छूने जाया करते थे? क्या ऐसे मालिकों की कोई कमी थी, जो गैर–मीडिया कारोबार  करने वाले अपने मित्रों को अपने अखबार के जरिये हर तरह की मदद मुहैया कराया करते थे? आखिर इसे किस पेड न्यूज के दायरे में रखेंगे आप? विज्ञापनों की दुनिया से अपना जलवा शुरू करने के बाद संपादक बन गए और बाद में शिवसैनिक तक की गति को प्राप्त हुए एक नामी–गिरामी चेहरे ने तो कला की दुनिया तक को नहीं बख्शा था। आज हुसेन समेत तमाम कलाकारों की कृतियां यूं ही करोड़ों में नहीं बिक रही है। इस शख्स ने तब अपनी पत्रिका के पन्नों पर मुहिम चलाई थी कि कलाकृतियों में निवेश से जितना फायदा भविष्य में होगा, न जमीन में निवेश से होगा, न सोने में निवेश से। उस दौर में जिन कलाकारों का महिमा–मंडन हुआ, उनके पीछे कौन–सी आर्ट गैलरियां थी।

सरकारी और निजी कंपनियां पत्रकारों को अपने समारोह कवर कराने के लिए विमानों से ले जाने लगीं। राज्य सरकारें नामी पत्रकारों को अपने विकास कार्यो का जायजा लेने बुलाने लगीं। विदेशी सरकारें प्रभावशाली पत्रकारों को अपने देश घुमाने लगीं। अप्रत्यक्ष पेड न्यूज का धंधा दीवाली के चांदी के सिक्के से बहुत आगे निकल गया। अमेरिका से नए–नए सीख कर आए एक नौजवान मीडिया मुगल ने अपने समूह के संपादकों को पहले तो हुक्म दिया कि वे प्रायोजित दौरे पर गए संवाददाताओं की रपटों के नीचे यह सूचना छापे कि रपट प्रायोजित है। फिर उसने हुक्म सुनाया कि सभी संवाददाता पत्रकार सम्मेलनों में मिले तोहफे कंपनी के स्टोर में जमा कराएं। हाल यहां तक पहुंचा कि देश के मीडिया शिखर पर बैठी इस कंपनी ने अपने अखबारों के संवाददाताओं को खुद के खर्च पर भेजना ही बंद कर दिया और उन्हें सिर्फ प्रायोजित दौरों पर जाने की इजाजत दी जाने लगी।

बाद में मुद्रित शब्द को बाकायदा बेचने की संस्थागत शुरुआत अपने को ‘अखबार की कीमतों का चौकीदार’ घोषित करने वाले इसी मीडिया समूह ने की। निजी किस्म के सामाजिक समारोहों की खबर और तसवीर शुल्क लेकर छापने से यह धंधा आरंभ हुआ। पेज–थ्री खुलेआम बिकने लगा और इन रपटों में कही इस बात का जिक्र नहीं होता था कि खबर छापने के लिए पैसे लिए गए हैं। कंपनी के मालिक ने एक अलग विभाग बनाया और खबरों को छापने का रेट–कार्ड छापा। अब तक प्रायोजित फीचर और विशेष परिशिष्टों का ही जमाना था और उनके बारे में पाठक जानते थे कि इस सामग्री के प्रकाशन के लिए भुगतान लिया गया है। मगर अब खबरों को बेचने का धंधा शुरू हो गया था और पाठक को यह मालूम ही नहीं होता था कि किस फ्लॉप फिल्म को लाजवाब बताने के लिए, किसी शादी–पार्टी की तसवीरें छापने के लिए और किस उत्पाद के लांच की खबर के लिए बाकायदा एक रेट–कार्ड के आधार पर पैसा वसूला गया है और इस सबके पीछे मालिक की दलील क्या थी? दलील यह है कि जब कंपनियों और व्यक्तियों के जनसंपर्क अधिकारियों–संवाददाताओं की मिलीभगत से इस तरह की खबरें और तसवीरें उनके अखबारों में छपती ही रहती हैं तो इसका सीधा लाभ कंपनी को ही क्यों न मिले?

चंद बरस पहले इस कंपनी ने एक और काम शुरू किया। उसने एक–एक कर पचासों कंपनियों के साथ यह समझौता किया कि वे उसके अखबारों में विज्ञापन के बदले उसे पैसे देने के बजाय एक निश्चित संख्या में अपने शेयर दे दें। विज्ञापनदाता कंपनी को लगा कि आज के भाव पर शेयर देने में फायदा है और मीडिया कंपनी जानती थी कि शेयर बाजार का धंधा किस तरह चलता है। अब आम पाठक को कौन यह बताएगा कि किस–किस कंपनी से मीडिया समूह का सीधा हित जुड़ा है और उन कंपनियों के उत्पादों के बारे में उसके अखबारों में छपने वाली खबरों से शेयर की कीमतों पर कैस असर पड़ रहा है? इसे पेड न्यूज की श्रेणी में रखा जा सकता है या नहीं? यह मीडिया समूह देश का सबसे बड़ा आर्थिक अखबार भी निकालता है। हाल ही में उससे एक डिप्टी एडिटर को मुंबई में एक कंपनी से उसके खिलाफ खबर नहीं छापने के लिए सात लाख रुपए लेते हुए पुलिस ने पकड़ लिया। 1 करोड़ रुपए मांगे गए थे, 25 लाख में सौदा हुआ व 7 लाख पहली किस्त थी।

लब्बोलुआब यह कि खबरों की तोड़–मरोड़ का खेल राजनीति के मैदान से बढ़कर दूसरे मैदानों में खेला जा रहा है। राजनीति की दुनिया में तो इसकी शुरूआत उन लोगों ने की, जो एक धक्का और देने का नारा लगा कर तमाम मूल्यों को जमींदोज करने को ही सच्चा हिंदुत्व मानते हैं और जो समाजवाद के नाम पर पूंजी डांस–बार में नंगे नाच रहे हैं। सियासत को आमोद–प्रमोद–रंजन–मनोरंजन में तब्दील करने वालों ने मीडिया का इस्तेमाल करने के लिए अपने दादा–परदादाओं द्वारा निकाले गए अखबारों को उनके बेटों–पोतों ने इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में अपनी टपकती लार सुड़कते हुए कुछ राजनीतिकों की कलाई का गजरा बना दिया। पैकेज और री–चार्ज पैकेज में अच्छे–अच्छों को डिगा दिया। चुनावी सर्वे के नाम पर टेलीविजन के परदों पर रहे खेल को भी सब समझ गए। अच्छा है कि आज सब पेड न्यूज के खिलाफ एक सुर में आलाप लगा रहे हैं। मार्क्सवादी प्रकाश करात और भाजपा की सुषमा स्वराज मिलकर पेड न्यूज पर पाबंदी के लिए कानून लाने की बात कर रहे हैं। सभी राजनीतिक दल अब इस सोच में डूब गए हैं कि 32 साल पहले बनी प्रेस काउंसिल आखिर कर क्या रही है उसे और ज्यादा अधिकार दिए जाने जरूरी है। कुछ को लग रहा है कि निर्वाचन आयोग को इस मामले में कुछ अधिकार दे दिए जाने चाहिए। जब जागो, तब सवेरा। लेकिन निवेदन यह है कि पेड न्यूज के सिर्फ राजनीतिक मैदान को देखने से ही काम नहीं चलेगा। इस मैदान से भी कई बड़े मैदान हैं, जहां की चियर–गर्ल्स ज्यादा सनसनीखेज जलवे दिखा रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि राजनीतिकों पर चुनाव के वक्त पड़ने वाले मीडिया के दबाव में उनकी चीख निकाल दी है और बाकी मैदानों के खिलाड़ी खुशी–खुशी मीडिया के साथ है, लेकिन पेड न्यूज तो पेड न्यूज है। हमला तो जड़ पर होना चाहिए। इसलिए किसी भी समाज या सरकार को तय तो यह करना होगा कि कैसे सब अखबार मालिक यह सार्वजनिक घोषणा करें कि मीडिया–समूह के अलावा उनके व्यापारिक हित और कहां–कहां जुड़े हैं? वे किस राजनीतिक दल की किस कुर्सी पर विराजमान हैं? किसी कंपनी में उनके कितने शेयर हैं? कहां किस निर्माण कार्य की ठेकेदारी उनकी किस कंपनी ने ले रखी है? उनके मीडिया समूह में किस–किस की कितनी पूंजी लगी है? अगर सरकार ने उन्हें मीडिया गतिविधि के लिए रियायती जमीन दी है तो उसके कितने प्रतिशत हिस्से का वे मीडिया गतिविधि के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और कितने का बाकी किसी और व्यावसायिक गतिविधि के लिए? ऐसी ही सार्वजनिक घोषणा अखबारों और चैनलों के संपादक करें, बाकी पत्रकार करें। प्रार्थना कीजिए कि कभी ऐसा दिन आए!
पंकज शर्मा
कार्यकारी संपादक, कांग्रेस संदेश, नई दिल्‍ली 

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